जानिए क्यूं ये मूवीज़ हमारे हिसाब से 2018 की 5 सबसे बेहतरीन ऑनलाइन मूवीज़ हैं?
कहीं आपने इनमें से एक दो मिस तो नहीं कर दीं?
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फोटो - thelallantop
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'लस्ट स्टोरीज़' को 2013 में आई 'बॉम्बे टॉकीज़' का सीक्वल भी कहा गया. क्यूंकि उस फिल्म की तरह इसका भी केवल फॉर्मेट ही नहीं बल्कि निर्देशकों की टोली भी एक ही थी. लेकिन 'लस्ट स्टोरीज़' को 'बॉम्बे टॉकीज़' से उलट सिनेमा हॉल में नहीं बल्कि सीधे ऑनलाइन स्ट्रीमिंग पोर्टल पर रिलीज़ किया गया था. साथ ही दोनों फिल्मों की थीम भी बिलकुल अलग थी. खैर, तुलना के बजाय अब केवल लस्ट स्टोरीज़ की बात करें तो इसमें कुल चार कहानियां हैं -#1. लस्ट स्टोरीज़ | जून, 2018 | नेटफ्लिक्स | 02 घंटे
– निर्देशक: अनुराग कश्यप, ज़ोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी, करण जौहर | कलाकार: राधिका आप्टे, भूमि पेडणेकर, मनीषा कोइराला, विकी कौशल, नेहा धूपिया, संजय कपूर
> पहली कहानी में एक स्टूडेंट और टीचर के बीच के रिश्ते को दिखाया गया है. इस पूरे पार्ट में बीच-बीच में हम टीचर कालिंदी के मोनोलॉग्स से उसके स्त्री मन के बारे में बहुत कुछ जान पाते हैं.
> दूसरा भाग एक कामवाली बाई, सुधा के बारे में बताता है. उसके अपने मालिक अजीत के साथ शारीरिक संबंध है. जिसको लेकर अजीत तो बहुत कैजुअल है लेकिन सुधा ने इस रिश्ते से एक उम्मीद सी बांध ली है.
एक्स्ट्रा-मेरेटल अफेयर्स में एक स्त्री का पॉइंट ऑफ़ व्यू दिखाता है दिबाकर बैनर्जी का भाग.> तीसरे पार्ट की कहानी विवाहेतर संबंधों की कहानी है जिसमें रीना नाम की शादी शुदा औरत अपनी शादी से परेशान है. उसका अपने पति सलमान के ही दोस्त सुधीर से अफ़ेयर चल रहा है.
> चौथे पार्ट की कहानी मेघा नाम की लड़की की है जिसकी शादी एक शर्मीले लड़के पारस से हो जाती है. पारस मेघा से प्रेम तो करता है लेकिन उसकी शारीरिक ज़रूरतों के बारे में नहीं जानता, और जानना भी नहीं चाहता.
# हमारी लिस्ट में क्यूं है -- इतनी लंबी चौड़ी स्टार कास्ट और इतने मंझे हुए निर्देशकों की टीम जब किसी प्रोजेक्ट में जुड़ती है तो फिल्म तो वैसे ही मस्ट वॉच हो जाती है, लेकिन ये हमारी लिस्ट में है अपने सब्जेक्ट के चलते. ‘लस्ट स्टोरीज़’ की चारों कहानियां स्त्रियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं और स्त्री मनोविज्ञान को समझने/समझाने का प्रयास करती हैं. महिलाओं के यौनाचार और उनकी यौन स्वच्छंदता को लेकर हमारे मुल्क और हमारे मुल्क के सिनेमा में एक किस्म की चुप्पी पसरी रहती है, लेकिन पिछले कुछ सालों से ये चुप्पी टूटी है. उसी ‘आवाज़’ का एक नारा ये मूवी ‘लस्ट स्टोरीज़’ भी है. अलग-अलग निर्देशकों द्वारा अलग-अलग परिवेशों में बुनी गईं मूवी की ये चार कहानियां आज़ादी वाले स्पेक्ट्रम के चटख गुलाबी रंग को बड़े रोचक ढंग दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती हैं.
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फिल्म रिव्यू - लस्ट स्टोरीज़
‘टाइगर्स’ के मुख्य पात्र का नाम अयान है. ये किरदार दरअसल सैयद आमिर रज़ा नाम के रियल लाइफ हीरो पर बेस्ड है. आमिर, पाकिस्तान में एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में एक सेल्समैन या कहें, मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव था. उस बड़ी कंपनी के एक बेबी फ़ॉर्मूले को पिडिएट्रीशियन्स (बच्चों के डॉक्टर्स) के सामने पिच करता था. लेकिन जब उसे पता चला कि ‘मां के दूध’ के विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा ये प्रोडक्ट पाकिस्तान के बच्चों के लिए खतरनाक है तो उसने अपनी ही कंपनी, यानी जिसमें वो काम करता था, के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. और खतरनाक भी ऐसा की जानलेवा. कुछ रियल फुटेज देखकर आपका दिल दहल जाता है. कुपोषण से ग्रस्त बच्चे हैं जिनके शरीर की पसलियां दिख रही हैं. बिलखती माएं हैं. और वो सब कुछ है जो आपको एक विशेष ब्रांड और उसकी मार्केटिंग से नफ़रत करवा सकता है.#2. टाइगर्स | नवंबर, 2018 | ज़ी5 | 01 घंटा 29 मिनट
– निर्देशक: डेनिस टेनोविक | कलाकार: इमरान हाशमी, गीतांजलि थापा, डैनी ह्यूस्टन, सुप्रिया पाठक, सत्यदीप मिश्रा, विनोद नागपाल
# हमारी लिस्ट में क्यूं है -इसे फिल्म से ज़्यादा एक डॉक्यूमेंट्री की तरह देखिए. पाकिस्तान के बैकड्रॉप पर भी ये फिल्म भारत के हालात पर हालात पर भी एक तंज़ है, एक कमेंट है, एक सबक है. भारत का मध्यमवर्ग भी पाकिस्तान सरीखा ही पश्चिमी सभ्यता को आंख मूंद के फॉलो करता है, फिर चाहे इसके लिए उसे कितना ही दुःख, पीड़ा, परेशानियां क्यूं न झेलनी पड़े. और इसी के चलते जब सत्तर के दशक में अमेरिका में बेबी फ़ॉर्मूला पर बैन लग गया था, तब इन मल्टीनेशनल कंपनी ने तीसरी दुनिया के देशों को टारगेट करना शुरू कर दिया.
फिल्म में एक और बात काबिले गौर है. और वो है एक सेल्समैन की दुनिया. अयान नैतिकता का पाठ तो बाद में पढ़ाता है लेकिन शुरुआत में एक अच्छे सेल्समेन के गुर भी दर्शकों को सिखा जाता है. और हां, फिल्म में ग़ालिब, फैज़ जैसे लेजेंड्स की ग़ज़लें भी हैं.
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फ़िल्म रिव्यू: टाइगर्स
राजमा चावल की कहानी की बात करें तो पत्नी की मौत हो जाने के बाद राज माथुर अपने लड़के कबीर के साथ नई दिल्ली से पुरानी दिल्ली शिफ्ट हो जाता है. बाप-बेटे के बीच कम्यूनिकेशन गैप है जिसे पाटने के लिए बाप सोशल मीडिया का सहारा लेता है, लेकिन इसी के चलते कन्फ्यूज़न और सेहर की एंट्री होती है. सेहर कई लोगों के छोटे-मोटे कर्ज़ में डूबी मेट्रो सिटी गर्ल है जिसका एक बुरा पास्ट है. इन तीनों के साथ-साथ ‘राजमा चावल’ में पुरानी दिल्ली और वहां के ढेरों किरदार देखने को मिलते हैं.#3. राजमा चावल | नवंबर, 2018 | नेटफ्लिक्स | 01 घंटा 58 मिनट
– निर्देशक: लीना यादव | कलाकार: ऋषि कपूर, अनिरुद्ध तंवर, अमायरा दस्तूर, अपारशक्ति खुराना
# हमारी लिस्ट में क्यूं है -फिल्म हमारी लिस्ट में है अपने रियस्टिक ट्रीटमेंट के चलते. जैसे - पुरानी दिल्ली और वहां के गली-मुहल्ले, वहां की दोस्ती यारी और रिश्तेदारी और वहां का मिडिल क्लास, जो शायद भारत के किसी भी शहर के मिडिल क्लास सरीखा है.
इसके अलावा ऋषि कपूर का अभिनय इतना एफर्टलेस है कि आपको कहीं भी नहीं लगता कि वो ऋषि कपूर हैं, वो तो दरअसल राज माथुर ही हैं. उनका मेकओवर और उनके हाव भाव देखे जाने योग्य हैं.
साथ ही हिंदी फिल्मों में शायद पहली बार इतने सशक्त तरीके से सोशल मीडिया को मूवी के प्लॉट का सबसे अहम हिस्सा बनाया गया है. मूवी में जनरेशन गैप और बाप बेटे के बीच संवादों की कमी को भी बड़े रियल तरीके से दिखाया गया है.
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फ़िल्म रिव्यू: राजमा चावल
एक आठ साल के बच्चे हेमू को अपने से बहुत बड़ी लड़की निम्मो से प्रेम हो जाता है. लड़की की शादी तय हो गई है और कुछ ही दिनों में वो ससुराल चली जाएगी. लड़के को बेशक प्रेम सीरियस वाला होता है. लेकिन उस लड़के को कोई सीरियसली नहीं लेता. बस आगे इसी को आधार बनाकर एक बहुत इनोसेंट कहानी दिखती है.#4. मेरी निम्मो | अप्रैल, 2018 | इरोज़ नाउ | 01 घंटा 30 मिनट
– निर्देशक: एम एम शांकल्य | कलाकार: अंजलि पाटिल, करण दवे, शालिनी पांडे
# हमारी लिस्ट में क्यूं है -फिल्म में कहानी से ज़्यादा प्यारा उसका ट्रीटमेंट है. शुरुआत में इस फिल्म का प्रमोशन देखते हुए लगा कि ये ’एक छोटी सी लव स्टोरी’ या किस्लोवस्की की ‘अ शॉर्ट फ़िल्म अबाउट लव’ जैसी होगी, या उससे प्रेरित. लेकिन दरअसल ये तो एक बाल फ़िल्म है, जिसको हर बच्चे और उसके पेरेंट्स के लिए रेकमंड किया जाना चाहिए.
फ़िल्म की सबसे बेहतरीन बात ये कि, मेरी निम्मो कोई शिक्षा नहीं देती कि आपको बच्चों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए, न आपको गिल्ट देती है कि बच्चों के दुःख को सीरियसली लो. ये बस आपको बच्चों की नज़र दे देती है, आपको समझा देती है कि बच्चों को उनका ख़ुद का दुःख कैसा दिखता होगा. बस्स!
मूवी में बचपन 2018 का बचपन नहीं है – जहां पर मोबाइल, वीडियो गेम्स और स्वीमिंग क्लासेज़ हैं. इसमें बचपन हमारे गुज़रे दौर का बचपन है – जिसमें गील-सूख, सेवन-टाइल्स, बड़े होने की चाहतें हैं.
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फ़िल्म रिव्यू: मेरी निम्मो
सआदत हसन मंटो की इसी नाम की शॉर्ट स्टोरी पर बेस्ड फिल्म ‘टोबा टेक सिंह’ एक पागलखाने की कहानी है. पागलखाना, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान में चला गया था. इस पागलखाने में हर कौम के पागल हैं. ये सारे चैन-ओ-अमन से रहते हैं. लेकिन जब एक मुल्क का दो मुल्कों में बंटवारा होता है तो इस पागलखाने में भी अज़ाब आ जाता है. इसी पागलखाने में एक सिख भी है – बिशन सिंह. उसके गांव के नाम पर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते हैं. उसके और बाकी पागलों की कहानी ही इस फिल्म की कहानी है. साथ फिल्म में मंटो की कुछ और कहानियों को भी गूंथा गया है, जैसे ‘खोल दो’.#5. टोबा टेक सिंह | अगस्त, 2018 | ज़ी5 | 01 घंटा 13 मिनट
– निर्देशक: केतन मेहता | कलाकार: पंकज कपूर, विनय पाठक, गौरव द्विवेदी
# हमारी लिस्ट में क्यूं है -कुछ लोगों को लग सकता है कि जब एक चर्चित कहानी स्क्रिप्ट में तब्दील होती है तो आधा काम तो पहले ही अच्छा हो गया. लेकिन दरअसल है इसका ठीक उल्टा. लिटरेचर के मामले में ऑरिजनल कंटेंट के साथ इंसाफ कर पाने में ही फ़िल्मकार की एक फ़िल्मकार के तौर पर कामयाबी छुपी रहती है. और कहना न होगा कि डायरेक्टर इसमें काफी हद तक कामयाब रहे हैं.
टोबा टेक सिंह को देखकर ये भी समझा जा सकता है कि कैसे कई बार पागल, ज़हीनों को ज़हीनियत का सबक सिखाते हैं. फिल्म इस चीज़ को समझने के लिए भी रेकमंड की जानी चाहिए कि क्यूं पंकज कपूर, पंकज कपूर हैं.
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फ़िल्म रिव्यू: टोबा टेक सिंह
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फिल्म एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा की 7 दिलचस्प बातें -

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