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नागालैंड: जहां नेहरू-इंदिरा जूझते रहे, वहां पका-पकाया खा रहे हैं नरेंद्र मोदी

नागालैंड. 1 दिसंबर, 1963 को अस्तित्व में आया भारत का 16वां राज्य. भारत के पूर्वोत्तर में जिन सात राज्यों को ‘सेवेन सिस्टर्स’ के नाम से जाना जाता है, उसमें से एक राज्य. लोकेशन की बात करें, तो ये पश्चिम में असम से, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश और असम से, दक्षिण में मणिपुर और पूर्व में म्यांमार से घिरा है. कोहिमा इसकी राजधानी है और दीमापुर यहां का सबसे बड़ा शहर है. 2011 की जनगणना में यहां की आबादी 19,80,602 बताई गई थी, जिसके हिसाब से ये देश का सबसे छोटा राज्य है. यहां 16 बड़ी जनजातियां (ट्राइब्स) रहती हैं, जिनमें से हर एक का अपना अलग पहनावा, संस्कृति, नियम, कायदे और भाषा हैं. हालांकि, ज़्यादातर लोग अंग्रेज़ी बोलते-समझते हैं.

भारत के नक्शे में नागालैंड
भारत के नक्शे में नागालैंड

चुनाव के बहाने नागालैंड की सियासत का ज़िक्र हो रहा है, लेकिन इसके अतीत, यहां के लोगों और दशकों से चली आ रहीं समस्याओं का ज़िक्र कम होता है. तो आइए, नज़र डालते हैं नागालैंड पर.

बात शुरू करते हैं ब्रिटिश हुकूमत से

ऐसा इसलिए, क्योंकि नागालैंड में रहने वाली जनजातियां कहां से आईं और यहां कब बस गईं, इसका कोई पुख्ता इतिहास नहीं है. लोग यहां साल 1,200 के आस-पास से रह रहे हैं, लेकिन वो मंगोलियन इलाके से आए, साउथ वेस्ट चीन से आए या साउथ ईस्ट एशिया से आए, इसका कोई मजबूती से दावा नहीं करता. नागालैंड के नाम और यहां के लोगों का ‘नागा’ नाम रखने पर भी विशेषज्ञों में मतभेद है.

नागा जनजाति के एक शख्स का स्केच (1875)
नागा जनजाति के एक शख्स का स्केच (1875)

हां, जब अंग्रेज़ों ने भारत पर कब्ज़ा किया, तो यहां के लोगों का उनसे खूब संघर्ष हुआ. 1840 से 1865 के बीच अंग्रेज़ सैनिकों और नागा लोगों के बीच खूब खून-खराबा और हत्याएं हुईं.

1879 में नागा ने अंग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई छेड़ी थी. उन्होंने अंग्रेज़ों पर हमला भी किया, लेकिन चूंकि नागा ट्राइब्स एक-दूसरे को अच्छे से नहीं समझती थीं, वो अंग्रेज़ों के आगे नहीं टिक पाए. तस्वीर में: अंग्रेज नागा हिल्स जीतने के बाद मीतेई वॉरियर्स के साथ.
1879 में नागा ने अंग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई छेड़ी थी. उन्होंने अंग्रेज़ों पर हमला भी किया, लेकिन चूंकि नागा ट्राइब्स एक-दूसरे को अच्छे से नहीं समझती थीं, वो अंग्रेज़ों के आगे नहीं टिक पाए. तस्वीर में: अंग्रेज नागा हिल्स जीतने के बाद मीतेई वॉरियर्स के साथ.

1850 के आसपास का ही वो वक्त था, जब यूरोपीय और अमेरिकी मिशनरी यहां आए और उन्होंने नागा ट्राइब्स के ढेर सारे लोगों को ईसाई धर्म में शामिल करा लिया. आज इस राज्य की करीब 88% आबादी ईसाई है और मेघालय-मिजोरम से साथ ये भारत का तीसरा ईसाई-बहुल राज्य है.

नागालैंड जाने वाले पहले मिशनरी

दूसरे विश्वयुद्ध का जिक्र होने पर कोहिमा का नाम ज़रूर लिया जाएगा

साल 1944 में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय और जापानी सेना की मदद से भारत को आज़ाद कराने की कोशिश की. वो बर्मा के रास्ते भारत में घुसे. उनकी मंशा कोहिमा से आज़ादी की शुरुआत करने की थी. लेकिन अंग्रेज़ इस लड़ाई में कब्ज़ा बचाने में कामयाब रहे. ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों ने जापानी सैनिकों को कोहिमा से खदेड़ दिया. दोनों ही देशों के सैनिक मारे गए, लेकिन सबसे ज़्यादा तादाद में मारे गए नागा लोग. उन्हीं का सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ.

कोहिमा युद्ध की याद में बना स्मारक
कोहिमा युद्ध की याद में बना स्मारक

पर संघर्ष यहां कभी नहीं रुका

नागालैंड में अंतरजातीय संघर्ष बहुत ज़्यादा है. ढेर सारी जनजातियां होने की वजह से उनके अलग-अलग संगठन हैं, नियम-कायदे हैं, लड़ने के लिए लोग हैं. ऐसे में अलग-अलग मुद्दों पर, चाहे वो राजनीतिक हों या सामाजिक, हिंसा होती रही है. ये आज भी जारी है और इसमें सबसे ज़्यादा नुकसान आम लोगों का होता है, क्योंकि वो बेवजह मारे जाते हैं और पब्लिक प्रॉपर्टी की रेढ़ पीट दी जाती है.

हाइवे को बंद करके बैठे उपद्रवी
हाइवे को बंद करके बैठे उपद्रवी

मुद्दे अधिकतर अधिकार को लेकर होते हैं. ढेर सारी जनजातियों के अपने अलग-अलग संगठन हैं, नेता हैं. वो अपनी जनजाति को ज़्यादा अधिकार मिलने, संविधान में संशोधन करने, अपने फैसले खुद लेने, कोर्ट और सरकार का दखल कम करने जैसे मुद्दों को लेकर लड़ते हैं. पर इनका मुद्दा उठाने का तरीका बातचीत नहीं, बल्कि हिंसा होता है.

फरवरी 2017 में दीमापुर में हुए वायलेंस की एक तस्वीर
फरवरी 2017 में दीमापुर में हुए वायलेंस की एक तस्वीर

आज़ादी से पहले नेहरू ने ये कोशिश की थी

50 के दशक में नागा इलाके में भयानक विद्रोह देखने को मिला. तब नागा असम में ही स्वायत्तता की मांग कर रहे थे. इस अंतरजातीय संघर्ष की वजह से वहां कुछ भी बेहतर नहीं हो पा रहा था. ढेर सारे अलगाववादी और विद्रोही गुट थे, जो अंग्रेज़ों के फैसले भी मानने से इनकार कर रहे थे. इसी को लेकर अंग्रेज़ों, नागा नेताओं और कांग्रेस के बीच लगातार बात हो रही थी.

मार्च 1953 में कोहिमा में नागा ट्राइबल्स के साथ बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू
मार्च 1953 में कोहिमा में नागा ट्राइबल्स के साथ बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू

1 अगस्त 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से नागा क्लब (जो बाद में नागा नेशनल काउंसिल (NNC) हो गया) के एक मेमोरेंडम के जवाब में कहा कि वो यूनियन ऑफ इंडिया (भारतीय गणतंत्र) में शामिल हो जाएं, जिसके बदले उन्हें स्वायत्ता और सुरक्षा दी जाएगी. लेकिन नागा लोग नहीं माने और वो अलग देश की मांग करने लगे, जिसमें किसी भी देश या सरकार का कोई दखल न हो.

नेहरू-नागालैंड के रिश्ते पर जारी हुआ डाक-टिकट
नेहरू-नागालैंड के रिश्ते पर जारी हुआ डाक-टिकट

आज़ादी के बाद क्या हुआ

अभी नागालैंड का जो इलाका है, वो 1947 में आज़ादी के बाद असम प्रॉविन्स का हिस्सा हो गया था. लेकिन वहां व्याप्त हिंसा आज़ादी के बाद भी जारी रही. 1955 में हालात इतने खराब हो गए कि वहां इंडियन आर्मी भेजनी पड़ी. इसका असर ये हुआ कि 1957 में नागा नेताओं और भारत सरकार के बीच समझौता हुआ कि नागा हिल्स का एक अलग इलाका बनाया जाए. नतीजतन Naga Hills Tuensang Area बनाया गया और ये एक यूनियन टेरेटरी बन गया. हालांकि, नागा ट्राइब्स इससे भी संतुष्ट नहीं हुए. ये फौरी उपाय था, जबकि उनकी निगाह तो अलग देश पर थी इसका असर ये हुआ कि हिंसा और बढ़ गई.

फिर आखिरकार नागालैंड राज्य बन गया

1960 में पंडित नेहरू और नागा नेताओं के बीच बातचीत सही ट्रैक पर आगे बढ़ी और नागालैंड को राज्य बनाने की कवायद शुरू की गई. 1962 में संसद में नागालैंड ऐक्ट पास हुआ और 1 दिसंबर 1963 को नागालैंड भारत का 16वां राज्य बन गया. जनवरी 1964 में यहां चुनाव हुए और 11 फरवरी 1964 को पहली विधानसभा बनी. पहले नागालैंड में 8 जिले थे, जो अब 11 हो चुके हैं. पहले चुनाव के समय 40 सीटें थीं, जो अब 60 हो चुकी हैं.

नागालैंड की एक ट्राइब कम्युनिटी
नागालैंड की एक ट्राइब कम्युनिटी

नागालैंड बनाते समय भारत के संविधान में एक आर्टिकल 371-A जोड़ा गया था. इसमें नागालैंड को ये छूट दी गई थी कि भारत की संसद का कोई ऐसा कानून, जो नागा परंपराओं के खिलाफ जाता है, वो नागालैंड की विधानसभा से पास हुए बिना नागालैंड में लागू नहीं होगा. ये नियम सिविल और क्रिमिनल, दोनों तरह के मसलों पर लागू हुआ. हालांकि, बाद में चुनाव में महिलाओं को आरक्षण देने के लिए संविधान में जो आर्टिकल 243-T जोड़ा गया, वो नागालैंड में विवाद की जड़ बना, जिसकी कहानी हम आपको आगे बताएंगे.

अलग-अलग राज्यों को मिले स्पेशल स्टेटस
अलग-अलग राज्यों को मिले स्पेशल स्टेटस

नेहरू के बाद इंदिरा भी अलगाववादियों से जूझीं

जानकर हैरानी होती है, पर राज्य बनने, चुनाव होने और विधानसभा बनने के बावजूद नागालैंड में हिंसा खत्म नहीं हुई. पंडित नेहरू के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी इससे जूझना पड़ा, क्योंकि नागालैंड में विद्रोही गुट खत्म नहीं हो रहे थे. जनजातियों में इतनी विविधता थी कि सबकी अलग-अलग मांगें थीं और अलग देश का सपना देखने वालों की कोई कमी नहीं थी. खैर, इंदिरा सरकार में इमरजेंसी लगने के बाद नवंबर 1975 में नागालैंड के बड़े विद्रोही नेता भारतीय संविधान स्वीकार करने पर राजी हो गए थे. हालांकि, छोटे ग्रुप फिर भी एक्टिव रहे.

साल 1966 के गणतंत्र दिवस कार्यक्रम के लिए आए नागालैंड ट्राइब्स के लोगों के साथ इंदिरा गांधी
साल 1966 के गणतंत्र दिवस कार्यक्रम के लिए आए नागालैंड ट्राइब्स के लोगों के साथ इंदिरा गांधी

लेकिन चुनावों में जीत कौन रहा था

नागालैंड के पहले चुनाव में उतरे सभी 73 कैंडिडेट पुरुष थे और निर्दलीय थे. 1 दिसंबर 1963 से 26 फरवरी 1974 के बीच नागालैंड में तीन मुख्यमंत्री हुए: पी. शिलू ओ, टीएन अनगामी और होकीशे सेमा. इन तीनों का ताल्लुक नागालैंड नेशनलिस्ट ऑर्गनाइजेशन से था, लेकिन इनमें से सिर्फ होकीशे सेमा ही पांच साल सरकार चला पाए. पहले दोनों सीएम तो सीएम के तौर पर हज़ार दिन भी पूरे नहीं कर पाए थे. 1964 के बाद 1969 और फिर 1974 में चुनाव हुए थे.

नागालैंड के पहले मुख्यमंत्री
नागालैंड के पहले मुख्यमंत्री पी. शिलू ओ

26 फरवरी 1974 को बने चौथे सीएम विजोल अनगामी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) से थे, जो सिर्फ सालभर सीएम रह पाए. 10 मार्च 1975 को नागा नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी (NNDP) से जॉन बॉस्को जसोकी सीएम बने, जो सिर्फ 11 दिन कुर्सी पर बैठ पाए.

होकीशे सेमा
होकीशे सेमा

नागा नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन 1964 में हुआ था. ये यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और नागा नेशनल पार्टी के आपस में मिलने से बनी थी, जिसके नेता जॉन बॉस्को थे. जॉन बॉस्को ने 20 मार्च 1975 को कुर्सी गंवाई, जिसके कुछ वक्त बाद 25 जून 1975 को इंदिरा सरकार ने इमरजेंसी लगा दी, जो 25 नवंबर 1977 तक लागू रही.

नवंबर 1977 को UDF के विजोल अनगामी फिर सीएम की कुर्सी पर बैठे और इस बार उन्होंने 876 दिन यानी करीब ढाई साल सरकार चलाई. 1977 में नागालैंड के चुनाव में कांग्रेस भी शामिल हुई थी, लेकिन वो UDF से बहुत पीछे रही. 18 अप्रैल 1980 को यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट- प्रोग्रेसिव (UDF-P) के एससी जमीर सीएम बने, जो सिर्फ 49 दिन सरकार चला पाए. इसके बाद नागा नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी (NNDP) के जॉन बॉस्को जसोकी फिर सीएम बन गए और अपनी दूसरी पारी में उन्होंने 897 दिन सरकार चलाई.

दोनों तस्वीरों में एससी जमीर
दोनों तस्वीरों में एससी जमीर

1982 में हुए चुनाव के बाद UDF-P के एससी जमीर सीएम बने, जो अक्टूबर 1986 तक सीएम रहे. जमीर वो नेता हैं, जो नागालैंड को अलग राज्य बनाने की मांग करने वाली नेगोसिएशन बॉडी का हिस्सा था और नेहरू से बातचीत करते थे. ये 1961 से 1970 तक सांसद रहे और इस दौरान इन्हें केंद्र में मंत्री भी बनाया गया. ये पांच बार (1980, 1982-1986, 1989-90, 1993-2003) नागालैंड के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. इनके पहले दोनों कार्यकाल UDF-P से थे, जबकि बाकी तीन कार्यकाल कांग्रेस से, क्योंकि 1989 में इन्होंने अपने संगठन का कांग्रेस में विलय कर लिया था. ये नागालैंड से राज्यसभा सदस्य और फिर गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात के गवर्नर भी रहे. अभी ये ओडिशा के गवर्नर हैं.

नागालैंड में 29 अक्टूबर 1986 को पहली बार कोई कांग्रेसी सीएम बना. ये होकीशे सेमा थे, जो अगस्त 1988 तक (648 दिन) सीएम रहे. अगस्त 1988 से जनवरी 1989 तक राष्ट्रपति शासन लागू रहने के बाद कांग्रेस ने एससी जमीर को मुख्यमंत्री बनाया, जिनका कार्यकाल मई 1990 तक (471 दिन) चला. इसके बाद कांग्रेस ने केएल चीशी को सीएम बनाया, लेकिन वो सिर्फ 36 दिन सीएम रह पाए.

केएल चीशी
केएल चीशी

चीशी के बाद वामुज़ो फेसाओ सीएम बने, जो जून 1990 से अप्रैल 1992 तक सीएम रहे. फिर अप्रैल 1992 से फरवरी 1993 तक राष्ट्रपति शासन रहा.

1993 के चुनाव के बाद कांग्रेसी सीएम एससी जमीर सीएम बने, जो 22 फरवरी 1993 से 6 मार्च 2003 तक सीएम रहे. 3,665 दिनों का उनका ये कार्यकाल नागालैंड में किसी भी मुख्यमंत्री का सबसे लंबा कार्यकाल है. हालांकि, ऐसा इसलिए भी हुआ था, क्योंकि 1998 में नागा कबीलों की शीर्ष संस्था नागा होहो और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-ईसाक मुईवा (NSCN-IM) ने चुनाव का बहिष्कार किया था. नागा होहो का मानना है कि नागालैंड में जो भी सियासी और संवैधानिक विवाद हैं, उनका कोई स्थायी हल निकलने के बाद ही चुनाव होने चाहिए. तो 1998 के चुनाव में कई बड़ी स्थानीय पार्टियां चुनाव से दूर रहीं, लेकिन कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और 53 सीटें जीत लीं. तब नागा पीपल्स फ्रंट (NPF) की मान्यता रद्द हो गई थी और उसका चुनाव चिन्ह वापस ले लिया गया था.

NPF का झंडा
NPF का झंडा

2003 से क्या स्थिति है

2003 तक आते-आते बीजेपी भी नागालैंड की सियासी तस्वीर में आ गई थी. इसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम को अलग से देखा जाना चाहिए. 23 फरवरी 2003 को हुए चुनाव में नागा पीपल्स फ्रंट (NPF) 38 सीटें जीतकर सत्ता में आया. नागा पीपल्स फ्रंट (NPF) ने बीजेपी के साथ मिलकर डेमोक्रेटिक अलायंस ऑफ नागालैंड (DAN) बनाया, जो 2018 तक सत्ता में रहा. 2003 में कांग्रेसी एससी जमीर के सीएम पद से हटने के बाद NPF के नेफियो रियो सीएम बने थे, जो 3 जनवरी 2008 तक कुर्सी पर रहे. नेफियो रियो की कहानी भी अलहदा है, जिसका ज़िक्र आगे.

NPF के मंच पर नेफियो रियो
NPF के मंच पर नेफियो रियो

नागालैंड में 2000 के बाद की राजनीति के तीन सूत्रधार: नेफियो रियो, शूरोजेली लाइजेत्सु और टीआर जीलियांग

इन तीनों नेताओं का ताल्लुक NPF से है, जिसके साथ बीजेपी ने गठबंधन किया था. रियो 2003 से 2014 तक सीएम रहे. 2014 में रियो की केंद्र सरकार में मंत्री बने की इच्छा हुई, तो वो लोकसभा चुनाव में उतर गए और सांसद बनकर दिल्ली चले गए. लेकिन बीजेपी से उन्हें उम्मीद के मुताबिक सपोर्ट नहीं मिला. उन्हें केंद्रीय मंत्री नहीं बनाया गया. सांसद मिलने की वजह से वो सीएम की कुर्सी पहले ही छोड़ गए थे और जब तक वो नागालैंड की सियासत में वापसी करते, तब तक कोहिमा की राजनीति बदल चुकी थी.

प्रधानमंत्री मोदी के साथ रियो
प्रधानमंत्री मोदी के साथ रियो

2014 के बाद से इन तीनों नेताओं के बीच जो खेल हुआ, उसने नागालैंड की सियासत में भारी अस्थिरता पैदा की और इसी ने बीजेपी को जगह बनाने में मदद की. रियो के दिल्ली जाने के बाद NPF के ज़्यादातर विधायक जीलियांग का समर्थन करने लगे. रियो जीलियांग को ही अपना उत्तराधिकारी बनाकर दिल्ली गए थे. हालांकि, जनवरी 2015 में रियो कैंप के 23 विधायकों ने मुख्यमंत्री बदलने की मांग की थी, लेकिन वो उसमें सफल नहीं हो पाए. हालांकि, इस कवायद ने पार्टी में आंतरिक दरार ज़रूर पैदा कर दी थी. तब चुनाव आयोग के निर्देश पर NPF का विशेष सम्मेलन बुलाया गया था, जिसमें तय हुआ कि शूरोजेली पार्टी अध्यक्ष रहेंगे और जीलियांग मुख्यमंत्री रहेंगे.

टीआर जीलियांग
टीआर जीलियांग

फिर जनवरी-फरवरी 2017 में जब निकाय चुनाव को लेकर भसड़ मची, तो शूरोजेली के पास सीएम की कुर्सी हथियाने का दूसरा मौका आया, जिसकी तलाश में वो लंबे समय से थे. सुप्रीम कोर्ट ने तय किया था कि चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलेगा. नागा नेता इस पर सहमत नहीं थे. उनके मुताबिक उनके रहते कोई और उनके बारे में कैसे फैसला कर सकता है. यही सनक तो नागालैंड 1964 से झेल रहा है. 2012 में ही नागालैंड विधानसभा में ये प्रस्ताव पारित हो गया था कि महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया जाएगा. नागा मदर्स असोसिएशन (NMA) इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गया.

शूरोजेली लाइजेत्सु
शूरोजेली लाइजेत्सु

2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागालैंड में निकाय चुनाव 243-T के तहत हो सकता है. ऐसे में सरकार को मजबूरी मे अपना 2012 वाला रेजॉल्यूशन वापस लेना पड़ा. आर्टिकल 243-T साल 1993 में संविधान में जोड़ा गया था. इसके मुताबिक देशभर के निकाय चुनावों में महिलाओं की 33% हिस्सेदारी रहेगी. पूरे देश से उलट नागालैंड में मातृसत्ता वाला समाज है. यहां महिलाओं के खिलाफ अपराध कम हैं और उनकी साक्षरता भी ज़्यादा है. लेकिन चुनाव में उनकी हिस्सेदारी नागा नेताओं के गले नहीं उतरी.

सीएम जीलियांग कह रहे थे महिलाओं को आरक्षण देना परंपरा तोड़ना नहीं है, जिससे चुनाव की राह साफ हो गई थी. लेकिन जीलियांग की ये बात नागा होहो को पसंद नहीं आई. ऐसे में भयंकर हिंसा भी हुई. लोग मरे और आखिरकार चुनाव नहीं हो पाया, क्योंकि 535 कैंडिडेट्स में से 150 ने महिलाओं के आरक्षण के विरोध में दावेदारी वापस ले ली.

ladies

जब नागालैंड के विधायकों को लगा कि वो अपना वोट-बैंक खो देंगे, तो 40 विधायकों ने फरवरी 2017 के दूसरे हफ्ते में NPF अध्यक्ष शुरोजेली को चिट्ठी लिखकर जीलियांग को हटाने की मांग की. आधार ये था कि सीएम जीलियांग हिंसा नहीं रोक पाए. मज़े की बात ये है कि रियो के सांसद बनने के बाद उन्हें पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से बाहर कर दिया गया था और अब विधायक कह रहे थे कि रियो को वापस लेकर जीलियांग को बाहर कर दो.

जीलियांग से इस्तीफा ले लिया गया, लेकिन रियो दिल्ली में ही रहे. आखिरकार 22 फरवरी को शुरोजेली नागालैंड के 11वें सीएम बन गए, जो उनकी बहुत पुरानी तमन्ना थी. जीलियांग कुर्सी से हट गए थे, लेकिन शांत नहीं बैठे थे. जैसे ही उनकी फील्डिंग सेट हुई, 8 जुलाई 2017 को उन्होंने गवर्नर पीबी आचार्य को चिट्ठी लिखकर फ्लोर टेस्ट की मांग की. शुरोजेली भी समझ गए कि आगे क्या होने वाला है. 19 जुलाई को फ्लोर टेस्ट हुआ, जिसमें जीलियांग ‘अपने’ 43 विधायकों के साथ पहुंचे और शुरोजेली फ्लोर टेस्ट में आए ही नहीं. अंतत: जीलियांग पांच महीने के भीतर दोबारा सीएम बन गए.

टी आर ज़ीलियांग (दाएं) को शपथ दिलाते नागालैंड के गवर्नर पीबी आचार्य
टी आर ज़ीलियांग (दाएं) को शपथ दिलाते नागालैंड के गवर्नर पीबी आचार्य

देखने को ये मिला कि जिस विधानसभा में विपक्ष था ही नहीं और जो आदमी 45 विधायकों वाली पार्टी से मुख्यमंत्री था, वो फ्लोर टेस्ट के दौरान इतना लाचार हो गया कि विधानसभा में आया ही नहीं. जीलियांग 43 विधायकों के समर्थन से सीएम बन गए.

2018 के चुनाव में रियो ने खेल कर दिया

NPF ने नेफियो रियो को सस्पेंड करके उन्हें नागालैंड की राजनीति से बाहर कर दिया था, लेकिन उनकी भी वापसी की ज़िद थी. अक्टूबर 2017 में उन्होंने अपने पुराने संगठन डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी का नाम बदलकर नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) कर दिया. ये कवायद 2018 के विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए की गई थी. चिंगवांग कोनयाक को इसका अध्यक्ष बनाया गया.

जनवरी 2018 में नागा होहो, कोर कमिटी ऑफ नागालैंड ट्राइबल होहोज़ एंड सिविल ऑर्गनाइज़ेशन्स (CCNTHCO) और सात अन्य नागा गुटों ने ये मुद्दा उठाया कि सभी पार्टियां चुनाव का बायकॉट करेंगे, जो अगले ही महीने फरवरी में होने जा रहा था. तब तक भी बीजेपी NPF का हिस्सा थी, लेकिन जैसे ही ये क्लियर हुआ कि सभी पार्टियां चुनाव में शामिल होंगी, तो बीजेपी ने NPF से गठबंधन तोड़ा और 3 फरवरी को NDPP के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया. बीजेपी और NDPP के बीच सीटों का बंटवारा भी हुआ. बीजेपी ने 20 और NDPP ने 40 सीटों पर चुनाव लड़ना तय किया.

रियो
रियो

पर बीजेपी पका-पकाया खा रही है

NPF के साथ गठबंधन में रहने की वजह से बीजेपी 2003 से नागालैंड में सत्ता में है. अब 2018 के चुनाव में उसने NDPP से हाथ मिला लिया. चुनावी नतीजों के शुरुआती रुझान में बीजेपी+NDPP का गठबंधन मजबूत स्थिति में दिख रहा था. ऐसे में ये तो साफ है कि सरकार चाहे NDPP गठबंधन बनाए या NPF गठबंधन, बीजेपी दोनों में ही एक्स फैक्टर रहेगी. जबकि इस चुनाव में वो सिर्फ और सिर्फ 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

हिंसा होती रहती है, पर सबसे बड़ा मुद्दा रोड है

ये मुद्दा समझने के लिए पहले एक किस्सा सुनिए. साल 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नागालैंड गए. उन्हें दीमापुर से कोहिमा जाना था, लेकिन उनका हेलिकॉप्टर टेकऑफ नहीं कर पा रहा था. फिर वो दीमापुर से कोहिमा तक रोड से गए और उस रोड को देखकर बोले, ‘अगर ये यहां की सबसे अच्छी रोड है, तो खराब वाली कैसी होंगी.’ अगले ही दिन उन्होंने फोर-लेन रोज बनाने की घोषणा की, जिसका इंतज़ार नागालैंड वाले अब तक कर रहे हैं. खराब सड़कें यहां के लोगों की बड़ी परेशानी हैं.

नागालैंड में अटल बिहारी वाजपेयी
नागालैंड में अटल बिहारी वाजपेयी

दीमापुर से कोहिमा के बीच की दूरी करीब 70 किमी है. नेशनल हाइवे 29 की इस रोड की हालत बहुत खराब है. इसके आसपास जोतोसमा, फेरमा, मेद्ज़ीफेमा जैसे कई गांव हैं, जहां के लोग सिर्फ रोड बनवाने की मांग करते हैं. इस रोड का 15 किसी का हिसस्सा तो बहुत खराब है. लोग बताते हैं कि ऊपर पहाड़ी से ये इलाका हरा और खूबसूरत दिखता है, लेकिन जो सड़क इस इलाके की जान है, वो खराब है. कभी ऐसा नहीं हुआ, जब पूरी की पूरी रोड अच्छी बनी हो. एक तरफ से बनती है, दूसरी तरफ से उखड़ती है और टूरिज़्म से पैसा कमाने वालों के लिए ये बड़ी ससमस्या है. पिछले तीन चुनावों से इस मुद्दे पर वोट बटोरे गए हैं, लेकिन काम नहीं हुआ.


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सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.