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सुप्रीम कोर्ट ने इनकम टैक्स रिटर्न पर क्या कहा है?

Prevention of Corruption Act, 1988 को सरकारी संस्थाओं और पब्लिक सेक्टर में फैले करप्शन को रोकने के लिए लाया था. ये एक्ट कहता है कि अगर किसी लोक सेवक के पास उसकी कमाई के ज्ञात स्त्रोतों से अधिक धन संपत्ति है, तो इसे क्रिमिनल एक्ट माना जायेगा

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prevention of corruption Act supreme court
प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 (फोटो- एआई)
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29 मार्च 2024
Updated: 29 मार्च 2024 08:15 IST
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बात शुरू करते हैं एक उदाहरण से. मान लीजिये A नाम का एक व्यक्ति है. इसकी एक निश्चित इनकम है. 1 लाख रुपये महीना. साल का 12 लाख रुपये. अब टैक्स वैक्स काट कर जो पैसा बचेगा, उससे वो अपनी संपत्ति बनाने में खर्च करेगा जैसे स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करना या ज़मीन खरीदना या फिर उसके जरिये अपने शौक पूरे करना. जैसे मर्जी वैसे खर्चा किये जाये. इतना तो पक्का है कि खर्चे का टोटल टैक्स घटने पर 12 लाख से कम का ही होगा.
लेकिन अगर यही A नाम का व्यक्ति, जिसके पास इनकम का कोई भी दूसरा साधन नहीं है और वो 12 लाख की आमदनी में एक साल के अंदर. 20-25 लाख से अधिक की संपत्ति बना ले. जैसे कार, फ्लैट खरीद ले( बिना लोन के). तब उठेगा सवाल एक सवाल? A के पास कहा से आया आय से अधिक पैसा. और इसको कमाने के लिए क्या कोई गैरकानूनी काम किया गया है? जैसे, घूसखोरी, करप्शन, स्मगलिंग. हमारे देश में इन सवालों का जवाब जानने के लिए एक एजेंसी है. CBI और इनकम टैक्स.पिछले कई सालों में इस सवाल के घेरे में कौन कौन आता है? चाहे वो एक समय के बहुत बड़े स्टॉक मार्किट ब्रोकर हर्षद मेहता हों या तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्य मंत्री जयललिता. इन दोनों एजेंसियों के पास ऐसे सवाल पूछने की शक्ति है और गड़बड़ी पाने मिलने पर कार्यवाही करने की शक्ति भो है. 
लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इसी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के कार्यवाही करने के तरीके पर एक जजमेंट दिया है. तो समझते हैं

-आये से अधिक संपत्ति की और देश में इस अपराध के लिए कौन से कानून हैं 
-इसके साथ ही जानेगे कुछ सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में क्या कहा है?      

आपने आय से अधिक संपत्ति का मोटा माटी मतलब समझ लिए इसके पहले कि हम इसकी टेक्नीकलिटी में घुसे आपको एक हाई प्रोफाइल किस्सा सुनाते हैं.  मामला है तमिलनाडु की तत्कालीन सीएम जे जयललिता का. साल 1996, चेन्नई की अदालत में सुब्रमण्यम स्वामी ने जयललिता के खिलाफएक शिकायत दर्ज की .शिकायत क्या थी? सुब्रमण्यम स्वामी का कहना था कि जयललिता के पास उनकी इनकम से ज्यादा की अधिक संपत्ति है. इस मामले में जयललिता के साथ उनकी सहयोग शशिकला, वीएन सुधाकरन और शशिकला के रिश्तेदार जे इलावरसी को आरोपी बनाया गया.  1996 में शुरू हुए इस मामले में स्पेशल कोर्ट ने 2014 में अपना फैसला सुनाया. 27 सितंबर, 2014 को स्पेशल कोर्ट ने जयललिता को दोषी करार देते हुए चार साल की सज़ा सुनाई. साथ ही उनपर 100 करोड़ का जुर्माना भी लगाया. लिहाज़ा एक सिटिंग चीफ मिनिस्टर रहते हुए उन्हें अपने पद छोड़ना पड़ा.

जयललिता और शशिकला (फोटो- एक्स)


फ़िर जयललिता ने जमानत के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाई कोर्ट ने बेल देने से मना कर दिया. इसके बाद जयललिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. और 17 अक्टूबर 2014 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट से बेल मिल गयी. बाद में 11 मई 2017 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने जयललिता को आरोपों से बरी कर दिया. पर इसके बाद भी मामला सुप्रीम कोर्ट में चलता रहा और इसी दौरान दिसंबर 2016 में जयललिता की मृत्यु हो गयी. फिर साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई की और स्पेशल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.

ये सारी कार्यवाही हुई एक कानून के तहत. Prevention Of Corruption Act, 1988. क्या है ये कानून इसको भी समझते हैं.  
 

Prevention Of Corruption Act, 1988

Prevention of Corruption Act, 1988 को सरकारी संस्थाओं और पब्लिक सेक्टर में फैले करप्शन को रोकने के लिए लाया था.  ये एक्ट कहता है कि अगर किसी लोक सेवक के पास उसकी कमाई के ज्ञात स्त्रोतों से अधिक धन संपत्ति है, तो इसे क्रिमिनल एक्ट माना जायेगा.किसी व्यक्ति को इस एक्ट के दायरे में लाने के लिए तीन मानक हैं. 
-उनके पास ऐसी संपत्ति हो जो उनकी आय के कानूनी स्त्रोतों से मेल न खाती हो.

-उन्हें एक सार्वजनिक यानी सरकारी पद पर होना चाहिए.

-वो ये बताने में सक्षम न हों कि उनके पास ये संपत्ति आई कैसे?

गौर करें इस एक्ट में बात सिर्फ सरकारी कर्मचारी और पद पर बैठे हुए नेताओं की हो रही है.  इस कानून के प्रावधान किसी सरकार कर्मचारी या विभाग में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए बनाये गए हैं. एक्ट के सेक्शन 3 अनुसार केंद्र सरकार के पास ये शक्ति है कि वो जजों की नियुक्ति कर सकती है जो ऐसे मामलों की सुनवाई करेंगे.

पर ये पता कैसे चले कि किसने करप्शन से पैसा बनाया है. या तो प्रत्यक्ष रूप से ये दिखाई दे कि फलां व्यक्ति अपनी आय से कहीं ज्यादा खर्च कर रहा है. या किसी जांच एजेंसी के पास उसकी शिकायत जाए और जांच में पता चले कि उसने अकूत संपत्ति बना ली है. तो आय और संपत्ति में तालमेल को समझने के लिए एक फॉर्मूले का इस्तेमाल किया जाता है. इसे कहते हैं 10 पर्सेंट का फॉर्मूला. इसका मतलब ये है कि अगर किसी व्यक्ति की संपत्ति उसकी कमाई से 10 प्रतिशत तक है तो ये स्वीकार्य है. 
यानी उदाहरण के लिए अगर कमाई सौ रुपये है, और कुल संपत्ति का मूल्य एक सौ दस रुपये है. तो आपकी संपत्ति को आय से अधिक नहीं माना जाएगा. पर यही संपत्ति अगर एक सौ पचास के आसपास पहुँच गई तो ये संपत्ति आय से अधिक मानी जाएगी. ऐसे मामलों में कुछ एजेंसियां हैं जिनपर ऐसे करप्शन को रोकने की जिम्मेदारी है. ईडी का नाम बीते दिनों खूब सुर्खियों में रहा. पर ईडी 1 करोड़ से ऊपर के मामलों की जांच करती है. छोटे स्तर पर एंटी करप्शन ब्यूरो, विजिलेन्स, इकोनॉमिक ऑफेन्स विंग. अगर  मामला ज्यादा बड़ा हो तो सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां भी जांच करती हैं. 
तो अब आगे समझते हैं कि Prevention Of Corruption Act, 1988 के अनुसार किन बातों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, और क्या सजा निर्धारित है?

अपराध और उसकी निर्धारित सजा

Prevention Of Corruption Act के अनुसार कुछ अपराधों के लिए सज़ा और जुर्माना तय किया गया है. पर उससे पहले जांच जरूरी है जिससे किसी मामले में किसी पब्लिक सर्वेन्ट की भूमिका स्पष्ट हो सके. इसके लिए अलग-अलग स्तरों पर जांच अधिकारी होते हैं. मसलन 
-दिल्ली में ऐसे मामलों के जांच, दिल्ली पुलिस के इन्स्पेक्टर रैंक के अधिकारी करते हैं. 
-मेट्रोपॉलिटन शहरों  में ऐसे मामलों की जांच असिस्टन्ट कमिश्नर ऑफ पुलिस के अन्डर में होती है. 
-अन्य शहरों में पुलिस के डिप्टी सुप्रिटेंडेंट या उस बराबर के रैंक के अधिकारी करप्शन के मामलों की जांच कर सकते हैं.

Prevention Of Corruption Act में कुछ अपराध और उनकी सज़ा के बारे में बताया गया है, मसलन 
-कानूनन तनख्वाह के अलावा कहीं और से पारिश्रमिक लेना  Prevention Of Corruption Act में अपराध माना गया है. 
दोषी पाए जाने पर 6 महीने की जेल, जिसे 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है. साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

2. किसी पब्लिक सर्वेन्ट को प्रभावित करने के इरादे से गलत तरीकों को अपनाना भी अपराध है. इसमें दोषी पाए जाने पर तीन साल की जेल, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है. साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

3. अगर किसी पब्लिक सर्वेन्ट पर गलत काम करने के लिए दबाव बनाया जाता है तो कम से कम 6 महीने की जेल हो सकती है, जिसे पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है. साथ ही जुर्माना भी लगाया जाता है.

4. और जब कोई पब्लिक सर्वेन्ट किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल हो ऐसे में कम से कम एक साल की जेल जिसे साल तक बढ़ाया जा सकता है. इसमें भी सजा के साथ जुर्माने का प्रावधान है.


 इस कहानी को बांचने की वजह 

वजह है सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनकम टैक्स के आदेश और इनकम टैक्स ट्रिब्यूनल के साक्ष्य को निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता. इनकम टैक्स सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति की आय के हिसाब से लगने वाला टैक्स है. ज़रूरी नहीं की इनकम टैक्स कमाई के स्रोतों को जानने का भी ज़रिया हो. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में 2017 के जयललिता केस का हवाला देते हुए कहा कि आयकर कमाई का स्त्रोत बताने का ज़रिया नहीं हो सकता. कोर्ट ने कहा था कि इनकम टैक्स आर्डर या रिटर्न्स, सबूत के रूप में मान्य हैं पर इस सबूत को कितनी तवज्जो दी जाएगी, ये इसमें मौजूद जानकारी और इनकम टैक्स आर्डर में मौजूद निष्कर्षों पर निर्भर करेगा. वास्तव में इनकम टैक्स किसी भी आरोप को साबित या खारिज करने का आधार नहीं हो सकता.

आखिर में आता है एक सवाल कि अगर कानून है, न्यायपालिका है, फिर भी इस तरह के मामले मसलन रिश्वतखोरी, समगलिङ्ग से कमाई, धोखाधड़ी जैसे मामले क्यों सामने आते हैं? क्या लोगों में कानून का डर नहीं या कानून ही इतना लचर है कि नेता, अधिकारी इससे आँखमिचौली खेल जाते हैं. आय से अधिक संपत्ति के मामले अधिकतर जांच के बाद ही दर्ज किये जाते हैं. अमूमन ऐसे मामलों में गिरफ़्तारी सबसे आखिरी उपाय होता है. लेकिन जहां रैंडम हुई किसी चेकिंग के दौरान आय से अधिक संपत्ति का केस दर्ज हो और बाकी असेट्स का पता लगाने  के लिए इंटेरोगेशन की जरूरत है, तो गिरफ्तारी भी की जाती है. 
बिल में करप्शन से जुड़े अपराध को बताने के लिए 'फाइनेंशियल और अदर एडवांटेज' टर्म का जिक्र किया है.  इसमें साफ नही होता है कि अदर एडवांटेज का दायरा क्या है?  लॉ कमीशन ने इसपर सुझाव देते हुए कहा था कि 'फाइनेंशियल और अदर एडवांटेज' को हटा दिया जाए और 'अनुचित लाभ' यानी Undue Advantage को शामिल किया जाए. यानी बेहतरी की गुंजाइश अभी भी है, आगे भी बनी रहेगी.

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