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खनन के बहाने धामी सरकार से किस बात की खुन्नस निकाल रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत?

Uttarakhand के पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से बीजेपी सांसद Trivendra singh Rawat ने संसद में अवैध खनन के मुद्दे पर अपनी ही राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया है. रावत के इस बयान के बाद सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या उनके पुराने जख्म अभी भरे नहीं हैं जो साल 2021 में उनको मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद मिले थे.

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1 अप्रैल 2025 (पब्लिश्ड: 04:10 PM IST)
pushkar singh dhami trivendra singh rawat
त्रिवेंद्र सिंह रावत (दाएं) ने उत्तराखंड सरकार पर निशाना साधा है. (एक्स, फाइल फोटो)
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उत्तराखंड (Uttarakhand) की BJP सरकार अवैध खनन के मुद्दे पर घिरती नजर आ रही है. विपक्षी कांग्रेस (Congress) उन पर हमलावर है. लेकिन दिलचस्प है कि कांग्रेस को ये मुद्दा BJP सांसद और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री ने ही दिया है. नाम है त्रिवेंद्र सिंह रावत. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और केंद्रीय नेतृत्व की नाक के नीचे संसद में अवैध खनन को लेकर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. आखिर उनको ये जरूरत क्यों पड़ी इसके पीछे की राजनीति क्या है? समझने की कोशिश करते हैं. शुरुआत हालिया घटनाक्रम से करेंगे.

हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 28 मार्च को लोकसभा में अवैध खनन का मुद्दा उठाते हुए कहा, 

हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और उधम सिंह नगर जिलों में रात के समय अवैध खनन किया जा रहा है. यह पर्यावरण और कानून व्यवस्था के लिए खतरा बनता जा रहा है. सरकार के स्पष्ट निर्देश के बावजूद खनन माफिया बाज नहीं आ रहे हैं. अवैध खनन के चलते सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं. जिसमें कई निर्दोषों की जान जा रही है.

ये पहला मौका नहीं है जब रावत ने पार्टी को असहज करने वाला बयान दिया है. साल 2021 में मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से कई मौकों पर उनके बयान पार्टी के लिए परेशानी का सबब बने हैं. नवंबर 2022 में उन्होंने देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना पर सवाल उठाते हुए कहा, 

हम कभी स्मार्ट सिटी की लिस्ट में 99वें स्थान पर थे. पिछले तीन साल (मेरे कार्यकाल) में हम नौवें स्थान पर पहुंच गए. लेकिन आज जिस तरह की आवाजें उठ रही हैं, ऐसा लगता है कि हम स्मार्ट सिटी के सपने से दूर जा रहे हैं.

इस बयान के बाद BJP के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात की थी. और रावत से पार्टी फोरम पर अपनी बात रखने का अनुरोध किया था. लेकिन रावत पर इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा.

त्रिवेंद्र सिंह रावत के ताजा बयान के बाद सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या उनके पुराने जख्म अभी भरे नहीं हैं जो साल 2021 में उनको मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद मिले थे. सीनियर पत्रकार राहुल कोटयाल बताते हैं, 

राज्य में BJP की सरकार है, सभी सांसद BJP के हैं. राज्य के 11 नगर निगम में से 10 में BJP के मेयर हैं. फिर भी रावत द्वारा अवैध खनन का मुद्दा संसद में उठाना कहीं न कहीं पार्टी के भीतर के गतिरोध को दर्शाता है. 

त्रिवेंद्र सिंह रावत को साल 2017 में सीएम बनाया गया था, जब राज्य की सत्ता में BJP की वापसी हुई थी. लेकिन विधानसभा चुनाव से एक साल पहले उनको हटा दिया गया. और उनकी जगह लोकसभा सांसद तीरथ सिंह रावत को लाया गया. लेकिन चार महीने के भीतर ही उनको पुष्कर सिंह धामी के लिए कुर्सी खाली करनी पड़ी. धामी के नेतृत्व में BJP की सत्ता में वापसी हुई. लेकिन धामी खटीमा विधानसभा सीट से चुनाव हार गए. इसके पीछे भी पार्टी के आंतरिक गतिरोध को जिम्मेदार बताया गया.

भूमि सुधार कानून पर टकराव 

साल 2000 में राज्य के गठन के बाद से राज्य में बाहरी लोगों के जमीन खरीदने पर कई तरह के प्रतिबंध हैं. साल 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राज्य में पर्यटन उद्योग, बागवानी, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के लिए निवेशकों द्वारा खरीदी जाने वाली जमीन के क्षेत्रफल की सीमा 12.5 एकड़ से बढ़ाकर 30 एकड़ कर दी थी. इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि व्यवस्था 1950 में संशोधन किया था. इसको लेकर राज्य में काफी हंगामा हुआ. साल 2022 के चुनाव में धामी ने इस कानून को बदलने का वादा किया था. अपने वादे के अनुसार धामी ने फरवरी 2025 में त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के किए गए बदलावों को पलट दिया. वरिष्ठ पत्रकार चारू तिवारी बताते हैं, 

इसके बाद से ही रावत खार खाए हुए थे. और धामी से अपना स्कोर सेटल करने के मौके की तलाश कर रहे थे. राज्य में हाल में बढ़े अवैध खनन के मामलों ने उनको ये मौका दे दिया.

केंद्रीय नेतृत्व के करीबी धामी 

6 मार्च को उत्तराखंड के दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुष्कर सिंह धामी को छोटा भाई और ऊर्जावान मुख्यमंत्री कहकर संबोधित किया. यही नहीं धामी भाषण खत्म कर जैसे ही प्रधानमंत्री के करीब पहुंचे तो उन्होंने उनकी पीठ भी थपथपाई. प्रधानमंत्री का जेस्चर ये दिखाता है कि धामी को केंद्रीय नेतृत्व का आशीर्वाद प्राप्त है. हाल में उन्होंने यूनिवर्सल सिविल कोड और हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर जो मुखरता दिखाई है उसका केंद्रीय नेतृत्व से भरपूर समर्थन मिला है. मुख्यमंत्री बनते समय धामी की संगठन पर कोई खास पकड़ नहीं थी. उत्तराखंड की राजनीति में BJP के पुराने क्षत्रप भगत सिंह कोश्यारी के भरोसेमंद होने के चलते उन पर दांव लगाया गया था. लेकिन दूसरी बार सत्ता में वापसी के बाद से धामी पार्टी और संगठन में अपनी जड़ें मजबूत करने में जुटे हैं. और इसमें उनको केंद्रीय नेतृत्व का भी समर्थन मिलता रहा है. त्रिवेंद्र सिंह रावत की नाराजगी के पीछे ये भी एक बड़ा कारण है क्योंकि उनकी नजर भी सीएम की कुर्सी पर है.

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गढ़वाली और कुमाऊं विभाजन

उत्तराखंड की राजनीति के दो सिरे हैं. एक ठाकुर-ब्राह्मण पॉलिटिक्स और दूसरा कुमाऊं और गढ़वाल का ऐतिहासिक क्षेत्रीय विभाजन. राज्य में कांग्रेस का नेतृत्व ज्यादातर कुमाऊं क्षेत्र से रहा है. वहीं BJP के अधिकतर मुख्यमंत्री गढ़वाल क्षेत्र से आते हैं. लेकिन इस बार BJP ने संतुलन साधने के लिए कुमाऊं क्षेत्र से आने वाले पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया. राहुल कोटयाल बताते हैं, 

इस चीज को लेकर भी त्रिवेंद्र सिंह रावत के मन में टीस रही होगी कि गढ़वाली होने के नाते सीएम की कुर्सी पर उनकी दावेदारी ज्यादा मजबूत थी. 

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रावत के प्रतिद्वंद्वी उन पर आरोप लगाते हैं कि उनकी नजर सीएम की कुर्सी पर है इसलिए वे धामी सरकार के सामने परेशानी खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं.

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सफाई दी है

संसद में धामी सरकार को घेरने के बाद उठ रहे सवालों को लेकर त्रिवेंद्र सिंह रावत की सफाई आई है. उन्होंने कहा, 

मैं कभी अपनी सरकार को अस्थिर करने के बारे में सोच नहीं सकता. मुझे मुख्यमंत्री नहीं बनना है मैं तो दिल्ली की राजनीति में जा चुका हूं. उसका फलक बहुत बड़ा होता है.

रावत के आरोपों में दम

त्रिवेंद्र सिंह रावत का संसदीय क्षेत्र हरिद्वार है. यहां गंगा किनारे बड़े पैमाने पर खनन होता है. यहां गंगा नदी का एक हिस्सा ‘कुंभ क्षेत्र’ के तौर पर प्रोटेक्टेड है. इस क्षेत्र में खनन पर रोक है. लेकिन यहां भी खनन माफिया सक्रिय है. राहुल कोटयाल बताते हैं कि हाल में इस इलाके से एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक पुलिस वाला बालू से लदे ट्रैक्टर से बचने की कोशिश कर रहा था. हरिद्वार में अवैध खनन को लेकर लगातार आंदोलन भी होते रहे हैं. मातृ सदन नाम का संगठन लंबे समय से अवैध खनन और गंगा सफाई को लेकर आंदोलन कर रहा है. भूख हड़ताल के दौरान इस संगठन के दो संन्यासी निगमानंद और आचार्य सानंद (जीडी अग्रवाल) की मौत हो चुकी है. 

उत्तराखंड BJP में गुटबाजी का पुराना इतिहास 

उत्तराखंड में BJP हमेशा से गुटबाजी से जूझती रही है. साल 2007 में जब पार्टी सत्ता में आई तो मेजर जनरल (रिटायर्ड) बीसी खंडूरी को सीएम बनाया गया. लेकिन वो दो साल तक ही इस पद पर रह पाएं. साल 2009 में उनकी जगह रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन 2011 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें फिर से खंडूरी को कुर्सी सौंपने को कहा गया. साल 2017 में दोबारा BJP की सरकार आने के बाद भी यही खेल हुआ. पांच साल में तीन सीएम बने. जिसके बारे में हम आपको बता चुके हैं. त्रिवेद्र सिंह रावत के बयान को भी गुटबाजी के पुराने इतिहास से जोड़ कर देखा जा सकता है.

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