ये संगम की नगरी है इलाहाबाद. संगम यानी मिलन. यहां तीन नदियां मिलकर एक होती हैं.पहली है गंगा, दूसरी यमुना और तीसरी सरस्वती जो दिखती नहीं है. यहां नया साल जैसेही शुरू हुआ रौनक आ गई. रौनक है माघ मेले की. संगम पर लोगों का संगम लगा हुआ है.श्रद्धा का संगम है माघ मेलाअब ये जान लीजिए कि माघ मेला होता क्या हैदरअसल 2 जनवरी को पौष पूर्णिमा थी. इस दिन से लेकर महाशिवरात्रि तक एक मेला चलताहै. 45 दिन तक इलाहाबाद, हरिद्वार और उत्तरकाशी में लगने वाले मेले को माघ मेला कहाजाता है. इलाहाबाद तीर्थराज है इसीलिए यहां लगने वाले मेले का महत्व और ज्यादा होजाता है. हर बार की तरह इस बार भी इलाहाबाद के मेले वाले इलाके में एक नया शहर बसगया है. पूरे देश से साधु महात्मा और श्रद्धालु जुट गए हैं.लाखों लोग माघ मेले पर संगम आते हैंकल्पवास करते हैं लोगपूरे माघ मेले के दौरान लाखों लोग इलाहाबाद में आकर बस जाते हैं और यहां कल्पवासकरते हैं. कल्पवास करने वाले भक्त इस दौरान घर-परिवार से बिल्कुल कट जाते हैं.मोह-माया से दूर होते हैं. जमीन पर सोते हैं. दो वक्त गंगा में नहाते हैं और सिर्फएक बार खाना खाते हैं. रामायण काल में तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भारद्वाज काआश्रम था. कहते हैं कि उस दौर में पूरे भारत देश के वो लोग जो धार्मिक गतिविधियोंसे जुड़े रहते थे यानी जो साधक थे वो माघ महीने में इलाहाबाद में जुटते थे. ये लोगकरीब 45 दिन तक कल्पवास करते थे.45 दिन तक चलता है कल्पवासक्या है पौराणिक मान्यताब्रह्मा जी ने सृष्टि यानी इस संसार को बनाने के लिए सबसे पहले यज्ञ किया. इस पहलेयज्ञ की शुरुआत माघ महीने में ही हुई थी. इसीलिए इस महीने गंगा किनारे के इन तीनशहरों उत्तरकाशी, हरिद्वार और इलाहाबाद में डुबकी लगाने का खास महत्व है.तुलसीदासने रामचरित मानस लिखी. तुलसीदास माघ महीने के बारे में लिखते हैं- माघ मकर गत रविजब होई, तीरथ-पतिहि आव सब कोई. इसका मतलब है- माघ महीने में भगवान सूर्य मकर राशिमें प्रवेश करते हैं. तब सभी तीर्थों के राजा इलाहाबाद में आकर रहने लगते हैं. वोआगे लिखते हैं ऐहि प्रकार भरि माघ नहाही, पुनि सब निज-निज आश्रम जाहीं.यानी माघ महीने में सभी साधक और तपस्वी प्रयाग यानी इलाहाबाद में आकर अपनी साधनापूरी करते थे और फिर लौट जाते थे. ये प्राचीन प्रथा आज भी देखी जा सकती है.हर उम्र, हर वर्ग के लोग पहुंचते हैं संगमकौन-कौन से बड़े स्नान होने हैंमाघ मेले के दौरान 6 बड़े स्नान होते हैं. स्नान यानी इन 6 दिनों में संगम तट परडुबकी लगाने देश दुनिया से बड़ी संख्या में लोग आते हैं. #पहला 2 जनवरी मंगलवार को.पौष पूर्णिमा. #दूसरा 14 और 15 जनवरी को. इसे मकर संक्रांति कहते हैं . #तीसरा बड़ास्नान 16 जनवरी को है. इस दिन मौनी अमावस्या है. ये माघ मेले के दौरान सबसे बड़ादिन होता है. इस दिन संगमनगरी में इतनी भीड़ होती है कि तिल रखने की जगह भी नहींबचती. #22 जनवरी को बसंत पंचमी और 31 जनवरी को माघ पूर्णिमा है. #13 फरवरी कोमहाशिवरात्रि के साथ ही माघ मेला खत्म हो जाएगा.कड़ाके की ठंड के बीच पहुंचते हैं श्रद्दालुये मेला अनंत श्रद्धा का है. कुछ वक्त तक मेले के बारे में देखा-पढ़ा जाता था तोलाखों श्रद्धालुओं के आने की बात होती थी. अब यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्याकरोड़ों में पहुंच गई है. इस सास़ल करीब पांच करोड़ से श्रद्धालुओं के आने काअनुमान है.हर बारह साल बाद महाकुंभ लगता है. और हर 6 महीने में अर्धकुंभ होता है. लेकिन इसअर्धकुंभ शब्द पर हिंदू संतों को एतराज है. अब वो कह रहे हैं कि यहां अर्ध यानी आधाजैसा कुछ नहीं होता है. 6 साल में जो होता है वो कुंभ है और 12 साल में जो होता हैवो महाकुंभ है. अगले साल इसी संगम नगरी पर 6 साल के बाद आने वाला कुंभ मेला लगेगा.ये रिहर्सल जैसा है उस तंत्र के लिए जिसको इससे भी बड़े मेले का इंतजाम करना है.--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी द लल्लनटॉप के लिए नीरज ने लिखी है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:वीडियो: देखिए हिटमैन रोहित शर्मा की साउथ अफ्रीका में क्या तैयारी हैअकेली औरत के हज जाने वाले नियम पर PM मोदी सही हैं या ओवैसी?क्या 100 करोड़ रुपए में बिका 'आप' का राज्यसभा टिकट?इंडिया में पैदा हुए वो 5 बच्चे जो आगे चलकर इंग्लैंड के लिए क्रिकेट खेले-------------------------------------------------------------------------------- वीडियो देखें: