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मेघालय में ऐसे क्यों भिड़े पंजाबी और लोकल लोग कि चार दिनों से कर्फ्यू लगा हुआ है

हिंसा के पीछे की कहानी 150 साल पुरानी है

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4 जून 2018 (अपडेटेड: 4 जून 2018, 11:27 AM IST)
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पिछले चार दिनों से मेघालय की राजधानी शिलांग के अधिकांश हिस्सों में कर्फ्यू लगा हुआ है.
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21 जनवरी 1972. भारतीय इतिहास में ये वो तारीख है, जब मेघालय नाम का राज्य अस्तित्व में आया. अगर शाब्दिक भाषा में समझें तो मेघालय का मतलब होता है बादलों का घर. भारत के सबसे पूर्वी छोर पर बांग्लादेश की सीमा से लगता हुआ ये एक छोटा सा राज्य है. ईसाई बहुल जनसंख्या वाले इस राज्य में सबसे ज्यादा खासी, जयंतिया और गारो जनजाति के लोग रहते हैं. इसके बाद आबादी के लिहाज से कोच, राभा और बोडो समुदाय के लोग शामिल हैं. राज्य में खासी की जनसंख्या करीब 34 फीसदी है. वहीं गारो जनजाति की संख्या 30.5 फीसदी और जयंतिया की संख्या करीब 18.5 फीसदी है.

मेघालय में सबसे ज्यादा आबादी खासियों की है. पूरी आबादी का करीब 34 फीसदी खासी हैं.

पहले मेघालय नहीं, असम था राज्य
जब भारत में अंग्रेज नहीं आए थे, तो ये खासी, जयंतिया और गारो पहाड़ियों के लोगों का अपना अलग राज्य था. ये सभी जनजातियां थीं और अपने-अपने हिसाब से शासन कर रही थीं. जब अंग्रेज आए, तो ये तीनों राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल हो गए. 1835 में ब्रिटिश साम्राज्य ने इन तीनों राज्यों को असम का हिस्सा बना दिया. 1905 में बंगाल विभाजन के बाद मेघालय को पूर्वी बंगाल का हिस्सा बना दिया गया, लेकिन 1912 में जब बंगाल विभाजन का फैसला वापस हुआ, मेघालय फिर से असम का हिस्सा बन गया. 1921 में ब्रिटिश साम्राज्य ने जयंतिया और गारो जनजातियों को पिछड़ा घोषित कर दिया, लेकिन खासी जनजाति को इससे बाहर रखा गया.
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150 साल पुरानी है दिक्कत
मेघालय में करीब 74 फीसदी ईसाई आबादी के बाद सबसे ज्यादा लोग हिंदू हैं, जिनकी संख्या करीब 11.5 फीसदी है. इसके अलावा इस राज्य में मुस्लिम भी चार फीसदी हैं. इसके अलावा इस राज्य में सिख भी अच्छी-खासी तादाद में हैं. इनमें अधिकांश संख्या दलितों की है. ये वो सिख हैं, जिन्हें अंग्रेज अपने जमाने में क्लीनर और सफाईकर्मी के तौर पर पंजाब से लेकर आए थे. ये लोग पंजाब से मेघालय आ तो गए, लेकिन कभी वापस नहीं लौटे. पिछले करीब 150 सालों से ये लोग मेघालय में ही रह रहे हैं. और मेघालय में हुई हिंसा की असली वजह भी यही है. मेघालय के खासी, जयंतिया और गारो लोग खुद को मेघालय का मूल निवासी मानते हैं. वहीं ये लोग राज्य में रहने वाले हिंदुओं, मुस्लिमों के साथ ही जैन, बौद्ध और सिखों को भी बाहरी मानते हैं. वो चाहते हैं कि इन लोगों को राज्य से बाहर कर दिया जाए. और इसके लिए वो हिंसा का भी सहारा लेते रहते हैं.

मेघालय में रहने वाले खासी, जयंतिया और गारो अपने अलावा और सभी लोगों को बाहरी मानते हैं. उन्हें राज्य से बाहर करने के लिए वो समय-समय पर प्रदर्शन करते रहे हैं.

1979 में हुई थी हिंसा की शुरुआत
इस हिंसा की शुरुआत 1979 में हुई थी. मेघालय में बंगाल के लोगों की भी कुछ आबादी है. उस साल दुर्गा पूजा के दिन किसी ने मूर्ति पर पत्थर फेंक दिया था. इससे नाराज लोग हिंसा पर उतर आए. कुछ दिन तक मेघालय शांत रहा, लेकिन 1988 के चुनाव के बाद से ही मेघालय में दबा-छिपा विद्रोह शुरू हो गया. इस विद्रोह की वजह थी मेघालय में बढ़ती हुई बाहरियों की आबादी. दूसरे राज्यों से आकर बसने वाले लोगों की वजह से मेघालय के मूल निवासियों खासी, जयंतिया और गारो को परेशानी होने लगी. उनके इस विद्रोह का नेतृत्व किया हाइनिटवर्प अचिक लिबरेशन काउंसिल ने. मेघालय में बाहरी लोगों को डखार कहा जाता है. उसने राज्य सरकार से मांग की कि दूसरे राज्य से आए लोगों को मेघालय से बाहर किया जाए. अभी ये आंदोलन परवान चढ़ता कि उससे पहले ही हाइनिटवर्प अचिक लिबरेशन काउंसिल के बीच फूट पड़ गई. इस आंदोलन से गारो का प्रतिनिधित्व करने वाले गुट ने खुद को अलग कर लिया और बनाया अचिक मतग्रिक लिबरेशन आर्मी. वहीं बचा हुआ खासी लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला गुट हाइनिटवर्प नेशनल लिबरेशन काउंसिल के रूप में काम करता रहा. हालांकि अचिक मतग्रिक लिबरेशन आर्मी में फूट पड़ गई और अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल ने इसकी जगह ले ली.

1990 के अंत में मेघालय से अलग खासी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग करने वाले सभी नेताओं की एक साथ मुलाकात हुई थी. (फोटो: Northeasttoday)

और फिर उठी खासी और गारो लोगों के लिए अलग-अलग राज्य की मांग
गारो और खासी के बीच उपजे इस विवाद के बाद हाइनिटवर्प नेशनल लिबरेशन काउंसिल मेघालय को खासी लोगों के लिए अलग राज्य बनाने की मांग कर दी. अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल मेघालय को गारो लोगों के लिए अलग राज्य की मांग करने लगा. इनमें भी अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल ज्यादा हिंसक हो गया. 2000 के बाद इस ग्रुप ने कई हिंसाएं कीं. आम लोगों के साथ ही पुलिसवाले भी मारे गए. इस ग्रुप को बांग्लादेश के उग्रवादी गुटों और असम के उग्रवादी गुटों का भी साथ मिल गया. हिंसा का सिलसिला जुलाई 2004 तक जारी रहा. इसके बाद अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल ने संघर्ष विराम की घोषणा कर दी. इसके बाद भी वो अपनी गतिविधियां चलाता रहा और राज्य में अवैध वसूली करता रहा. इसके आंदोलन को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब 24 जुलाई 2007 को अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल के अगुवा जूलियस डोरफांग ने अपने चार साथियों के साथ मेघालय की राजधानी शिलांग में सरेंडर कर दिया. वहीं 2004 में अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल के संघर्ष विराम की घोषणा के बाद रिट्राइवल इंडीजीनस यूनीफाइड फ्रंट (RIUF), यूनाइटेड अचनिक नेशनल फ्रंट (UANF),हजोंग यूनाइटेड लिबरेशन आर्मी (HULA) जैसे गुटों ने सिर उठाना शुरू कर दिया.
पीटर मारक को पुलिस ने एनकाउंटर में मार दिया था.
पीटर मारक को पुलिस ने एनकाउंटर में मार दिया था.

2006 में लिबरेशन अचनिक एलिट फोर्स का गठन किया गया, जिसे पीटर मारक नाम के शख्स ने बनाया था. ये एक पुलिस कमांडो रह चुका था. इसने कई उग्रवादी संगठनों से हाथ मिला लिया. अगस्त 2007 में पीटर और उसके दो साथी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. अगले ही साल इसके कमांडर किमरी के संगमा को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया. इसके बाद शांति के लिए मेघालय में चर्च ने भी पूरी कोशिश की और इसका नतीजा ये था कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के मुकाबले मेघालय में थोड़ी शांति थी.

31 मई की रात से शिलांग में हिंसा फैली हुई है, जिसे रोकने के लिए कर्फ्यू लगाया गया है.

आग बुझी नहीं थी, सिर्फ राख पड़ी थी जो उड़ गई
लेकिन अचानक से 31 मई की रात से मेघालय में एक बार फिर से हिंसा भड़क गई. मेघालय की राजधानी शिलांग में देम ल्यू मॉवलांग इलाके में एक पंजाबी बस्ती है. इस बस्ती में सिख रहते हैं, जो पिछले करीब 150 सालों से यही रह रहे हैं. अंग्रेज उनके पूर्वजों को बतौर सफाई कर्मचारी और क्लीनर लेकर आए थे. अंग्रेज तो 1947 में भारत छोड़कर चले गए, लेकिन ये लोग यहीं पर बस गए. उन्होंने मेघालय के अलग-अलग शहरों में अपनी बस्तियां बसा लीं. इसी तरह की एक बस्ती शिलांग में भी है. 31 मई की दोपहर में सरकारी बस का एक खलासी बस को पार्क कर रहा था. खलासी खासी समुदाय का था. इस दौरान पंजाबी बस्ती की एक महिला ने इस पर आपत्ति जताई. दोनों ही पक्षों के बीच तू-तू, मैं-मैं हुई, जिसके बाद मौके पर पुलिस पहुंच गई. उसने बीच बचाव कर मामले को शांत करवाया.

कर्फ्यू में ढील मिलने के बाद भी उपद्रवी सेना और पुलिस पर पत्थर फेंक रहे हैं.

यहां भी सोशल मीडिया बना विलेन
लेकिन शाम होते-होते सोशल मीडिया पर मैसेज वायरल होने लगा कि पंजाबी बस्ती के लोगों ने खासी समुदाय के एक शख्स को पीटकर मार डाला है. वहीं पंजाबी बस्ती के लोगों के लिए अफवाह फैलाई गई कि खासी समुदाय के युवक ने उनकी किसी लड़की के साथ छेड़खानी की है. दोनों ही पक्षों में ये अफवाह आग की तरह फैली और लोग सड़कों पर उतर आए. खासी समुदाय के लोग पंजाबी बस्ती पर हमला करना चाहते थे, लेकिन उन्हें पुलिस ने रोक लिया. इस दौरान खासी लोगों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प भी हुई. पुलिस ने लाठियां भांजी और आंसू गैस के गोले दागे तो खासी लोगों ने पुलिस की गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया. उनके पथराव में कई पुलिसवाले भी घायल हो गए. पूरी रात खासी लोगों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प होती रही, जिसके बाद 1 जून की सुबह चार बजे कर्फ्यू लगा दिया गया. पूरे शहर में हिंसा न फैले, इसके लिए अधिकारियों ने शहर के 14 हिस्सों में कर्फ्यू लगा दिया और पूरे शहर की इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई.
सेना भी नहीं रोक पाई हिंसा
चूंकि एक जून को शुक्रवार था, इसलिए लोगों को चर्च जाना था, लेकिन कर्फ्यू भी लगा हुआ था. इसे देखते हुए कर्फ्यू में थोड़ी सी ढील दे दी गई, ताकि लोग चर्च में पूजा कर सकें. इस दौरान भीड़ ने पंजाबी कॉलोनी की एक दुकान को आग के हवाले कर दिया, एक घर को आग लगा दी और पांच गाड़ियां फूंक दीं. भीड़ ने पथराव भी किया, जिसमें 10 से ज्यादा लोग घायल हो गए. इस दौरान हिंसा को शांत करने की कोशिश में एसपी सिटी स्टीफन रिंजा भी गंभीर रूप से घायल हो गए. इसके बाद पुलिस ने 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया और एक बार फिर से पूरे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया. वहीं मुख्यमंत्री कोनराड संगमा मे सेना से भी मदद मांगी, जिसके बाद सेना ने शुक्रवार की रात शहर में फ्लैग मार्च किया. इस दौरान सेना ने 200 महिलाओं और बच्चों समेत कुल 500 लोगों को भीड़ से बचाया और उन्हें सीआरपीएफ के कैंप में ले जाया गया. वहां से उन्हें गैरिसन ग्राउंड स्थित रिनो ट्रेनिंग सेंटर भेजा गया जहां सेना उनकी देखभाल कर रही है.


पूरे इलाके में हिंसा की आशंका को देखते हुए शनिवार यानी कि 2 जून को भी कर्फ्यू लगा ही रहा. पूरे शहर सेना और पुलिस के जवान फ्लैग मार्च करते रहे. वहीं पूरे शहर में इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया गया. 3 जून को जब प्रशासन को लगा कि स्थिति थोड़ी सी नियंत्रण में है, तो सुबह 10 बजे से शाम के चार बजे तक कर्फ्यू में ढील देने का ऐलान किया गया. हालांकि सेना के जवान और पुलिस की टुकड़ी गश्त करती रही. इसी दौरान उपद्रवियों की भीड़ ने सेना के काफिले पर पेट्रोल बम से हमला कर दिया और पत्थरबाजी शुरू कर दी. इसके बाद स्थितियों को बिगड़ने से बचाने के लिए प्रशासन ने एक बार फिर से कर्फ्यू लगा दिया जो 4 जून की शाम तक जारी था.


इस बीच पंजाबियों पर हमले को देखते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कैबिनेट मंत्री सुखजिंदर रंधावा के नेतृत्व में सांसद गुरजीत अजूला, रवनीत बिट्टू के साथ ही विधायक कुलदीप सिंह वैद को 4 जून को शिलांग भेजा. इस टीम ने मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा से बात की और वहां के हालात का जायजा लिया. टीम ने कहा कि फिलहाल शिलांग में शांति है और पंजाबी समुदाय को किसी तरह का खतरा नहीं है. वहीं शिरोमणि अकाली दल के के लोगों ने भी शिलांग में पंजाबियों से मुलाकात की और कहा कि इस हिंसा के दौरान पंजाबी सुरक्षित हैं और किसी भी गुरुद्वारे को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा है.


इस पूरे मुद्दे पर मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने साफ तौर पर कहा है कि शिलांग में हिंसा भड़काने के लिए शराब और पैसे का सहारा लिया जा रहा है. कुछ बाहर के लोग हैं, जो तीस साल पुरानी दिक्कत को हवा देकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं. फिलहाल हालात सेना और पुलिस के नियंत्रण में हैं. लेकिन इनपर हथियारों के बल पर काबू पाया गया है. समस्या पुरानी है. स्थानीय लोग बाहरी लोगों को अपने साथ रखना नहीं चाहते हैं. स्थानीय लोग जिनको बाहरी बता रहे हैं, वो पिछले करीब चार पुश्तों से यही रह रहे हैं. ऐसे में दोनों पक्षों के बीच के विवाद को सुलझाना इतना भी आसान नहीं है. मुद्दा बड़ा है, जिसमें आग हमेशा धधकती रहती है. इस बार एक चिंगारी ने उसे सुलगा दिया. लेकिन अब भी आग बुझी नहीं है.


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