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असम में बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस का नया मोर्चा कितने काम का है?

असम चुनाव से पहले BJP कितने पानी में है?

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20 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 7 फ़रवरी 2021, 03:13 PM IST)
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AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल. (तस्वीर: पीटीआई)
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भारत में हर साल चुनाव का साल होता है. 2021 भी चुनाव का ही साल है. तो फिर इस बात का उल्लेख अलग से क्यों? ज़रा उन राज्यों पर गौर कीजिए, जहां इस साल के पहले 6 महीनों में चुनाव है - तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम, पुदुचेरी और केरल. माने एक राज्य नहीं, जिसके चुनाव को कम दिलचस्प कहा जाए. लेकिन आज हम बात करेंगे असम पर. क्यों? क्योंकि 19 जनवरी को यहां विपक्षी पार्टियों ने एक महागठबंधन बनाने का फैसला कर लिया. महागठबंधन- इस शब्द का इस्तेमाल पिछले कुछ वक्त से उन तमाम चुनावी गोलबंदियों के लिए हुआ है जिन्हें आप BJP वर्सेज़ अन्य भी कह सकते हैं. इस तरह के महागठबंधन अब तक भाजपा के खिलाफ उतने सफल नहीं रहे हैं. अगर झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार को अपवाद माना जाए. फिर असम के महागठबंधन में ऐसा क्या है कि चुनाव से 5 महीने पहले चर्चा की जाए. इसका जवाब आपको महागठबंधन के सद्स्यों की लिस्ट में मिलेगा - 1. कांग्रेस 2. बदरुद्दीन अजमल की AIUDF 3. भाकपा - CPI 4. भाकपा (मार्कस्वादी) - CPM 5. भाकपा (मा.ले.) - CPI(ML) 6. आंचलिक गण मोर्चा - AGM इस लिस्ट में दो बड़े कीवर्ड हैं - कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल वैसे महागठबंधन के ऐलान पर असम कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा ने ये कहा कि असम की दूसरी पार्टियों के लिए भी दरवाज़ा खुला है. लेकिन हमारा फोकस कांग्रेस और अजमल पर ज़्यादा रहेगा. ये समझेंगे कि इसे कांग्रेस नीत गठबंधन कहा जा सकता है क्या? अगर हां, तो इस साझेदारी के पीछे की कहानी क्या है. और ये भी कि ये साझेदारी कितनी कामयाब हो सकती है. इन सारी बातों को सही संदर्भ मिले, इसके लिए आपको पहले असम और उसके हालिया राजनैतिक माहौल का एक क्रैश कोर्स करवाते हैं. असम विधानसभा में 126 सीटें हैं. पिछले विधानसभा चुनाव हुए थे 2016 में. असम विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक चुनाव के बाद विधानसभा में ये स्थिति बनी - सत्तापक्ष - राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन NDA भाजपा - 60 असम गण संग्राम परिषद - 13 निर्दलीय - 1 असम में NDA सरकार के मुख्यमंत्री हैं सर्बानंद सोनोवाल. आल असम स्टूडेंट यूनियन AASU से आने वाले सोनोवाल ने असम में अवैध प्रवासियों के मुद्दों पर खूब काम किया था. प्रवासियों के हित में समझे जाने वाले IMDT एक्ट को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में घसीटकर खत्म करवाया था. इसीलिए भाजपा ने असम में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया. अब विपक्ष की बात करते हैं कांग्रेस - 20 ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (AIUDF) - 14 बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) - 12 पूर्वोत्तर में बीजेपी के आसपास कोई नहीं एक वक्त भाजपा को खराब डिफेंडर माना जाता था. ये छवि अब टूटी है. पार्टी ने गठबंधन करके सूबे बचाए हैं. और जहां चुनाव में नहीं जीत पाई, वहां चुनाव के बाद जोड़तोड़ से सरकार बना ली है. चूंकि ताकत के मामले में पूर्वोत्तर में कोई पार्टी भाजपा के आसपास भी नहीं फटकती है, तो कागज़ पर आपको असम का चुनाव डल लग सकता है. कि यहां हो ही क्या सकता है. लेकिन फिर आपको कुछ चीज़ों पर गौर करना होगा - #1 2011 की जनगणना के अनुसार असम की 3 करोड़ 12 लाख की आबादी में से 1 करोड़ 7 लाख मुस्लिम हैं. माने 34.22 फीसदी. सादी भाषा में - एक तिहाई से भी ज़्यादा #2 असम में पूर्वी पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश से हुआ अवैध प्रवास एक बड़ा मुद्दा है जिसे लेकर सभी पक्ष बेहद भावुक हैं. इसी के चलते सूबे में भारत का इकलौता नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स NRC तैयार किया गया. 2019 में ये अपडेट हुआ. #3 केंद्र की मोदी सरकार ने सिटिज़नशिप अमेंटमेंट एक्ट CAA बनाया है. इसके तहत भारत के पड़ोसी देशों में से मुसलमानों को छोड़कर सभी धर्मों के शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात है. असम में आम धारणा ये है कि कोई भी ''बाहरी'' सूबे में न रहे, चाहे वो मुस्लिम हो या हिंदू. इसीलिए असम में नागरिकता कानून को भारी विरोध देखना पड़ा. प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह के दौरे रद्द हुए. आंदोलन से राजनैतिक पार्टियों का तक जन्म हुआ जो चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. कांग्रेस-AIUDF के महागठबंधन को आपको इन सभी बातों के आलोक में भी देखना होगा. तमाम दूसरे सूबों की तरह असम में भी कांग्रेस ने दशकों तक राज किया है. 2001 से लेकर 2016 तक तरुण गोगोई की अगुआई में कांग्रेस लगातार तीन बार सत्ता में रही. गोगोई के ही मुख्यमंत्री रहते हुए ही असम में उग्रवाद आज वाली स्थिति में आया - माने छिटपुट घटनाओं को छोड़कर शांति. लेकिन अभी कांग्रेस मुश्किल में है. असम में पार्टी के सबसे कद्दावर नेता हिमंत बिस्वसर्मा नाराज़ होकर भाजपा में शामिल हो गए. उसके बाद से स्थिति खराब ही हुई है. हाल में हुए बोडो टेरेटोरियल काउंसिल और तिवा ऑटोनॉमस काउंसिल चुनाव में पार्टी हार गई. नवंबर 2020 में तरुण गोगोई का पोस्ट कोविड कॉम्प्लिकेशन के चलते दिसंबर 2020 में पार्टी के दो विधायक भी भाजपा में चले गए. अब AIUDF की बात करते हैं याद कीजिए हमने सर्बानंद सोनोवाल का परिचय आपको क्या दिया था. ये कि उन्होंने IMDT एक्ट को खत्म करवाया. इसका पूरा नाम है Illegal Migrants (Determination by Tribunals) Act, 1983. इस कानून के बारे में लंबे समय से शिकायत थी कि ये असम में बांग्ला भाषी अवैध प्रवासियों को सुरक्षा प्रदान करता है. ज़्यादातर बंगाली प्रवासी मुसलमान हैं. तो जब जुलाई 2005 में सुप्रीम कोर्ट इस एक्ट को रद्द कर देती है, तब इत्र का एक कारोबारी राजनीति में उतरता है - बदरुद्दीन अजमल. पार्टी का नाम - असम यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट - AUDF. अजमल की पार्टी कहती है कि वो उन सभी की पार्टी है, जिनपर असम में बाहरी बताकर अत्याचार हुआ. लेकिन असम की राजनीति में पीएचडी के बिना भी आप बता सकते हैं कि उनका कोर वोटर है असम का बांग्ला भाषी मुस्लिम समुदाय. 2009 में एक रीलॉन्च के बाद AUDF नाम में से असम हटाकर ऑल इंडिया लगा लेता है और AIUDF बन जाता है. AIUDF ने NRC की प्रक्रिया में खूब मेहनत की. इसके वॉलेंटियर्स ने बांग्ला भाषियों की जितनी मदद हो सकी, करके प्रयास किया कि वो बाहर न छूट जाएं. इससे आपको असम की भूमिपुत्र वाली बहस में AIUDF का राजनैतिक स्टैंड समझ में आ गया होगा. अजमल और कांग्रेस आज साथ हैं. लेकिन एक वक्त असम का मुख्यमंत्री रहते हुए तरुण गोगोई ने सवाल किया था - हू इज़ बदरुद्दीन अजमल. मतलब ये बदरुद्दीन अजमल हैं कौन. गोगोई ने ये बयान दिया था बराक घाटी में. जहां प्रवासियों को लेकर नाराज़गी है. लेकिन गोगोई जैसे नेता तीन बार मुख्यमंत्री ऐसे ही नहीं बन जाते. वो देख पा रहे थे कि अवैध प्रवास के मुद्दे पर असम में कैसी राजनैतिक ज़मीन तैयार हो रही है. खासतौर पर संख्या के मामले में बांग्लाभाषी एक बड़ी कॉन्स्टीट्यूएन्सी बन चुके थे. गोगोई जानते थे कि देव कांत बरुआ ने ''इंदिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज़ इंदिरा'' के अलावा एक और नारा दिया था - जब तक असम में अली-कुली-बंगाली का साथ है, कांग्रेस का कुछ नहीं बिगड़ सकता. अली माने मुस्लिम समुदाय, कुली माने असम के चाय बागान में काम करने वाले आदिवासी समुदाय और बंगाली माने बांग्ला भाषी हिंदू. कांग्रेस और AIUDF साथ कैसे आए? गोगोई जानते थे कि जैसे जैसे NRC करीब आएगा, अली कांग्रेस से छिटकने लगेगा. और अगर असम में धार्मिक आधार पर ध्रुविकरण होता है, तो बंगाली भी कांग्रेस पर किसी दूसरी पार्टी को तरज़ीह देने लगेंगे. ऐसे में गोगोई एक ऐसे साझेदारी की कल्पना करते हैं जिसमें अली और बंगाली के सिरों को मिलाया जाए. इसीलिए गोगोई ने CAA आने के बहुत पहले प्रवासियों को भारत की नागरिकता देने की बात कर दी. और अंदरखाने अजमल के साथ संबंध बनाए. इतने अच्छे संबंध कि जब उनके बेटे कलियाबोर लोकसभा सीट से पर्चा भरते हैं, जहां मुस्लिम आबादी अच्छी संख्या में है, तो AIUDF वहां एक तरह से वॉकओवर दे देती है. नतीजा - गौरव गोगोई दो बार से कलियाबोर के रास्ते लोकसभा पहुंचते हैं. असम में पत्रकार बताते हैं कि गोगोई परिवार अजमल से ऐसी वन टू वन डील लंबे वक्त से करता आ रहा है. अब तक आपको ये समझ आ गया होगा कि कांग्रेस और AIUDF किस ज़मीन पर खड़े हैं और साथ कैसे आए. रही बात लेफ्ट पार्टियों की, तो संगठन की दृष्टि से वो किसी बड़े इलाके पर पकड़ नहीं रखतीं. कुछ छिटपुट इलाकों में उनका प्रभाव है. लेकिन राजनीति का कॉमन सेंस कहता है कि महागठबंधन में उनकी मौजूदगी, उनकी गैरमौजूदगी से बेहतर ही है. जैसा कि हमने आपको बताया, असम में CAA-NRC के विरोध से उपजी पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं. इनमें से दो पर गौर करने की ज़रूरत है. असम जातीय परिषद (AJP) - इसे ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और असोम जातीयताबादी युबा छात्र परिषद (AJYCP) का समर्थन प्राप्त है. ये इसे सिद्धांतः एक मज़बूत आधार वाली पार्टी बना देता है. दूसरी पार्टी है रायजोर दल - ये अखिल गोगोई के कृषक मुक्ति संग्राम समिति का पॉलिटिकल आउटफिट है. ये दोनों साथ चुनाव लड़ने के बारे में सोच रही हैं. महागठबंधन के ऐलान के बाद हुए संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस नेता मुकुल वासनिक से पूछा गया कि महागठबंधन ने सीएम फेस की घोषणा क्यों नहीं की, तो मुकुल वासनिक ने कहा कि सारे सवालों के जवाब एक ही दिन में नहीं दिए जा सकते. लेकिन मुकुल वासनिक तो नेताजी हैं, अंदर की बात क्यों बताने लगे. तो हम बता देते हैं कि कांग्रेस ने सीएम फेस क्यों प्रोजेक्ट नहीं किया? जबसे ये बात सामने आई है कि कांग्रेस असम में बदरुद्दीन अजमल के साथ चली गई है, तभी से ये कहा जाने लगा है कि इन दो पार्टियों को फायदा हो, न हो भाजपा को इससे फायदा ज़रूर होगा. क्या ये बात सही है? और जब इतना खर्चा हो ही रहा था, तो एक बड़ी मुस्लिम आबादी वाले राज्य में ओवैसी महागठबंधन से कैसे छूट गए, ये भी समझते जाइए.

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