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हाथ से चाकू छीनकर गोडसे को फेंक दिया था, नहीं रहे गांधी को बचाने वाले भिलारे

क्या गोडसे गांधी को पिस्तौल की जगह खंजर से मारना चाहता था?

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20 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 20 जुलाई 2017, 12:43 PM IST)
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गांधी, भिलारे और नाथुराम गोडसे (फोटोःटाइम्स ऑफ इंडिया)
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30 जनवरी की शाम को गांधी जी दिल्ली के बिरला हाउस के लॉन में प्रार्थना के लिए आए. उनकी दो पोतियां उन्हें सहारा देकर धीरे-धीरे आगे ले जा रही थीं. तभी खाकी जैकेट और नीली पैंट पहने एक आदमी उनके सामने आया. उसने नमस्ते की, गांधी जी ने एक मुस्कान तैरा दी. लेकिन अगले ही पल उस आदमी ने अपनी जेब से बरैटा पिस्टल निकालकर गांधी जी पर पॉइंट ब्लैंक रेज से तीन गोलियां चला दीं. जो जहां था, ठहर गया. गांधी जी नहीं रहे. गोली चलाने वाले ने पुलिस को अपना नाम नाथूराम गोडसे बताया. इतना हम सब जानते हैं.
लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि बिरला हाउस के बाहर चली तीन गोलियां नाथूराम गोडसे का गांधी जी पर किया पहला हमला नहीं था. कम से कम कहा तो यही जाता है. इतिहास से ये धूल 19 जुलाई, 2017 को अचानक तब छांटी जानी लगी जब खबर आई कि भिलारे गुरुजी का देहांत हो गया है. कहा जाता है कि 1944 में भी नाथूराम गोडसे ने गांधी जी को मारने की कोशिश की थी. तब भिलारे गुरुजी ने उनकी जान बचाई थी.

गांधी जी की हत्या के तीन फरार आरोपियों के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें.




 

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क्या हुआ था तब?

इंडियन एक्सप्रेस ने महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी की किताब 'Let's Kill Gandhi' के अंश छापे हैं. इनके मुताबिक 30 जनवरी, 1948 से पहले कम से कम तीन बार महात्मा गांधी को मारने की कोशिश हुई. इनमें से दूसरा हमला 1944 में तब हुआ था, जब गांधी आगा खान प्रिज़न कैंप से आज़ाद किए गए थे. जुलाई में गांधी जी को मलेरिया हो गया. डॉक्टर ने हवा बदलने की सलाह दी. तो गांधी जी पूना के पास पंचगनी के एक रिज़ॉर्ट पर चले गए. वहां दिलखुश बंगले पर रुके.
इसका पता चलने पर पूना से करीब 20 लोग पंचगनी पहुंचे और गांधी जी के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे. गांधी जी को इसका पता चला तो उन्होंने प्रदर्शनकारियों के लीडर को मिलने बुलाया. ये लीडर था नाथूराम विनायक गोडसे. नाथूराम ने गांधी का न्योता ठुकरा दिया.
गांधी हर शाम को प्रार्थना सभा करते थे. उस शाम की सभा बाथा हाई स्कूल के हॉल में थी. बारिश का मौसम था, तो हवा में नमी थी. प्रार्थना सभा शुरू हुई. भिलारे गुरूजी उस सभा में मौजूद थे. अचानक भिलारे के सामने का दरवाज़ा खुला और नेहरू शर्ट, पैजामा और जैकेट पहने नाथूराम गोडसे गांधी विरोधी नारे चीखता हुआ हॉल में घुसा. उसके हाथ में एक खंजर था. भिलारे बिना वक्त गंवाए उस पर झपटे और उसका हाथ ऐंठ कर चाकू छुड़ा लिया. भिलारे और पूना के सूर्ती लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित ने मिल कर गोडसे को काबू कर लिया. भिलारे कहते थे कि उस शाम गोपाल गोडसे और नारायण आप्टे भी वहीं थे. (अपनी चौथी कोशिश यानी 1948 में जब गोडसे गांधी की जान लेने में कोशिश में कामयाब हो गया, तब भी साजिश में इन दोनों को भागीदार माना गया.)
 
भीकू दाजी भिलारे (फोटोःटाइम्स ऑफ इंडिया से साभार)
भीकू दाजी भिलारे (फोटोःटाइम्स ऑफ इंडिया से साभार)

 
भिलारे उन दिनों राष्ट्र सेवा दल के तालुका प्रमुख होते थे. दल के और लोग भी हॉल में थे. तो गोडसे जिस फुर्ती से हॉल में घुसा था, उसी फुर्ती से हॉल के बाहर फेंक दिया गया. 26 नवंबर 1919 को पैदा हुए भिलारे नाना पाटिल के चलाए प्रति सरकार आंदोलन से जुड़े रहे थे. 1943 से 1946 के बीच चले इस आंदोलन ने तब के सतारा ज़िले में अंग्रेज़ सरकार के कई काम अपने हाथ में ले लिए थे. भिलारे आगे चल कर कांग्रेस में शामिल हुए. आज़ादी के बाद जवाली से 18 साल तक विधायक रहे.

लेकिन सब इस कहानी को सच नहीं मानते

पंचगनी की इस घटना का ज़िक्र तुषार की किताब के अलावा गांधी जी के करीबी सहयोगियों के संस्मरणों में भी मिलता है. लेकिन इस वाकये को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं. मिसाल के लिए कपूर कमिशन का मानना था कि पंचगनी वाली घटना का न तो सही ब्योरा उपलब्ध है, न उस दिन की घटनाओं की तस्दीक की जा सकती है.
 
गांधी जी का पार्थिव शरीर (1948)
गांधी जी का पार्थिव शरीर (1948)

 
गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र की पूरी पड़ताल का काम 22 मार्च, 1965 में सुप्रीम कोर्ट के जज जेके कपूर के कमिशन को दिया गया था. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक कपूर कमिशन की कार्यवाही में भिलारे के बयान का कहीं उल्लेख नहीं मिलता. इतना ही नहीं, मणिशंकर पुरोहित ने जो बयान कपूर कमिशन को दिया, उसमें पंचगनी वाली घटना का वक्त जुलाई, 1944 की जगह जुलाई 1947 बताया है. कमीशन ने पंचगनी में हुई घटना को एक छोटा-सा फसाद भर माना.
सच जो भी रहा हो, पंचगनी वाली घटना की जानकारी ज्यों-ज्यों लोगों को लगती गई, भिलारे लोकप्रिय होते गए. दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आते. उनके लिए भिलारे वो देवदूत होते, जिसने उनके मसीहा की जान बचाई. शायद यही वजह रही कि 19 जुलाई को जब भिलारे का अंतिम संस्कार हुआ तो पार्टी-विचारधारा के बाड़ेबंदी से ऊपर उठ कर नेता और आम लोग पहुंचे.


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