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डिंपल के पास ऐसा क्या था जो सत्यजित रे के पास नहीं था?

साल 1973 में दो फिल्में रिलीज हुई थीं, एक थी राज कपूर की 'बॉबी' अौर दूसरी सत्यजीत राय की 'अशनि संकेत'. 'मास' अौर 'क्लास' की इस भिड़ंत को परखा मराठी कवि दिलीप चित्रे ने.

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1 जून 2016 (अपडेटेड: 1 जून 2016, 10:36 AM IST)
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इससे पहले कि उपरोक्‍त शीर्षक पढ़कर सत्‍यजित राय के धुर प्रशंसक (जिनमें इन पंक्तियों का लेखक स्‍वयं शामिल है) भड़क जाएं और प्रतिवाद में यह कहने की कोशिश करें कि 'सत्‍यजित अॉलसो हैड लॉन्‍ग लेग्‍स' (शायद डिम्‍पल जितनी दर्शनीय नहीं), लेकिन इस तरह की तुलना करने की आखिर जुर्रत ही कैसे की गई! तिस पर मैं उन्‍हें शांत कराने की कोशिश करता हुआ कहूंगा कि यह मेरी मौलिक उक्ति नहीं है. यह 'डी' का कथन है। कौन 'डी'? 'डी' यानी दिलीप चित्रे : मराठी के शीर्ष स्‍थानीय कवि, कथाकार, चित्रकार और फिल्‍मकार. उन्‍होंने चर्चित पत्रिका 'क्‍वेस्‍ट' में इसी शीर्षक से एक लेख लिखा था.

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वर्ष 1973 में दो घटनाएं घटीं. हिंदी में राज कपूर की फिल्‍म 'बॉबी' रिलीज़ हुई. बांग्‍ला में सत्‍यजित राय की फिल्‍म 'अशनि संकेत' आई. 'बॉबी' ने मजमा लूट लिया. वह एक मैसिव ब्‍लॉकबस्‍टर थी. इससे भी बढ़कर वह एक कल्‍चरल फिनामिना थी और उस फिल्‍म में व्‍यक्‍त अदम्‍य सेक्‍स अपील का कोई जवाब किसी के पास नहीं था. दूसरी तरफ़ सत्‍यजित की फिल्‍म, जो कि बंगाल के अकाल पर केंद्रित थी, बर्लिन में सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का पुरस्‍कार जीतने के बावजूद बॉक्‍स ऑफिस पर पिट गई और समालोचकों की भी उसे सराहना नहीं मिली. जहां राज कपूर ने डटकर 'बॉबी' बनाई थी, वहीं 'अशनि संकेत' में सत्‍यजित का फिल्‍म-कौशल किंचित अन्‍यमनस्‍क था. फिल्‍म की नायिका बोबीता (जो कि मशहूर बांग्‍लादेशी अभिनेत्री थीं) की आई-ब्रो तराशी हुई थीं और समालोचकों ने इस बात के लिए सत्‍यजित को आड़े हाथों लिया कि अकाल से जूझ रहे बंगाल के देहात में ऐसी तराशी हुई भवों वाली स्‍त्री को वे कहां से खोज लाए.

दिलीप चित्रे सत्‍यजित राय के आलोचक थे और उनके समक्ष ऋत्विक घटक और मृणाल सेन को कहीं बेहतर फिल्‍मकार मानते थे. उन्‍होंने 'बॉबी' और 'अशनि संकेत' को आमने-सामने रखकर अपने उस कॉलम में सत्‍यजित की भरपूर भर्त्‍सना की.

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दिलीप चित्रे का चाहे जो पूर्वग्रह रहा हो, लेकिन यहां पर जो चीज़ विमर्श के दायरे में है, वह है 'मास' बनाम 'क्‍लास' का शाश्‍वत संघर्ष. ख़ासतौर पर कलाओं में 'लोकप्रिय' और 'शास्‍त्रोचित' का यह द्वैत लंबे समय से बना हुआ है. सिनेमा के परिप्रेक्ष्‍य में, दोनों तरह के फिल्‍म निर्देशक एक-दूसरे के सामने टकराव की मुद्रा में रहते हैं. आर्टहाउस फिल्‍ममेकर कहता है कि तुम कचरा बना रहे हो, पॉपुलर फिल्‍ममेकर कहता है कि भीड़ तो मेरी ही पिक्‍चर पर उमड़ रही है. आर्टहाउस फिल्‍ममेकर कहता है, लेकिन अवार्ड तो मुझे ही मिलेंगे. पॉपुलर कहता है, पब्लिक का प्‍यार ही मेरे लिए सबसे बड़ा अवार्ड है, वग़ैरह-वग़ैरह.

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वहां पर क्‍वेन्‍टीन टैरेंटिनो की 'पल्‍प फिक्‍शन' को कान में सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का पुरस्‍कार दे दिया जाता है, हमारे यहां 'पल्‍प' को ऐसी मान्‍यता कभी नहीं मिलेगी. वास्‍तव में पॉपुलर कल्‍चर तो वहां पर गंभीर अकादमिक अध्‍ययनों और शोधों का विषय रहा है. रोलां बार्थ से लेकर स्‍लावोइ ज़िज़ेक तक ने पॉपुलर मिथकों पर विस्‍तार से लिखा है. ज्‍यां बोद्रिलां जैसों की पोस्‍ट मॉर्डन थ्‍योरीज़ लोकप्रिय संस्‍कृति पर आधारित हैं. और हां, अमेरिका में साल की सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म और सर्वाधिक पैसा कमाने वाली फिल्‍म अमूमन एक ही होती है, जो अकादमी पुरस्‍कार जीतती है. भारत में फिल्‍मफ़ेयर और राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों जैसा स्‍पष्‍ट विभाजन वहां पर नहीं है.

मुझसे पूछो तो मैं तो अकसर इस भेद को समझ नहीं पाता. मुझे दोनों स्‍वीकार हैं. दोनों में मेरा मन रमता है. क्‍योंकि मैं सत्‍यजित से भी उतना ही प्‍यार करता हूं, जितना कि 'बॉबी' से. 'बॉबी' से थोड़ा ज्‍़यादा.

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