उसके अंतिम शब्द थे - कम से कम मेरी हत्या तो अच्छे से करो!
मार्कस टुलियस सिसरो का आज बड्डे है, जिसे लैटिन का पाणिनी और रोम का चाणक्य कहा जा सकता है.
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फोटो - thelallantop
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मार्कस टुलियस सिसरो - जुलियस सीज़र और पोम्पेइ के वक्त का राजनीतिज्ञ, एक महान वक्ता, वकील और दार्शनिक. होने को वो अपने आप को एक राजनीतिज्ञ कहलवाया जाना पसंद करता था लेकिन लोग उसे आज भी लैटिन का सबसे बेहतरीन ऑरेटर (वक्ता) और गद्यकार कहते हैं. और दरअसल, उसने राजनीति में भी जो मुकाम हासिल किया था वो भी अपने इसी वाक्-पटुता वाले फन के चलते.
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Video देखें: केदारनाथ सिंह की 'बनारस':
# सिसरो रोमन साम्राज्य में 'सोनिया गांधी' और 'नरेंद्र मोदी' दोनों ही की तरह थाजब सिसरो ने रोम में काउंसलर का चुनाव लड़ा तो उसके प्रतिद्वन्दियों ने उसे विदेशी, अप्रवासी और बाहरी कहा. ठीक वैसे ही जैसे भारत में विपक्ष ने तब सोनिया गांधी को कहा था, जब वो प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहीं थीं. दरअसल सिसरो सोनिया गांधी की ही तरह इटली का था. होने को तो रोम, जहां काउंसलर का चुनाव हो रहा था, इटली में ही है, पर उस वक्त रोम 'शहर' की इटली से अलग एक आइडेंटिटी भी थी. सिसरो इस शहर से बाहर, सौ किलोमीटर दूर बसे अर्पिनियम नामक एक कस्बे से आता था. लेकिन प्रतिद्वन्दियों के इन सब विरोधों के बावज़ूद सिसरो ने न केवल काउंसलर का इलेक्शन जीता बल्कि अपने दो प्रतिद्वन्दियों में से एक को अपना दायां हाथ बनाया और दूसरे को, जो सिसरो का कट्टर दुश्मन हो चुका था, देश निकाला देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. यह सिसरो की पहली या अंतिम सफलता नहीं थी. अपने भाषणों और वाक्-पटुता के दम पर वो रोम का सबसे टॉप का ऑरेटर (वक्ता) बन गया था. इसी वाक्-पटुता के चलते वो हर इलेक्शन पहले प्रयास में ही जीत जाता. क्या आपको कुछ समानता दिखी सिसरो और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री में? नहीं ये अकेली समानता नहीं है. बल्कि बड़ी समानता तो ये है कि सिसरो रोमन साम्राज्य का अंतिम 'न्यू मैन' कहा जाता है. 'न्यू मैन' मतलब जो राजसी या अभिजात्य परिवार से न आकर भी सर्वोच्च पदों की सीढ़ियां चढ़ता चला जाए. क्यूंकि बेशक सिसरो रोम शहर के बाहर एक धनी परिवार से आता था लेकिन उसका रोम की राजनीति और वहां की सोसाईटी में कोई दबदबा नहीं था. यूं वो अपनी राजनितिक सूझ-बूझ और शब्दों पर पकड़ के चलते उस मुकाम तक पहुंच पाया जिस मुकाम के उस वक्त सपने देखना भी हास्यास्पद था.
# लैटिन, यूरोप और सिसरोलैटिन आज बेशक लुप्तप्राय है लेकिन कभी पूरे यूरोप में कविता की भाषा यही थी. हर कुलीन और पढ़े लिखे यूरोपियन की भाषा थी लैटिन. और इस भाषा, यानी लैटिन पर सिसरो का प्रभाव इतना विशाल था कि यह कहा जाता है कि न केवल लैटिन बल्कि यूरोपियन भाषा में जो कुछ भी प्रोज़ लिखा गया है वो या तो सिसरो का ही भावानुवाद है या उस पर प्रतिक्रिया है या फिर उसके कहे/लिखे का ही उत्तर/प्रतिउत्तर है.
# हम अपने सुख को भूल जाते हैं किंतु अपने दुःखों को याद रखते हैंबंदा दर्शनिक था, शब्दों का जादूगर था, भयानक भाषण देता था. लैटिन भाषा का ज्ञानी. तो कई कोट्स बड़े प्रसिद्ध हुए उसके. जैसे - # किताबों बिना कमरा ,आत्मा बिन शरीर है. # यदि तुम्हारे पास एक बगीचा और एक लाइब्रेरी है, तो तुम्हारे पास तुम्हारी ज़रूरत का सब कुछ है. # बुरा वक्त है! बच्चे अब अपने माता-पिता का पालन नहीं कर रहे हैं और हर कोई किताब लिख रहा है. # अगर हम कोई चीज़ सोचने में शर्मिंदा नहीं होते, तो हमें वो चीज़ कहने में भी शर्म नहीं होना चाहिए. # प्रकृति ने जो जीवन हमें दिया है वो बहुत छोटा है, लेकिन एक अच्छी तरह से बिताए गए जीवन की स्मृति अनंत है. # मर चुके लोगों का जीवन, जीवित व्यक्तियों की याद में होता है. # जहां उम्मीद है, वहां जीवन है. # मैं रचना के द्वारा आलोचना करता हूं, गलतियां ढूंढ के नहीं. # हमें यह नहीं कहना चाहिए कि हर गलती एक मूर्खता है.
# आर्किमिडीज़ को कब्र से भी खोज निकालादरअसल ये कहना गलत होगा कि सिसरो ने आर्किमिडीज़ को कब्र से भी खोज निकाला, बल्कि ये कहा जा सकता है कि सिसरो ने आर्किमिडीज़ की कब्र को खोज निकाला. सिसिली में अपने प्रवास के दौरान, उन्होंने अनजाने में ही 'आर्किमिडीज़ ऑफ सिरैक्यूस' की वह कब्र खोज निकाली जो कई दिनों से भुलाई जा चुकी थी और उस वक्त घनी झाड़ियों में छिपी हुई थी. कब्र को उन्होंने उसके ऊपर के पत्थर पर उकेरे गए आर्किमिडीज़ के प्रसिद्ध प्रमेय से पहचाना.
# जो कुछ तुम कर रहे हो उसमें कुछ भी सही नहीं है, लेकिन कम से कम मुझे सही से मारो!अपने राजनितिक जीवन के दौरान केवल दोस्त और सफलताएं ही मिली हों ऐसा नहीं था. कई दुश्मन भी बनाए और कई असफलताएं भी हाथ लगीं. उन्हीं दुश्मनों में से एक, एंटोनी ने जब सिसरो के क़त्ल के लिए सैनिक भेजे तो सिसरो सैनिकों से बोला,'जो कुछ तुम कर रहे हो उसमें कुछ भी सही नहीं है, कम से कम मेरी हत्या तो अच्छे से करो!' अंततः सिसरो को एंटनी के सैनिकों द्वारा मार दिया गया, उसका सर और दाहिना हाथ काट दिया गया. और रोम में 'प्रदर्शन' के लिए रखा गया.
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उसकी आवाज गूंजती है, जैसे लोहे की सांकल बजती है, जैसे ईमान बजता है!
'उसके चेहरे पर पालक की कोमलता, हरी मिर्चों की खुशबू पुती थी'
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'यही तुम अंग्रेजी की एम.ए. हो?'
एक कहानी रोज़: 'मुगलों ने सल्तनत बख्श दी'
Video देखें: केदारनाथ सिंह की 'बनारस':

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