वो ब्राह्मण परिवार की औरत जो मुग़ल बादशाहों को राखी बांधती थी
खून से सनी हुई आलमगीर की लाश को गोद में लिए रामकुमारी रात भर रोती रही थी.
Advertisement

आलमगीर द्वितीय महज नाम के सम्राट थे. सारी ताकत उनके वज़ीर गाज़ी-उद-दीन-इमाद-उल-मुल्क के होथों में हुआ करती थी.
Quick AI Highlights
Click here to view more
18वीं सदी में मुगल साम्राज्य को चलाने-संभालने का काम मजबूत मंत्रियों के हाथों में हुआ करता था. वो ऐसे राजाओं को गद्दी पर बिठाते थे जो उनके काम में ज्यादा खलल न डाले और उनकी उपयोगिता खत्म होते ही उन्हें हटा देते थे.
औरंगज़ेब (1659-1707) के बाद सम्राट बने उनके बेटे शाह आलम (1702-1712) जिन्हें बाद में बहादुर शाह कहा गया. उनके बाद मुगल गद्दी पर बैठने वाले सम्राटों की अवधि कुछ महीनों से ज्यादा लंबी नहीं चल सकी. साल 1754 में औरंगज़ेब के परपोते, मोहम्मद अज़ीज-उद-दौला 18वें मुगल सम्राट बने. अज़ीज को शाही महल में रहने वाले ढेर सारे राजकुमारों में से चुना गया था. इमाद-उल-मुल्क ने उन्हें आलमगीर द्वितीय के नाम से सम्राट घोषित किया.

आलमगीर और अन्य मुगल शासको को भारतीय लोग पसंद करते थे.
आलमगीर द्वितीय महज नाम के सम्राट थे. सारी ताकत उनके वज़ीर गाज़ी-उद-दीन-इमाद-उल-मुल्क के होथों में हुआ करती थी. अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण और लूट-खसोट के कारण मुगल सम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होने लग गया. हर तरफ अराजकता का माहौल फ़ैल गया था. दूसरी तरफ इमाद को शक था कि उनका सम्राट अहमद शाह अब्दाली के साथ टच में है और ये सब बिना उसकी जानकारी के हो रहा है. इसके बाद से इमाद, आलमगीर से छुटकारा पाने का तरीका ढूंढ़ने लगा.

अफगानी शासक अहमद शाह अब्दाली वही शासक है जिसने 1761 में हुई पानीपत की लड़ाई जीती थी.
सम्राट को महल के अंदर निपटाने का साहस उसके अंदर नहीं था. इसलिए वो आलमगीर को महल के बाहर भेजने की जुगत में लग गया. आलमगीर बहुत धार्मिक आदमी था. उसकी सूफी फकीरों में बड़ी आस्था थी. जब भी वो सुनता कि दिल्ली में कोई फकीर आया हुआ है, वो उसे अपने महल में आमंत्रित करता और अगर फकीर आने से मना कर देता तो खुद उनसे मिलने जाया करता था. इमाद ने उसके इसी आदत का फायदा उठाने की ठान ली.
उसने दिल्ली में एक पहुंचे हुए फकीर के आने की अफवाह फैला दी. साथ ही उसने ये भी कहा कि वो फिरोज़ शाह कोटला में ठहरेंगे और किसी से मिलने कहीं नहीं जाएंगे. वज़ीर एकदम अपने नाम के मुताबिक काम कर रहा था. खेल रच रहा था और खेल बदलने की कूव्वत भी उसके अंदर थी. उसने ये खबर राजा का कानों तक बड़ी चालाकी से पहुंचवा दी. अब आलमगीर फकीर से मिलने के लिए बेताब हुआ जा रहा था. एक रात उसने कहा 'मैं खुद उस फकीर से मिलने जाऊंगा'.
जब आलमगीर फकीर से मिलने कोटला पहुंचा तो वज़ीर ने उससे कहा 'जहांपनाह, आपको इतने लोगों के साथ देखकर फकीर नाराज हो सकते हैं. आपको अकेले ही अंदर जाना चाहिए.'

आज का फिरोज़ शाह कोटला मस्जिद.
बादशाह ने एक किन्नर को मस्जिद के गेट पर इंतजार करने को कहा. बाकी सभी को बाहर जाने का आदेश दे दिया. और खुद अंदर चले गए. जैसे ही आलमगीर ने किले के अंदर कदम रखा, वज़ीर के आदमियों ने उसपर हमला कर उसका कत्ल कर दिया. और लाश को यमुना में फेंक दिया. इतने में वज़ीर मस्जिद से बाहर आया और कहा 'मुझे बादशाह ने उनके ख्वाबगाह से कुछ कागज लाने को कहा है. तुम सब यहीं रहो मैं वो कागज लेकर आता हूं'. उसके बाद वो वहां से गायब हो गया.
इस सब के बीच एक ब्राह्मण महिला जिसका नाम राम कुमारी बताया जाता है, गुज़र रही थी. वो तड़के सुबह यमुना की पूजा करने जा रही थी, जो ठीक कोटला के नीचे से बहती थी. उनकी नज़र यमुना में तैरती कटी-फटी लाश पर पड़ी. उसने देखते ही पहचान लिया कि ये बादशाह की लाश है. मुगल शासकों को हमेशा से ही जनता का प्यार और सम्मान मिलता था. वो फटाक से बादशाह के डेड बॉडी के पास पहुंची और उनका सर अपनी गोद में रखकर सुबह तक रोती रही. सुबह होते ही कई और लोग वहां इकट्ठा हो गए.

मुगलों के दौर में लोग जिस यमुना की पूजा करते थे वो अब ऐसी दिखती है.
घंटो बीत गए लेकिन न बादशाह और न ही वज़ीर बाहर आए. इससे शाही रक्षक चिंतित हो मस्जिद के अंदर गए. वहां उन्हें राजा और फकीर में से कोई नज़र नहीं आया. वो बेतहाशा होकर आसपास बादशाह को ढूंढ़ने लगे. उन्हें राजा की लाश वहीं मस्जिद के बाहर पड़ी मिली जिसके पास ब्राह्मण महिला बैठी थी. आलमगीर की लाश को वहां से लाया गया और पारंपरिक शाही स्नान के बाद हुमायूं के मकबरे मे दफन कर दिया गया.
आलमगीर की जगह सम्राट बने शाह आलम द्वितीय ने राम कुमारी को बुलावाया और उन्हें उनकी बहन घोषित कर दिया. उन्हें ढेर सारे ईनाम भी दिए गए. उसके बाद से हर साल 'सलोना' (उस समय मे रक्षाबंधन का नाम) के दिन वो आतीं और बादशाह की कलाई पर असली मोतियों की राखी बांधती थीं. राखी के साथ वो कई सारी मिठाइयां भी लातीं. बदले में बादशाह भी उसे बहुत सारे कपड़े और सोने के सिक्कों से नवाजते थे. समय के साथ ये एक तरह की परंपरा में तब्दील हो गई.
ये चीज़ तब तक चलती रही जब तक आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को लाल किले से निर्वासित नहीं कर दिया गया. राम कुमारी के बाद उनके परिवार की अन्य महिलाओं ने इस परंपरा को बनाए रखा. वो आतीं और शाही खानदान के राजाओं और राजकुमारों की कलाइयों पर राखी बांधती.

आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर.
नोट: आलमगीर द्वितीय का राज्यकाल और उनकी मृत्यु, बादशाह की हत्या में इमाद-उल-मुल्क को अच्छे तरीके से लिखा गया है. मैंने ये किस्सा 1885 में मुगल दरबारी रहे मुंशी फैज़ुद्दीन की लिखी 'बज़्म-ए-आखिर' से लिया है. फ़ैज़ुद्दीन ने 'किला-ए-मोहल्ला' या लाल किले में काफी समय बिताया है, क्योंकि वो बहादुर शाह ज़फर के ससुर मिर्ज़ा इलाही बख्श के मुलाज़िम हुआ करते थे. इस कहानी का ज़िक्र मिर्ज़ा फ़र्हतुल्लाह बेग की 19वीं किताब 'फूल वालों की सैर' में भी आता है.
वीडियो देखें:
ये भी पढ़ें:
औरंगज़ेब (1659-1707) के बाद सम्राट बने उनके बेटे शाह आलम (1702-1712) जिन्हें बाद में बहादुर शाह कहा गया. उनके बाद मुगल गद्दी पर बैठने वाले सम्राटों की अवधि कुछ महीनों से ज्यादा लंबी नहीं चल सकी. साल 1754 में औरंगज़ेब के परपोते, मोहम्मद अज़ीज-उद-दौला 18वें मुगल सम्राट बने. अज़ीज को शाही महल में रहने वाले ढेर सारे राजकुमारों में से चुना गया था. इमाद-उल-मुल्क ने उन्हें आलमगीर द्वितीय के नाम से सम्राट घोषित किया.

आलमगीर और अन्य मुगल शासको को भारतीय लोग पसंद करते थे.
आलमगीर द्वितीय महज नाम के सम्राट थे. सारी ताकत उनके वज़ीर गाज़ी-उद-दीन-इमाद-उल-मुल्क के होथों में हुआ करती थी. अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण और लूट-खसोट के कारण मुगल सम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होने लग गया. हर तरफ अराजकता का माहौल फ़ैल गया था. दूसरी तरफ इमाद को शक था कि उनका सम्राट अहमद शाह अब्दाली के साथ टच में है और ये सब बिना उसकी जानकारी के हो रहा है. इसके बाद से इमाद, आलमगीर से छुटकारा पाने का तरीका ढूंढ़ने लगा.

अफगानी शासक अहमद शाह अब्दाली वही शासक है जिसने 1761 में हुई पानीपत की लड़ाई जीती थी.
सम्राट को महल के अंदर निपटाने का साहस उसके अंदर नहीं था. इसलिए वो आलमगीर को महल के बाहर भेजने की जुगत में लग गया. आलमगीर बहुत धार्मिक आदमी था. उसकी सूफी फकीरों में बड़ी आस्था थी. जब भी वो सुनता कि दिल्ली में कोई फकीर आया हुआ है, वो उसे अपने महल में आमंत्रित करता और अगर फकीर आने से मना कर देता तो खुद उनसे मिलने जाया करता था. इमाद ने उसके इसी आदत का फायदा उठाने की ठान ली.
उसने दिल्ली में एक पहुंचे हुए फकीर के आने की अफवाह फैला दी. साथ ही उसने ये भी कहा कि वो फिरोज़ शाह कोटला में ठहरेंगे और किसी से मिलने कहीं नहीं जाएंगे. वज़ीर एकदम अपने नाम के मुताबिक काम कर रहा था. खेल रच रहा था और खेल बदलने की कूव्वत भी उसके अंदर थी. उसने ये खबर राजा का कानों तक बड़ी चालाकी से पहुंचवा दी. अब आलमगीर फकीर से मिलने के लिए बेताब हुआ जा रहा था. एक रात उसने कहा 'मैं खुद उस फकीर से मिलने जाऊंगा'.
जब आलमगीर फकीर से मिलने कोटला पहुंचा तो वज़ीर ने उससे कहा 'जहांपनाह, आपको इतने लोगों के साथ देखकर फकीर नाराज हो सकते हैं. आपको अकेले ही अंदर जाना चाहिए.'

आज का फिरोज़ शाह कोटला मस्जिद.
बादशाह ने एक किन्नर को मस्जिद के गेट पर इंतजार करने को कहा. बाकी सभी को बाहर जाने का आदेश दे दिया. और खुद अंदर चले गए. जैसे ही आलमगीर ने किले के अंदर कदम रखा, वज़ीर के आदमियों ने उसपर हमला कर उसका कत्ल कर दिया. और लाश को यमुना में फेंक दिया. इतने में वज़ीर मस्जिद से बाहर आया और कहा 'मुझे बादशाह ने उनके ख्वाबगाह से कुछ कागज लाने को कहा है. तुम सब यहीं रहो मैं वो कागज लेकर आता हूं'. उसके बाद वो वहां से गायब हो गया.
इस सब के बीच एक ब्राह्मण महिला जिसका नाम राम कुमारी बताया जाता है, गुज़र रही थी. वो तड़के सुबह यमुना की पूजा करने जा रही थी, जो ठीक कोटला के नीचे से बहती थी. उनकी नज़र यमुना में तैरती कटी-फटी लाश पर पड़ी. उसने देखते ही पहचान लिया कि ये बादशाह की लाश है. मुगल शासकों को हमेशा से ही जनता का प्यार और सम्मान मिलता था. वो फटाक से बादशाह के डेड बॉडी के पास पहुंची और उनका सर अपनी गोद में रखकर सुबह तक रोती रही. सुबह होते ही कई और लोग वहां इकट्ठा हो गए.

मुगलों के दौर में लोग जिस यमुना की पूजा करते थे वो अब ऐसी दिखती है.
घंटो बीत गए लेकिन न बादशाह और न ही वज़ीर बाहर आए. इससे शाही रक्षक चिंतित हो मस्जिद के अंदर गए. वहां उन्हें राजा और फकीर में से कोई नज़र नहीं आया. वो बेतहाशा होकर आसपास बादशाह को ढूंढ़ने लगे. उन्हें राजा की लाश वहीं मस्जिद के बाहर पड़ी मिली जिसके पास ब्राह्मण महिला बैठी थी. आलमगीर की लाश को वहां से लाया गया और पारंपरिक शाही स्नान के बाद हुमायूं के मकबरे मे दफन कर दिया गया.
आलमगीर की जगह सम्राट बने शाह आलम द्वितीय ने राम कुमारी को बुलावाया और उन्हें उनकी बहन घोषित कर दिया. उन्हें ढेर सारे ईनाम भी दिए गए. उसके बाद से हर साल 'सलोना' (उस समय मे रक्षाबंधन का नाम) के दिन वो आतीं और बादशाह की कलाई पर असली मोतियों की राखी बांधती थीं. राखी के साथ वो कई सारी मिठाइयां भी लातीं. बदले में बादशाह भी उसे बहुत सारे कपड़े और सोने के सिक्कों से नवाजते थे. समय के साथ ये एक तरह की परंपरा में तब्दील हो गई.
ये चीज़ तब तक चलती रही जब तक आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को लाल किले से निर्वासित नहीं कर दिया गया. राम कुमारी के बाद उनके परिवार की अन्य महिलाओं ने इस परंपरा को बनाए रखा. वो आतीं और शाही खानदान के राजाओं और राजकुमारों की कलाइयों पर राखी बांधती.

आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर.
नोट: आलमगीर द्वितीय का राज्यकाल और उनकी मृत्यु, बादशाह की हत्या में इमाद-उल-मुल्क को अच्छे तरीके से लिखा गया है. मैंने ये किस्सा 1885 में मुगल दरबारी रहे मुंशी फैज़ुद्दीन की लिखी 'बज़्म-ए-आखिर' से लिया है. फ़ैज़ुद्दीन ने 'किला-ए-मोहल्ला' या लाल किले में काफी समय बिताया है, क्योंकि वो बहादुर शाह ज़फर के ससुर मिर्ज़ा इलाही बख्श के मुलाज़िम हुआ करते थे. इस कहानी का ज़िक्र मिर्ज़ा फ़र्हतुल्लाह बेग की 19वीं किताब 'फूल वालों की सैर' में भी आता है.
वीडियो देखें:
ये भी पढ़ें:
एक लीटर पानी के लिए कोहली जितना खर्च करते हैं, उतने में 8 लीटर पेट्रोल आ जाए
नेहरा जी की विदाई पर इससे बेहतरीन चीज आपने नहीं देखी-पढ़ी होगी
जब फेडरर ने पहली बार विंबलडन ट्रॉफी उठाई थी, तब दुनिया ऐसी दिखती थी
और हमें अब भी ये अहसास नहीं हो रहा कि युवराज सिंह बुड्ढा हो गया है

.webp?width=60)
