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अगर पानी नहीं पीते हैं तो राजेन्द्र सिंह की इस चेतावनी को मत पढ़िए, इग्नोर करिए

परसों गौरेय, कल पोएट्री के बाद आज विश्व जल दिवस है, अगले साल फिर होगा - बिग डील!

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22 मार्च 2019 (अपडेटेड: 21 मार्च 2019, 02:37 AM IST)
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अरुण तिवारी

अरुण तिवारी, पर्यावरण संबंधी कार्यों से जुड़े हुए हैं. उन्होंने राष्ट्रीय जल बिरादरी एवं गंगा जल बिरादरी में लंबे समय तक संयोजन के उत्तरदायित्व को निभाया था. उन्होंने जल साक्षरता, जल नीति, जल निजीकरण, नदी जोड़, नदी नीति, मतदाता जागरुकता, पंचपरमेश्वर जागृति तथा गंगा-यमुना-गोमती-हिंडन-मंदाकिनी व सई नदी संबंधी कई महत्वपूर्ण अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ‘गंगा प्रहरी सम्मान’ (1996), ‘गंगा सम्मान’ (2009) एवं ‘तरुण भारत पर्यावरण रक्षण सम्मान’ (2013) आदि से पुरुस्कृत हो चुके अरुण वर्तमान में ‘इंडिया वाटर पोर्टल (हिंदी)’ में सलाहकार और ‘पानी पोस्ट’ नामक वेब पत्रिका के संपादक हैं. पर्यावरण सरोकारों को लेकर ‘प्रकृति के समय लेख’ उनकी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक है. आज विश्व जल दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है उनकी और राजेंद्र सिंह के बीच हुई बातचीत का एक महत्वपूर्ण अंश.




राजेंद्र सिंह
राजेंद्र सिंह

अरुण तिवारी कहते हैं - 'यह दावा अक्सर सुनाई पड़ जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा. मुझे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रही कि इस बारे में दुनिया के अन्य देशों से मिलने वाले संकेत क्या हैं? मेरे मन के कुछेक सवालों का उत्तर जानने का एक मौका हाल ही में मेरे हाथ लग गया. प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह, पिछले करीब ढाई वर्ष से एक वैश्विक जलयात्रा पर हैं. इस यात्रा के तहत वह अब तक करीब 40 देशों की यात्रा कर चुके हैं. यात्रा को 'वर्ल्ड पीस वाटर वाॅक' का नाम दिया गया है. मैंने राजेन्द्र सिंह से निवेदन किया और वह मेरी जिज्ञासा के सन्दर्भ में अपने वैश्विक अनुभवों को साझा करें और वह राजी भी हो गए. मैंने, दिनांक 07 मार्च, 2018 को सुबह नौ बजे से गांधी शांति प्रतिष्ठान के कमरा नम्बर 103 में उनसे लम्बी बातचीत की. उस बातचीत के दौरान मैंने उनसे प्रश्न किया कि क्या ये कहना उचित है कि तृतीय विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा? उनका उत्तर चौंकाने वाला था.'

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पूरी दुनिया में वाटर वार की यह जो बात लोग कह रहे हैं; यह निराधार नहीं है. पानी के कारण अन्तरराष्ट्रीय विवाद बढ़ रहे हैं. विस्थापन, तनाव और अशांति के दृश्य तेजी से उभर रहे हैं. ये दृश्य, काफी गम्भीर और दर्द भरे हैं. पिछले कुछ वर्षों में पानी के संकट के कारण खासकर, मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से विस्थापन करने वालों की तादाद बढ़ी है.
एक आदमी साबरमती नदी, अहमदाबाद के प्रदूषित जल में कबाड़ बीनता हुआ, (रयूटर्स/अमित देव)
एक आदमी साबरमती नदी, अहमदाबाद के प्रदूषित जल में कबाड़ बीनता हुआ. (रॉयटर्स/अमित देव)

विस्थापित परिवारों ने खासकर यूरोप के जर्मनी, स्वीडन, बेल्जियम पुर्तगाल, इंग्लैंड, फ्रांस, नीदरलैंड, डेनमार्क, इटली और स्विटजरलैंड के नगरों की ओर रुख किया है. अकेले वर्ष 2015 में मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से करीब 05 लाख लोग, अकेले यूरोप के नगरों में गए हैं. जर्मनी की ओर रुख करने वालों की संख्या ही करीब एक लाख है. जर्मनी, टर्की विस्थापितों का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, यूरोप के नगरों की ओर हुए यह अब तक के सबसे बड़े विस्थापन का आंकड़ा है.
बच्चे मनीला बे के प्रदूषित पानी में कुद्दी मार रहे हैं. फिलीपींस. 21 मार्च 2018. उआनी विश्व जल दिवस से ठीक एक दिन पहले. (रयूटर्स / रोमियो रानोको)
बच्चे मनीला बे के प्रदूषित पानी में कुद्दी मार रहे हैं. फिलीपींस. 21 मार्च 2018. यानी विश्व जल दिवस से ठीक एक दिन पहले. (रॉयटर्स/रोमियो रानोको)

गौर करने की बात है कि एक विस्थापित व्यक्ति, रिफ्यूजी का दर्जा हासिल करने के बाद ही संबंधित देश में शासकीय कृपा के अधिकारी बनता है. अन्तरराष्ट्रीय स्थितियां ऐसी हैं कि विस्थापितों को रिफ्यूजी का दर्जा हासिल करने के लिये कई-कई साल लम्बी जद्दोजहद करनी पड़ रही है. परिणाम यह है कि जहां एक ओर विस्थापित परिवार, भूख, बीमारी और बेरोजगारी से जूझने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर जिन इलाकों में वे विस्थापित हो रहे हैं; वहां कानून-व्यवस्था की समस्याएं खड़ी हो रही हैं. सांस्कृतिक तालमेल न बनने से भी समस्याएं हैं.
World Water Day

यूरोप के नगरों के मेयर चिन्तित हैं कि उनके नगरों का भविष्य क्या होगा? विस्थापित चिन्तित हैं कि उनका भविष्य क्या होगा? पानी की कमी के नए शिकार वाले इलाकों को लेकर भावी उजाड़ की आशंका से चिन्तित हैं. 17 मार्च को ब्राजील की राजधानी में एकत्र होने वाले पानी कार्यकर्ता चिन्तित हैं कि अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे, उरुग्वे जैसे देशों ने 04 लाख, 60 हजार वर्ग मील में फैले बहुत बड़े भूजल भण्डार के उपयोग का मालिकाना हक़ अगले 100 साल के लिये कोका कोला और स्विस नेस्ले कम्पनी को सौंपने का समझौता कर लिया है. भूजल भण्डार की बिक्री का यह दुनिया में अपने तरह का पहला और सबसे बड़ा समझौता है. इस समझौते ने चौतरफा भिन्न समुदायों और देशों के बीच तनाव और अशांति बढ़ा दी है.
जमुना किनारे मोरा गांव... फोटो दिल्ली की है, इक्क्सी मार्च यानी कल की. (रयूटर्स / अदनान आबिदी)
जमुना किनारे मोरा गांव... फोटो दिल्ली की है, इक्क्सी मार्च यानी कल की. (रॉयटर्स / अदनान आबिदी)

आप देखिए कि 20 अक्टूबर, 2015 को टर्की के अंकारा में बम ब्लास्ट हुआ. 22 मार्च को दुनिया भर में अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस मनाया जाता है. 22 मार्च, 2016 को जब बेल्जियम के नगरों में वाटर कन्वेंशन हो रहा था, तो बेल्जियम के ब्रूसेल्स में विस्फोट हुआ. शांति प्रयासों को चोट पहुंचाने की कोशिश की गई. उसमें कई लोग मारे गए. 19 दिसंबर, 2016 को बर्लिन की क्रिश्चियन मार्किट में हुए विस्फोट में 12 लोग मारे गए और 56 घायल हुए. यूरोपियन यूनियन ने जांच के लिये विस्थापित परिवारों को तलब किया. ऐसा होने पर मूल स्थानीय नागरिक, विस्थापितों को शक की निगाह से देखेंगे ही. शक हो, तो कोई किसी को कैसे सहयोग कर सकता है?
दक्षिण अफ्रीका में बारिश वैसे भी काफी अप्रत्याशित है. पिछले तीन साल से यहां सूखा पड़ रहा है. ऐसे में सरकार को पहले से ही प्लानिंग करनी चाहिए थी. पानी बचाने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए थी. दक्षिण अफ्रीका में सरकारी योजनाएं तो खूब बनीं, मगर उनके ऊपर अमल होना टलता रहा. और शायद इसीलिए हालात इतने खराब हो गए हैं.
दक्षिण अफ्रीका में बारिश वैसे भी काफी अप्रत्याशित है. पिछले तीन साल से यहां सूखा पड़ रहा है.

विस्थापितों को शरण देने के मसले पर यूरोप में भेदभाव पैदा हो गया है. पोलैंड और हंगरी ने किसी भी विस्थापित को अपने यहां शरण देने से इनकार कर दिया है. चेक रिपब्लिक ने सिर्फ 12 विस्थापितों को लेने के साथ ही रोक लगा दी. यूरोपियन कमीशन ने इन तीनों के खिलाफ का कानूनी कार्रवाई शुरू कर दिया है. ब्रूसेल्स और इसकी पूर्वी राजधानी के बीच, वर्ष 2015 के शुरू में ही सीरियाई विस्थपितों को लेकर लम्बी जंग चल चुकी है.
ये कोई मैदान नहीं है. यहां नदी बहा करती थी. पिछले तीन साल से पड़ रहे सूखे ने नदी को भी सुखा दिया.
ये कोई मैदान नहीं है. यहां नदी बहा करती थी. पिछले तीन साल से पड़ रहे सूखे ने नदी को भी सुखा दिया.

इटली और ग्रीक जैसे तथाकथित फ्रंटलाइन देश, अपने उत्तरी पड़ोसी फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया को लेकर असहज व्यवहार कर रहे हैं. कभी टर्की और जर्मनी अच्छे सम्बन्धी थे. जर्मनी, विदेशी पर्यटकों को टर्की भेजता था. आज दोनों के बीच तनाव दिखाई दे रहा है. यूरोप के देश अब राय ले रहे हैं कि विस्थापितों को उनके देश वापस कैसे भेजा जाये. अफ्रीका से आने वाले विस्थापितों का संकट ज्यादा बढ़ गया है. तनाव और अशांति होगी ही.
ड्रेस्डेन, जर्मनी में 13 फरवरी, 2018 को एंटी इमिग्रेंट अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) पार्टी के खिलाफ विरोध के रूप में लोग एक ध्वज फहरा रहे हैं, जिसमें लिखा है 'नाज़ी नहीं'. (रियटर्स / हैनिबल हंसचें)
ड्रेस्डेन, जर्मनी में 13 फरवरी, 2018 को 'एंटी इमिग्रेंट अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' (एएफडी) पार्टी के खिलाफ धरने के दौरान लोग एक ध्वज फहरा रहे हैं, जिसमें लिखा है 'नाज़ी नहीं'. (रॉयटर्स / हैनिबल हंसचें)

यह साबित करने के लिये मेरे पास तथ्य-ही-तथ्य हैं कि इस तनाव और अशांति के मूल में पानी है. दक्षिण अफ्रीका के नगर केपटाउन के गम्भीर हो चुके जल संकट के बारे में आपने अखबारों में पढ़ा ही होगा. संयुक्त अरब अमीरात के पानी के भयावह संकट के बारे में भी खबरें छप रही हैं.
मौसम का मिजाज पूरी दुनिया में बदल रहा है. बारिश के समय बारिश नहीं होती. सहारा रेगिस्तान और सऊदी अरब में बर्फबारी हो जाती है. गर्मी के मौसम में कुछ जगहों का तापमान 53-54 डिग्री तक पहुंच जाता है. ये सब जलवायु परिवर्तन की तस्वीरें हैं. जहां तक दक्षिण अफ्रीका की बात है, तो वहां तय सीमा से ज्यादा पानी खर्च करने वालों पर कानूनी कार्रवाई हो रही है.
मौसम का मिजाज पूरी दुनिया में बदल रहा है. बारिश के समय बारिश नहीं होती. सहारा रेगिस्तान और सऊदी अरब में बर्फबारी हो जाती है. गर्मी के मौसम में कुछ जगहों का तापमान 53-54 डिग्री तक पहुंच जाता है. ये सब जलवायु परिवर्तन की तस्वीरें हैं. जहां तक दक्षिण अफ्रीका की बात है, तो वहां तय सीमा से ज्यादा पानी खर्च करने वालों पर कानूनी कार्रवाई हो रही है.

संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व जल विकास रिपोर्ट में आप जल्द ही पढ़ेंगे कि दुनिया के 3.6 अरब लोग यानी आधी आबादी ऐसी है, जो हर साल में कम-से-कम एक महीने पानी के लिये तरस जाती है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पानी के लिये तरसने वाली ऐसी आबादी की संख्या वर्ष 2050 तक 5.7 अरब पहुंच सकती है. 2050 तक दुनिया के पांच अरब से ज्यादा लोग के रिहायशी इलाकों में पानी पीने योग्य नहीं होगा.

यह लेख इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)
 में प्रकाशित एक साक्षात्कार
के आधार पर लिखा गया है




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