The Lallantop
Advertisement

ये है ताजमहल के बनने की असली कहानी

शाहजहां के शासनकाल में लिखे गए दस्तावेज़ों से सच का पता चलता है.

Advertisement
Img The Lallantop
जब मुमताज़ महल ये दुनिया छोड़कर गई, तब फ़ैसला लिया गया कि उन्हें अकबराबाद में दफ़नाया जाएगा. उस समय आगरा को अकबराबाद कहा जाता था.
pic
रुचिका
13 नवंबर 2017 (अपडेटेड: 13 नवंबर 2017, 12:25 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
17वीं शताब्दी में मुग़ल और उनकी भव्यता, भारत आए कई यात्रियों को अपनी कल्पना से परे लगते थे. इन यात्रियों में अंग्रेज़ भी शामिल थे. यही कारण था कि उन्होंने यहां आकर व्यापार करना शुरू किया.
जॉन मिल्टन लंदन में पैदा हुए एक अंग्रेज़ी कवि थे. उनकी बहुत फ़ेमस कविता है ''Paradise Lost". हम जानते हैं कि ईसाई धर्म में दुनिया के पहले आदमी और औरत को एडम और ईव का नाम दिया गया है . जॉन मिल्टन की इस कविता में लिखा है कि एडम को आगरा शहर इस तरह से दिखाया गया कि आने वाले टाइम में ये शहर दुनिया का एक अजूबा होगा.
Image embed

ताजमहल देखने के लिए औसतन हर साल 21 करोड़ रुपए के टिकट बिकते हैं.

मुग़लों को बगीचे और भव्य इमारतें बनवाने का बहुत शौक था. इसलिए इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उनके बनाए शहर अद्भुत दिखते थे. मुग़लों के समय में आगरा भी नदी किनारे बसे एक ऐसे शहर की तरह विकसित हुआ, जिसमें बहुत से सुंदर बगीचे थे. शहर के जितने भी नामी गिरामी लोग थे उन सभी के बड़े आलीशान मकान और बगीचे थे. एब्बा कोच एक इतिहासकार हैं, उन्होंने अपनी किताब ''The Complete Taj Mahal" में शहर के इन सारे नामी गिरामी लोगों के नाम मैप के साथ लिख  रखे हैं. कुछ लोगों के मकान नदी किनारे, किले के पास थे, उनमें महाबत ख़ान, असफ़ ख़ान, मुकीम खान, दारा सुकोह और मान सिंह का नाम शामिल है.
जब मुमताज़ महल ये दुनिया छोड़कर गईं, तब तय किया गया कि उन्हें अकबराबाद में दफ़नाया जाएगा. उस समय आगरा को अकबराबाद कहा जाता था. मकबरा बनाने के लिए सही जगह की तलाश शुरू हुई. मुमताज़ के पति ने तय कर लिया था कि वो अपनी पत्नी का मकबरा स्वर्ग जितना सुंदर बनाएंगे.
Image embed

16वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक, मुग़ल साम्राज्य दुनिया का सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था.

एक भव्य और विशाल मकबरे का निर्माण किया जाना था. चूंकि मकबरे का स्ट्रक्चर बहुत भारी होना था, इसलिए आर्किटेक्ट्स ने तय किया कि स्ट्रक्चर को सहारा देने के लिए गहरे गड्ढों के ऊपर लकड़ी के मोटे तख्ते लगाए जाएंगे. तय किया गया कि मकबरा यमुना नदी के पास बनेगा. ये सबसे सही जगह लग रही थी. ये ज़मीन राजा मान सिंह के नाम थी, जो कि अकबर के सेनाध्यक्ष थे. चूंकि राजा मान सिंह और मुग़लों के परिवारों में शादियां तक हुई थीं, इसलिए उनके बीच संबंध अच्छे होना लाज़िमी है.
1631 में जब मुमताज़ महल की मौत हुई, तब उस ज़मीन के हकदार थे राजा जय सिंह, जो कि मान सिंह के पोते थे. हालांकि शाहजहां और राजा जय सिंह ने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनकी प्रोपर्टी की ऐसे जांच की जाएगी. फिर भी शुक्र है, मुग़ल प्रशासन ने न सिर्फ़ हज़ारों दस्तावेज़ तैयार किए बल्कि उन्हें संरक्षित करके भी रखा. इन दस्तावेज़ों में से ज़्यादातर दस्तावेज़ तो खो गए, फ़िर भी कुछ तो बचे ही हैं.
Image embed

राजा जय सिंह. Source: Wikipedia

बाबर और जहांगीर जैसे मुग़लों ने तो खुद ही अपने संस्मरण लिखे. बाकियों के संस्मरण उनके सरकारी इतिहासकारों ने लिखे. इनके अलावा और भी कई दस्तावेज़ लिखे गए, जिनसे हमें उस काल की हर जानकारी मिलती है. शाहजहां के समय भी सरकारी इतिहासकारों ने ऐसे ही दस्तावेज़ तैयार किए. ये दस्तावेज़ थे क़ाज़विनी, अब्दुल हमीद लाहौरी, मोहम्मद वारिस और मोहम्मद सालेह कान्बो के पादशाह नामे.
इन सबसे शाहजहां के शासनकाल के बारे में काफ़ी कुछ पता चलता है. 19वीं और 20वीं शताब्दी में भी शाहजहां के शासनकाल पर बहुत लिखा गया, लेकिन उन दस्तावेज़ों में लिखे फ़ैक्ट्स सही हैं, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
वेन एडिसन बैगली, ज़ियाउद्दीन.ए देसाई ने अपनी किताब 'Taj Mahal: The Illumined Tomb' में शाहजहां के समय लिखे गए सारे दस्तावेज़ों का संकलन किया है. इन सारी किताबों से मुझे पता चला कि इस मकबरे को बनाते समय कितने ध्यान से सारी बातों को दस्तावेज़ों में उतारा गया था.
Image embed

'Taj Mahal: The Illumined Tomb' किताब का कवर

इनमें लिखा है कि राजा जय सिंह इस नेक काम के लिए अपनी ज़मीन मुफ़्त में देना चाहते थे लेकिन बादशाह तैयार नहीं थे. उन्होंने मकबरा बनाने के लिए मिली जगह के मुकाबले और भी विशाल हवेली राजा को दे दी.
दो किताबों से मिली जानकारी और एक राजसी 'फ़रमान' के ट्रांसलेशन से पता चलता है कि राजा जय सिंह की हवेली के बदले उन्हें चार हवेलियां दी गई थीं.
लाहौरी और काज़विनी में बताया गया है कि आगरा के दक्षिणी हिस्से की ज़मीन में वो हर बात थी जो उस जगह को रानी के मकबरे के लिए स्वर्ग का फ़ील देती. काज़विनी में ये भी लिखा है कि वो जगह राजा जय सिंह की थी.
उसमें ये भी लिखा हुआ है कि राजा उसे फ्री में देने को तैयार था, फिर भी शाहजहां ने इसके बदले में उन्हें आलीशान महल दिए. मोहम्मद सालेह कान्बो में भी यही बात लिखी हुई है.
जयपुर के सिटी पैलेस में इस फ़रमान की सर्टिफ़ाइड कॉपी रखी हुई है. फ़रमान के मुताबिक 1631 में जब तय हुआ था कि उसी जगह मुमताज़ का मकबरा बनेगा, उसी समय राजा जय सिंह ने वो जगह उन्हें दे दी थी. लेकिन इसके बदले में शाहजहां ने 28 दिसंबर, 1633 को उन्हें चार हवेलियां दीं.

Image embed

ये आर्टिकल राना सफवी ने डेली ओ के लिए लिखा था. इसे रुचिका ने दी लल्लनटॉप के लिए ट्रांसलेट किया है. सफवी एक इतिहासकार हैं. साथ ही एक ब्लॉगर और लेखिका भी. आर्टिकल में लिखे हुए विचार लेखिका के निजी विचार हैं और दी लल्लनटॉप इससे सहमत या असहमत हो सकता है. 




 
ये भी पढ़ें:

'मुग़लों के बारे में वो झूठ, जिसे बार-बार दोहराकर आपको रटाया जा रहा है'

मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद उसके वंशज गलियों में भीख मांगते थे

मुगलों की वो 5 उपलब्धियां, जो झूठ हैं

जोधाबाई का चौंकाने वाला सच सामने आया, राजपूत हो सकते हैं नाराज

कोहिनूर ले जाने वाले नादिर शाह के संग जाने से एक तवायफ ने क्यों इनकार किया था?



वीडियो देखें:

Advertisement

Advertisement

()