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राजाराज चोल का असली इतिहास क्या है, जिनके हिंदू होने या ना होने पर विवाद हो गया है?

पोन्नियिन सेल्वन रिलीज के बाद राजारोज चोल के धर्म को लेकर बयानबाजी हो रही है.

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7 अक्तूबर 2022 (अपडेटेड: 7 अक्तूबर 2022, 10:28 PM IST)
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प्रतीकात्मक फोटो.
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चोलवंश (Chola Dynasty) के महान शासक राजाराज चोल के धर्म और पहचान को लेकर विवाद शुरू हो गया है. राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित तमिल निर्माता निर्देशक वेटरीमारन ने ये कहकर विवाद को जन्म को दे दिया कि राजाराज चोल हिंदू राजा नहीं थे. वेटरीमारन ने भी कहा,

'लगातार हमारे प्रतीक हमसे छीने जा रहे हैं. तिरुवल्लुवर का भगवाकरण करना या राजाराज चोल को हिंदू राजा कहना इसी का उदाहरण है. उन्होंने कहा कि सिनेमा आम आदमी के लिए है. इसलिए पीछे की राजनीति को समझना जरूरी है.'

तमिल सुपरस्टार कमल हासन ने भी वेटरीमारन का समर्थन किया है. मक्कल निधि मय्यम (एमएनएम) पार्टी के अध्यक्ष और अभिनेता कमल हासन ने एक बयान में कहा,

'राजा राज चोल की अवधि के दौरान हिंदू धर्म नाम का कोई शब्द नहीं था. उस समय वैष्णव और शैव थे. और यह अंग्रेज थे, जिन्होंने हिंदू शब्द गढ़ा क्योंकि वो नहीं जानते थे कि इसे सामूहिक रूप से क्या कहा जाए. यह उसी तरह है जैसे उन्होंने थुथुकुडी को तूतीकोरिन में बदल दिया.'

चोलवंश के महान शासक राजाराज चोल को लेकर आए इस तरह के बयानों के बाद सियासी घमासान शुरू हो गया है. तमिलनाडु बीजेपी ने वेटरीमारन के बयान का विरोध किया है. वहीं पुडुचेरी की उपराज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन ने भी बयान पर आपत्ति जताई है.

अचानक चर्चा क्यों?

एक फिल्म रिलीज हुई है 'पोन्नियिन सेल्वन'. राजाराज चोल को लेकर ये विवाद इसी फिल्म के बाद से शुरू हुआ है. 30 सितंबर को रिलीज हुई पोन्नियिन सेल्वन फिल्म में चोल साम्राज्य की नौसैनिक शक्ति और इसके साम्राज्य विस्तार को दिखाया गया है. फिल्म में चोल वंश के राजा पोन्नियन सेल्वन की जिंदगी को दिखाया गया है. इसी फिल्म में राजाराज चोल की चर्चा होती है. राजाराज चोल प्रथम इस साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली राजाओं में से थे. इस फिल्म में बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या राय भी मुख्य भूमिका में हैं.

चोल वंश का इतिहास

चोल साम्राज्य का इतिहास 1000 साल से भी पुराना है. ये साम्राज्य भारत के दक्षिण में स्थित कावेरी नदी के किनारे विकसित हुआ. इस साम्राज्य की राजधानी तिरुचिरापल्ली थी. इस साम्राज्य के राजाओं ने दक्षिण भारत में भव्य और विशाल मंदिर बनवाए.

NCERT की किताबों में इस बारे में लिखा है कि कावेरी नदी के किनारे में मुट्टिरयार नाम के एक परिवार की सत्ता थी. ये परिवार कांचीपुरम के पल्लव राजाओं की सरपरस्ती में काम करता था. इसी दौरान 849 ईस्वी में चोलवंश के सरदार विजयालय ने इन मुट्टिरयारों को हराकर  कावेरी नदी के किनारे कब्जा जमाया और चोल वंश की स्थापना की. इसके बाद विजयालय ने तंजावुर शहर को बसाया और निशुम्भसूदिनी देवी का मंदिर बनवाया.

विजयालय के उत्तराधिकारियों ने पड़ोसी इलाकों को जीता और अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया. दक्षिण और उत्तर के पांड्यन और पल्लव भी इस राज्य का हिस्सा बन गए. 985 ईस्वी में राजाराज चोल प्रथम इस साम्राज्य के शासक बने. राजाराज को तमिल संस्कृति में काफी महान माना जाता है. 985-1014 तक चले राजाराज चोल के साम्राज्य का विस्तार श्रीलंका से लेकर उत्तर में ओडिशा और मालदीव तक हुआ. चोल वंश के राजाओं ने दक्षिण भारत पर लगभग 500 सालों तक शासन किया.

चोल वंश के मंदिरों की अलग पहचान 

राजाराज और उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने तंजावुर और गंगईकोंड चोलपुरम में बड़े-बड़े मंदिर बनवाए. चोल राजवंश ने ही बृहदेश्वर और राजराजेश्वर मंदिर बनवाए. इन मंदिरों ने द्रविड़ वास्तुकला को ऊंचाइयों पर पहुंचाया. इन मंदिरों को मूर्ति कला की दृष्टि से चमत्कार कहा जाता है. चोल राज्य के संरक्षण में बनी कांस्य प्रतिमाएं दुनिया की बेहतरीन कलाकृतियों में गिनी जाती हैं, इनमें से ज्यादातर देवी-देवताओं की ही हैं.

राजाराज चोल द्वारा बनवाया गया बृहदेश्वर मंदिर | फाइल फोटो

राजाराज चोल के धर्म और पहचान को लेकर कई सालों से विवाद है. उन्होंने शैव मंदिरों का निर्माण करवाया था. कई लोगों का मानना है कि राजाराज चोल समेत सभी चोल राजा शैव धर्म के थे. इनके मुताबिक भगवान शिव और उनके अवतारों को मानने वालों को शैव कहते थे. और ये चोल वंश के राजा शिव को मानते थे. शैव धर्म हिंदू धर्म से अलग है या नहीं, इसे लेकर मतभेद हैं. और इसी वजह से राजाराज चोल के धर्म को लेकर भी अक्सर विवाद छिड़ जाता है. 

इस पूरे विवाद पर प्रतिष्ठित तमिल लेखक और नाटककार इंदिरा पार्थसारथी कहते हैं,

‘कमल हासन के मुताबिक चोल वंश के दौरान हिंदू साम्राज्य नहीं था. सत्य है. लेकिन क्या राजाराज ने खुद को शैव शासक घोषित किया था? उन्हें शैव शासक कहना उतना ही बेतुका है जितना कि हिंदू शासक कहना है.’

पार्थसारथी के मुताबिक सभी शासक अपना गौरव दिखाने के लिए स्मारक, मस्जिद और मंदिर का निर्माण करवाते थे.

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