पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 16वीं किस्त. इस सीरीज में हमआपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदाहुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंसहै. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. अब तक आप इससीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कैसे राजस्थान का एक बाप बेटी का सौदाकरता था. बुड्ढे खूसट रईस लोगों से.-------------------------------------------------------------------------------- अमरू ने गाडा चलाना एक तरह से छोड़ ही दिया था. पांच हज़ार नकद बहुत बड़ी रकम थीउसके और उसके परिवार के लिए. अब दोनों वक्त घर में चूल्हा जलता था. हालांकि जैनारोज अमरू से काम पर जाने के लिए झगड़ा करती लेकिन अमरू पर कोई असर नहीं होता था. वोतो दिन भर जुआ खेलता और शाम को देसी दारू का एक पव्वा चढ़ाकर खूब हंगामा मचाता. कभीजैना की पिटाई होती तो कभी कालकी की, कभी मुनकी की बारी आ जाती तो कभी नूरकी की.जिसकी भी बारी आती, मार तो उसे पड़ती ही थी लेकिन मुंनकी को जब मार पड़ने लगती तोबहुत ज़्यादा ही शोर शराबा मच जाता था क्योंकि वो चुपचाप मार नहीं खाती थी. रेडियोजुबानी की पहली किस्त वो तो जो चिल्ला चिल्लाकर अपने बाप को गंदी गंदी गालियांनिकालती थी कि पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो जाता था. एक तरफ से हाथों के वार होते थे औरदूसरी तरफ से गालियों के तीर चलते थे. बीच बीच में जैना के अपने पति को गालियांबकने की आवाज़ भी हवा में तैर जाती थी. कुल मिलाकर लगभग रोज ये ड्रामा घंटे डेढ़ घंटेचलता था. उसके बाद जब अमरू वहां इकट्ठे हुए मोहल्ले के लोगों को गालियां देने लगतातो लोग समझ जाते कि बस खेल खत्म हो गया है, फूट लो यहां से. और लोग अपने अपने घर केलिए रवाना हो जाते. अमरू के पीछे वाला घर कालूजी का था जिनकी बीवी बरसों पहलेउन्हें अकेला छोड़ कर अल्लाह मियां के घर चली गयी थी. रेडियो जुबानी 2 कालू जी भीरोज एक पव्वा चढ़ाते थे, बारी बारी से तीन बहुएं थाली में दो रोटियां डालकर रोजपकड़ा देती थीं. वो पव्वा चढ़ाने के बाद रोटी खाते और खूंटी पर टंगी ढोलक उतारकर उसेबजाकर लंबे लंबे आलाप लेकर संगीत सभा शुरू कर देते थे. हालांकि उनकी और मेरीमातृभाषा एक ही थी लेकिन मुझे कभी समझ नहीं आया कि वो क्या गाते थे. न जाने उनकेगाने में कोई माधुर्य था या उनकी ढोलक की आवाज़ में, कि बस अमरू का मूड ठीक हो जाताथा और वो ढोलक की थाप पर थिरक उठता था. लोगों को तो तमाशा देखने से मतलब था, इसीलिएमोहल्ले के लोग उस नाच और गाने को देखने सुनने फिर इकट्ठे हो जाया करते थे. उसज़माने में उन लोगों की पहुँच में न सिनेमा था और न रेडियो, तब ये नाच गाना ही उनकेमनोरंजन के साधन थे. रेडियो जुबानी 3 सारे मोहल्ले की नज़र में इन दिनों अमरू खूबपैसे वाली आसामी बन गया था लेकिन जैना का दिमाग अपनी जगह पर सही सलामत था. वो अब भीदोनों वक्त हमारे घर के बर्तन साफ़ करने आती थी और जब आती थी तो मेरी मां के सामनेअपने दिल का गुबार भी निकालती थी. 'देखो ना काकीजी, ऐ रिपिया कित्ता दिन चालसी ? पणओ बाळनजोगो काम पर जावै ई नईं.' साथ ही कभी कभी जैना खर्च के लिए मिले रुपयों मेंसे कुछ रुपये बचा कर मेरी मां के पास जमा करा देती थी. “ऐ थोड़ा सा रिपिया राखो काकीजी, अडी बगत में काम आसी ई सगला रे” अमरू के पास रुपये तेज़ी से खतम हो रहे थे. इतनेजीवों का पेट भरना, ऊपर से दारू और जुए की लत. जैना अमरू को खूब समझाती कि देखरुपये खतम हो रहे हैं, फिर तो गाडा रोज चलाना ही पड़ेगा. इससे अच्छा है अभी हीचलाना शुरू कर दे ताकि कुछ तो आमद रहे रुपये पैसे की. घर बैठे कोइ भाड़ा आ जाता थातो अमरू जाने भी लगा था गाड़ी लेकर लेकिन बहुत बुरा लगता था उसे मेहनत करना. पिछलेकई महीनों से बड़े आराम से घर में पड़े पड़े रोटी भी मिल रही थी और दारू भी. बहुतगुस्सा आता था उसे गाड़ी लेकर जाने में. गाडे को खींचने में जो पसीना बहाना पड़ताथा, वो उसे झुंझलाहट से भर देता था. वो ये झुंझलाहट निकालता था जैना और बच्चों पर.फिर वही मार पीट और गालियां. रेडियो जुबानी 4 जैना मेरी मां से कहतीं, “काकी जीगालियां सूं तो किसा गूमड़ा हुए पण ओ मरज्याणो जवान होती छोरियां पर हाथ उठावे जदम्हारो काळजो घणो बलै.” मेरे पड़ोस में ज़िंदगी इसी तरह चल रही थी. लगभग 6 महीने गुजरगए थे भंवरी की शादी हुए कि एक दिन शोर मचा, भंवरी आई है भंवरी आई है. जैना भागीहुई आई और मां से कुछ रुपये मांग कर ले गयी. रेडियो जुबानी 5 उस बेचारी को क्या पताथा कि अमरू ने क्या ठानी है, वो तो मां से बोली “ काकी जी जंवाई आयो है सागै, बींरीखातर तो करनी पड़सी.” दामाद की खातिरदारी हुई. दारू, गोश्त से लेकर पान बीडी तक सबकुछ पेश किए गए. अमरू भी दो दिन दामाद के साथ बहुत मीठा मीठा बोलता रहा और उसे खूबखिलाता पिलाता रहा. उसे ज़रा भी अंदाजा नहीं हुआ कि अमरू के दिमाग में क्या चल रहाहै. रेडियो जुबानी 6 चार दिन बाद दामाद बोला “ अब हम लोग चलते हैं. मैं अपनारेवड़(पशुओं का झुण्ड) अपने काके के बेटे के सुपुर्द करके आया था. ज़्यादा दिनरुकेंगे तो वो परेशान हो जाएगा.” अमरू हाथ जोड़कर बोला “ कुछ दिन और रुकता तो आछोलागतो पण खैर, पधारो आप काम तो काम है पण एक अरज है, अगर बुरो नईं मानो तो.” दामादबोला, 'हुकुम करो आप, क्या कहना है ?' अमरू ने हाथ जोड़े हुए ही कहा, 'आप तो पधारोपण म्हारी बेटी नै थोड़ा दिन अठै रैण दो.' उस बेचारे गांव के सीधे सच्चे शफी को कहांपता था कि अमरू के दिल में क्या है? उसने कहा, 'हां हां जरूर रखो आप, जब भेजना होसमाचार करवा देना, मैं आकर ले जाऊंगा.' अमरू बोला, 'बहुत किरपा आप री जंवाई सा.' औरजंवाई सा लौट गए. अमरू ने उस दिन जी भर कर पी और कालू जी की ढोलक की थाप पर जी भरकरनाचा. चार पांच दिन गुजर गए तो भंवरी ने जैना से कहा, मां अब कह्लावो भेज दो थारैजंवाई नै कि आ’र ले जावै म्हने.' रेडियो जुबानी 7 दरअसल चार पांच महीनों में रोजभरपेट खाने की आदत पड़ गयी थी भंवरी को. यहां तो वही कभी दो रोटी मिल जाती थी औरकभी सिर्फ पानी पीकर ही सोना पड़ता था. ऊपर से वहां पति चाहे पचास बरस का था लेकिनबहुत प्यार करता था उसे और यहां हालांकि उसे ज़्यादा कोई कुछ बोलता नहीं था फिर भीकभी कभार अमरू के हाथ की एक आध पड ही जाती थी. जैना ने अमरू को कहा, 'जंवाई नै कहवादो.” अमरू ने कहा, 'हां कहवा दूंगा.” लेकिन उसने कुछ ठान ली थी....... हर बार जबजैना उससे कहती तो उसका यही जवाब होता.उसने न तो दामाद को कुछ कहलवाया और न हीदामाद के आये संदेशों का कोइ जवाब भिजवाया. इसी तरह एक महीना गुजर गया. अमरू के घररोज महाभारत छिड़ता. पूरा मोहल्ला तमाशा देखने इकठ्ठा हो जाता. दरअसल ये शेख गरीबज़रूर थे लेकिन ऐसा कभी किसी घर में नहीं हुआ था कि कोइ अपनी बेटी की शादी करे औरफिर उसे घर बुलाकर अपने घर में ही बिठा ले. एक महीना गुजर गया तो दामाद शफी अपनेकुछ सगे सम्बन्धियों के साथ अमरू के घर आया. खूब झगड़ा फसाद हुआ लेकिन अमरू ने साफ़कह दिया कि वो भंवरी को शफी के साथ नहीं भेजेगा. बहुत बरस नहीं हुए थे बटवारे को.ये बहावलपुरी अनपढ़ थे, गांवों में रहते थे और पशु पालन करते थे. एक एक बहावलपुरी केपास पांच पांच, दस दस हज़ार भेड़, दो दो चार चार हज़ार गाय भैंसे होती थीं जो उस वक्तभी उन्हें हज़ारो की आमदनी करवा देती थी लेकिन ये वो मुसलमान थे जो न जाने किन हालातमें हिन्दुस्तान में रह गए थे और उनके दिमाग में कहीं एक ग्रंथि बैठ गयी थी किउन्होंने गलती की है हिन्दुस्तान में रहकर. हर बहावलपुरी के पास 12 बोर की दुनालीथी लेकिन वो उनसे सिर्फ तीतर या बटेरों का शिकार करता था, उस दुनाली का कहीं औरउपयोग करने की सोच भी नहीं सकता था. रेडियो जुबानी 8 शफी भी उन्हीं बहावलपुरियोंमें से एक था. सीधा सादा इंसान. कई दिन कोशिश करता रहा कि भंवरी उसके साथ चली जाएलेकिन अमरू अड़ गया. उसने भंवरी को नहीं भेजा तो नहीं ही भेजा. भंवरी भी सर फोड़फोड़कर रह गयी. उसे ककराला जाना नसीब नहीं हुआ तो नहीं ही हुआ. उस बेचारी को भीकहां पता था कि उसके भाग्य में विधाता ने क्या लिख दिया है? रेडियो जुबानी किस्त -9कुछ और महीने इसी तरह गुजर गए. कभी कानों में पड़ता कि भाग कर भंवरी अपने ससुराल चलीगई है, कभी ये सुनाई देता कि भंवरी किसी और के साथ भाग गई है, कभी ये सुनने में आताकि भंवरी पाकिस्तान चली गई है. लेकिन हर रोज सुबह उठते तो भंवरी अमरू के उसझोंपड़ीनुमा घर में नज़र आती कभी रोती तो कभी हंसती, कभी झगड़ा करते तो कभी अमरू केहाथ की मार खाते. गर्मियों का मौसम था. छत पर सोया करते थे हम लोग कि एक दिन सुबहसुबह कुछ शोर सुनकर आंख खुली. रेडियो जुबानी किस्त-10 आवाज़ आ रही थी, “हेलो हेलोहेलो..........” मैं एक दम से चौंक कर उठा. ये तो पास ही किसी लाउडस्पीकर से आनेवाली आवाज़ थी. उठकर देखा कि अमरू के घर पर लाउडस्पीकर लग रहे थे. मेरे मन मेंउत्सुकता जागी कि ये रेडियो (लाउडस्पीकर) क्यों लग रहा है ? शायद कालकी की शादी है,लेकिन वो तो बहुत छोटी है, फिर मुझे लगा या तो जैना को बेटा हुआ है या फिर...!रेडियो जुबानी की 11वीं किस्त अरे हां, भंवरी की शादी को 4-6 महीने हो गए, लगता हैउसके बेटा हुआ है. तभी सुना मां पिताजी से कह रही थीं कि भंवरी की शादी हो रही है.मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वास्तव में आखिर क्या हो रहा है. भंवरी की शादी तोहो चुकी, अब फिर से उसकी शादी कैसे हो रही है? उसका तो पति भी ज़िंदा है तो फिर किसीऔर से शादी करने की उसे क्या ज़रूरत पड़ गयी? सवाल मेरे बालमन में उठते रहे लेकिनमैं भी किस से पूछता उनके जवाब? रेडियो जुबानी की 12वीं किस्त लाउडस्पीकर लग गया,बहुत बच्चों ने उस पर अपनी पसंद के गाने बजाये, बहुत बच्चों ने माइक खोलकर हेलोहेलो किया, मगर मैं अपने मालिये में बैठा अपने हैडफोन रेडियो पर न जाने क्या क्यासुनता रहा. रेडियो जुबानी 13 दो तीन दिन बाद सफ़ेद कमीज़ तहमद पहने लोगों का जत्थाअमरू के घर के सामने एक ट्रक में आकर रुका. मैंने देखा एक पूरी बरात आकर रुकी थीवहां. हां वास्तव में एक बारात ही आकर रुकी थी वहां. और एक बार फिर भंवरी का ब्याहएक और बहावलपुरी के साथ हो गया. सुना कि इस बहावलपुरी ने नकद 10 हज़ार रुपये दिए हैंअमरू को. इसका नाम है अल्ताफ. उम्र वही 50 के आस पास. खूब आव भगत हुई. सारा खर्चाअल्ताफ ने उठाया. पूरी बारात थी. सैकड़ों की तादाद में लोग, ढेरों ट्रेक्टर, ढेरोंट्रक और न जाने कितने लोग ऊंटों और घोड़ों पर चढ़े हुए. भंवरी की विदाई हुई. बहुत रोईभंवरी. न जाने वो इस घर से विदाई की रुलाई थी या अपने पहले पति शफी से जुदाई कीरुलाई जिसने उसे बहुत प्यार दिया था. उस बेचारी को पता ही नहीं था शायद कि उसे आगेजाकर न जाने कितनी बार इसी तरह विदा होना पड़ेगा. मैंने अपने घर की छत से देखा,भंवरी रोये चले जा रही थी, अमरू बहुत खुश था और जैना एकदम खामोश. घर के बाकी सब लोगजी भर कर खाने में मस्त थे. पिछले कुछ दिनों से घर में कभी कभार ही रूखी सूखी हीनसीब हो रही थी इन दो तीन दिनों में सबको पेट भर कर खाना मिल रहा था. अचानक अमरू केदिमाग में आया. अरे, क्यों वो गाडा चलाता है, क्यों मजदूरी करता है? भंवरी अगर एकके साथ शादी करके उसे 5 हज़ार दे सकती है. दूसरे के साथ शादी कर के 10 हज़ार दे सकतीहै तो क्या ज़रूरत है कमाने की? मोहल्ले की औरतें मिलकर गा रही थीं, “ कोयलडी सिधचाली. ये गीत ही ऐसा है कि सुनते ही राजस्थान में हर एक की आंखे भर आती हैं, हम लोगभी रो पड़े और भंवरी एक बार फिर अपने बाप के घर से विदा हो गई. और उधर अमरू के दिमागमें उस वक्त न जाने क्या क्या योजनाएं बनने लगीं थीं. रेडियो जुबानी 14