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जब फेडरर ने पहली बार विंबलडन ट्रॉफी उठाई थी, तब दुनिया ऐसी दिखती थी

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मुझे याद नहीं है कि मैंने पहली बार उसे खेलते कब देखा था. वैसे ही जैसे मुझे याद नहीं कि मैंने माही को पहली बार खेलते कब देखा था. कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे मैं आज भी नहीं बता पाता कि मैंने लियोनॉर्डो डिकेप्रियो को पहली बार कब देखा था. ‘इनसेप्शन’ थी… या शायद ‘टाइटैनिक’. पहली मुलाकातें मुझे कम याद रहती हैं. उत्तरार्ध की तस्वीरें मैं देर तक बचाए रख पाता हूं. उसके साथ भी मेरा रिश्ता ऐसे ही बना है. हां, मुझे ये जरूर याद है कि अब से 14 साल पहले 2003 में जब उसने पहली बार विंबलडन ट्रॉफी उठाई थी, तब मैं चौथी क्लास में बैठा कागज पर मोमबत्ती बनाने से जूझ रहा था. और 16 जुलाई, 2017 को जब उसने आठवीं बार विंबलडन ट्रॉफी उठाई, तब भी मैं कागज से ही जूझ रहा था. मोमबत्ती हो या शब्द, प्रक्रिया उतनी ही जटिल है. जीत के ऐसे मौकों पर वो अक्सर रो देता है. पर इससे पहले कि उसके आंसू उसके होंठों को चूमें; खुशी, विस्मय, कहीं पहुंचने का बोध और कुछ देर ठहरने का लालच उसके होंठों पर जगह बना लेते हैं. इन्हीं के बीच एक हिस्से में पूर्णता की भूख भी बैठी होती है, जिसे हम ऊपर से नहीं देख पाते.

2003 में विंबलडन जीतने के बाद रोजर फेडरर
2003 में विंबलडन जीतने के बाद रोजर फेडरर

विंबलडन के रास्ते मैं 14 साल पुरानी उन तस्वीरों में पहुंचा, जब वो लंबे बाल रखता था. अभी की तरह काले नहीं, कुछ भूरे से, जो मैच खत्म होने के बाद भी करीने से बंधे हुए थे. उसे पेशेवर टेनिस खिलाड़ी बने पांच साल हो चुके थे और ये जीत 78×27 फीट के हरे मैदान पर उसकी लेगेसी का एक पड़ाव थी. लेगेसी, विंबलडन जूनियर जीतने के बाद विंबलडन जीतने की. अब तक सिर्फ पांच खिलाड़ी ऐसा कर पाए हैं, जिनमें फेडरर पांचवें हैं.

विंबलडन जूनियर जीतने के बाद फेडरर
विंबलडन जूनियर जीतने के बाद फेडरर

उसके मुस्काते चेहरे को देखकर लगता है, जैसे वो स्वर्ग से निष्कासित कोई देवता हो. मैदान पर सब वैसा ही हो रहा है, जैसा उसने सोच रखा था. उसके चेहरे के भाव किसी अभिनेता के लिए सीख हो सकते हैं कि खुद को खपाते हुए आपमें क्या बदलता है. उसे देखकर लगता है जैसे मैदान पर सिर्फ उसका शरीर खेल रहा है. खुद तो वो मैदान के किसी कोने में खड़ा सब देख रहा होगा. दूर से, चीजें होते हुए, किसी चश्मदीद गवाह की तरह. पर जीत के कुछ पलों बाद वो रो देता है और साबित कर देता है कि वो इंसान ही है.

2003 की विंबलडन चैंपियनशिप. 23 जून से 6 जुलाई तक. ये उस साल का तीसरा ग्रैंड स्लैम था और 117वां विंबलडन. ‘ऑल इंग्लैंड लॉन टेनिस ऐंड क्रॉकेट क्लब’ में. उस साल इंग्लैंड में शायद सभी अपने-अपने काम में मसरूफ थे. मैदान पर खिलाड़ी अपना खेल खेल रहे थे. ब्रिटिश सैनिक इराक में सद्दाम हुसैन की हुकूमत को उखाड़ने में लगे थे. और प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर 29 अप्रैल को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक टेबल पर बैठे अपना मजाक उड़वा रहे थे, क्योंकि उनकी और अमेरिकी सेना मिलकर भी इराक में नरसंहार के हथियार नहीं ढूंढ पाई थी.

पुतिन और ब्लेयर
पुतिन और ब्लेयर

अमेरिका तब जॉर्ज डब्ल्यू बुश के हाथ में था. या शायद जेब में. बुश, जो हर काम अपने तरीके से करने के हिमायती थे. उनकी थ्योरी थी, ‘अगर आप मेरे साथ नहीं हैं, तो आप मेरे खिलाफ हैं.’ अफसोस, उनकी थ्योरी का दायरा सीमित है. खेल के मैदान से तो इसकी सीमा बहुत पहले ही खत्म हो जाती है. खेल के मैदान के अलावा बुश ये थ्योरी जहां भी लागू कर सकते थे, उन्होंने की. संयुक्त राष्ट्र को धता बताते हुए इराक में सेना उतार दी. जून-जुलाई के बीच सद्दाम हुसैन का तख्ता-पलट कर दिया. सऊदी अरब से सैनिक हटाए, तो कतर में तैनात कर दिए. परसाई लिख गए हैं, ‘सभ्यता का दावा करने वाले देश बम बरसाते हैं और लोगों को लगता है कि सभ्यता बरस रही है.’

सद्दाम हुसैन
सद्दाम हुसैन

पर अमेरिका ने उस साल एक बेशकीमती चीज खोई भी. 1 फरवरी को अमेरिकी स्पेस शटल ‘कोलंबिया’ क्रैश हो गया, जिसमें सात ऐस्ट्रोनॉट्स की मौत हो गई थी. इनमें से एक कल्पना चावला भी थीं. हरियाणा के करनाल में पैदा हुईं कल्पना. अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला, कल्पना. हमारा उनसे शायद इतना ही नाता रहा. इससे ज्यादा नाता हम बना भी नहीं सकते, क्योंकि हमारी समस्याओं की सूची बड़ी बेतरतीब होती है. उसी साल भारत का एक राज्य गुजरात आर्थिक तंगी से जूझ रहा था और राज्य सरकार ने कई विकास योजनाओं से 1600 करोड़ रुपए का बजट काट दिया था. गुजरात में नमक हमेशा प्रासंगिक रहेगा, पर 2003 में नमक उत्पादक और इसके ट्रांसपोर्टर्स आपस में ऐसे भिड़े कि पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी. तब के गुजरात के मुखिया आज देश के प्रधानसेवक हैं. नमक वाली इस घटना से कुछ वक्त पहले ही उन्हें राजधर्म का पालन करने की समझाइश दी गई थी, जिस पर वो गुलगुला हो गए थे. आज ऐसी सलाहों पर वो भावुक हो जाते हैं.

नरेंद्र मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी
नरेंद्र मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी

जिस शख्स ने ‘राजधर्म’ उवाचा था, उसने भी उस साल कुछ ऐतिहासिक किया था. सीमा पर पाक की ओर से लगातार गोलीबारी हो रही थी. उसे समझाना तब भी आज जितना ही जटिल था. तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाक के सामने शांति प्रस्ताव रखा था, जिसे पाक ने स्वीकार कर लिया था. ये अटल के लिए उपलब्धि थी. ऐसी कई उपलब्धियों के बूते वो चौथी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के ख्वाब देख रहे थे.

18 अप्रैल को वो श्रीनगर गए, जो वहां उनका पहला दौरा था. 31 मई को वो सेंट पीट्सबर्ग के 300वें स्थापना दिवस पर पुतिन और बुश के साथ टेबल शेयर कर रहे थे. ये भारत के लिए बड़ा मौका था. विंबलडन शुरू होने के पिछले दिन 22 जून को अटल चीन में थे. हालांकि, वहां उनके और चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन के बीच टेनिस नहीं हुआ. दोनों खिलाड़ियों ने गेंद एक-दूसरे की तरफ उछालने के बजाय अपनी-अपनी गेंद अपने पास रख लीं. भारत ने मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है और चीन ने मान लिया कि सिक्किम भारत का हिस्सा है.

अटल बिहारी वाजपेयी और जियांग जेमिन
अटल बिहारी वाजपेयी और जियांग जेमिन

लेकिन हर मुकाबला ऐसा नहीं होता. कम से कम 23 मार्च को ऐसा नहीं हुआ था. जोहांसबर्ग में इंडिया और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के बीच ऐसा नहीं हुआ था. क्रिकेट वर्ल्ड कप के फाइनल में भारत 125 रनों से हार गया था. इसका जिक्र छिड़ेगा, तो कई और चेहरे याद आएंगे. वो चेहरे, जिनके साथ पहली मुलाकात मुझे याद नहीं है. मुझे नहीं पता कि 24 मार्च की सुबह अखबारों का स्पोर्ट्स पेज देखकर कितने लोग रोए होंगे. पर मैंने ये हमेशा जानना चाहा कि 7 जुलाई की सुबह जब अखबारों में 21 साल का एक लड़का विंबलडन ट्रॉफी उठाए छपा था, तो कितने लोग खुश हुए होंगे.

पवेलियन लौटते सचिन और विजेता ट्रॉफी के साथ ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग
पवेलियन लौटते सचिन और विजेता ट्रॉफी के साथ ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग

वो बड़ा साल था. पूरे साल दुनियाभर के देशों में आतंकी हमले होते रहे. 12 मई को सऊदी अरब की राजधानी रियाद में एक कार ब्लास्ट में 35 लोगों की मौत हो गई थी. 5 अगस्त को इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता के JW मैरिअट होटल के गेट पर ब्लास्ट किया गया, जिसमें 12 लोग मर गए और करीब 150 घायल हो गए. पर सब कुछ बुरा ही नहीं था. 2003 में हम होमोसेपियंस की जिजीविषा के गवाह बने, जब क्लाइम्बिंग करते हुए पत्थरों के बीच फंस गए ऐरन राल्सटन ने अपनी बांह काट ली थी. उनकी बांह पत्थरों में फंस गई थी और 127 घंटे के बाद उन्होंने ये फैसला किया था. ये अब तक की सबसे ताकतवर मिसाल है. उधर बेल्जियम ने सेम सेक्स मैरिज को मान्यता दी थी. 2003 में. 14 साल पहले. ऐसा करने वाला वो तब दूसरा देश था. कई आज भी इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं.

राल्सटन
राल्सटन

पर हमारे इस हीरो ने कई बार हिम्मत जुटाई है. चोटों के बावजूद बार-बार मैदान पर लौटने की हिम्मत. अंदर तक तोड़ देने वाली हार के बाद जीतने की हिम्मत. खेल से दूर होने और सही समय पर लौटने की हिम्मत… दो दशक से ज्यादा खेलने के बाद भी सर्वश्रेष्ठ बने रहने की हिम्मत. वो अपनी काया से खेल बदलता रहा, पर खुद नहीं बदला. इसी साल ऑस्ट्रेलियन ओपेन के फाइनल में वो ऐसे खेला, जैसे राफेल नडाल की जगह हिमालय भी होता, तो हार जाता. विंबलडन 2017 के फाइनल में हमने जिसे देखा, वो शायद वही 21 साल पहले वाला हीरो था. उसे देखकर लगा कि 20 साल और खेलने पर भी वो खेल को खेल बनाए रखेगा. क्लास, पेशेंस, परफेक्शन…

रोजर फेडरर के विंबलडन जीतने के आठ मौके
रोजर फेडरर के विंबलडन जीतने के आठ मौके

हम इतने सालों तक उसके हर फैसले के साथ खड़े रहे. आज भी हम उसके फैसले के साथ खड़े रहेंगे. शुक्रिया रोजर फेडरर. तुम महान हो.


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