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फ़िल्म रिव्यू: टाइगर्स

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एक कंपनी है. जो अपने सेल्समैन्स को टाइगर्स कहती है. इंटरव्यू वाले ही दिन अपने भावी कर्मचारियों को टाइगर के गुर्राने की आवाज़ सुनाती है. ज़ी5 पर 21 नवंबर को रिलीज़ हुई टाइगर्स नाम की फिल्म उसी कंपनी और उसके एक टाइगर की कहानी है.

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# वही पुरानी कहानी अपने को दोहराती रहती है

‘टाइगर्स’ के मुख्य पात्र का नाम अयान है, जिसे निभाया है इमरान हाशमी ने. ये किरदार दरअसल सैयद आमिर रज़ा नाम के रियल लाइफ हीरो पर बेस्ड है. आमिर, पाकिस्तान में एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में एक सेल्समैन या कहें, मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव था. उस बड़ी कंपनी के एक बेबी फ़ॉर्मूले को पिडिएट्रीशियन्स यानी बच्चों के डॉक्टर्स के सामने पिच करता था. लेकिन जब उसे पता चला कि ‘मां के दूध’ के विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा ये प्रोडक्ट पाकिस्तान के बच्चों के लिए खतरनाक है तो उसने अपनी ही कंपनी, यानी जिसमें वो काम करता था, के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

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फिल्म में, जैसा कि आपको पहले ही बताया कि, आमिर का नाम अयान रखा गया है और उस कंपनी का नाम कहीं नहीं आया है. एक जगह छोड़कर, जहां पर उसे म्यूट कर दिया गया है. लेकिन वहां पर भी लिप मूवमेंट को गौर से देखने पर पता चल जाता है कि किस कंपनी की बात हो रही है. फिल्म में ‘बेबी फ़ॉर्मूले’ का नाम लास्टावीटा रखा गया है.

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ये जानने के लिए कि अयान अपने इस नोबल कॉज में सफल हो पाता है या नहीं, और इस दौरान उसे किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

# बहुत सताए लगते हो बेटा, तभी मुर्गी के गू में भी उम्मीद तलाश रहे हो

चलिए सबसे पहले आपको एक किस्सा सुनाता हूं. अपनी याद्दाश्त के हिसाब जितना भी याद है.

एक बार की बात है यीशु एक चोटी पर बैठे थे. सभी लोग उनके पास गिफ्ट वगैरह लेकर आ रहे थे. भेंट देने वालों में एक बुढ़िया भी थी. उसने आधा खाया हुआ ब्रेड का टुकड़ा यीशु के चरणों में रख दिया और चुपचाप एक कोने में बैठ गई.

जब यीशु के एक शिष्य ने पूछा कि आपको सबसे अच्छी भेंट किसकी लगी तो यीशु ने बताया कि उस बुढ़िया की. क्यूंकि बाकी लोग चाहे कितना ही कीमती गिफ्ट लाएं हो, बुढ़िया वो सब कुछ ले आई थी जो कुछ भी उसके पास था.

ऐसी ही एक बुढ़िया टाइगर्स में भी है. नाम है अयान. मध्यमवर्गीय या सच बताएं तो निम्न वर्गीय अयान को जिस जॉब की शिद्दत से तलाश थी वो उसे ‘केवल’ इसलिए छोड़ देता है क्यूंकि उसकी नैतिकता उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं देती.

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अब मैंने ‘केवल’ इसलिए कहा क्यूंकि ज़रा सोचिए कौन केवल नैतिकता की खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है? आप फिल्म देखिए और उसकी जगह अपने को रखकर देखिए.

जब आप फिल्म के कुछ मिनट देखते हैं तो आपको पता लगता है कि हारा हुआ अयान इस बात में भी शुभ-संकेत ढूंढने लगता है कि उसपर एक मुर्गी ने पॉटी कर दी है. वही अयान एक पल नहीं लगाता अपनी नौकरी को लात मारने में. लेकिन इसके बाद भी उसकी परेशानियां कम होती नहीं लगतीं, बल्कि बढ़ और जाती हैं.

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इस फिल्म की ही बात करें तो इसे रिलीज़ करने में ही लोगों के, डिस्ट्रीब्यूटर्स के पसीने छूट गए. 2014 में ही इसे टोरंटो इंटरनेशनल फिल्मफेस्टिवल में प्रदर्शित कर दिया गया था. लेकिन तब से लेकर आज तक ये रिलीज़ नहीं हो पाई क्यूंकि उस बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी ने अपना सब कुछ झोंक दिया था जिसपर इसकी कहानी बेस्ड थी. मूवी का नाम भी बदला गया. पहले इसका नाम वाइट लाइज़ यानी सफेद झूठ था.

# आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है

इसे फिल्म से ज़्यादा एक डॉक्यूमेंट्री की तरह देखिए. पाकिस्तान के बैकड्रॉप पर भी ये फिल्म भारत के हालात पर हालात पर भी एक तंज़ है, एक कमेंट है, एक सबक है. भारत का मध्यमवर्ग भी पाकिस्तान सरीखा ही पश्चिमी सभ्यता को आंख मूंद के फॉलो करता है, फिर चाहे इसके लिए उसे कितना ही दुःख, पीड़ा, परेशानियां क्यूं न झेलनी पड़े. और इसी के चलते जब सत्तर के दशक में अमेरिका में बेबी फ़ॉर्मूला पर बैन लग गया था, तब इन मल्टीनेशनल कंपनी ने तीसरी दुनिया के देशों को टारगेट करना शुरू कर दिया.

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अब जाकर बड़ी मुश्किल से मां-बाप की ये आदत छूटी है. बेबी फ़ॉर्मूला वाली. मुझे याद है हाल-हाल तक मां के दूध को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय विज्ञापन देता आया था. इन विज्ञापनों ने जागरूकता पैदा करने में काफी योगदान दिया. साथ ही अब हर बेबी फ़ॉर्मूला में साफ़-साफ़ लिखा रहता है कि एक निश्चित उम्र के बाद ही इसे बच्चों को दिया जाना चाहिए.

वैसे परेशानी केवल बेबी फ़ूड या इस एक प्रोडक्ट को लेकर नहीं है. और केवल एक या कुछ देशों तक ही सीमित नहीं है. पूरे विश्व के अलग अलग देशों में बड़ी-बड़ी कार कंपनियों से लेकर गारमेंट कंपनियों और टेलिकॉम से लेकर सॉफ्ट ड्रिंक्स तक को अवैध कारोबार करते हुए पाया गया है. अमेरिका में कितने ही लॉ सूट हो चुके हैं. लेकिन भारत, पाकिस्तान जैसे देशों में सब कुछ इतना पारदर्शी नहीं है. इसी करप्शन को जब आप टाइगर्स में देखते हैं तो आपको कहीं भी नहीं लगता कि बात भारत की नहीं पाकिस्तान की हो रही है.

# अपनी जंग को चुनना बहुत ज़रूरी होता है

फिल्म में एक और बात काबिले गौर है. और वो है एक सेल्समैन की दुनिया. जिसको जॉब देते हुए ही बता दिया जाता है कि जॉब तो मिल गई, देखते हैं इसमें बने कब तक रह सकते हो. अयान जॉब में बना भी रहता है और वक्त आने पर उसमें लात भी मारता है वो अपनी जंग चुनता है.

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लेकिन इस दौरान वो एक अच्छे सेल्समेन के गुर भी दर्शकों को सिखा जाता है. केवल पैसों से ही नहीं इमोशन से भी पब्लिक रिलेशन बनते हैं. और भारत और पाकिस्तान में इस कॉमन इमोशन का स्रोत है क्रिकेट, मूवी या म्यूज़िक.

# चैन तुमसे, करार तुमसे है, ज़िंदगी की बहार तुमसे है

फिल्म में ग़ालिब, फैज़ जैसे लेजेंड्स की ग़ज़लें हैं, नज़्में हैं लेकिन उनके आने से फिल्म रूकती नहीं है क्यूंकि एक लाइन के बाद वो बैकग्राउंड में चलने लगती हैं.

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जिन डायलॉग या गीतों को हर पैरा ही हैडिंग बनाया गया है वो दरअसल फिल्म से ही ली गई हैं.

# ज़िंदगी मुश्किल भी थी पर वो कभी-कभी मुस्कुराती भी थी

कमी की बात करें तो फिल्म बहुत सपाट तरीके से चलती है और दर्शकों से कनेक्ट नहीं हो पाती. समस्त इमोशंस के बावज़ूद इसे दिमाग के लिए ही कहा जा सकता है, दिल के लिए नहीं. फिल्म के कुछ सीन गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से मरते बच्चों वाले इंसिडेंट की याद दिलाते हैं. लेकिन फिर भी ये आपको सारी चीज़ों की जानकारी भर देती है या जानकारी पाने के लिए मोटिवेट भर करती लगती है, रुलाती हंसाती या गुस्से से नहीं भरती. और बहुत संभावना है कि फिल्म खत्म करने के तुरंत बाद आप गूगल में कुछ चीज़ें सर्च करने लगें.

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# आटे में नमक चलता है

फिल्म के निर्देशक डेनिस टेनोविक हैं. डेनिस का एक परिचय ये है कि उनकी फिल्म नो मेंस लैंड ने 2001 में लगान को हराकर फॉरेन फिल्म केटेगरी का ऑस्कर अवार्ड जीता था.

फिल्म में सभी कलाकार ने अच्छी एक्टिंग की है. इमरान हाशमी के अलावा आदिल हुसैन, गीतांजलि थापा, सत्यदीप मिश्रा, विनोद नागपाल और सुप्रिया पाठक भी फिल्म में नज़र आती हैं. एक वैश्विक प्रोजेक्ट सरीखे इस फिल्म में भी कई विदेशी कलाकार नज़र आते हैं और सभी ने अपना काम बखूबी किया है.

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होने को फिल्म के कला पक्ष भी बात इसलिए भी कम कर रहे हैं क्यूंकि, जैसा कि पहले भी कहा कि दर्शक इसे एक डॉक्यूमेंट्री की तरह ट्रीट करें. इसमें आपको हल्का सा थ्रिलर, हल्का सा ह्यूमर, और कुछ बेहतरीन नज़्मों का मुखड़ा भी सुनाई देता है. लेकिन ये सब आटे में नमक मानिंद है.

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