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बुलंदशहर हिंसा: फिर अपने बयान से पलट गए योगी आदित्यनाथ!

जानिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले क्या कहा था और अब क्या कहा...

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20 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 19 दिसंबर 2018, 04:34 AM IST)
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उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष ने बुलंदशहर मामले पर हंगामा किया. इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया कि बुलंदशहर के पीछे राजनैतिक साज़िश थी. उधर 83 पूर्व नौकरशाहों ने बुलंदशहर की घटना पर एक ओपन लेटर लिखकर योगी का इस्तीफ़ा मांगा है (फोटो: रॉयटर्स)
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बड़ी साज़िश है. मॉब लिंचिंग नहीं, दुर्घटना है. राजनैतिक षड्यंत्र है.
ये तीनों बातें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कही हैं. आगे-पीछे, अलग-अलग मौकों पर. तीनों ही बातें बुलंदशहर हिंसा के बारे में कही गई हैं. राजनैतिक साज़िश वाला बयान सबसे ताज़ातरीन है. 19 दिसंबर को उत्तर प्रदेश विधानसभा में हंगामा हुआ. विपक्ष चाहता था कि बुलंदशहर मामले पर विधानसभा में बहस हो. सरकार इसके लिए राज़ी नहीं थी. विपक्ष नारेबाज़ी कर रहा था. नारों का एक सैंपल पढ़िए-
कानून व्यवस्था ध्वस्त है, योगी बाबा मस्त है.
इस हंगामे की वजह से फिर विधानसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई. इसके बाद आए CM योगी. वो मीडिया से बात कर रहे थे. बोले-
बुलंदशहर की घटना एक साज़िश थी और साज़िश का पर्दाफाश हो चुका है. ये साज़िश वही लोग कर रहे हैं, जिन लोगों ने प्रदेश में ज़हरीली शराब बनाकर यहां के निर्दोष लोगों को मारने का प्रयास किया था. ये राजनैतिक षड्यंत्र था और राजनैतिक षड्यंत्र वही लोग करते हैं, जो कायर हैं. जो आमने-सामने किसी चुनौती को फेस करने की स्थिति में नहीं हैं, पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकती हुई देख करके एक-दूसरे को गले लगाने का प्रयास कर रहे हैं और निर्दोष नागरिकों को अपनी साज़िश का शिकार बनाना चाहते हैं.
मुख्यमंत्री ने जो आरोप लगाए हैं, उन्हें साबित भी करें 19 दिसंबर को जब योगी आदित्यनाथ ये बयान दे रहे थे, उस समय ख़बरें चल रही थीं. कि बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी पार्टी (SP) और राष्ट्रीय लोकदल (RLD) ने हाथ मिला लिया है. 3 दिसंबर से लेकर 19 दिसंबर के बीच शायद ये पहला मौका था, जब बुलंदशहर की घटना को राजनैतिक साज़िश का ऐंगल दिया गया. अगर ये सच है कि बुलंदशहर घटना के पीछे कोई राजनैतिक साज़िश है, तो ये बड़ा गंभीर मामला है. सरकार को चाहिए कि वो ये आरोप साबित करे. क्योंकि सरकार बस आरोप लगाकर नहीं रह सकती. उस पर दोषियों को सज़ा देने की भी जिम्मेदारी है. मगर बार-बार बयान क्यों बदल रहे हैं मुख्यमंत्री? क्या ये संयोग है कि जब विपक्ष सरकार को इस मामले पर घेरने की कोशिश कर रही है, तब ही सरकार इसे पॉलिटिकल कॉन्सपिरेसी बता रही है! इतनी बड़ी और गंभीर घटना पर बार-बार बयान बदल रहा है. बार-बार इसका ऐंगल बदला जा रहा है. अगर 19 दिसंबर को विपक्ष हंगामा नहीं करता, तो क्या ये राजनैतिक साज़िश वाली बात कहते मुख्यमंत्री? क्या उनका ये आरोप रिऐक्शनरी था? अपने ऊपर उठते सवालों की प्रतिक्रिया में उपजा था? इस तरह के कैजुअल बयान ग़लत सिग्नल देते हैं. इससे लगता है कि अपराध के ऐसे संगीन मामलों की आड़ में राजनीति साधने की भी कोशिश की जा रही है. 83 रिटायर्ड नौकरशाहों ने बुलंदशहर घटना पर खुला ख़त लिखा था सरकार के रुख से कुछ ग़लत सिग्नल तो यकीनन मिल रहा है. शायद इसीलिए रिटायर्ड नौकरशाहों ने योगी सरकार के नाम एक खुला ख़त लिखा है. इस ओपन लेटर पर 83 नौकरशाहों के दस्तख़त हैं. इनमें पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (ये पोस्ट फिलहाल अजीत डोभाल के पास है) शिव शंकर मेनन और पूर्व विदेश सचिव श्याम शरण और दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल नजीब जंग भी शामिल हैं. इस चिट्ठी का निचोड़ ये है-
नफ़रत की राजनीति का नतीजा थी बुलंदशहर में हुई इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या. ये एक निर्मम हत्या थी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुसंख्यकों के हावी रहने की राजनीति करते हैं. ऐसा लगता है कि इस अजेंडा ने सबसे ऊपर अपनी जगह बना ली है. योगी आदित्यनाथ की सरकार में गुंडागर्दी और बदमाशी सरकारी कामकाज़ का हिस्सा हो गए हैं. जो कोई भी अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति निष्पक्ष रहने की कोशिश करता है, फिर चाहे वो पुलिस और प्रशासन के ही लोग क्यों न हों, उन्हें भी सबक सिखाने की कोशिश की जाती है.
चिट्ठी में योगी आदित्यनाथ से इस्तीफ़ा मांगते हुए लिखा गया है-
योगी आदित्यनाथ खुलेआम अपनी धर्मांधता, अपनी कट्टरता ज़ाहिर करते हैं. बुलंदशहर में भीड़ ने जो हिंसा की, जिसकी वजह से एक पुलिस अफसर की हत्या कर दी गई, वो नफ़रत की राजनीति के सबसे ख़तरनाक मोड़ पर पहुंचने का मामला है. सुबोध कुमार सिंह की हत्या बहुसंख्यकों की ताकत दिखाने की सोची-समझी कोशिश थी. इसके द्वारा इलाके के मुसलमानों को मेसेज दिया गया. 
योगी आदित्यनाथ मौके की गंभीरता नहीं समझते! इस चिट्ठी में लिखा है कि मुख्यमंत्री घटना की गंभीरता को नहीं समझते. न ही वो हिंसा करने वालों की खुलकर आलोचना करते हैं. न पुलिस को सीधे-सीधे उनके खिलाफ कार्रवाई करने को कहते हैं. ये सब छोड़कर वो पुलिस से गैरक़ानूनी गोकशी पर फोकस करने को कहते हैं. योगी के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं. लिखा है-
हमारे प्रधानमंत्री, जो कि अपने चुनाव प्रचार में इतना व्यस्त हैं, वो ऐसे मामलों पर ख़तरनाक चुप्पी बनाए हुए हैं. 
इस ओपन लेटर में चीफ सेक्रटरी, DGP, गृह सचिव और प्राशासनिक सेवा के बाकी बड़े अधिकारियों से अपील की गई है कि वो अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाएं और बिना डरे कानून व्यवस्था बहाल करें. इन नौकरशाहों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से अपील की है कि वो बुलंदशहर घटना पर संज्ञान ले और न्यायिक जांच का आदेश दे. ताकि इस मामले से जुड़ी सच्चाई सामने आए. इसके पीछे की राजनीति का पर्दाफाश हो. जिम्मेदारियां तय हों और ज़रूरी कार्रवाई सुनिश्चित हो. क्या इसका मतलब है कि बुलंदशहर मामले की फिलहाल जैसी जांच हो रही है, वो निष्पक्ष नहीं है? क्या इस केस को ट्रैक से भटकाया जा रहा है? क्या सरकार के बर्ताव के कारण उसकी विश्वसनीयता पर संदेह पैदा हो रहा है? इतने सारे टॉप के पदों पर रहे रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स ने ये सब लिखने की ज़रूरत क्यों समझी, इसपर बात होनी चाहिए. विपक्ष का इल्ज़ाम, सरकार इंस्पेक्टर सुबोध के हत्यारों को बचा रही है विपक्ष ने योगी आदित्यनाथ की राजनैतिक साज़िश वाली बात को ख़ारिज कर दिया. विपक्ष का आरोप है कि सरकार इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के क़ातिलों को बचाने की कोशिश कर रही है. उन लोगों को बचा रही है, जिन्होंने कथित तौर पर दंगा भड़काने की कोशिश की. राजनीति अलग चीज है, सरकार चलाना अलग 3 दिसंबर को बुलंदशहर के स्याना में मॉब लिंचिंग हुई. इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह भी़ड़ के हाथों मारे गए. ये सारा मामला गोकशी के कथित आरोप को लेकर शुरू हुआ. उस कथित गोकशी की रिपोर्ट लिखवाने वाला योगेश राज इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या के केस में मुख्य आरोपी है. योगेश घटना के बाद से ही फरार है. पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई है. घटना के बाद कुछ दिनों तक तो इसी बात का कन्फ्यूजन बना रहा कि पुलिस की प्राथमिकता क्या है. इंस्पेक्टर की मॉब लिंचिंग के दोषियों को पकड़ना. या फिर कथित गोकशी की जांच. ये कन्फ्यूजन दूर किया योगी आदित्यनाथ ने. उन्होंने प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया कि गोकशी के मामले को वरीयता दी जाए. सरकार की आलोचना के लिए मुद्दे तो हैं. सवाल भी हैं पूछे जाने के लिए. लेकिन अगर सवालों के जवाब की जगह रोज़-रोज़ थिअरी बदलती रही, तो स्थिति और गंभीर हो जाएगी. आख़िरकार राजनीति अलग चीज होती है और सरकार-प्रशासन अलग चीज. दोनों का घालमेल हुआ, तो भरोसा किसपर बचेगा?
पुलिस ने गोकशी के इल्जाम में कैद चार लोगों को बेगुनाह बताया

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