पुनीत शर्मा को आप पहले दी लल्लनटॉप पर पढ़ चुके हैं. आज उन्होंने गोता लगाया है 50के दशक में. तब जब घर से भागे हुए एक लड़के को वो मिल गया जो उसकी घर से भागने कीवजह बना था. पुनीत आज मायानगरी के वासी हैं. उसी सिनेमाई दुनिया के जवां सिपाही.‘औरंगजेब’ और ‘रिवॉल्वर रानी’ के गीत लेखक. आजकल विज्ञापन की दुनिया में सक्रिय.चलते हैं फ्लैशबैक में. 50 का दशक. सिनेमा जवान था. हमेशा की तरह. और आंखों मेंसारी रात जा रही थी.--------------------------------------------------------------------------------तारीख़ से मेरा तअल्लुक़ कड़वा सा ही रहा है. ना मैंने उसे कभी याद रखा, ना उसने मुझे.इन्हीं भूली तारीखों में भटका हुआ मैं, आपको इनसे जुड़े कुछ तज़्किरों से रूबरूकरवाता हूँ. तज़्किरा अरबी में आत्मकथात्मक संस्मरण को कहा जाता है. अब कहने को तोमैं संस्मरण भी कह देता लेकिन मेरा बेचारा कमज़ोर संस्मरण, हिन्दी की किसी ना किसीनुक्ताचीं आँख से कुचला जाता. सो मैंने सोचा संस्कृत को सर पे बिठाने वाले अनपढ़, इसअरबी लफ्ज़ को सीने तक को चढ़ा ही लेंगे. संस्कृत का ख़ौफ़ बड़बड़ा के पंडितों ने सदियोंलूटा, तो मैं अरबी के एक लफ़्ज़ के सहारे चंद दिन कुछ मोहब्बत नहीं लूट सकता? तोपेश-ए-ख़िदमत हैं, झूठी यादों और सच्चे ख्यालों के दो सिरे, "मेरे झूठे तज़्किरे"------------------------------------------------------------------------------------------घर से भागते वक्त ऐसा लगा था जैसे सारे निर्माता फूल लिए हुए दादर स्टेशन पे मेरेचरण पखारने का इंतज़ार कर रहे होंगे. यहाँ आते ही हकीकत समझ आई और हक़ीक़त से लड़ना भीसीख लिया. वैसे मेरे लिए झूठ बोलना, बदबू भरी जगह में साँस लेने की तरह था. मन मुँहतो सिकोड़ता था लेकिन अगर ना लेता तो मर जाता. साँस लेना ऐसी क्रिया है जिसे आप करतेहुए ये याद नहीं रखते की आप उसके लिए कोशिश कर रहे हों. तो कोशिश सिर्फ़ मैं ज़िंदारहने की करता था और उसके लिए मैंने मजदूरी करने और भीख माँगने से लेकर एक दफ़ा जेबकाटने तक का काम कर लिया था.-------------------------------------------------------------------------------- ज़ोर बहुत डालता हूँ दिमाग पर, लेकिन ना तारीख़ याद आती है और ना महीना. रह-रह केकुछ याद आता है तो बॉम्बे में मेरा मुश्किलों भरा दशक - 1950. वो दिन और उस जादुईकिस्से की याद. बहुत उमस भरा दिन था वो. हवा, सड़क के बीचोंबीच बैठी गाय जैसी हो गईथी. चलने का नाम ही नहीं ले रही थी और मैं था कि मेरे पास चलने के सिवाय कोई औरचारा ही नहीं था. जब से फ़िल्म राइटर बनने के लिए बंबई में कदम रखा था, जेबधीरे-धीरे अपना अपना अस्तित्व खोते जा रही थी. जब कभी जेब में हाथ डालता, तो समझनहीं आता कि मेरी जेब छोटी हो रही है या हथेली बड़ी होती जा रही है. बमुश्किल जो इसमरमुई से निकलता उससे कुछ चने ख़रीद लेता, और उन्हें फाँकते हुए इसे फिर से गरम करनेका तरीका खोजने निकल पड़ता. घर था जो मुझे बार-बार बुलाता था और याद दिलाता था किइतनी दूर मैं क्या काम करनेको आया था. मैं फिर से दम भर के लग जाता लेकिन स्टूडियोके दरवाज़े थे, जो कभी मेरे लिए खुलते नहीं थे और मेरा पेट था जो बिना नागा भूख़ काहर्जाना माँगता था. उस दिन शाम के तकरीबन 6 बजे थे. मैं जुहू चौपाटी के सामने पहुँचचुका था. चना जोर गरम की ख़ुश्बू ऐसा नारा लगा रही थी कि पेट को रह-रह के नेहरू कासमाजवाद याद आ रहा था. कोई भला मानस मिले तो कुछ भूख़ मिटे. अब चलना तो मुमकिन नहींथा. मैं जाकर ठंडी सी रेत पर बैठ गया. बैठ गया से मेरा मतलब लेट गया, यानि कि पसरगया या कह लीजिए कि थोड़े वक़्त के लिए मर गया. मरने के बाद सपने में मैंने देखा किहवा ने, हल चलाकर आसमान को बिलकुल सपाट कर दिया है. सितारों के दाने छिड़क दिए गएहैं और बस अभी चारों तरफ़ चाँद की रोटियाँ उग आएंगी. तभी मेरे कूल्हे पर लात पड़ी औरमैं पछाड़ खा कर जागा. मैंने देखा काफ़ी रात हो चुकी थी और एक हवलदार मेरे सर के ऊपरखड़ा था. मैं उसको टकटकी लगाए देखता रहा. हवलदार आँखों को गेट वे ऑफ़ इण्डिया से भीज़्यादा चौड़ी कर के बोला, "क्या!" "क्या हुआ?" मैंने बड़े डरे हुए स्वर में पूछा."दारु पी है?" "नहीं साहब." "झूठ बोलता है?" "साहब रोटी के लिए पैसा नहीं है, दारुके लिए कहाँ से आएगा? यकीन नहीं आए तो सूंघ के देख लो." मैं अब तक अपनी जगह पर हीपड़ा हुआ था. "तो क्यूँ पड़ा था यहाँ पर?" "बैठे-बैठे नींद लग गई तो सो गया" "येचौपाटी तेरे बाप की है, जो बीचोबीच टाँग फैला के सो रहा है?" हवलदार इतनी ऊँची आवाज़में बोला कि मेरे जैसे बेइज़्ज़त आदमी को भी इज़्ज़त की फ़िक्र होने लगी. मेरे तो होंठही ना खुले, खड़ा हुआ, बदन झाड़ा और वहाँ से निकलने लगा. तभी पीछे से एक आवाज़ आई."रुको!" मुड़ के देखा तो एक दुबला पतला सा, गहरे साँवले रंग का आदमी, हाथ में गोल्डफ्लेक का डब्बा लिए सिगरेट फूँकते हुए मेरी तरफ़ आ रहा था. उसके साथ एक गोल मटोल साजवान लड़का भी था. आदमी मेरे पास आया और आते ही मेरे कंधे पे हाथ रख के हवलदार सेबोला "किसके बाप की है ये चौपाटी?" हवलदार को इस सवाल की उम्मीद नहीं थी. उसे लगासामने खड़ा ये कमज़ोर सा आदमी कोई तो है। फिर भी ठसक के उसने जवाब दिया। "सरकार कीहै." "सरकार किसकी माई-बाप है?" आदमी ने पूछा "जनता की." हकलाते हुए हवलदार बोला."ये आदमी क्या तुम्हे कहीं का राजा लग रहा है?" हवलदार चुप. "अपने माई-बाप की ज़मीनपे नहीं सोएगा, तो क्या सोवियत रूस जाएगा समाजवाद की तलाश में?" "भाषण तो ऐसे देरहे हो जैसे पंडित नेहरू हो." "नहीं - नहीं! बन्दा तो दो टके का लेख़क है." "अच्छा!बेरोज़गार-बेरोज़गार मौसेरे भाई." "आपको पता है आप किस से बात कर रहे हैं?" गोल मटोलसे चेहरे वाला लड़का तैश में बोला "कौन है ये?" "ज़रुरत ना पड़े तो कोई नहीं." आदमीबुदबुदाया. "शैलेन्द्र दा! आप क्यूँ इसके मुँह लग रहे हैं?" लड़का धीमे से बोला."कौन? शैलेन्द्र? गीत...गीतकार शैलेन्द्र?" हवलदार अटक-अटक के बोला. "जी हाँ." लड़काठसक से बोला. "अरे! बहुत बड़ी ग़लती हो गई हजूर." हवलदार गिड़गिड़ाया. "हजूर कह के गालीमत दो भाई, गले लग के इस भले आदमी से माफ़ी माँग लो." शैलेन्द्र सिगरेट का कश लेताहुआ तंज़ में बोले. मैं बातचीत की शुरुआत से लेकर अब तक सन्न था. सबकुछ किसी किस्सेकी तरह मेरे सामने घट रहा था. हवलदार मेरे गले लगा और शैलेन्द्र से हाथ मिला केजाने लगा. तभी उसे कुछ सूझा और अपनी जेब से एक रुपए का नोट निकाल के उसने उस परशैलेन्द्र से दस्तख़त करने की दरख़्वास्त की. नोट अपने हाथ में लेकर शैलेन्द्र ने उसेघूर के देखा. "इसकी क़ीमत जानते हो?" शैलेन्द्र कुछ रूखेपन से बोले. "जी!" हवलदार कोलगा, उससे फिर कोई ग़लती हो गई है. "मेरे दस्तख़त के बाद ये महज़ एक काग़ज़ का टुकड़ा रहजाएगा." रूखापन ज़रा गर्म हो चुका था. "क्या बात कर रहें हैं आप? इसकी कीमत बढ़ जाएगीअगर आप इस पर दस्तख़त कर दें." हवालदार मुस्कुराया जैसे उसने कोई सही बात कह दी हो."इसे किसी ज़रूरतमंद को दे दीजिएगा. मैं आपके लिए इस कागज़ को ज़ाया कर देता हूँ."शैलेन्द्र ने अपनी डायरी के एक कागज़ पर एक ख़ूबसूरत दस्तख़त किया और हवलदार को नोट केसाथ दे दिया. हवलदार मुस्कुराते हुए, बिना कुछ बोले वहाँ से चल दिया. मैं अभी भीवहीं का वहीं आधा जागा, आधा सोया खड़ा था. शैलेन्द्र मेरी तरफ़ मुड़े. "क्या करते हो?"बड़े ही शांत स्वर में पूछा उन्होंने. "कुछ नहीं." हारी सी मुस्कराहट में मैंने जवाबदिया. "मतलब देश का बहुमत हो." लड़का मुस्कुराकर बोला. "जी? जी!" "कुछ खाया है सुबहसे." शैलेन्द्र ने मेरा हाल भाँपकर कहा. मैं कुछ बोल नहीं पाया. "शर्माओं मत. येशहर शर्माने वालों को सबसे पहले मारता है." शैलेन्द्र ने जैसे मुझसे कहते हुए ख़ुदसे ये बात कही थी. "दादा! आप कम शर्मीले हैं?" लड़का मुस्कुराकर बोला. "बीमारी कोईफ़क्र करने की चीज़ तो नहीं है ना!" शैलेन्द्र तंज़ के साथ बोले, फिर सिगरेट फेंकीं औरमेरी तरफ देखकर कहा, "कहीं जाना नहीं हो तो हमारे साथ आओ, लौटते वक़्त कहीं कुछ खाकरही विदा लेंगे." "जी! मैं आपको परेशान नहीं करना चाहता." मैं इजाज़त लेने के अंदाज़बोलते हुए निकलने लगा. "इसीलिए कह रहा हूँ साथ आओ, वरना ना जाने कितने दिन ख्यालोंमें आकर परेशान करते रहोगे." थोड़ी ऊँची और हक़ भरी आवाज़ में उन्होंने कहा और ये कहतेही शैलेन्द्र मेरी चुप्पी को हामी मानकर लड़के के साथ आगे बढ़ गए. मैं चुपचाप उनकेपीछे-पीछे चल दिया. शैलेन्द्र ने आगे जाकर बैठने की एक उम्दा जगह चुनी. आसपास डंडोंपर जाल पड़े हुए थे और एक उल्टी नाव के नीचे कोई मुझसा दिखने वाला शख़्स सो रहा था.लहरें उस महान आदमी के पैर छू-छूकर वापस लौट रहीं थी. पानी के अलावा कोई दूसरी आवाज़वहाँ मौजूद नहीं थी. हम तीनों चुपचाप ना जाने किस के इंतज़ार में बैठे थे. तभी लड़काबड़ी मजबूरी भरी आवाज़ में बोला "दादा. बाबा मेरा पीछा नहीं छोड़ने वाले और मैं आपका.लिख भी डालिए." "तुम्हें क्या लग रहा है कि मैं काम टाल रहा हूँ?" तंज़ भरी आवाज़ मेंशैलेन्द्र ने कहा. "जी नहीं!" लड़के ने सकपका के जवाब दिया. मुझे शैलेन्द्र का जवाबदेने का लहज़ा ठीक नहीं लगा. अब भाई! मुझे ये नहीं पता कि उनका मसला किस तरह का थालेकिन इतने बड़े लोगों का फ़र्ज़ बनता है कि जो उनसे कमज़ोर हो उनसे कुछ ध्यान रख केनरमी से पेश आएँ. "क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात." आप सोचने लगे ना कि जिसभले आदमी ने मेरा इतना साथ दिया, मैं उसकी ही नुक्ताचीनी करने पे उतर आया. तो देवीजी या श्रीमान, आप जो भी हैं मुझे माफ़ कीजिएगा मैं तो ऐसा ही हूँ. मैं तो हर काम केआधार पर अपना या किसी दूसरे का आंकलन करता हूँ. कोई भी मेरे लिए इतना पवित्र नहींहै कि मैं उस पर उँगली ही ना उठा पाऊँ. ख़ैर! आपको समझाते हुए मैं अपने झूठे तज़किरेसे भटक रहा हूँ. झूठ और सच में यही अंतर है कि झूठ बहुत लम्बे समय तक याद नहीं रहताऔर उसकी तफ़सीली में बहुत अंतर आ जाता है. हाँ! तो मैं कहाँ था? हमारे इधर उधर,डंडों पे बंधी रस्सियों पे मछली पकड़ने के जाल पड़े हुए थे और वहाँ से कुछ दूरी पर एकउल्टी पड़ी नाव के पास एक चना जोर गरम वाला सो रहा था. लहरें उसके पैर छू-छूकर वापसलौट रहीं थी, मानो उसकी दिन भर की थकान को पाँव दबाकर दूर करना चाहती हों. पानी केअलावा कोई दूसरी आवाज़ वहाँ मौजूद नहीं थी. शैलेन्द्र सिगरेट पे सिगरेट फूँके जा रहेथे. लड़का रेत पर कुछ उकेर रहा था और सिलसिलेवार ढंग से शैलेंद्र की सिगरेटों केटूटने का इंतज़ार कर रहा था. शैलेंद्र साहब अपनी ही धुन में थे और लग रहा था, आज कीरात वो ऐसे ही गुज़ारने वाले थे. तभी लड़के ने हिम्मत की और भारी आवाज़ में बोला,"दादा. आपको तो पता है कि जब तक आप मुझे लिखकर नहीं देंगे, मुझे बाबा के इस काम सेऔर आपको मुझसे मुक्ति नहीं मिलने वाली. लिख भी डालिए ना दादा." "एक बात बताओ!तुम्हें क्या लग रहा है कि मैं ये काम टाल रहा हूँ?" तंज़ भरी आवाज़ में शैलेन्द्र नेकहा. "जी नहीं!" लड़के ने सकपका के जवाब दिया. "बात ये है पंचम कि...एक ख़्याल है. जोज़बान पे आ आकर लौट रहा है." "क्या ख़्याल है?" उम्मीद भरी आवाज़ में लड़के ने पूछा.जिसे अभी-अभी पंचम जैसा अजीबो-गरीब नाम मिला था. "बड़ा बकवास ख़्याल है." शैलेन्द्रने मुस्कुराते हुए कहा. पंचम, मेरे और शैलेन्द्र के साथ हँस दिया. "आपके दिमाग़ मेंकैसे कोई बकवास ख़्याल आ सकता है?" मैंने हिम्मत कर के ज़बान खोली. शैलेन्द्रमुस्कुराए, जेब से सिगरेट का डब्बा निकाला और मुँह में सिगरेट रखी. फिर कुछ सोचकरउसे उँगलियों पर संभाला और कहा "क्यूँ? आप मुझे इंसान नहीं समझते?" और ये कहते हुएमाचिस की तीली डब्बी पर मारी और ताज़ा लपट से सिगरेट का सिरा सुलगा लिया. "समंदर सेकभी नकली मोती निकला करते हैं" मैंने जैसे किसी हक़ से कहा. "क्या काम आता है जो अबतक नहीं मिला?" शैलेन्द्र ने जैसे कुछ भाँपते हुए पूछा. "फ़िल्मों में लिखने आया था"ना जाने कितनी हिम्मत लेकर कहा था मैंने. "क्या लिखने?" "गीत" "मेरी रोटी मारने?"मैं हिचकिचाया "नहीं मेरा मतलब..." "फिर शरमाए! सटायर था. समझते हो?" "जी" मैंनेजवाब दिया "कल ही निकोलाई गोगोल का नाटक गवर्मेंट इंस्पेक्टर पढ़ के ख़त्म किया है""शाबास! तुम तो बेरोज़गार के साथ समझदार भी मालूम होते हो।" मैं फ़क्र मेंमुस्कुराया. "ख़ुश होने की बात नहीं है, बड़ा घातक मिश्रण है. सेहत और जेब दोनों केलिए हानिकारक." मेरी कॉटन कलफ़ वाली कड़क मुस्कान, जार्जेट की तरह लटक गई. "अरे!सटायर था." वो मुस्कुराए और धुँआ छोड़ के आसमान को देखने लगे "तुमने सुना पंचम,ख्रुश्चेव ने क्या कहा?" "नहीं दादा." "कहता है, दुनियाभर के नेता एक जैसे होतेहैं, वो पुल बनाने का वादा करते हैं, चाहे वहाँ नदीं हो या ना हो." हम सब हँसे."आपको पता है बाबा ने क्या कहा?" लड़का तंज़ पर ज़ोर देते हुए बोला "क्या कहा?""शैलेन्द्र घमंडी हो गया है." "तुम्हारे बाबा से बड़ा घमंडी है कोई इस शहर में?उन्हें लगता है कि वो कुछ भी धुन बनाएंगे और मैं उसमे अपने शब्द ठूंस दूँगा. वोगीतकार को कुछ समझते ही नहीं है. मुझसे ज़्यादा दिन ये सब नहीं हो पाएगा." मुझे इसजवाब की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी. पंचम भी रुआंसा सा हो गया था. उसे भी शायद अंदाज़ानहीं था कि शैलेंद्र ऐसा जवाब देंगे. मुझे ये तो नहीं पता था कि पंचम के बाबा कौनथे लेकिन समझ आ गया था कि वो कोई संगीतकार थे और उम्र में बड़े भी. मेरा मन कह रहाथा कि चुप बैठ लेकिन पता नहीं मुझमे कहाँ से इतनी हिम्मत आई कि मैंने कह दिया"शैलेन्द्र साहब! क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इस दुनिया में सबको ही अपना घमंड कमलगता है?" मैंने हिम्मत कर के पूछा. "आपको ऐसा नहीं लगता कि इस देश में सबको सलाहदेने की बहुत बुरी आदत है." मैं भी सकपका के चुप रह गया. "माफ़ कीजिएगा. आज मूड कुछठीक नहीं है. पहले उस हवलदार की क्लास ले ली, फिर पंचम की और अब तुम्हारी." बड़ेशांती भरे स्वर में शैलेन्द्र ने कहा. "जी कोई बात नहीं." "जानते हो ये लड़का कौनहै?" शैलेन्द्र ने पंचम को देखते हुए मुझसे पूछा मैंने अंदाज़ा लगाने की कोशिश कीलेकिन फिर हारकर कहा "नहीं" "लोगों के लिए तो सिर्फ़ बर्मन दा का बेटा है" मैंने बातकाटी "आरडी बर्मन" उन्होंने मुझे बीच में काटा "हाँ! लेकिन मेरे लिए ये आने वालेवक्त का संगीतकार है. जिसका अपना नाम होगा. राहुल देव बर्मन." "क्या दादा. बाबा कोतो लगता ही नहीं कि मैं अभी तैयार हूँ." लड़का मुरझाए स्वर में बोला. "उन्हें तोमेरे लिखने पर भी शक होता है।" मुस्कुराते हुए बोले शैलेन्द्र "तभी तुम्हे भेज रहेहैं." "दादा उन्हें आपकी लिखाई पर शक नहीं, विजय आनंद की फ़िल्म की तारीख ख़त्म होनेका डर है. अभी ये एक ही गाना बचा है और उसके लिखे जाने तक मैं आपको नहीं छोड़ूँगा."शैलेन्द्र ने पंचम को देखा और फिर आसमान को ताकने लगे. हमारे बीच फिर वही सन्नाटापसरा था. मैं समंदर, चाँद, पंचम और रह रहकर शैलेन्द्र को देख रहा था. शैलेन्द्र कीआँखों को देखकर मैं बाकी सब चीज़ें उनमे देख सकता था. कितना कुछ था उन आँखों में.थके हुए योद्धा के जीवन के अंतिम पल तक लड़ने के साहस का नमक था उन आँखों में."होंगे राजे-राजकुँवर हम बिगड़े दिल शहज़ादे." मैं गुनगुनाया. "हम सिंघासन बैठे जब-जबकिए इरादे." पंचम मेरे पीछे-पीछे बुदबुदाया. "कैसे लिख लेते हैं आप इतना सरल औरइतना जादुई?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा. "ठीकठाक लिख लेता हूँ." "जी? ठीकठाक?""ठीकठाक भी नहीं?" "आप जादूगर हैं." मैंने बिना सोचे दिल से कहा. "जादूगर तो झूठ कोसच दिखाता है." "नहीं! मेरा वो मतलब नहीं था. आप का लिखा सुनकर लगता है जैसे हमनेअपनी ही बात किसी और के मुँह से सुनी हो." "अच्छा बोल लेते हो. लिखते कैसा हो?""ठीक-ठाक." "संगीतकारों को भी यही कहते हो? तभी शायद काम नहीं मिला." शैलेन्द्रहँसते हुए बोले. "जी. उनसे तो कभी मिलना हुआ नहीं." "ये बैठा है ना तुम्हारे सामनेएक. सुनाओ इसे कुछ." "अभी?" "नहीं तो फिर कब?" पंचम मेरे मज़े लेने के स्वर मेंबोला. "बुरा ना मानें तो दो पंक्तियाँ सुनाता हूँ." शैलेन्द्र कुछ समझे नहीं. "बुरामानने वाली क्या बात है इसमें?" "दरअसल, मैं आपको बहुत मानता हूँ. आपको पढ़-सुनकर हीगीतकार बनने का ख़्याल मन में उपजा था." शैलेन्द्र नर्म सी आँखों से शर्माते हुएनीचे देखने लगे. "आप की ही तर्ज़ पर दो पंक्तियाँ लिखी है. आप इजाज़त दें तो सुनाऊँ."शायद किसी और मौके पर वो सुनना टाल जाते लेकिन मेरा हौसला बढ़ाने के लिए उन्होंनेशर्म भरी मुस्कान समेटते हुए मुझे इशारे में इजाज़त दी. मैंने हिम्मत बाँधते हुएकहा, "इश्क़ के हिस्से ज़मीं थी इतनी, कोई ना पाए नाप." "इश्क़ के हिस्से ज़मीं थीइतनी, कोई ना पाए नाप." पंचम ने बँगाली लहज़े में दोहराया "इश्क़ के हिस्से ज़मीं थीइतनी कोई ना पाए नाप, लिखा-पढ़ी में लुट गया लेकिन इश्क़ अंगूठाछाप." "अच्छा है."पंचम ने कहा शैलेन्द्र चुप रहे. फिर बोले "बढ़िया लिखते हो, कल मेरे घर अपनी बाकीकविताओं और गीतों के साथ आओ. वहाँ से तुम्हे किसी निर्माता के पास ले चलूँगा." मैंसकपका गया. एक गीतकार दूसरे गीतकार को कैसे मौका दे सकता है? वो भी अपने हीनिर्माताओं के साथ काम करने का मौका देना. मैं वहाँ होता तो शायद मैं भी ऐसा ना करपाता. "अरे चिंता मत करो. मैंने अपने घर से अलग एक जगह ली है अपने लिखने के लिए. जबभी लिखने का मन हो वहाँ चले जाता हूँ. वहाँ मेरे कुछ दोस्त भी ठहरे हुए हैं, तुम भीआ जाओगे तो मुझ पर कोई आसमान नहीं टूटेगा." मैं अभी भी तैयार नहीं हो पा रहा था.मैं जैसे कि कह चुका हूँ कि मैं कोई संत नहीं था लेकिन पिछले आधे-एक घंटे से मुझमेना जाने कैसे इतनी अच्छाइयाँ जाग उठी थी. मुझ जैसे बेघर-बेरोज़गार को घर और रोज़गारएक साथ मिल रहा था और मैं सोच रहा था? मैं आपको तो क्या ख़ुद को भी इस बात का जवाबनहीं दे पा रहा था. "सोचो मत, सोचने की सारी ज़िम्मेदारी आज मेरे पास है. ये मेरानहीं, सचिन दा का आदेश है. राजा साहेब का. तुम्हें पता है कि सचिन दा, त्रिपुरा कीसल्तनत के वारिस हैं?" "क्या बात कर रहे हैं?" मैंने आश्चर्य से पूछा. "हाँ! वोचाहते तो राजा हो सकते थे लेकिन सब छोड़ के उन्होंने संगीत चुना." "क्यूँ?" "क्यूँ?सही नहीं किया? राजा होते तो लोग उनका भय के कारण सम्मान कर रहे होते. संगीतकार बनेतो लोग आज उन्हें दिल से मोहब्बत करते हैं."--------------------------------------------------------------------------------"सच कह रहे हैं आप. हम सब ज़िंदगीभर अपने जीवन के मतलब को खोजने के लिए ही भटकतेरहते हैं. सम्राट अशोक भी शान्ति की तलाश में बौद्ध भिक्षु बना. शायद उसे उससे भीज़्यादा शान्ति जूते सिलने में मिलती लेकिन हम बहुत डरपोक लोग हैं. अगर भौतिकवाद कीऊँचाई से डर जाएँ तो सीधे धर्म की शरण लेते हैं. इसी दुनिया की किसी सच्चाई मेंअपने जीवन का मतलब ढूँढ़ना एक थका देने वाली प्रक्रिया लगती है हमको."-------------------------------------------------------------------------------- "हाँ शायद! अब ये भी तो बात है ना कि जब इतने सारे रास्ते हों कि सब एक दूसरे मेंमिल जाएँ तो वो मैदान से लगने लगते हैं. और आदमी किस रास्ते जाए उसे समझ नहीं आता.जैसे खाली रेगिस्तान में कोई बच्चा रास्ता भूल जाए या जैसे इस खुले आसमान में येचाँद. ऐसा लग रहा है कि जैसे कि भटक गया हो." ये कहकर शैलेन्द्र एक बार फिर ख़ामोशीमें डूब गए. बड़ी देर तक चाँद को तकते रहे. फिर कुछ सोचने लगे और माचिस का डब्बापंचम के हाथ में थमा दिया. ना पंचम कुछ समझा ना मैं. "इस पर गाने की धुन बजाओ."पंचम ने सुना और आँखों में किसी उम्मीद की चमक लेकर, माचिस पर ताल बजाकर गाने लगा.शैलेन्द्र ने डायरी निकाली और फिर आसमान को देखने लगे. आसमान बिलकुल ख़ाली था. बादलका एक कतरा भी नहीं था. सिर्फ़ एक पूरा चाँद था. शैलेन्द्र ने धुन बजाते हुए पंचम कोइशारा किया, पंचम रुक गया. शैलेन्द्र ने कहा "आसमान खुला है, चाँद बिल्कुल ही खोगया है... हम्म्म." और शैलेन्द्र की कलम कागज़ पर थिरकने लगी. "गाओ पंचम, खोया-खोयाचाँद खुला आसमान" फिर शैलेन्द्र ने पंचम को शरारत से मुस्कुराते हुए देखा और आगेलिखते हुए बोले "आँखों में सारी रात जाएगी, तुमको भी कैसे नींद आएगी." पंचम गानेलगे और शैलन्द्र की कलम अंतरे की तरफ़ दौड़ने लगी. मेरे देखते-देखते शैलेन्द्र ने,अपनी डायरी में चार अंतरे लिख डाले. मैंने उस रात वहाँ बैठे हुए, उन जादुई अल्फ़ाज़ोंको अपनी आँखों से शैलेन्द्र की डायरी में उतरते हुए देखा. गीत ख़त्म होने के बाद, हमवहाँ से चले. शैलेन्द्र ने अपना पता देते हुए, कल मिलने के वादे के साथ, मुझसे गलेमिलकर और फिर हाथ मिलाकर विदा ली. पंचम भी गले मिलकर गए लेकिन उन्होंने देखा नहींकि कब शैलेन्द्र ने हाथ मिलाते-मिलाते मेरे हाथों में रूपए थमा दिए. जाते-जातेशैलेन्द्र पीछे मुड़कर बोले "तुम्हारी पंक्तियाँ बढ़िया थी, बस उसमे 'लेकिन' की जगह'साला' लगा दो, मज़ा दूना हो जाएगा." मैं बड़बड़ाया, "इश्क़ के हिस्से ज़मीं थी इतनी कोईना पाए नाप, लिखा पढ़ी में लुट गया साला इश्क़ अंगूठाछाप." "वाह" मैंने अपनी हीपंक्तियों को आश्चर्य में पढ़ा. शैलेन्द्र और पंचम वहाँ से निकल गए. अगली सुबह मैंनेशैलेन्द्र के दिए रुपयों से, बड़े दिनों बाद पेटभर के और मनभर के खाना खाया. फिरबाकी बचे पैसों से ट्रेन टिकट कटाकर ये सोचते हुए घर लौट आया, कि इस जनम में तो मैंइसके आसपास का भी गीत नहीं लिख सकता. जब तक शैलेन्द्र है, मैं गीतकार बनने की ज़हमतनहीं उठा सकता. शायद अगले जनम में ये कोशिश की जा सकती है. सच मानिए इसमेंशैलेन्द्र के उधार का रत्तीभर बोझ नहीं था. ये जादू था उन बोलों का खोया-खोया चाँदखुला आसमान आँखों में सारी रात जाएगी, तुमको भी कैसे नींद आएंगी, ओ हो ...खोया-खोया चांद ... मस्ती भरी, हवा जो चली खिल-खिल गई, ये दिल की कली मन की गली मेंहै खलबली कि उनको तो बुलाओ, ओ हो ... खोया-खोया चांद ... तारे चले, नज़ारे चलेसंग-संग मेरे वो सारे चले चारों तरफ़ इशारे चले किसी के तो हो जाओ, ओ हो ...खोया-खोया चांद ... ऐसी ही रात, भीगी सी रात हाथों में हाथ, होते वो साथ कह लेतेउनसे दिल की ये बात अब तो ना सताओ, ओ हो ... खोया-खोया चांद ... हम मिट चले, जिनकेलिये बिन कुछ कहे, वो चुप-चुप रहे कोई ज़रा ये उनसे कहे न ऐसे आजमाओ, ओ हो ...खोया-खोया चांद ...और जैसा मैंने कहा है की तारीख़ों से मेरा तअल्लुक़ कड़वा सा ही रहा है, ना मैंनेउन्हें कभी याद रखा, ना उन्होंने मुझे.