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जब महात्मा गांधी ने कहा था, 'आवारा पागल कुत्तों को मारना सही'

आवारा कुत्तों पर गांधीजी ने भी अपने विचार रखे थे. उन्होंने कहा था कि किसी भी समाज में आवारा कुत्तों का होना उस समाज की 'सभ्यता और दया' पर सवाल खड़े करते हैं.

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Mahatma gandhi on stray dogs
महात्मा गांधी ने पागल कुत्तों को मारने की मंजूरी दी थी. (India today)
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राघवेंद्र शुक्ला
14 अगस्त 2025 (अपडेटेड: 14 अगस्त 2025, 11:42 PM IST)
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करुणा, दया और अहिंसा की बात चले तो महात्मा गांधी याद आ ही जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश है और दिल्ली के आवारा कुत्ते हैं. करुणा की तमाम याचिकाएं हैं और सुरक्षावादियों के साथ उनके संघर्ष भी हैं. सवाल ऐसे खड़े हैं कि किसी के लिए साफ जवाब देना मुश्किल है. आवारा कुत्तों के अपने पशु अधिकार और बच्चों-बुजुर्गों की सुरक्षा के द्वंद्व में ‘तर्क’ काम नहीं आ रहे. आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में भेजा जाए या उन्हें आजादी से गली-मोहल्लों में घूमते-फिरते रहने दिया जाए?

ये वो सवाल हैं, जिनके जवाब सीधे-सपाट नहीं हैं. ऐसे में गांधीजी के पास ही चलते हैं. वे अहिंसा के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं. सिर्फ मनुष्यों के लिए ही नहीं, जानवरों के लिए भी उनके मन में दया, अहिंसा और करुणा की मजबूत भावना थी. लेकिन ऐसा कई बार होता है जब मानवता के सामने ‘अहिंसा बनाम जीवन रक्षा’ के मौके आ जाते हैं. जैसे, अगर कोई जानवर या कुत्ता ही ले लें, वो पागल हो जाए. वह इंसानों के लिए खतरा बन जाए. उस समय क्या अहिंसा का पालन करें या जीवन रक्षा के लिए कुत्ते को मार दें? गांधीजी के सामने भी ये सवाल उठा था.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र है. साल 1926 में अहमदाबाद के एक मिल मालिक ने गांधीजी से संपर्क किया था और अपने कैंपस में 60 आवारा कुत्तों के बारे में मार्गदर्शन मांगा था जो पागल हो गए थे. इसके बाद यंग इंडिया में गांधीजी ने एक लेख लिखा और अपने विचार साझा किए.

आवारा कुत्तों पर क्या बोले गांधीजी?

गांधीजी का मानना था कि आवारा कुत्ते किसी भी समाज की ‘सभ्यता या दया’ नहीं दिखाते. वो वहां के लोगों की अज्ञानता और सुस्ती का प्रमाण होते हैं. उन्होंने कहा,

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गांधीजी ने आवारा कुत्तों को यूं ही छोड़ देने की आदत को ‘शर्मनाक’ बताया और तर्क दिया कि एक दयालु व्यक्ति को या तो व्यक्तिगत रूप से कुत्ते की देखभाल करनी चाहिए या किसी ऐसे संगठन में योगदान देना चाहिए जो उनकी देखभाल करता हो.

खतरा बन चुके आवारा कुत्तों का क्या करना चाहिए?

गांधीजी ने अपने लेख में आवारा कुत्तों की 'अंधाधुंध' हत्या का विरोध करते हुए इसका जवाब दिया है. कुछ हद तक ही वे इसे इंसानों की रक्षा के लिए एक उपाय मानते थे, लेकिन सिर्फ तभी जब वह जीवन पर संकट बन गए हों. उन्होंने इसे ‘संकट में कर्तव्य’ कहा है.

गांधी ने कहा,

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गांधीजी ने आवारा कुत्तों की बुरी हालत को ‘समाज की अहिंसा की गलत समझ’ का नतीजा बताया और कहा,

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गांधीजी के सामने मूल सवाल मिल मालिक के असमंजस का था कि वह 60 पागल कुत्तों का क्या करे. इस पर विचार करते हुए उन्होंने कहा,

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गांधी ने यह भी कहा कि भले ही कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोग अपनी इस ‘गलत दया’ के लिए जुर्माना भरने को तैयार हों. फिर भी समाज का आवारा कुत्तों के खतरे से मुक्त होना ही बेहतर है.

सुप्रीम कोर्ट में 'गांधीजी की बात'

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 में जब सुप्रीम कोर्ट में कुछ खास गोवंश को मारने को लेकर याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी, तब वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने गांधी का हवाला दिया था. उन्होंने बताया कि गांधीजी का मानना था कि जिन जानवरों का मालिक नहीं है, वे समाज के लिए खतरा बन सकते हैं. ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा कि कुत्तों को मारना तब सही है जब वे समाज के लिए खतरा बन जाएं.

दवे के मुताबिक, ‘गांधीजी ने कहा था कि मैं पालतू कुत्तों से प्यार करता हूं और उन आवारा कुत्तों को पसंद नहीं करता जो समाज के लिए खतरा हों.’

चर्चा में है आवारा कुत्तों का मामला

बता दें कि इन दिनों आवारा कुत्तों के मामले पर पूरे देश में चर्चा जोरों पर है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 11 अगस्त को दिल्ली सरकार और एमसीडी को आदेश दिया था कि वह दिल्ली के आवारा कुत्तों को जल्द से जल्द शेल्टर्स में शिफ्ट करे. डॉग लवर्स के अलावा पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का विरोध किया था और फैसले को अव्यावहारिक बताया है.

वीडियो: सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों पर क्या सुनवाई हुई? कपिल सिब्बल ने क्या दलील दी?

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