1हम तीन दोस्त- दो लड़कियां और एक लड़का ऑटोरिक्शा लेते हैं. लड़के को बीच में उतरनाहै. ऑटो वाले से 150 रुपये तय होते हैं. लड़का थोड़ी दूरी पर उतर जाता है. उसके अगलेसिग्नल पर ऑटो वाला कहता है, हमें उतरना होगा. क्योंकि ऑटो खराब हो गया है. हमनेआधा रास्ता भी तय नहीं किया है. रात का समय है. हम कहते हैं हमें दूसरा ऑटो अरेंजकरके दो. ऑटो वाला मना कर देता है. अगला ऑटो 100 रुपये और मांगता है. वो सफ़र जो हम150 में तय करने वाले थे, हमारे लिए 220 का बन जाता है. हम खीझते हैं, ऑटो वाले सेलड़ते हैं. वो लड़ने को तैयार है. हम उसे 70 रुपये थमाकर पुलिस वाले से शिकायत करनेकी धमकी देते हैं. धमकी सुनते ही वो कहता है, 'रुकिए, शायद ऑटो स्टार्ट हो रहा है'.अचानक ऑटो स्टार्ट हो जाता है. लेकिन उसके पहले ऑटो वाला अपनी पूरी जान लगा देताहै, हमसे एक्स्ट्रा पैसे निकलवाने के लिए. मैं रोज ऑटो लेकर ऑफिस से घर आती हूं.मुझे शाम को अकेला देख ऑटो वाला 70 मांगता है. साथ खड़े उसके सभी साथी भी 70 पर अड़जाते हैं. कोई लड़का कलीग साथ में हो तो 50 में चले जाते हैं.-------------------------------------------------------------------------------- 2मैं कनॉट प्लेस पर सबवे से सड़क पार कर रही हूं. एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने आताहै. सबवे में चल रहे पुरुष उसे झिड़क देते हैं. भिखारी मेरे पास आता है. मैं तय करतीहूं कि बिना उसकी ओर देखे चुपचाप आगे बढ़ती चली जाऊंगी. भिखारी मेरे पीछे-पीछे आताहै. लेकिन उसने किसी लड़के का पीछा नहीं किया था. मैं उसे झिड़कने के लिए उसकी ओरदेखती हूं. वो इस तरीके से मुस्कुराता है, जैसे उसे मेरी डांट से कोई फर्क ही नहींपड़ता. फिर वो अपनी जीभ से अपने ऊपर वाला होंठ चाट मुझे इशारा करता है. सबवे ख़त्म होगया है. मैंने ऊपर आने के लिए एस्केलेटर ले लिया है.--------------------------------------------------------------------------------3हम तीन लड़कियां ऑटो में हैं. लगभग 10 साल का एक लड़का सिग्नल पर फूल बेच रहा है.मैंने शॉर्ट्स पहने हैं. बच्चा ऑटो के पास आता है. कहता है 'दीदी फूल ले लो'. मैंउसकी ओर ध्यान न देने का अभिनय करती हूं. वो मेरी जांघों पर हाथ रखकर कहता है,'दीदी ले लो ना'. मैं जब तक कुछ समझकर अपने गुस्से को किसी तरह की प्रतिक्रिया मेंबदलती, ऑटो स्टार्ट होता है. बच्चा भाग जाता है.--------------------------------------------------------------------------------4दिल्ली का पानी पीने लायक नहीं है. RO पानी की बोतलें ऑर्डर कर मंगवानी पड़ती हैं.लड़के बोतलें लेकर आते हैं, 30 रुपये लेकर पानी के डिस्पेंसर पर फिट कर जाते हैं. दोलड़के पानी लेकर आते हैं. पानी लगा कर तेजी से भागते हैं. मैं देखती हूं पानी कीबोतल में सजावट वाला 'हैप्पी बर्थडे' बैनर तैर रहा है. पानी में सुनहरे रंग कीकिरकिरी भी तैर रही है. मैं पानी वाले को रोककर पानी बदलने को कहती हूं. वोमुस्कुरा कर कहता है, 'अरे कुछ नहीं होता, पी लो ना. ये गंदा नहीं है'. मुझे औरमेरी रूममेट को विश्वास नहीं होता कि कोई पीने के पानी से इस तरह का मजाक कैसे करसकता है. जब हम उससे लड़ते हैं तो कहता है, 'अच्छा ठीक है पानी बदल दूंगा. लेकिनअगली बोतल कल मिलेगी'. मैं कहती हूं घर में पीने का पानी ख़त्म है. वो कहता है, 'तोयही पानी रख लो. वरना कल तक इंतजार करो.'--------------------------------------------------------------------------------5मैं दुकान में सामान लेने जाती हूं. मैंने टैंक टॉप के ऊपर बटन खोलकर शर्ट डाल रखीहै. दुकान वाला मेरी आंखों में देख बात नहीं करता, वो लगातार मेरे सीने को ओर घूरतारहता है. वो सामान लेने घूमता है. मैं चेक करती हूं कि मेरा क्लीवेज तो नहीं दिखरहा है. नहीं, मैंने 'ठीक' तरीके से कपड़े पहने हैं. वो फिर भी मेरे स्तनों से हीबात करता है.--------------------------------------------------------------------------------ऑटो वाले, दुकान वाले, पानी वाले, भिखारी. ये सब वो लोग हैं, जो हमें रोज़ मिलतेहैं. इनसे हमारा रिश्ता पर्सनल नहीं, पैसों का है. जब हम इनसे मिलते हैं, हम एकअर्थव्यवस्था के दो यूनिट होते हैं. जो हमारे बीच होता है, वो एक 'ट्रांसैक्शन'होता है. और हम उम्मीद करते हैं, कि इसे एक ट्रांसैक्शन ही होना चाहिए. जब ये दोपुरुषों के बीच होता है, ये महज एक ट्रांसैक्शन ही होता है. लेकिन जब इनमें एक तरफऔरत आ जाती है, तो ये हैरेसमेंट में बदल जाता है. ऐसा हर बार नहीं होता. शायद 10में से 1 बार ही होता हो. लेकिन ऐसा होने का स्कोप हमेशा बना रहता है. औरत संभोग केलिए है, और ये फैक्ट अर्थव्यवस्था में बदलता नहीं देखा जाता. हम कह सकते हैं कि हमउन दिनों के बाहर आ गए हैं, जब अर्थव्यवस्था को केवल पुरुष चलाते थे. लड़कियांऑफिसों में काम करती हैं. मेरे ऑफिस में भी सैकड़ों लड़कियां हैं. लेकिन ऑफिस में कामकरने वाली लड़कियों को जब प्रमोशन मिलता है, या उनके काम की तारीफ़ होती है, लोग कहतेहैं कि लड़की है इसलिए हो गया. कॉलेजों में प्लेसमेंट होते हैं. जब उनमें लड़कियों कोचुन लिया जाता है, लड़के कहते हैं कि लड़की थी, इसलिए हो गया. औरतों की किताबें छपतीहैं, तो लोग कहते हैं, 'इसकी कविताएं तो कुछ ख़ास नहीं, लेकिन लड़की सुंदर है'. एकट्रांसैक्शन में, या चैरिटी में, हमेशा उसका पलड़ा भारी होता है, जिसे पैसे देनेहोते हैं. भीख मांगने का मतलब ही यही होता है कि आप किसी और से मेहरबानी चाहते हैं.लेकिन जब भिखारी देखता है सामने एक पुरुष नहीं, औरत है, उसकी आर्थिक असमर्थता गौणहो जाती है, और पौरुष हावी हो जाता है. तब वो एक भिखारी नहीं, एक पुरुष होता है. जबपानी वाला, या ऑटो वाला या एक औरत से अपनी सेवा के बदले पैसे ले रहा होता है, वो येमानकर चलता है कि सामने वाली पार्टी के पास दिमाग नहीं है. दिमाग हो भी तो, उसकेपास विरोध करने के लिए आवाज नहीं है. जब वक़्त रात का हो, उन्हें मालूम होता है किसामने वाली औरत अपने आप में काफी नहीं, इसे एक पुरुष पर निर्भर होना है. और अगर वोपुरुष ऑटो वाला है, तो वो मनचाहे दाम ले सकता है. इसमें एक सवाल छुपा होता है- आपक्या चुनना चाहती हैं, अपनी सेफ्टी, या पैसों की बचत? ज्यादा पैसे देकर मैं हर बारअपनी सेफ्टी चुन लेती हूं. और एक बार फिर सामने वाले की आर्थिक असमर्थता उसके पुरुषहोने के पीछे छिप जाती है.ये सच है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर औरतें ज्यादा असुरक्षित हैं. उन्हें पब्लिकट्रांसपोर्ट लेकर पुरुषों के बीच धक्का-मुक्की सहते हुए जाना पड़ता है. लेकिन वोलड़कियां जो कैब लेना अफोर्ड कर सकती हैं, या पर्सनल ऑटो बुक कर सकती हैं, वो क्यासेफ हैं? एक अकेली समर्थ औरत भी घर में प्लम्बर, कारपेंटर या पानी वाले को बुलानेके पहले सौ बार सोचती है. औरतें अर्थव्यवस्था का हिस्सा होते हुए भी, अर्थव्यस्थाका वो यूनिट नहीं होतीं जो पैसे देने वाली पार्टी में आकर सक्षम और सेफ महसूस करसकें. वो पैसे देने वाली पार्टी होकर भी महज शरीर बनकर रह जाती हैं.