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लश्कर के हेडक्वार्टर मरकज की पोल खुली, पाकिस्तान ने इंटरनेशनल मीडिया को मुर्गा खिलाकर झूठ परोसा

Lashkar Headquarters Markaz e Taiba Explained: साल 2008 में जब पाकिस्तान की थू-थू हुई. पोल खुल गई कि उनकी सरकार ‘मरकज-ए-तैयबा’ कॉम्प्लेक्स में आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है. इसके बाद उसने एक नाटक रचा.

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Marqz Subhan Allah
'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद आई 'मरकज सुभान अल्लाह' की तस्वीरें. (तस्वीर: इंडिया टुडे/AP)
14 मई 2025 (अपडेटेड: 19 मई 2025, 12:31 PM IST)
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नवंबर 2012. भारत-पाकिस्तान बॉर्डर से 30 किमी दूर एक कस्बा, मुरीदके. कस्बे का ‘मरकज-ए-तैयबा’ या 'मरकज सुभान अल्लाह' (Markaz Subhan Allah) कॉम्प्लेक्स. इस कॉम्पलेक्स की मस्जिद में हजारों लोग इकट्ठा हो रहे थे. यहां 'गायबाना नमाज-ए-जनाजा' होना था. मसलन ऐसी नमाज जो किसी मुस्लिम शख्स की मौत पर पढ़ी जाती है, जब उसका शव वहां मौजूद न हो.

इस बार ये नमाज पढ़ी जा रही थी 26/11  हमले के आरोपी अजमल कसाब के लिए. जिसे भारत में फांसी दे दी गई थी.  इस नमाज के दौरान हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद कसाब को “हीरो” बताते हुए कह रहा था, “कसाब की शहादत बाकी युवाओं को आगे प्रेरित करती रहेगी.”

अजमल कसाब के लिए पढ़ी गई नमाज को पाकिस्तान के उर्दू मीडिया ने खुलकर छापा. पाकिस्तान की ही मीडिया ने उनकी पोल खोल दी. खबर जब इंटरनेशनल लेवल पर पहुंची तो सरकार बगलें झांकने लगी. ये कहते हुए कि नमाज अजमल कसाब के लिए नहीं बल्कि बर्मा में मारे गए मुसलमानों के लिए पढ़ी गई थी. दरअसल उस साल बर्मा के रखाइन प्रांत में बौद्धों और मुसलमानों के बीच हिंसक झड़प हुई थी.  खैर, पाकिस्तान के लिए ये कोई नई बात नहीं है. 

ये ‘मरकज-ए-तैयबा’ आतंकवादी संगठन ‘लश्कर-ए-तैयबा’ का हेडक्वार्टर है. 7 से 8 मई की दरमियानी रात को भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत इस आतंकी ठिकाने को धवस्त कर दिया. 

लेकिन अभी थोड़ा पीछे जाते हुए, बात करेंगे साल 2008 की. जब इस आतंकी ठिकाने में इंटरनेशनल मीडिया को बुलाया गया. उन्हें चिकन खिलाया गया और उनके सामने झूठ परोसा गया. 

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इंटरनेशनल मीडिया में पाकिस्तान की फजीहत

ये उसी ‘लश्कर- ए- तैय्यबा’ का हेडक्वार्टर है, जिसने 2008 के 26/11 मुंबई हमले की जिम्मेदारी ली थी. एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब खूब थू-थू हुई, तो ‘जमात-उद-दावा’ ने खुद को पाक साफ दिखाने के लिए एक तरकीब अपनाई. ‘जमात-उद-दावा’ ‘लश्कर-ए-तैयबा’ का ही एक ऑर्गनाइजेशन है, जो ऊपर से खुद को पढ़ाई-लिखाई कराने वाला चैरिटेबल ट्रस्ट बताता है. 

तरकीब ये थी कि दुनियाभर के मीडिया को मुरीदके बुलाया जाए. ‘मरकज-ए-तैयबा’ में उनका स्वागत किया जाए. कैंपस का टूर कराया जाए.  ताकि ये साबित किया जा सके कि वो चैरिटी का काम कर रहे हैं. ये दावा किया जाए कि आतंकवाद तो ‘दूर की कौड़ी’ है, वो तो वहां “शिक्षा के फूल” खिला रहे हैं. 

दुनियाभर के मीडिया हाउसेज से पत्रकार यहां टूर पर पहुंचते हैं. The Times,  BBC, National Post, Associated Press, The Guardian और Reuters. ऐसे तमाम प्रेस इंस्टीट्यूशन का जमावड़ा लगा. मुरीदके में इस विजिट के बाद दुनियाभर के अखबारों ने अपनी अपनी राय छापी.

मरकज-ए-तैयबा पर विदेशी अखबारों ने क्या लिखा?

ब्रिटिश अखबार The Times ने  लिखा,

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BBC ने अपने आर्टिकल में लिखा,

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सच्चाई कुछ और निकली?

रिपोर्टिंग का लंबा तजुर्बा रखने वाले कई वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि किसी कार्यक्रम की सच्चाई उसके आयोजन के पहले और बाद पता चलती है. उस आयोजन के दौरान आयोजनकर्ता हावी होते हैं. मसलन कि वो वही दिखाने की कोशिश करते हैं जो वो दिखाना चाहते हैं. इसलिए सलाह दी जाती है कि आयोजन के पहले ग्राउंड पर पहुंचा जाना चाहिए और उसके खत्म होने के बाद तक वहां रूकना चाहिए. 

इंटरनेशन मीडिया के लिए इस आयोजन से पहले वहां पहुंचना मुश्किल था. क्योंकि ये दो देशों के बीच का मामला था. लेकिन आयोजन के दौरान और उसके बाद भी खोजबीन की संभावना थी. इस दौरान ‘जमात-उद-दावा’ जो दिखाना चाहता था, उससे इतर भी देखा जा सकता था. The Guardian ने ऐसा करने का प्रयास किया. मीडिया संस्थान ने अपने आर्टिकल में लिखा,

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The Associated Press लिखता है कि विजिट के दौरान उनकी टीम ने कुछ अलग देखा. उन्होंने एक स्टूडेंट से बात की जिसने बताया,

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जिहाद का मतलब क्या पढ़ाया जाता है?

ये पाकिस्तान की थिंकटैंक ‘Institute of Strategic Studies Islamabad’ को खुद वहां का विदेश मंत्रालय फंड करता है. इसके एक रिसर्च पेपर में मरकज में पढ़ाई जाने वाली किताब का जिक्र है. उस किताब में ‘जिहाद’ को समझाया गया है. इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत और इजरायल को दुश्मन के रूप में देखा जाता है. इसकी वजहें भी बताई गई हैं. इसका मतलब इस तरह बताया गया है- बुराई को खत्म करना, इस्लाम में धर्मांतरण को आसान बनाना, मुसलमानों के खून का बदला लेना और गैर-मुस्लिमों से मुस्लिम इलाकों  को मुक्त कराना.

“पाकिस्तान के कॉरपोरेट में भी हिस्सेदारी है”

अब सवाल ये है कि मरकज के नाम पर इस तरह के आतंकी संगठन के शानदार हेडक्वार्टर ऑपरेट कैसे होते हैं? और इसे बनाने और मैनेज करने में क्या-क्या जतन किए जाते हैं? डिफेंस एक्सपर्ट अभिनव पांडया ने लल्लनटॉप को बताया,

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"पाकिस्तानी आर्मी और ISI का रियल सपोर्ट"

लल्लनटॉप ने इस पर ‘साउथ एशियन यूनिवर्सिटी’ के ‘इंटरनेशनल अफेयर डिपार्टमेंट’ में सीनियर एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी से बात की. उन्होंने कहा,

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"खतरनाक आतंकवादी बनते हैं यहां के एलुमनाई"

200 एकड़ में फैला 'मरकज-ए-तैयबा’ के कैम्पस के एलुमनाई आगे कई खतरनाक आतंकवादी बने. 26/11 हमले का आतंकी अजमल आमिर कसाब भी यहीं का स्टूडेंट था. पूछताछ में उसने ये बात कबूल की थी कि मुरीदके के 'मस्जिद तैयबा' में उसने ट्रेनिंग ली थी. 26/11 के प्लान में शामिल डेविड हेडली और तहव्वुर राणा ने भी इस कंपाउंड का दौरा किया था. लेकिन ये संस्थान कभी भी इस बात को स्वीकारते नहीं हैं.

जामिया मिलिया इस्लामिया में ‘MMAJ Academy of International Studies’ में प्रोफेसर अजय दर्शन बेहरा बताते हैं,

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चलते चलते आपको बता दें कि खूंखार आतंकवादियों का प्रोडक्शन करने वाली इस फैक्ट्री की स्थापना साल 2000 में हुई थी. ओसामा बिन लादेन ने इसमें 10 मिलियन की फंडिंग की थी. इस कॉम्पलेक्स में मदरसा, यूनिवर्सिटी, रहने के क्वॉटर, आर्म ट्रेनिंग, मस्जिद सबकुछ है/था (ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्या बचा है, अभी इसकी जानकारी नहीं). इंडियन इंटेलिजेंस की रिपोर्ट की माने तो यहां हर साल हजारों युवा अलग अलग प्रोग्राम्स में इनरोल होते आए हैं, इनमें महिलाएं भी शामिल हैं.

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तस्वीर: Maxar.

फिलहाल इस पूरे कॉम्पलेक्स की हालत लचर हो चुकी है. भारतीय वायुसेना ने लश्कर के इस ठिकाने पर 4 हमले किए, जिससे 200 एकड़ में फैले इस सेंटर को काफी नुकसान पहुंचा है. और जो तस्वीरें सामने आईं हैं उसमें मलबा ही दिख रहा है.

वीडियो: J&K के शोपियां में इंडियन आर्मी ने मुठभेड़ में लश्कर के तीन आतंकी मार गिराए

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