फैज़ की नज़्म को एंटी हिंदू बताने पर गुलज़ार ने क्या कहा?
CAA प्रोटेस्ट के बीच, फैज़ की नज़्म पर IIT कानपुर में बवाल मचा हुआ है.
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लेफ्ट में फैज़, राईट में गुलज़ार और बीच में उस वीडियो का स्क्रीनग्रैब जिसको लेकर विवाद हुआ है.
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# ‘बिल’ संभाले रहो, ज़बां की तरह-
खबर पर सीधे आएं उससे पहले आप क्रोनोलॉजी समझिए-- पहले सिटिज़न एमेंडमेंट बिल आया. - फिर वो कानून बनकर हो गया सिटिज़न एमेंडमेंट एक्ट. - फिर देश भर में हुआ इसका विरोध. - और अंत में हुआ इन विरोधों का विरोध.हालांकि बात यहीं पर खत्म नहीं हुई और फिर विरोध का विरोध करने वालों का भी विरोध होने लगा. लेकिन चूंकि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इसलिए विरोध का विरोध करने वाले दरअसल सिटिज़न एमेंडमेंट एक्ट के समर्थक थे. और विरोध के विरोध का विरोध करने वाले सिटिज़न एमेंडमेंट एक्ट के विरोधी. खैर बात अगर ज़्यादा कन्फ्यूजिंग हो गई तो निदा फ़ाज़ली के एक शेर से इस पूरी बात का पटाक्षेप कर देते हैं-
कभी कभी यूं भी हमने, अपने जी को बहलाया है, जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है.
# वो ‘फैज़’ सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था, वो ‘फैज़’ उनको बहुत ना-गवार गुज़रा है-
तो अब आते हैं खबर पर. यानी निदा फाजली से फैज़ पर. तो हुआ यूं कि CAA यानी सिटीजनशिप एमेंडमेंट एक्ट के विरोध में IIT कानपुर में रैली निकली. ‘इन सोलिडैरिटी विद जामिया’. मने, जामिया के साथ मजबूती से खड़े हैं. ये जामिया प्रोटेस्ट के समर्थन में निकाली गई रैली थी. इस रैली में एक नज़्म पढ़ी गई– हम देखेंगे. इसके बाद फैकल्टी के सदस्यों ने आरोप लगाया कि ये नज़्म ‘हिन्दू विरोधी’ है. जहां वो नज़्म पढ़ी गई, उसका वीडियो ये रहा:इसी वीडियो के आधार पर शिकायत दर्ज़ की गई. शिकायत जिसमें कई चीज़ों के अलावा एक पॉइंट ये भी था कि, जो नज़्म गाई गई, उसकी कुछ पंक्तियां एक ख़ास समुदाय के लोगों की भावनाओं को आहत करने वाली थीं. ये रहीं वो पंक्तियां-A faculty at IIT Kanpur has submitted this video and a complaint to director, alleging anti-India & communal statements made at a recent event held in 'solidarity with Jamia' & that event held without permission.
"When All Idols Will Be Removed... Only Allah’s Name Will Remain" pic.twitter.com/nRfI68JSxR — ABN News Live (@ABNNews4) January 2, 2020
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएंगे, हम अहल-ए-वफा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे. सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे. बस नाम रहेगा अल्लाह का. हम देखेंगे.अब इस नज़्म और इसके पढ़ने वालों का विरोध बढ़ते-बढ़ते इसके शायर तक जा पहुंचा. यानी फैज़ अहमद फैज़ तक. लोग इस कविता को एंटी हिंदू कहने लगे. जिसपर आपत्ति व्यक्त करते हुए फैज़ की बेटी ने भी कहा कि फैज़ की नज़्म को एंटी हिंदू कहना दुखद नहीं हास्यास्पद है. तो नज़्म और इस शायर के पक्ष में भी लोग और बुद्धिजीवी आ गए. इस दौर के कुछ अच्छे शायर भी उनमें से एक थे. जैसे जावेद अख्तर. उन्होंने कहा-
अगर फैज की कविता हिंदू विरोधी होती तो ज़िया-उल-हक इसे नेशनल एंथम बनवा देता. जावेद अख्तर ने कहा कि फैज़ कातिल था तो मैं सुन लूंगा, लेकिन उसकी कविता को एंटी हिंदू कहना, इस पर क्या कहूं. फैज़ ने पाकिस्तान के हुक्मरानों और मुल्लाओं से तो पत्थर खाएं हैं, जेल गए हैं. फिर कैसे उनकी कविता एंटी हिंदू हो सकती है.
# मुझसे पहली सी फ्रीडम ऑफ़ स्पीच, मेरे गुलज़ार न मांग-
इसके बाद मीडिया से रूबरू होते हुए एक दूसरे उतने ही चोटी के शायर ने भी अपनी राय व्यक्त की. गुलज़ार ने. उन्होंने कहा-फैज साहब पर इल्जाम लगाना गलत है. वह एशिया के सबसे बड़े शायरों में से एक हैं. एक कवि जो प्रगतिशील लेखकों के आंदोलन का संस्थापक रहा है. उसे मजहब के मामलों में शामिल करना उचित नहीं है. उसने जो कुछ भी किया है वह लोगों के लिए किया. दुनिया उसे और उसके काम को जानती है. उन्होंने ज़िया-उल-हक के दौर में कविताएं लिखी. उनके काम को गलत संदर्भ में दिखाना सही नहीं है. अगर नज्म को आउट ऑफ कॉन्टेस्ट प्लेस कर दें, तो इसमें नज्म पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते. जो लोग ऐसा कर रहे हैं ये उनकी गलती है. उनके काम- कविताओं और उनकी रचनाओं को उसके वास्तविक संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
.#Gulzar sahab condemns the controversy surrounding #FaizAhmedFaiz
this is what he said today. pic.twitter.com/pQFj0NFAsR — Faridoon Shahryar (@iFaridoon) January 3, 2020
# वो तर्ज़ुमा था जो इसका, ये वो कॉन्टेक्स्ट तो नहीं-
शब्दों को लेकर लुडविग विटगेंस्टिन (Ludwig Wittgenstein) ने दो थ्योरिज़ दीं. गेम थ्योरी और पिक्चर थ्योरी. जिनका लब्बोलुआब ये है कि दुनिया भर में जो कंफ्लिक्ट शब्दों और बातों को लेकर होते हैं, उनका कारण होता है कॉन्टेक्स्ट को न समझना. फैज़ की इस नज़्म के साथ भी यही हुआ है. देखिए, जिसपर विवाद हुआ है उस लाइन को बिना कॉन्टेक्स्ट के पढ़ने पर एकबारगी आपको भी आपत्ति हो सकती है. लेकिन जानिए फैज़ ने ये नज़्म किस कॉन्टेक्स्ट में लिखी. दरअसल हुआ क्या था कि जब जिया-उल-हक़ ने पाकिस्तान को वापस कट्टरता की तरफ धकेल दिया था तो उस हालात में फैज़ अहमद फैज़ ने अपना विरोध जताते हुए ये नज़्म लिखी थी. इसका कोई धार्मिक एंगल नहीं था. यही बात गुलज़ार ने भी कही. बाकी तो जो है सो है. आखिर ये लोकतंत्र है, सबको अपनी बात कहने का हक़ है. तो हर चीज़ के पक्ष भी हैं और विपक्ष भी. गुलज़ार ने किसी और कॉन्टेक्स्ट में कहा था लेकिन यहां भी फिट बैठता है-हिंदुस्तान में दो हिंदुस्तान बसते हैं!
वीडियो देखें:
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