अम्मा खुदा के पास चली गईं, अपने हिस्से के बकरे काटने!
अम्मा हफ्ते भर की बासी रोटियों से हलीम बनाती थीं. उनके पास सारी घुट्टियां थीं.
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Symbolic Photo: Reuters
ये कहानी उर्दू और फारसी की दुनिया में कई लोगों ने सुनाई-पढ़ाई. यूट्यूब पर इस पर बने वीडियोज और ऑडियो भी बहुतायत में मिलते हैं. असल कहानी किसकी है, इस बारे में थोड़ा डाउट है. कुछ लोग असल कहानीकार का नाम वसतुल्ला खान बताते हैं. खैर कहानी जिसकी भी हो, उसे शुक्रिया पहुंचे. हिंदी में इसका तर्जुमा किया सिराज जनसंघी ने. आप भी पढ़िए.
बात उन दिनों की है, जब हम बहुत छोटे थे. जब अब्बा की दिहाड़ी के चौदह रुपये पूरी तरह खत्म हो जाते तब अम्मा हमारा पसंदीदा पकवान तैयार करतीं. तरकीब ये थी कि सूखी रोटियों के टुकड़े कपड़े के पुराने थैले में जमा होते रहते और महीनों के आखिरी दिनों में उन टुकड़ों की किस्मत खुलती. पानी में भिगोकर नर्म करके उनके साथ एक दो मुट्ठी बची हुई दालें सिल बट्टे पर पिसे हुए मसाले के साथ पतीले में डालकर पकने को छोड़ दिया जाता. जहां तक कि वो बिल्कुल मजेदार 'हलीम' सा बन जाता और हम सब बच्चे वो हलीम उंगलियां चाटकर खतम कर जाते. अम्मा के लिये सिर्फ पतीले की तह में लगे कुछ टुकड़े ही बचते, उनका कहना था खुरचन का मजा तुम लोग क्या जानो! और अम्मा ऐसी सुघड़ थीं कि एक दिन गोभी पकती तो अगले दिन उसी गोभी के पत्तों और डंठलों की सब्जी और ये कहना मुश्किल हो जाता गोभी मजेदार थी या डंठलों की सब्जी..? ईद के मौके पर मुहल्ले भर के बच्चे इस्लाम दर्जी से कपड़े सिलवाते, हम ज़िद करते तो अम्मा कहतीं कि वो तो मज़बूरी में सिलवाते हैं क्यूंकि उनके घरों में किसी को सीना पिरोना नहीं आता. मैं तो अपने शहज़ादे शहज़ादियों के लिये हाथ से कपड़े सिलूंगी. अलविदा जुमा के मुबारक दिन अब्बा सफेद के टी और फूलदार छींट के दो आधे-आधे थान जाने कहां से खरीदकर लाते. सफेद के टी के थान में से अब्बा और तीनों लड़कों के और छींट के थान में से चारों लड़कियों और अम्मा के जोड़े कटते और फिर अम्मा हम सबको सुलाने के बाद सहरी तक ताहिरा आपा से मांगकर लाई गई मशीन पर सिलतीं. ताहिरा आपा हर साल इस शर्त पर मशीन देतीं कि उनका और उनके मियां का जोड़ा भी अम्मा सी के देंगी. ईद उल फितर वाहिद ऐसा त्यौहार था जिस पर सब बच्चों को अब्बा एक एक रुपये का मकई वाला बड़ा सिक्का देते थे, जिसके इंतज़ार और खर्च करने का प्लान बनाने में चांदरात आंखों में ही कट जाती. सुबह सुबह नमाज़ के बाद हम बच्चों की खरीदारी शुरू हो जाती. सबसे पहले हर बहन भाई फूलचंद के ठेले से एक पन्नी वाला चश्मा लेता जिसे पहनकर जमीन पर गढ्ढा गढ्ढा दिखता, फिर सब लाल ज़बान चूरन और इमली खरीदते. वहीं बगल में सजे मिट्टी के खिलौनों को बस छूकर खुशी जाहिर करते. एक बांसुरी लेता दूसरा गुब्बारा, तीसरा लट्टू. फिर सब आपस में छीना झपटी करते और आखिर मे बस उतने ही पैसे बचते कि दो तीन बर्फ की रंगीन पेप्सी मिल सके. यहां तक कि उन्हीं दो तीन में से हम सातों बहन भाई अपना गला तर कर लेते. ये ध्यान रखते हुए कि कोई देर तक न चूसता रह जाए. पैसे खत्म होने के बाद हम दूसरे बच्चों को दीवार पर लगे गुब्बारों को छर्रे वाली बंदूक से फोड़ते हुए बड़ी हसरत से देखते. बंदर और भालू का तमाशा भी अक्सर मुफ्त हाथ आ जाता. बड़े वाले गोल से झूले में बैठने से हम सब डरते थे और उसका टिकट भी बहुत महंगा था. एक दफा गुड़िया ने पूछा कि "अम्मा! क्या हम जल्दी ऊपर नहीं जा सकते.."? हर सवाल पर मुतमईन कर देने वाली अम्मा चुप सी हो गई और हमें सहन में छोड़कर इकलौते कमरे में चली गई, हम बच्चों ने पहली बार कमरे से सिसकियों की आवाजें आती सुनीं मगर झांकने की हिम्मत न हुई. समझ में न आया कि आखिर गुड़िया की बात पर रोने की क्या बात थी. कोई छ: सात माह बाद एक दिन अम्मा बावर्चीखाने में काम करते करते गिर पड़ीं. अब्बा काम पर थे और हम सब स्कूल में. घर आकर पता चला कि ताहिरा आपा हमारी अम्मा की चीख सुनकर दौड़ी-दौड़ी आईं और फिर गली के नुक्कड़ पर बैठने वाले डाक्टर शमसाद को बुला लाईं. डाक्टर ने कहा कि अम्मा का दिल कोई हरकत नहीं कर रहा है. जनाज़े के बाद एक रोज़ गुड़िया ने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया और ये कहते हुए फूट पड़ी कि खुद तो ऊपर जाकर अगली ईद पर अकेले अकेले बकरे काटेंगी और हमें यहीं छोड़ गईं. ओह मां!
बात उन दिनों की है, जब हम बहुत छोटे थे. जब अब्बा की दिहाड़ी के चौदह रुपये पूरी तरह खत्म हो जाते तब अम्मा हमारा पसंदीदा पकवान तैयार करतीं. तरकीब ये थी कि सूखी रोटियों के टुकड़े कपड़े के पुराने थैले में जमा होते रहते और महीनों के आखिरी दिनों में उन टुकड़ों की किस्मत खुलती. पानी में भिगोकर नर्म करके उनके साथ एक दो मुट्ठी बची हुई दालें सिल बट्टे पर पिसे हुए मसाले के साथ पतीले में डालकर पकने को छोड़ दिया जाता. जहां तक कि वो बिल्कुल मजेदार 'हलीम' सा बन जाता और हम सब बच्चे वो हलीम उंगलियां चाटकर खतम कर जाते. अम्मा के लिये सिर्फ पतीले की तह में लगे कुछ टुकड़े ही बचते, उनका कहना था खुरचन का मजा तुम लोग क्या जानो! और अम्मा ऐसी सुघड़ थीं कि एक दिन गोभी पकती तो अगले दिन उसी गोभी के पत्तों और डंठलों की सब्जी और ये कहना मुश्किल हो जाता गोभी मजेदार थी या डंठलों की सब्जी..? ईद के मौके पर मुहल्ले भर के बच्चे इस्लाम दर्जी से कपड़े सिलवाते, हम ज़िद करते तो अम्मा कहतीं कि वो तो मज़बूरी में सिलवाते हैं क्यूंकि उनके घरों में किसी को सीना पिरोना नहीं आता. मैं तो अपने शहज़ादे शहज़ादियों के लिये हाथ से कपड़े सिलूंगी. अलविदा जुमा के मुबारक दिन अब्बा सफेद के टी और फूलदार छींट के दो आधे-आधे थान जाने कहां से खरीदकर लाते. सफेद के टी के थान में से अब्बा और तीनों लड़कों के और छींट के थान में से चारों लड़कियों और अम्मा के जोड़े कटते और फिर अम्मा हम सबको सुलाने के बाद सहरी तक ताहिरा आपा से मांगकर लाई गई मशीन पर सिलतीं. ताहिरा आपा हर साल इस शर्त पर मशीन देतीं कि उनका और उनके मियां का जोड़ा भी अम्मा सी के देंगी. ईद उल फितर वाहिद ऐसा त्यौहार था जिस पर सब बच्चों को अब्बा एक एक रुपये का मकई वाला बड़ा सिक्का देते थे, जिसके इंतज़ार और खर्च करने का प्लान बनाने में चांदरात आंखों में ही कट जाती. सुबह सुबह नमाज़ के बाद हम बच्चों की खरीदारी शुरू हो जाती. सबसे पहले हर बहन भाई फूलचंद के ठेले से एक पन्नी वाला चश्मा लेता जिसे पहनकर जमीन पर गढ्ढा गढ्ढा दिखता, फिर सब लाल ज़बान चूरन और इमली खरीदते. वहीं बगल में सजे मिट्टी के खिलौनों को बस छूकर खुशी जाहिर करते. एक बांसुरी लेता दूसरा गुब्बारा, तीसरा लट्टू. फिर सब आपस में छीना झपटी करते और आखिर मे बस उतने ही पैसे बचते कि दो तीन बर्फ की रंगीन पेप्सी मिल सके. यहां तक कि उन्हीं दो तीन में से हम सातों बहन भाई अपना गला तर कर लेते. ये ध्यान रखते हुए कि कोई देर तक न चूसता रह जाए. पैसे खत्म होने के बाद हम दूसरे बच्चों को दीवार पर लगे गुब्बारों को छर्रे वाली बंदूक से फोड़ते हुए बड़ी हसरत से देखते. बंदर और भालू का तमाशा भी अक्सर मुफ्त हाथ आ जाता. बड़े वाले गोल से झूले में बैठने से हम सब डरते थे और उसका टिकट भी बहुत महंगा था. एक दफा गुड़िया ने पूछा कि "अम्मा! क्या हम जल्दी ऊपर नहीं जा सकते.."? हर सवाल पर मुतमईन कर देने वाली अम्मा चुप सी हो गई और हमें सहन में छोड़कर इकलौते कमरे में चली गई, हम बच्चों ने पहली बार कमरे से सिसकियों की आवाजें आती सुनीं मगर झांकने की हिम्मत न हुई. समझ में न आया कि आखिर गुड़िया की बात पर रोने की क्या बात थी. कोई छ: सात माह बाद एक दिन अम्मा बावर्चीखाने में काम करते करते गिर पड़ीं. अब्बा काम पर थे और हम सब स्कूल में. घर आकर पता चला कि ताहिरा आपा हमारी अम्मा की चीख सुनकर दौड़ी-दौड़ी आईं और फिर गली के नुक्कड़ पर बैठने वाले डाक्टर शमसाद को बुला लाईं. डाक्टर ने कहा कि अम्मा का दिल कोई हरकत नहीं कर रहा है. जनाज़े के बाद एक रोज़ गुड़िया ने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया और ये कहते हुए फूट पड़ी कि खुद तो ऊपर जाकर अगली ईद पर अकेले अकेले बकरे काटेंगी और हमें यहीं छोड़ गईं. ओह मां!

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