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स्टीव जॉब्स की वो 3 कहानियां, जिन्होंने उनकी जिंदगी बदल दी

छह महीने में कॉलेज छोड़ा, खाली बोतलें बेचकर खाना खरीदा और बना दी एपल कंपनी

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5 अक्तूबर 2020 (अपडेटेड: 5 अक्तूबर 2020, 08:23 AM IST)
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स्टीव जॉब्स. कंप्यूटर और मोबाइल के जरिए दुनिया में एक क्रांति के अगुआ. 9 साल पहले आज यानी 5 अक्टूबर के ही दिन 56 साल की उम्र में स्टीव की मौत हुई थी, कैंसर की वजह से. अपने विजन और विचारों की मजबूती से आसमान की ऊंचाइयां छूने वाले स्टीव की जिंदगी काफी उतार चढ़ाव से भरी रही. इस जिंदगी में उन्होंने कई नाकामियां झेलीं, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी कामयाबी की सीढ़ियां बनीं. कैसे? इसके बारे में स्टीव जॉब्स ने खुद 12 जून2005 को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में बताया था. सुनिए स्टीव जॉब्स की कहानी, उन्हीं की जुबानी-

***

मैं बहुत सम्मानित महसूस कर रहा हूं कि मैं दुनिया की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटीज़ में से एक के दीक्षांत समारोह में आप लोगों के साथ हूं. सच कहूं तो मैं कभी किसी कॉलेज से ग्रैजुएट नहीं हुआ. ये पहली बार है, जब मैं किसी ग्रैजुएशन के इतने करीब पहुंच पाया हूं. आज मैं आपको अपनी ज़िंदगी की तीन कहानियां सुनाऊंगा. और कुछ नहीं, सिर्फ तीन कहानियां.
ये स्टैनफर्ड की उसी स्पीच की तस्वीर है
ये स्टैनफर्ड में स्टीव जॉब्स की उसी स्पीच की तस्वीर है

पहली कहानी डॉट्स को कनेक्ट करने के बारे में है.
मैंने एडमिशन के छह महीने बाद ही रीड कॉलेज ड्रॉप कर दिया. लेकिन ड्रॉप करने के बाद 18 महीने तक मैं वहीं पड़ा रहा. तो फिर मैंने कॉलेज ड्रॉप क्यों किया?
ये सब मेरे पैदा होने से पहले शुरू हुआ. मुझे जन्म देने वाली मां एक नौजवान, बिनब्याही कॉलेज ग्रैजुएट थी. जब मैं उनके पेट में था, तब उन्होंने फैसला किया कि मुझे कोई और अडॉप्ट करे. उन्हें ये ज़रूरी लगा कि मुझे अडॉप्ट करने वाले कॉलेज ग्रैजुएट्स ही हों. तो तय हुआ कि मुझे एक लॉयर और उनकी पत्नी गोद लेंगे. लेकिन जैसे ही मैं पैदा हुआ, वो पलट गए. उन्होंने कहा कि उन्हें लड़की चाहिए थी. इसके बाद आधी रात को एक ऐसे जोड़े को कॉल किया गया, जो अडॉप्शन की वेटिंग लिस्ट में थे. उनसे पूछा गया, 'हमारे पास एक अप्रत्याशित बच्चा है, क्या आपको ये चाहिए'. उन्होंने कहा 'बिल्कुल चाहिए'.
मेरी बायोलॉजिकल (जन्म देने वाली) मां को बाद में पता चला कि मुझे गोद लेने वाली मां कॉलेज ग्रैजुएट नहीं है, और मेरे पिता ने तो हाई स्कूल भी पास नहीं किया था. उन्होंने अडॉप्शन पेपर्स पर साइन करने से मना कर दिया. उन्हें मनाने में महीनों लगे. जब मुझे अडॉप्ट करने वाले पैरेंन्ट्स ने वादा किया वो मुझे कॉलेज ज़रूर भेजेंगे, तब जाकर उन्होंने साइन किए.
और 17 साल बाद मैं कॉलेज गया. लेकिन मैंने ऐसा कॉलेज चुन लिया, जो लगभग स्टैनफोर्ड जितना ही महंगा था. और मेरे वर्किंग क्लास पैरेंट्स की सेविंग्स मेरी फीस पर खर्च होने लगी. मुझे इसका कोई मतलब समझ नहीं आ रहा था. मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि ज़िंदगी में क्या करना है, और कॉलेज इसमें मेरी क्या मदद करेगा. मुझे लग रहा था कि मैं अपने मां-बाप के जीवनभर की कमाई जला रहा हूं. छह महीने बाद मैंने कॉलेज ड्रॉप करने का फैसला लिया, इस भरोसे के साथ कि सब ठीक हो जाएगा. तब बहुत डर लगा था, लेकिन पीछे मुड़कर देखूं तो वो मेरी लाइफ के बेस्ट डिसीज़न्स में से एक है. कॉलेज ड्रॉप करने के बाद मैं फ्री था. उन क्लासेस में नहीं जाने के लिए जहां मज़ा नहीं आता था. और सिर्फ उन क्लासेस में जाने के लिए जिनमें मेरा मन लगता था.
स्टीव ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर गैरैज में ऐपल शुरू की थी.
स्टीव ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर गैरैज में ऐपल शुरू की थी.

ये सब इतना रोमांटिक नहीं था. मेरे पास अपना कमरा नहीं था, तो मैं दोस्तों के कमरों के फर्श पर सोता था. मैं कोक की खाली बॉटल लौटाकर खाना खरीदता था. ढंग का खाना खाने के लिए मैं हर रविवार सात मील चलकर हरे कृष्णा टेंपल जाता था. मुझे वो बहुत पसंद था. जहां भी मैं अपनी क्यूरियोसिटी और इंट्यूशन के चलते जा घुसा, बाद में बेशकीमती साबित हुआ. मैं आपको एक एग्ज़ाम्पल देता हूं-
उस समय रीड कॉलेज में शायद देश का सबसे बेहतरीन कैलीग्राफी (सुलेख) कोर्स होता था. मैं तो कॉलेज ड्रॉप कर चुका था और मेरे लिए सभी क्लास में जाना ज़रूरी भी नहीं था, तो मैं सीखने के लिए कैलीग्राफी क्लास जाने लगा. मैंने वहां सेरिफ और सैंस सेरिफ टाइपफेसेस के बारे में सीखा, अलग-अलग लेटर कॉम्बिनेशन्स के बीच स्पेस के बारे में सीखा. मैंने सीखा कि एक बेहतरीन टाइपोग्राफी को बेहतरीन क्या बनाता है. ये बहुत ही खूबसूरत, ऐतिहासिक और इतनी कलात्मक महीनता से भरा था कि साइंस इसे नहीं साध सकता था. और मुझे ये बहुत ही ग़ज़ब लगा.
मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि ये सब प्रैक्टिकली मेरी लाइफ में किसी काम आएगा. लेकिन 10 दस साल बाद जब हम पहला मैकिनटोश कंप्यूटर डिज़ाइन कर रहे थे, तब ये सब काम आया. और हमने ये सब मैक में डिज़ाइन किया. ये खूबसूरत टाइपोग्राफी वाला पहला कंप्यूटर था. अगर मैं उस कोर्स में नहीं गया होता, तो मैक में कभी मल्टिपल टाइपफेसेस या प्रपोर्शनली स्पेस्ड फॉन्ट्स न होते. और चूंकि विंडोज़ ने मैक को कॉपी किया है, तो ये बहुत संभव है कि ये किसी भी पर्सनल कंप्यूटर में न होते. और अगर मैंने कॉलेज ड्रॉप न किया होता, तो मैं कभी उस कोर्स में न जाता और शायद पर्सनल कंप्यूटर्स में इतनी खूबसूरत टाइपोग्राफी न होती.
अच्छा, तुम कभी आगे की तरफ देखकर डॉट्स कनेक्ट नहीं कर सकते, तुम उन्हें पीछे देखते हुए ही कनेक्ट कर पाओगे. तो हमें ये भरोसा रखना होता है कि भविष्य में ये डॉट्स किसी न किसी तरह कनेक्ट हो ही जाएंगे. गट्स, नियति, कर्मा- जो भी कहो, हमें किसी न किसी में तो भरोसा करना होता है. इस नज़रिए ने मुझे कभी नीचा नहीं दिखाया और इसी ने मेरी ज़िंदगी को पूरा बदलकर रख दिया.
मेरी दूसरी कहानी प्यार और हार के बारे में है.
मैं बहुत खुशकिस्मत था कि मुझे जो करना पसंद था, वो मुझे कम उम्र में ही मिल गया. जब मैं 20 साल का था, मैंने और वॉज़ ने मिलकर अपने पैरेंट्स के गैरेज में ऐपल शुरू कर दिया. हमने बहुत मेहनत की. 10 साल में 2 लोगों से शुरू हुई ऐपल दो बिलियन डॉलर की कंपनी बन गई, जिसमें आज 4000 से ज़्यादा लोग हैं. फिर मुझे वहां से निकाल दिया गया. तुम्हें उस कंपनी से कैसे निकाला जा सकता है, जो तुमने शुरू की हो? हुआ यूं कि जैसे-जैसे ऐपल बड़ी हो रही थी, हमने एक ऐसे आदमी को हायर किया जो मुझे मेरे साथ कंपनी चलाने के काबिल लगा. एकाध साल तक तो सब बढ़िया चला, लेकिन फिर फ्यूचर को लेकर हमारे विज़न्स अलग हो गए. इस अलगाव में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने दूसरे की साइड ली. 30 की उम्र में मैं कंपनी से बाहर था. और बहुत ही सार्वजनिक रूप से बाहर था. जिस चीज़ में मैंने अपनी जवानी लगा दी, वो जा चुकी थी, और ये बहुत ही भयानक था.
जिस कंपनी को शुरू किया, उसी से निकाल दिए गए.
जिस कंपनी को शुरू किया, उसी से निकाल दिए गए.

मुझे कुछ महीनों तक समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूं. मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने ऑन्ट्रप्रेन्योर्स की पिछली पीढ़ी को निराश किया है, कि जब मुझे बैटन पास किया जा रहा था, मैंने उसे गिरा दिया. मैं डेविड पैकार्ड और बॉब नॉयस से मिला. उनसे माफी मांगी कि मैंने सबकुछ गड़बड़ कर दिया. मैं एक बहुत ही पब्लिक फेलियर था. एक बार तो मैंने सिलिकॉन वैली से भाग जाने के बारे में भी सोचा. लेकिन धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि मुझे तो अब भी अपने काम से प्यार है. ऐपल में जो भी हुआ, वो मेरे अंदर की ये एक चीज़ नहीं बदल पाया. मुझे ठुकरा तो दिया गया था, लेकिन मुझे इश्क अब भी था. तो मैंने शुरू से शुरू करने का फैसला लिया.
मुझे तब तो ये नहीं दिखा लेकिन ऐपल से निकाला जाना सबसे बढ़िया चीज़ थी, जो मेरे साथ हो सकती थी. सफलता का भार नौसिखिया होने के हल्केपन में बदल गया. मैं अब चीज़ों के बारे में कम श्योर था. इस बात ने मुझे अपने जीवन के सबसे रचनात्मक समय में जाने के लिए आज़ाद कर दिया.
अगले पांच सालों में मैंने नेक्स्ट नाम की एक कंपनी शुरू की, फिर पिक्सार नाम की कंपनी और उसी दौरान मैं एक ग़ज़ब की लड़की के इश्क में पड़ा. लॉरेंस. जो आगे चलकर मेरी बीवी बनी. पिक्सर ने टॉय स्टोरी बनाई. इस दुनिया की पहली कंप्यूटर एनिमेटेड फिल्म. और आज पिक्सर दुनिया का सबसे सक्सेसफुल एनिमेशन स्टूडियो है. फिर एक असाधारण बात हुई, ऐपल ने पिक्सर को खरीद लिया. मैं ऐपल में वापस लौटा और फिर हमने नेक्स्ट नाम की जो टेक्नोलॉजी वहां डेवेलप की, उसने ऐपल को नए सिरे से खड़ा किया.
अपने मास्टर-प्रॉडक्ट के साथ.
अपने मास्टर-प्रॉडक्ट के साथ.

मुझे पूरा यकीन है कि अगर मुझे ऐपल से न निकाला जाता तो ये सब कभी न हो पाता. ये एक कड़वी दवा थी, लेकिन मुझे लगता है कि मरीज़ को इसकी ज़रूरत थी. कभी ज़िंदगी तुम्हारे सिर पर ईंट दे मारेगी. विश्वास मत खोना. मुझे पूरा यकीन है कि जिस एक बात ने मुझे आगे बढ़ने में मदद की, वो यही थी कि मैं जो कर रहा था, मुझे उस काम से प्यार था. तुम्हें वो ढूंढ़ना ही होगा, जिसे तुम प्यार करते हो. ये बात तुम्हारे काम के लिए भी उतनी ही सही है, जितनी ये तुम्हारे प्रेमी या प्रेमिका के लिए है.
तुम्हारा काम तुम्हारी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा है. संतुष्ट रहने का इकलौता रास्ता यही है कि तुम वही काम करो जो तुम्हें ग़ज़ब का लगता है. और तुम ग़ज़ब का काम तभी कर पाओगे जब तुम्हें अपने काम से प्यार होगा. अगर तुम्हें वो अब तक नहीं मिला है तो ढूंढ़ते रहो. समझौता मत करना. जैसा कि दिल से जुड़े सारे मामलों में होता है - वो जब भी मिलेगा, तुम्हें मालूम हो जाएगा. और जैसा कि किसी अच्छे रिश्ते में होता है - जैसे-जैसे साल साल बदलेंगे, वो और अच्छा होता जाएगा. तो जब तक वो मिल नहीं जाता, समझौता मत करना.
मेरी तीसरी कहानी मौत के बारे में है.
जब मैं 17 साल का था, मैंने कहीं पढ़ा था कि 'यदि तुम हर दिन ये मानकर जिओगे कि वो तुम्हारा आखिरी दिन है, तो किसी दिन तुम ज़रूर सही साबित होगे.' ये बात मेरे अंदर घर कर गई और आज तक मेरे अंदर जमी हुई है. पिछले 33 सालों से मैंने हर रोज़ आइने में देख कर खुद से ये सवाल किया है कि 'अगर आज मेरी ज़िंदगी का आखिरी दिन होता, तो क्या मैं वही करता, जो मैं आज कर रहा हूं?' और जब लगातार कई दिनों तक जवाब आता 'नहीं', तो मुझे पता होता है कि कुछ बदलने की ज़रूरत है.
ये याद रखना कि 'मैं जल्द ही मर जाऊंगा', एक बहुत ज़रूरी टूल है जिसने हमेशा मुझे ज़िंदगी के बड़े फैसले लेने में मदद की. क्योंकि लगभग सबकुछ - सारी अपेक्षाएं, सारा अभिमान, शर्मिंदगी और असफलता का सारा डर - ये सारी चीज़ें मौत के सामने ध्वस्त हो जाती हैं, सिर्फ वही बचता है जो सच में ज़रूरी है. 'हमारे पास कुछ खोने को है' इस ख्याल के जाल से बचने का सबसे अच्छा तरीका है ये याद रखना कि 'मैं जल्द ही मर जाउंगा'. तुम पहले से ही नंगे हो. तुम्हारे पास अपने दिल की न सुनने का कोई और कारण ही नहीं है.
स्टीव 56 साल की उम्र तक ज़िंदा रहे.
स्टीव 56 साल की उम्र तक ज़िंदा रहे.

करीब एक साल पहले मुझे अपने कैंसर के बारे में पता चला. सुबह 7:30 बजे मैंने स्कैन कराया. उसमें साफ-साफ मेरे पैनक्रियास में एक ट्यूमर दिख रहा था. मुझे ये भी नहीं पता था कि ये पैनक्रियास क्या होता है. डॉक्टर्स ने मुझे बताया कि लगभग वैसा कैंसर है, जिसका इलाज नहीं किया जा सकता. मुझे तीन से छह महीने से ज़्यादा ज़िंदा रहने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.
डॉक्टर्स ने मुझसे कहा- Go home and get your affairs right. ये डॉक्टर्स का मौत की तैयारी करने के लिए कोड था. इसका मतलब होता है कि अपने बच्चों को वो सब कुछ ही महीनों में बताने की कोशिश करो जो तुम उन्हें अगले 10 सालों में बताने वाले थे. इसका मतलब होता है कि तुम ये सुनिश्चित कर सको कि तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे परिवार को कोई तकलीफ न हो. इसका मतलब होता है अलविदा कहना.
उस डायग्नोसिस के साथ मैं पूरे दिन रहा. उसके बाद बायोप्सी हुई. उन्होंने एक एंडोस्कोप मेरे गले से उतारकर मेरे पेट और अंतड़ियों से होते हुए मेरे पैनक्रियास में एक सुई डाली. और कुछ सेल्स निकाले. मैं बेहोश था लेकिन मेरी बीवी ने बताया कि जब डॉक्टर्स माइक्रोस्कोप में उन सेल्स को देख रहे थे तो वो रोने लगे. क्योंकि ये एक रेयर पैनक्रियाटिक कैंसर था, जिसका सर्जरी से इलाज किया जा सकता था. मेरी सर्जरी हुई और अब मैं ठीक हूं.
स्टीव की मौत उसी कैंसर से हुई, जिसका वो ज़िक्र कर रहे हैं.
स्टीव की मौत उसी कैंसर से हुई, जिसका वो ज़िक्र कर रहे हैं.

ये मौत से मेरी सबसे करीबी मुलाकात थी, और मुझे आशा है कि कुछ और दशकों तक मेरी इतनी करीबी मुलाकात न हो. पहले मेरे लिए मौत एक ज़रूरी ही सही लेकिन सिर्फ एक इंटेलेक्चुअल कॉन्सेप्ट थी. इस सब से गुज़रने के बाद मैं और यकीन से बात कर सकता हूं:
कोई भी मरना नहीं चाहता. जो लोग स्वर्ग चाहते हैं, वो भी इसके लिए मरना नहीं चाहते. लेकिन मौत ही हम सबकी आखिरी मंज़िल है. कोई इससे बच नहीं सका. और ऐसा ही होना भी चाहिए, क्योंकि मृत्यु जीवन का सबसे बेहतरीन आविष्कार है. ये लाइफ चेंजिंग एजेंट है. ये नए के लिए रास्ता बनाने की खातिर पुराने को साफ करती है. अभी, इस वक्त तुम लोग नए हो, लेकिन किसी दिन जो आज से दूर नहीं, तुम बूढ़े हो जाओगे और साफ कर दिए जाओगे. इतना नाटकीय होने के लिए माफी चाहता हूं, लेकिन यही सच है.
तुम्हारे पास सीमित समय है, इसे किसी और की तरह जीने में बर्बाद मत करो. हठधर्मिता में फंसे न रह जाना, कि तुम दूसरों की सोच के नतीजों से हिसाब से जीने लगो. दूसरों की राय को हावी मत होने देना अपने अंदर की आवाज़ पर. और सबसे ज़रूरी बात, अपने इंट्यूशन और दिल की आवाज़ सुनकर चलने का साहस रखो. उन्हें पहले से पता होता है कि तुम क्या बनना चाहते हो. बाकी सारी बातें दोयम दर्जे की हैं.
जब मैं छोटा था, 'दी होल अर्थ कैटेलॉग' नाम का एक ग़ज़ब पब्लिकेशन हुआ करता था. वो हमारी पीढ़ी की बाइबिल्स में से एक था. इसे स्टूवर्ट ब्रांड नाम के एक शख्स ने अपने पोएटिक टच के साथ बनाया था. ये 60 के दशक की बात है. पर्सनल कंप्यूटर्स और डेस्कटॉप पब्लिकेशन से भी पहले की. तब ये सब टाइपराइटर्स और सिज़र्स और पोलराइड कैमरों से बनाया गया था. ये गूगल के आने के 35 साल पहले एक पेपरबैक गूगल की तरह था. आदर्शवादी, साफ टूल्स और महान विचारों से ओतप्रोत.
स्टूवर्ट और उनकी टीम ने 'दी होल अर्थ कैटेलॉग' के कई इश्यूज़ निकाले. और आखिर में एक फाइनल इश्यू निकाला. ये 70 के दशक के मध्य की बात थी और तब मैं तुम्हारी उम्र का हुआ करता था. फाइन इश्यू के बैक कवर पर एक गांव की सड़क की सुबह की फोटो थी. ऐसी सड़क जिस पर तुम्हारा हिचहाइकिंग करने का मन कर जाए. उस फोटो के नीचे लिखा था - 'Stay Hungry. Stay Foolish.' ये उनका फेयरवेल मैसेज था. और हमेशा ये मैंने खुद से कहा है. आज आप लोग यहां से ग्रेजुएट होकर नई शुरुआत करने वाले हैं तो आज मैं ये आप से कहूंगा -
Stay Hungry. Stay Foolish.
आप सभी की बहुत-बहुत शुक्रिया.


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