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यूनिफॉर्म सिविल कोड पर संविधान सभा की बहस में क्या हुआ था?

संविधान का आर्टिकल 44 है. और ये Directive Principles of State Policy में आता है. हालांकि महात्मा गांधी Directive Principles को संविधान का डस्ट्बिन कहा करते थे .

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Uniform Civil Code
समान नागरिक संहिता
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31 जनवरी 2024
Updated: 31 जनवरी 2024 22:38 IST
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क्या आप कभी कोर्ट गए हैं? अगर गए हों तो कोर्ट में आपने कई तरह की अदालतों का नाम सुना होगा. जैसे क्रिमिनल कोर्ट, सिविल कोर्ट, लोक अदालत. पर मोटे तौर पर भारत में दो तरह की अदालतें हैं. क्रिमिनल और सिविल.  तो समझते हैं
-यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए संविधान में क्या लिखा है?
-सिविल लॉ क्या होते हैं ?
-हिन्दू कोड बिल क्या है ?
और उत्तराखंड से इसपर क्या खबर आई है ?
 


 यूनिफॉर्म सिविल कोड शब्द आया कहां से ?
भारत के संविधान में नागरिकों को दो तरह के अधिकार मिले हुए हैं. पहला मूल अधिकार. ये ऐसे अधिकार हैं जिन्हें एक व्यक्ति जो भारत का नागरिक है, उससे सामान्य हालात में ये अधिकार नहीं छीने जा सकते. अगर इन अधिकारों में किसी तरह की कटौती या हनन होता  है, तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. दूसरे हैं राज्य के नीति-निर्देशक तत्व. इन्हें Directive Principles of State Policy के नाम से संविधान में जगह दी गई है. जैसे मूल अधिकारों के लिए अदालत में जा सकते हैं वैसे नीति निर्देशक तत्वों के लिए अदालत में नहीं जा सकते. ये एक आदर्श स्थिति है. इसमें ऐसे प्रावधान हैं, जो सरकार को दिशा दिखाने के लिए रखे गए हैं. अपनी नीतियां बनाते समय सरकार को इसका ध्यान रखना चाहिए. संविधान के भाग 4 में आर्टिकल 36 से आर्टिकल 51 तक यही Directive Principles Of State Policy मौजूद हैं. इसी का आर्टिकल 44 सभी नागरिकों के लिए एक यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाने की बात करता है. अनुच्छेद 44 के  अनुसार 

 "राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा." 
 

इसके मुताबिक सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वो अपने नागरिकों के लिए एक यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाए. पर सरकार पर इसे बनाने के लिए कोई बाध्यता नहीं है. कोई भी सरकार या नागरिक इसका पालन करने के लिए बाध्य नहीं किये जा सकते. माने ये ऐसा कोई अधिकार नहीं जिसके न मिलने पर कोर्ट में अपील की जा सके.

यूनिफॉर्म सिविल कोड के बाद अब सिविल लॉ समझते हैं. जानते हैं कि अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसी स्थिति बनती है तो क्या होगा ? 
जैसा कि हमने शुरू में बताया, अदालतें दो तरह की होती हैं, क्रिमिनल और सिविल.

क्रिमिनल मामले :
क्रिमिनल लॉ के केसेस में किसी अमुक व्यक्ति बनाम सरकार का मुकदमा बनता है. आपने मुकदमों की सुनवाई के दौरान अक्सर The State vs person, या सरकार बनाम अमुक व्यक्ति,, ऐसा सुना होगा.  उदाहरण के लिए अगर किसी एक्स नाम के व्यक्ति ने वाई नाम के व्यक्ति पर हमला किया है तो वाई की ओर से सरकार केस लड़ती है. क्रिमिनल मामलों में ऐसा माना जाता है कि हमला किसी व्यक्ति पर नहीं बल्कि एक नागरिक पर हुआ है जिसकी जिम्मेदारी स्टेट यानी सरकार की है. ऐसे मामलों में व्यक्ति चाहे किसी भी समुदाय का हो, सभी के लिए कोर्ट का प्रोसेस और दी जाने वाली सजा एक समान होती है. यदि ऊपर दिए उदाहरण में एक्स और वाई अलग-अलग समुदाय से हैं, तो भी सुनवाई, सजा में कोई अंतर नहीं होता.

 सिविल मामले
क्रिमिनल लॉ से ठीक उलट सिविल मामलों में मुकदमा सरकार के खिलाफ नहीं लड़ना होता. सिविल मुकदमा दो व्यक्तियों, दो संस्थानों, समूहों आदि के बीच होता है. उदाहरण के लिए जमीन, प्रॉपर्टी, मानहानि, तलाक जैसे मुद्दों में सिविल मुकदमा दाखिल किया जाता है. क्रिमिनल कोर्ट में जहां सज़ा पर जोर दिया जाता है, वहीं सिविल मामलों में मुआवजा या सेटलमेंट कराना प्राथमिकता में रहता है.    

क्रिमिनल और सिविल मामलों को जानने के बात एक बात क्लीयर है कि क्रिमिनल मामलों में जो कानून होते हैं वो सभी समुदायों के लिए एक समान हैं. पर सिविल मामलों में ऐसा नहीं है. इसी को एकरूपता देने के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने की मांग उठती रहती है. अगर ऐसा होता है तो सभी समुदायों के लिए सिविल मामलों में भी एक समान नियम और सज़ा तय होगी.

कौन से मामले सिविल कहलाते हैं, हिन्दू कोड बिल क्या है ? आगे बताएंगे. पर उससे पहले थोड़ा इतिहास में चलते हैं. जानते हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर संविधान सभा के सदस्यों, महात्मा गांधी और बाबासाहेब भीम राव आंबेडकर के क्या विचार थे? 
जैसा कि हमने बताया, यूनिफॉर्म सिविल कोड- संविधान का आर्टिकल 44 है. और ये Directive Principles of State Policy में आता है. हालांकि महात्मा गांधी Directive Principles को संविधान का डस्ट्बिन कहा करते थे . उनका मानना था जो चीजें संविधान के निर्माता कहीं डाल नहीं पाए उन्हें Directive Principles में डाल दिया. संविधान सभा के मेम्बर केटी शाह तो ये कहा करते थे कि ये एक पोस्ट डेटेड चेक की तरह है. जब पैसा होगा, तब सरकार इसे लागू करे. यहां पैसे का मतलब प्रभावित होने वाले वर्गों की सहमति से था.

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर संविधान सभा में भी खूब बहस हुई. 23 नवंबर 1948 को नई दिल्ली के कॉन्सटीट्यूशन हॉल में चेयरमैन की कुर्सी पर उपसभापति हरेन्द्र कुमार मुखर्जी बैठे थे. तभी बॉम्बे से संविधान सभा के मेंबर मीनू मसानी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रस्ताव रखा. प्रस्ताव के आते ही इसपर जोरदार बहस शुरू हो गई. तर्क-वितर्क के दौरान बात अंग्रेजों और खिलजी के शासन तक पहुंच गई.

इसका समर्थन करने वाले लोगों में बाबासाहेब, मीनू मसानी, के एम मुंशी और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर थे. 
इनका तर्क था कि विवाह आदि का पर्सनल लॉ से क्या लेना-देना?  ये मौलिक अधिकारों के खिलाफ नहीं है, बल्कि ये संविधान में प्रस्तावित मौलिक अधिकारों की रक्षा का प्रावधान है, खास तौर पर इससे लैंगिक समानता आएगी.

अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर जो कि मद्रास से संविधान सभा के सदस्य थे. उन्होंने कहा कि मुस्लिम सदस्य कहते हैं कि समान नागरिक संहिता मुसलमान नागरिकों के बीच अविश्वास और कटुता लाएगी. मैं कहता हूं इसके विपरीत होगा. समान नागरिक संहिता समुदायों के बीच एकता का कारण बन सकती है.

और बाबासाहेब का तर्क था  
 

"इस देश में एक कंप्लीट यूनिफॉर्म क्रिमिनल कोड है. ज्यादातर सिविल कानून भी यूनिफॉर्म हैं. सिर्फ शादी और उत्तराधिकार के मसले पर हम दखल नहीं दे पाए हैं और आर्टिकल 35 के जरिए उसे ही छूना चाहते हैं. मुसलमानों में शरियत का पालन पूरे देश में एक जैसा नहीं है. यूनिफॉर्म सिविल कोड वैकल्पिक व्यवस्था है. ये अपने चरित्र के आधार पर नीति निदेशक सिद्धांत होगा और इसी वजह से राज्य तत्काल यह प्रावधान लागू करने के लिए बाध्य नहीं है. राज्य जब उचित समझे तब इसे लागू कर सकता है."

वहीं कई सदस्य इसके विरोध में भी थे. इनमें मोहम्मद इस्माइल, नजीरुद्दीन अहमद, मौलाना हसरत मोहानी और बी पोकर साहिब बहादुर थे. इनका तर्क था कि अगर UCC जैसा कोई कानून आता है तो इसमें पर्सनल लॉ को बाहर रखना चाहिए, क्योंकि पर्सनल लॉ लोगों के धर्म और कल्चर का हिस्सा हैं.


नजीरुद्दीन अहमद जो कि संविधान सभा में पश्चिम बंगाल से मुस्लिम सदस्य थे. उन्होंने कहा 
 

"हमारे देश में बहुत सारे कानून पहले से पर्सनल लॉ में दखल देते हैं, लेकिन 175 साल के ब्रिटिश रूल में भी उन्होंने कुछ पर्सनल लॉ को नहीं छुआ. जैसे- शादी से जुड़ी प्रैक्टिस या उत्तराधिकार का कानून. मुझे कोई शक नहीं है कि एक वक्त आएगा जब पूरे देश में एक जैसा सिविल लॉ होगा, लेकिन अभी वक्त नहीं आया. अंग्रेजों ने जो 175 सालों में नहीं किया, जो मुस्लिम शासक 500 सालों में करने से बचते रहे, इसलिए हमें स्टेट को ये ताकत नहीं देनी चाहिए कि वो इसे एक बार में कर दे."    

इस पूरी बहस के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड पर संविधान सभा में वोटिंग हुई और यूनिफॉर्म सिविल कोड को संविधान के आर्टिकल 44 के तहत डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में डाल दिया गया. ये कहकर कि स्टेट जब उचित समय समझेगा, तब वो इसे लागू करेगा.

इसके बाद 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हो गया. फिर 1951 में बाबासाहेब, जो कि उस वक्त देश के कानून मंत्री थे, उनके नेतृत्व में संसद में हिन्दू कोड बिल पेश किया गया.  इसमें महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति में अधिकार, तलाक का अधिकार, बहुविवाह पर रोक, विधवा विवाह को मान्यता जैसी बातें थीं. पर बिल पेश होते ही संसद में हंगामा शुरू हो गया. विरोध करने वालों का तर्क था कि सिर्फ हिंदुओं के लिए ये कानून लाकर उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. इसी मुद्दे पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने पीएम नेहरू को चिट्ठी लिखी. खत में उन्होंने कहा कि बिल को अपनी सहमति देने से पहले पंडित नेहरू उसके अच्छे-बुरे पक्ष को भी देख लें. इस खत के जवाब में नेहरू ने सदन और सरकार के फैसलों को चुनौती देने के राष्ट्रपति के अधिकार पर ही सवाल उठा दिए. 
फिर आया साल 1955. पंडित नेहरू ने साहस दिखाते हुए हिन्दू कोड बिल को पारित कराया जिसमें  हिंदू मैरिज एक्ट (1955), हिंदू सक्सेशन एक्ट (1956) , Hindu Minority and Guardianship Act और Hindu Adoptions and Maintenance Act पास हुए. इन एक्ट्स की वजह से हिन्दू समुदाय में तलाक, उत्तराधिकार, तलाक के बाद गार्जियनशिप और बच्चों को गोद लेने आदि के प्रावधान तय किये गए.

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर पहाड़ों के राज्य उत्तराखंड से एक खबर आई है.
5 फरवरी,2024 से उत्तराखंड विधानसभा का सत्र शुरू हो रहा है. उत्तराखंड विधानसभा में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड बिल 6 फरवरी को पेश किया जाएगा. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मुताबिक समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार की प्राथमिकता में शामिल है. धामी सरकार ने सरकार ने मई 2022 में उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय कमेटी गठित की थी. जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई (रिटायर्ड) की अध्यक्षता में गठित इस कमेटी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड की ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार की है. बकौल सीएम धामी, ये कमेटी 2 फरवरी को अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगी और आगामी विधानसभा सत्र में विधेयक लाकर सरकार समान नागरिक संहिता को प्रदेश में लागू कर देगी.

 

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