19 जनवरी को कश्मीरी पंडित 'विस्थापना दिवस' मनाते हैं. ये वो दिन था. जब जम्मूकश्मीर से पंडितों के विस्थापन की शुरुआत हुई. 2017 की जनवरी में इसके 27 साल पूरेहो गए हैं. कश्मीर में ये सब हिंसक तब हुआ जब 14 सितंबर, 1989 को बीजेपी के राज्यसचिव टिक्का लाल टपलू को गोली मारी गई. उसके कुछ दिनों बाद मकबूल बट, जो जम्मूकश्मीर लिबरेशन फ्रंट का नेता था, को फांसी सुनाने वाले जज नीलकंठ गंजू को मार दियागया. वहीं से डर का माहौल बना. 27 बरस बाद उसे याद करते हुए अनुपम खेर ने एक कवितापढ़ी है. इसे अशोक पंडित ने डायरेक्ट किया है. 'मौन' कविता का शीर्षक है. जिसे डा०शशिशेखर तोशखानी ने लिखा और अनुपम खेर ने पढ़ा है. फैलेगा फैलेगा हमारा मौन.https://youtu.be/XAQHBMBdvQ8 पढ़ना भी चाहिए तो पढ़िए.समुद्र के पानी में नमक की तरह, नसों में दौड़ते हुए ख़ून की तरह, पहुंचेगा दिलोंकी धड़कनों के बहुत ही निकटबोरी से झड़ते हुए आटे की तरह देगा हमारा पता हम जहां भी हों, किसी दुःस्वप्न मेंया दुःस्वप्न से भी भयंकर किसी वास्तविकता के कगार पर, दूब की जडों सा, अंधेरे सेहोता हुआ गुत्थमगुत्था, मांगेगा अपने लिए एक पूरी ज़मीन.पड़ा रहेगा हीरे की चमकती अंगूठी सा, हमारे दुख की छोटी उंगली में, शरणार्थीशिविरों में हमेशा के लिए उदास हो गया बच्चों का मौन, कोटर से निकाल ली गई बूढ़ेकवि की आंखों का मौन, जो हमेशा सच की तरह खुलती थी, स्त्रियों के होंठों पर जमी शोककी काली नदी का मौन, उन सब लोगों का मौन जिन्हें चुप करा दिया गया है.बेचैन पक्षी सा उड़ेगा आग के इस पेड़ से उस पेड़ पर, आधी रात को हवा के झोंकों कीतरह, आकर नींद के गुप्त दरवाज़ों की सांकलें खटखटाता हुआ, विचारों में गुप चुपकरेगा प्रवेश, अपने लहूलुहान पैरों की छाप छोड़ जाएगा, हर आंख से आंसुओं को बटोरताहुआ, बुनेगा एक लम्बी और मज़बूत रस्सी, सुलगते हुए बारूद सा पड़ा रहेगा उन पुलों केनीचे, जहां से गुज़रेंगें झूठ के हज़ारों हज़ार पांव. और तब हमारे मौन के धमाके सेबड़ा कोई और धमाका नही होगा.--------------------------------------------------------------------------------कश्मीरियों तुम्हारी रोल मॉडल ज़ायरा नहीं तो क्या बंदूकची बुरहान है?कश्मीर से दिल खुश करने वाली खबर आई है