उत्तर प्रदेश में अधिकारियों की खबरें आती हैं तो दो वजहों से. या तो उन्होंने किसीबड़े नेता को हौंक दिया होता है. या किसी नेता ने उन्हें रगड़ दिया होता है. कोई औरअधिकारी चर्चा में आता है तो अपनी जांबाजी या किसी भ्रष्टाचार के लिए. मगर यूपी काएक अधिकारी अपने प्रशासनिक कामों के साथ ही अपने गाने, गज़लों, किताबों के लिए जानाजाता है. वो जब ड्यूटी पर होता है तो अलग मिजाज का होता है. बड़े-बड़ों को लाइन परला देता है. और जब किसी महफिल में आता है, माइक पकड़ता है तो सबको अपनी गज़लों काफैन बना लेता है. बात कर रहे हैं आईएएस डॉ. हरिओम की. उन हरिओम की जिन्होंने कभीगोरखपुर में डीएम रहते कानून तोड़ने पर योगी आदित्यनाथ को जेल पहुंचा दिया था. 21जनवरी को उनका पहला, दूसरा नहीं चौथा एल्बम रिलीज हो रहा है. उनकी जुबानी ही जानतेहैं उनकी आईएएस और सिंगर दोनों बनने की कहानी-अब आईएएस हैं तो बात पढ़ाई-लिखाई से ही शुरू होगीअमेठी जिले में पड़ता है कटारी गांव. यहीं से शुरू होती है डॉ. हरिओम की कहानी.यहीं उनका जन्म हुआ. 12वीं तक की पढ़ाई गांव के या गांव के आसपास पड़ने वाले सरकारीस्कूलों से ही की. माने सरकारी स्कूलों से भी आईएएस निकलते हैं. वैसे थे हरिओम भीबचपन से ही एकदम पढ़ाकू किस्म के. टॉपर रहते थे. हर बार फर्स्ट. जैसा कि सभी पढ़ाकूबच्चों को सुनने को मिलता है- बड़े होकर अधिकारी बन जाओगे. ऐसे ही पढ़ते रहो. वहीउन्हें भी सुनने को मिलता था. मगर इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस. आईएएस. इस नाम कीभी कोई बला होती है, ये इन्होंने तब सुना जब वे इलाहाबाद पहुंचे. ग्रैजुएशन करने.1989 में. हरिओम खुद कहते हैं कि 12वीं तक तो उन्हें कोई हवा ही नहीं थी आईएएसवाईएएस की. उनके पिता भी बस इतना जानते थे कि जिले में एक कलेक्टर होता है जो जिलेमें सबसे बड़ा अधिकारी होता है. अब क्योंकि वो पढ़ने लिखने में अच्छे थे. स्कूल केमास्टर उनकी तारीफ करते रहते थे. सो उनके पिता यही कहते थे- मेहनत करते रहो,कलेक्टर बन जाओगे.डॉ. हरिओम ने इलाहाबाद से ग्रैजुएशन किया.हरिओम बताते हैं कि जब वो इलाहाबाद बीए करने पहुंचे तो उनको कमरा मिला अमरनाथ झाहॉस्टल में. इस हॉस्टल में एकदम पढ़ाकू किस्म के लड़के ही रहते थे. यही उनको पताचला कि सबको आईएएस बनने का कीड़ा काटे हुए है. उनसे कुछ लड़कों ने कहा कि तुम तोगांव से आए हो. क्या करोगे यहां तो उन्होंने कहा- कुछ अच्छा ही करेंगे.इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की जब बात हो तो वो छात्र राजनीति. बम, कट्टा, बवाल के बिनाकैसे पूरी हो सकती है. हालांकि हरिओम बताते हैं कि वो इन सभी चीजों से दूर रहते थे.वो तमाम सम्मेलनों, डिबेट्स और अन्य कार्यक्रमों मे जरूर हिस्सा लेते थे, मगरराजनीति में उन्हें कोई मजा नहीं आता था. माने इंटेलेक्चुअल इंट्रेस्ट तो था मगरइलेक्शन को लेकर कोई इंट्रेस्ट नहीं था. हां, कभी कभार झंडा-बैनर लेकर वो भी निकलजाते थे. हॉस्टल में रहकर इनसे कैसे बचा जा सकता है.पत्नी मालविका और दो बेटियां हैं हरिओम के परिवार में.फिर वो पहुंचे जेएनयू. जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी. 1992 से 1997. पांच साल यहांगुजारे. यहां उन्होंने एमए और एमफिल किया. हिंदी लिटरेचर में. हरिओम अपने जेएनयू केसफर को स्वर्णिम सफर बताते हैं. इसके कई कारण हैं. पहला इलाहाबाद में जो आईएएस बननेका चसका उन्हें लग गया था, वो यहां परवान चढ़ा. तैयारी तो इलाहाबाद में ही शुरू होगई थी, मगर एग्जाम में अटेम्प्ट जेएनयू में रहते हुए किया. 1997 में उन्होंने मैदानमार लिया. आईएएस में सेलेक्शन हो गया. फिर यहीं उन्हें भाभीजी मिलीं. माने उनकीलाइफ पार्टनर. मालविका. वो उनकी क्लासमेट थीं. और वो भी गाती हैं. लोक गीत. वो भीबहुत अच्छे से.जेएनयू में हाल-फिलहाल में जो बवाल हुआ, आरोप लगे. उसको हरिओम राजनीति से प्रेरितबताते हैं. वो कहते हैं- किसी घटना को लेकर पूरे इंस्टीट्यूट को खारिज करना गलत है.कोई आदमी हो सकता है, ग्रुप हो सकता है. उसको बोलिए. मगर इसके बिना पर पूरेइंस्टीट्यूट पर कीचड़ उछालना एकदम सही नहीं है. जेएनयू के माहौल पर बोले कि वो एकदमअलग है. वहां कोई किसी को सर नहीं बोलता है. सीनियर, जूनियर सब एक दूसरे नाम सेबुलाते हैं. कोई जाकर किसी मास्टर के पैर नहीं छूता है. कोई लड़की अगर हंस दी तोमतलब कोई खराबी ही होगी या कोई लड़का लड़की के साथ घूम रहा है तो कोई संबंध हीहोगा. ये सब वहां कोई नहीं सोंचता है. यही दकियानूसी खयाल वहां नहीं होते हैं.इसीलिए लोगों को जेएनयू अच्छा लगता है. और शायद इसीलिए कुछ लोगों को खराब लगता है.जेएनयू के बाद भी उन्होंने पढ़ाई से नाता नहीं तोड़ा. सर्विस में रहते हुए उन्होंनेहिंदी में ही पीएचडी भी कर डाली.जेएनयू से हरिओम ने एमए और एमफिल किया.अब सर्विस की कुछ बात, जब योगी को किया गिरफ्तारजेएनयू में एमफिल का एग्जाम देते-देते ही उन्होंने सिविल गिरा दिया था. अधिकारी बनचुके थे. ट्रेनिंग के बाद पहली पोस्टिंग मिली रुद्र प्रयाग में. तब उत्तराखंड अलगनहीं हुआ था. ये जिला यूपी में ही आता था. वहां एसडीएम बने. बतौर डीएम हरिओम कीतैनाती 2002 में हुई. इलाहाबाद के पास पड़ता है कौशांबी जिला. वहां पर. फिर वोलगातार 11 जिलों में डीएम रहे. इलाहाबाद, कानपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, मिर्जापुर,फतेहपुर आदि आदि...मगर चर्चा में हरिओम आए गोरखपुर में अपनी तैनाती के दौरान.बात 2007 की है. उस वक्त गोरखपुर में सांप्रदायिक तनाव का माहौल था. तब योगी सांसदथे गोरखपुर के. धरने का ऐलान कर दिया. धरना होने पर हिंसा और भड़कने की उम्मीद थी.सो प्रशासन ने योगी को शहर में घुसने से पहले ही रोक लिया. वहां हंगामा होने लगा तोडीएम हरिओम ने सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने और आदेशों का पालन न करने के आरोपमें योगी को गिरफ्तार करने के निर्देश दिए थे. योगी को इसके बाद 11 दिन जेल मेंरहना पड़ा था. इसी घटना के बाद जब योगी संसद पहुंचे तो फफक-फफक कर रोने लगे थे. कहाथा कि कैसे एक सांसद को 11 दिन तक जेल में रखा जा सकता है. हालांकि इस गिरफ्तारी के24 घंटे बाद ही हरिओम को सस्पेंड कर दिया गया था. रातोंरात उनकी जगह चार्ज संभालनेके लिए तब सीतापुर के डीएम राकेश गोयल को हेलिकॉप्टर से गोरखपुर भेजा गयाथा. फिलहाल डॉ. हरिओम लखनऊ में पोस्टेड हैं. सेक्रेटरी जनरल, एडमिनिस्ट्रेशन, उत्तरप्रदेश.गाने के शौक को स्कूल, कॉलेज से लेकर नौकरी तक संवारते रहे हरिओम.योगी वाली घटना के बारे में हरिओम कहते हैं - एक डीएम के नाते जो आपका फर्ज होताहै, जब हालात तनावपूर्ण होते हैं तो करना पड़ता है. मैं अपनी जिम्मेदारी निभा रहाथा. हमारा तो काम ही शांति व्यवस्था बनाए रखना है. इट्स अ पार्ट ऑफ ड्यूटी. हमारेजैसे लोग जहां भी होंगे, अपना फर्ज निभाएंगे. अब बात उनके गाने के शौक कीगाने का चसका भी उन्हें बचपन में अपने गांव कटारी में ही लग गया था. हरिओम बतातेहैं कि तब जो गांव में लोक संगीत सुनने को मिलता था. नाटक-नौटंकी, कव्वाली होती थी.मंदिरों में भजन-कीर्तन होता था. इन सबमें उन्हें संगीत बहुत सही लगता था. तोशुरुआत यहीं से हो गई थी. फिल्मी गाने गुनगुनाते रहते थे. फिर जैसा हर मोहल्ले मेंहोता है कि जो बच्चा नाचने-गाने में अच्छा हो, उसे उसका टैलंट दिखाने के लिए लोगपकड़-पकड़कर ले जाते थे. वैसा ही हरिओम के साथ होता था. गांव के लोग उन्हें गाने केलिए ले जाते थे. खैर ये बात आजके जमाने के लोग नहीं समझ पाएंगे. फोन से फुर्सत कहांहै किसी को. मगर पहले तो ऐसे ही एंटरटेनमेंट होता था. बाकी हरिओम का जलवा स्कूल मेंभी टाइट था. 26 जनवरी हो या 15 अगस्त. एक गाना उनका तो होता ही था.देखें उनके एल्बम का वीडियो-ये गाने का शौक कॉलेज में भी जारी रहा. माने 12वीं पास करने के बाद जब वो इलाहाबादपहंचे. ग्रैजुएशन करने. यहां भी वो तमाम कॉम्पिटिशंस में फिल्मी गाने गाते रहे. मगरइसी बीच उन्हें नया नशा चढ़ा. गज़ल सुनने का. हरिओम बताते हैं कि उस वक्त गुलाम अलीसाहब बड़े हिट थे. दिल में इक लहर सी उठी है...हंगामा है क्यों बरपा...हर लड़के केकानों में बज रहा था. सो वो कैसे बच जाते. उसी समय वो निकाह फिल्म आई थी. वही सल्माआगा वाली. पाकिस्तानी हिरोइनी. इसी में चुपके-चुपके रात दिन, आंसू बहाना याद हैगज़ल डाल दी गई. गुलाम अली की. तो इस तरह ये गज़ल भी तब हर लड़के की जुबान पर पहुंचगई. उनका भी गज़लों से याराना बढ़ता गया. उसी वक्त जगजीत सिंह भी आ गए और छा गए.अपनी गज़ल होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो...तुमको देखा तो ये खयाल आयावगैरह के लिए. तो इस तरह हरिओम फिल्मी गानों से गज़लों की तरफ आ गए. गज़लें गाने कीकोशिश करने लगे.फिर जब जेएनयू पहुंचे तो गज़लों का चसका लग ही चुका था. सो पहुंच गए स्टेज पर औरगज़लें गाकर सुना डालीं जनता को. संगीत तो सीखा नहीं था, मगर सुन-सुन कर खुद कोइतनी ट्रेनिंग दे दी थी कि गा लें. मेहंदी हसन की गज़लें, जगजीत सिंह की गज़लें खूबगाईं. और इस तरह वो नॉन स्टॉप पढ़ाई के साथ गाना गाते रहे और अपना गला पकाते रहे.नौकरी में आने के बाद भी ये शौक जारी रहा. और 2006 में उनका पहला म्यूजिक एल्बमसबके सामने आया. नाम था रंग पैराहन. तभी जब वो गोरखपुर में डीएम थे. दूसरा एल्बमआया 2011 में. नाम है इंतिसाब. जब वो कानपुर के डीएम थे. तीसरा एल्बम आया अप्रैल2015 में. नाम है रौशनी के पंख. और अब आ रहा है उनका चौथा एल्बम. नाम है रंग कादरिया. इसकी पहली गज़ल 21 जनवरी को रिलीज हो रही है. नए एल्बम में 6 गज़लें होंगी.21 तारीख को पहली गज़ल सबके सामने आएगी. बोल हैं- रो चुके जिनके लिए रोना था.वीडियो के साथ. डिजिटल फॉर्मैट में. कैसट-वैसट का जमाना तो गया ना. बाकी की 5गज़लें धीरे-धीरे रिलीज होती रहेंगी.देखें उनका लेटेस्ट म्यूजिक एल्बम-इन सब के बावजूद एक सवाल उठता है कि अधिकारी होने के बावजूद वो गाने के लिए समयकैसे निकाल लेते हैं. इसका जवाब देते हुए हरिओम बताते हैं कि इसका टाइम फालतू केकाम ना करके निकलता है. दूसरों की बुराई में समय बेकार नहीं करने की वजह से बचताहै. लोगों का निंदा रस में बहुत टाइम जाता है. मैं उस समय को इन अच्छी चीजों मेंलगाता हूं.चार किताबें भी लिख चुके हैंडॉ. हरिओम गज़लें गाने के साथ लिखते भी हैं. उनकी चार किताबें अब तक पब्लिश हो चुकीहैं. पहली का नाम है धूप का परचम. इसमें गज़लें हैं. ये किताब 2002 में आ गई थी.दूसरी किताब आई अमरीका मेरी जान. इसमें कहानियां हैं. तीसरी किताब फिर कविताओं कीआई. चौथी किताब आई 2016 में. इसमें भी गज़लें हैं. और अब पांचवीं किताब पर भी वोलगे हुए हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें-इंटरव्यू : अनुराग कश्यप की फ़िल्मों की सबसे विचित्र हिरोइनइस मराठा सेनापति की छोटी सी गलती, और मराठे हार गए पानीपत की लड़ाई4 लाख कश्मीरी पंडितों की वो कहानी जिसे सुनाने वाले का मुंह सिल जाता हैखून से गाड़ी गंदी हो जाती इसलिए 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