शेफ विकास खन्ना के रोज़ा रखने वाली कहानी में ये बड़ा झोल है
तारीफें तो बहुत हो रही हैं, लेकिन गड़बड़ भी तगड़ी है.
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विकास खन्ना खबरों में है. रमजान चल रहा है. ईद आने वाली है. इसी माहौल में 11 जून को उन्होंने 2017 के अपने एक इंटरव्यू का क्लिप लगाया. इसमें उन्होंने बताया है कि 1992 से लेकर अब तक हर रमजान में वो एक रोजा रखते हैं. क्यों, इसका कहानी सुनाई. इसी चीज की एक अलग कहानी उन्होंने पहले बताई थी. 2015 में. दोनों कहानियां अलग हैं (फोटो: ट्विटर)
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विकास खन्ना.
हिंदुस्तानी. शेफ. सिलेब्रिटी.
विकास खन्ना ने एक कहानी सुनाई. कि वो हर रमजान में एक रोजा रखते हैं. क्यों रखते हैं इसी की कहानी है. ये कहानी हिंदू-मुस्लिम मुहब्बत की सबसे टचिंग, सबसे भावुक कहानी का अवॉर्ड पा सकती है. मगर इस कहानी में एक बहुत भारी झोल है. थोड़ी गड़बड़ है.
कहानी है साल 1992 की. जब बाबरी मस्जिद ढहने के बाद बंबई शहर में दंगा छिड़ा. विकास तब बंबई में ही थे. रिपब्लिक न्यूज चैनल है न. उसी पर अनुपम खेर ने विकास खन्ना का इंटरव्यू लिया. 2017 में. इस इंटरव्यू में विकास खन्ना ने दंगे वाली ये कहानी सुनाई. 11 जून को उन्होंने इस इंटरव्यू का एक खास हिस्सा ट्वीट किया. साथ में लिखा कि पिछले 26 सालों से वो अपनी जान बचाने वाले जिस मुस्लिम परिवार को खोज रहे थे, उसका पता लग गया है. कि इस खुशी में वो उनके साथ ही रोजा खोलेंगे. इसके बाद हर जगह उनकी खबर चल रही है. खूब तारीफ हो रही है. हिंदू-मुस्लिम एकता के नजरिये से. इंसानियत के नजरिये से. लेकिन उनकी कहानी में एक बड़ी दिक्कत है.

विकास खन्ना सिलेब्रिटी शेफ हैं. काफी मशहूर हैं. अमेरिका में इनका रेस्तरां बहुत क्लास माना जाता है.
पहले वो कहानी सुनिए, जो उन्होंने अनुपम खेर को सुनाई. उन्होंने जो कहा, वो हम नीचे लिख रहे हैं-
ये विकास खन्ना के उस फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट. पोस्ट 2015 का है.
जिक्र उसी समय का है, मगर डिटेल्स में फर्क है दोनों कहानियां प्यारी हैं. दोनों में इंसानियत भरी है. मगर 2015 की कहानी 2017 आते-आते बिल्कुल बदल गई. उसका घटनाक्रम और नैरेशन बदल गया. ब्योरा बदल गया. 2015 में विकास ने लिखा कि एक मुसलमान ट्रेनी शेफ और एक मुसलमान वेटर और उनके परिवारों ने उन्हें अपने यहां रखा. खिलाया-पिलाया. बचाया. और उनकी ही याद में वो हर साल एक रोजा रखते हैं. जबकि अनुपम खेर को दिए गए इंटरव्यू में ये कहानी बदल गई. वो रास्ता भटके और एक अजनबी मुसलमान परिवार ने उन्हें अपने घर में बुला लिया. भीड़ से उनको बचाया. डेढ़ दिन तक उन्हें रखा. और विकास ने इंटरव्यू में साफ कहा. कि उन्हें न तो ये याद है कि वो कौन थे और न ही उनके घर का रास्ता ही याद है. उनके बारे में कुछ भी याद नहीं है. हां, 1992 से हर साल रमजान में एक रोजा वो उन्हीं लोगों की याद में रखते हैं, ये जरूर कहा. जबकि 2015 वाली फेसबुक पोस्ट में उन्होंने दो नाम दिए थे. जैसे लिखा था, उससे लगता है कि वो उनके साथ काम करने वाले लोगों में से ही थे. जिनके साथ बाद में उनका संपर्क टूट गया. एक ही वजह की दो कहानियां. दोनों में कई चीजें एक सी. फिर भी बिल्कुल अलग.

ये वैरिफाइड अकाउंट है विकास खन्ना का. नीले रंग का टिक देखिए. यानी दोनों चीजें उन्होंने ही कही और लिखी हैं. फिर भी दोनों में इतना फर्क है.
तो क्या विकास खन्ना ने ज्यादा इमोशनल बनाने के लिए चीजों को ज्यादा नाटकीय बनाकर पेश किया? हम नहीं जानते. ये वही बता सकते हैं. हम बस इतना जानते हैं कि विकास खन्ना की दोनों कहानियां खूबसूरत हैं. काश यूं ही हम सबके त्योहार साझा हो जाएं. समाज साझा हो जाए. जान साझा हो जाए. मुहब्बत साझा हो जाए. दुनिया साझी हो जाए. बंटवारे का हर लफड़ा ही खत्म हो जाए. ईद मुबारक.
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हिंदुस्तानी. शेफ. सिलेब्रिटी.
विकास खन्ना ने एक कहानी सुनाई. कि वो हर रमजान में एक रोजा रखते हैं. क्यों रखते हैं इसी की कहानी है. ये कहानी हिंदू-मुस्लिम मुहब्बत की सबसे टचिंग, सबसे भावुक कहानी का अवॉर्ड पा सकती है. मगर इस कहानी में एक बहुत भारी झोल है. थोड़ी गड़बड़ है.
कहानी है साल 1992 की. जब बाबरी मस्जिद ढहने के बाद बंबई शहर में दंगा छिड़ा. विकास तब बंबई में ही थे. रिपब्लिक न्यूज चैनल है न. उसी पर अनुपम खेर ने विकास खन्ना का इंटरव्यू लिया. 2017 में. इस इंटरव्यू में विकास खन्ना ने दंगे वाली ये कहानी सुनाई. 11 जून को उन्होंने इस इंटरव्यू का एक खास हिस्सा ट्वीट किया. साथ में लिखा कि पिछले 26 सालों से वो अपनी जान बचाने वाले जिस मुस्लिम परिवार को खोज रहे थे, उसका पता लग गया है. कि इस खुशी में वो उनके साथ ही रोजा खोलेंगे. इसके बाद हर जगह उनकी खबर चल रही है. खूब तारीफ हो रही है. हिंदू-मुस्लिम एकता के नजरिये से. इंसानियत के नजरिये से. लेकिन उनकी कहानी में एक बड़ी दिक्कत है.

विकास खन्ना सिलेब्रिटी शेफ हैं. काफी मशहूर हैं. अमेरिका में इनका रेस्तरां बहुत क्लास माना जाता है.
पहले वो कहानी सुनिए, जो उन्होंने अनुपम खेर को सुनाई. उन्होंने जो कहा, वो हम नीचे लिख रहे हैं-
एक होटल था वहां पर- शीरॉक शेरटन. 1992 में मुझे मौका मिला यहां पर काम करने का. रूम सर्विस में. दंगों के दौरान. मैं आया बॉम्बे 1 नवंबर को, होटल में जॉइन किया और दंगे शुरू. पहली बार घर से निकले बच्चों को इतना पता भी नहीं होता. मैं शीरॉक शेरटन में काम कर रहा हूं और क्या हुआ कि दंगे हुए तो कर्फ्यू लग गया था. होटल का स्टाफ बाहर नहीं जा सकता. क्योंकि आपको सारे मेहमानों को देखना होता है. उनका ध्यान रखना होता है. तो होटल ने हमसे कहा कि बाहर नहीं जाना. क्योंकि नया स्टाफ अंदर आ नहीं सकता. तो रूम सर्विस का सामान खत्म होना शुरू हुआ. रसोई और फ्रिज का सामान खत्म होना शुरू हो गया. मेरा काम था अंडे, दालें, जो चीजें स्टोरेज में होती हैं, वही बनाना. किसी ने कहा, घाटकोपर में आग लगी है. बहुत लोग मर रहे हैं घाटकोपर में. मेरा भाई घाटकोपर में रहता था. मैंने वहीं यूनिफॉर्म फेंकी. होटल से निकल गया और बोला कि मैं जा रहा हूं घाटकोपर. मेरा भाई घाटकोपर में है. कह रहे हैं कि बिल्डिंग्स को आग लग रही हैं वहां पर.आगे क्या हुआ, ये भी विकास के शब्दों में जानिए-
वहां से सप्लाई वाले ट्रक जा रहे थे. मैंने उनमें से एक को बोला कि मुझे खार स्टेशन तक छोड़ दोगे. वो बोले, हां. खार स्टेशन पहुंचा, तो वहां कुछ है ही नहीं. ट्रेनें नहीं चल रही थीं. तो वहां से पता करते-करते मैंने घाटकोपर की तरफ चलना शुरू किया. मैंने देखा भीड़ को. कि दंगा हो रहा है. वहां एक क्रॉस सेक्शन था. वहां पर एक मुस्लिम परिवार ने कहा- क्या कर रहे हो बेटा? मैंने कहा- मेरा भाई घाटकोपर में है. रास्ता नहीं समझ आ रहा है मेरे को. मेरे को तब चलते-चलते दो से ढाई घंटे हो चुके थे. उस मुस्लिम परिवार ने मुझसे कहा. अंदर आ यार, भीड़ आ रही है. मैं उनके घर के अंदर आया. उसी समय भीड़ उनके घर पर आ गई पूछने के लिए. कि ये (यानी विकास खन्ना) कौन है. उन्होंने कहा, बेटा है. मुझे अच्छी तरह याद है. उनके घर में उस समय दो बेटे, एक बेटी और जंवाई था. उन्होंने कहा, ये मेरा बेटा है. अभी बाहर से आया है. भीड़ ने पूछा- मुस्लिम है? उन्होंने कहा- हां. मैं आज तक वो दिन नहीं भूला. मैं डे़ढ़ दिन तक उनके पास रहा. मुझे नहीं याद कि वो कौन थे. मुझे उनके घर का रास्ता भी याद नहीं है. उन्होंने अपने जंवाई को भेजा पता करने के लिए. कि मेरा भाई ठीक है. उसने आकर कहा कि ठीक है. वो मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी यादों में से एक है. डेढ़ दिन तक उनके घर पर रहना. फर्श पर सोना. और वो मेरी हिफाजत कर रहे थे. मुझे बचा रहे थे. कह रहे थे कि तू हमारा बच्चा है. 1992 से लेकर आज तक मैं हर रमजान में एक रोजा रखता हूं. कि उनका परिवार ठीक रहे.
कितनी प्यारी कहानी है न. कितनी खूबसूरत. आप सामने से सुनें, तो दिल भर आए. हमारा भी दिल भर आया. लेकिन फिर हमें इस कहानी में एक गड़बड़ी दिखाई दी. 18 जून, 2015 को विकास खन्ना ने अपने वैरिफाइड फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट लिखा था. उसमें भी ये रोजा रखने वाली बात लिखी थी. उसमें भी दंगे का जिक्र था. उसमें भी एक मुस्लिम परिवार का जिक्र था. मगर वो कहानी बिल्कुल अलग थी. उन्होंने जो अंग्रेजी में लिखा, वो हम नीचे हिंदी में लिख रहे हैं-This is one of the happiest day of my life. @AnupamPKher
— Vikas Khanna (@TheVikasKhanna) June 11, 2018
ji had interviewed me last year for @republic
& I shared the story of Muslim family that saved my life during riots. WE FOUND THEM & today I shall break the fast with them vikas khanna Anupam Kher https://t.co/wldNhL5it2
सबको रमजान मुबारक. खुदा करे कि ये पवित्र महीना शांति, तरक्की और प्यार से भरा रहे. 1992 के दिसंबर महीने में मैं मुंबई के सीरॉक शेरटन होटल में ट्रेनिंग ले रहा था. दंगा छिड़ गया. पूरा शहर जल रहा था. हम कई दिनों तक होटल में फंसे रहे. इकबाल खान और वसीम भाई (ट्रेनी शेफ और एक वेटर, जिनके साथ मेरा संपर्क टूट चुका है) और उनके परिवारों ने मुझे शरण दी. उस वक्त मेरा खयाल रखा. तब से लेकर आज तक, मैं हर साल रमजान के महीने में एक रोजा रखता हूं. उनके लिए दुआ करता हूं. आप सब को प्यार.

ये विकास खन्ना के उस फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट. पोस्ट 2015 का है.
जिक्र उसी समय का है, मगर डिटेल्स में फर्क है दोनों कहानियां प्यारी हैं. दोनों में इंसानियत भरी है. मगर 2015 की कहानी 2017 आते-आते बिल्कुल बदल गई. उसका घटनाक्रम और नैरेशन बदल गया. ब्योरा बदल गया. 2015 में विकास ने लिखा कि एक मुसलमान ट्रेनी शेफ और एक मुसलमान वेटर और उनके परिवारों ने उन्हें अपने यहां रखा. खिलाया-पिलाया. बचाया. और उनकी ही याद में वो हर साल एक रोजा रखते हैं. जबकि अनुपम खेर को दिए गए इंटरव्यू में ये कहानी बदल गई. वो रास्ता भटके और एक अजनबी मुसलमान परिवार ने उन्हें अपने घर में बुला लिया. भीड़ से उनको बचाया. डेढ़ दिन तक उन्हें रखा. और विकास ने इंटरव्यू में साफ कहा. कि उन्हें न तो ये याद है कि वो कौन थे और न ही उनके घर का रास्ता ही याद है. उनके बारे में कुछ भी याद नहीं है. हां, 1992 से हर साल रमजान में एक रोजा वो उन्हीं लोगों की याद में रखते हैं, ये जरूर कहा. जबकि 2015 वाली फेसबुक पोस्ट में उन्होंने दो नाम दिए थे. जैसे लिखा था, उससे लगता है कि वो उनके साथ काम करने वाले लोगों में से ही थे. जिनके साथ बाद में उनका संपर्क टूट गया. एक ही वजह की दो कहानियां. दोनों में कई चीजें एक सी. फिर भी बिल्कुल अलग.

ये वैरिफाइड अकाउंट है विकास खन्ना का. नीले रंग का टिक देखिए. यानी दोनों चीजें उन्होंने ही कही और लिखी हैं. फिर भी दोनों में इतना फर्क है.
तो क्या विकास खन्ना ने ज्यादा इमोशनल बनाने के लिए चीजों को ज्यादा नाटकीय बनाकर पेश किया? हम नहीं जानते. ये वही बता सकते हैं. हम बस इतना जानते हैं कि विकास खन्ना की दोनों कहानियां खूबसूरत हैं. काश यूं ही हम सबके त्योहार साझा हो जाएं. समाज साझा हो जाए. जान साझा हो जाए. मुहब्बत साझा हो जाए. दुनिया साझी हो जाए. बंटवारे का हर लफड़ा ही खत्म हो जाए. ईद मुबारक.
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हमारी मिथकीय कथाओं में ट्रांसजेंडर और होमोसेक्शुअलिटी का ज़िक्र किस तरह आया है?
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