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एक कहानी रोज़: 'मुगलों ने सल्तनत बख्श दी'

हीरोजी को आप नहीं जानते, और यह दुर्भाग्य की बात है. इसका यह अर्थ नहीं कि केवल आपका दुर्भाग्य है, दुर्भाग्य हीरोजी का भी है. कारण, वह बड़ा सीधा-सादा है. यदि आपका हीरोजी से परिचय हो जाए, तो आप निश्चय समझ लें कि आपका संसार के एक बहुत बड़े विद्वान से परिचय हो गया. हीरोजी को जाननेवालों में अधिकांश का मत है कि हीरोजी पहले जन्म में विक्रमादित्य के नव-रत्नों में एक अवश्य रहे होंगे और अपने किसी पाप के कारण उनको इस जन्म में हीरोजी की योनि प्राप्त हुई. अगर हीरोजी का आपसे परिचय हो जाय, तो आप यह समझ लीजिए कि उन्हें एक मनुष्य अधिक मिल गया, जो उन्हें अपने शौक में प्रसन्नतापूर्वक एक हिस्सा दे सके.

हीरोजी ने दुनिया देखी है. यहां यह जान लेना ठीक होगा कि हीरोजी की दुनिया मौज और मस्ती की ही बनी है. शराबियों के साथ बैठकर उन्होंने शराब पीने की बाजी लगाई है और हरदम जीते हैं. अफीम के आदी हैं, पर अगर मिल जाए तो इतनी खा लेते हैं. जितनी से एक खानदान का खानदान स्वर्ग की या नरक की यात्रा कर सके. भंग पीते हैं तब तक, जब तक उनका पेट न भर जाए. चरस और गांजे के लोभ में साधु बनते-बनते बच गए.

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एक बार एक आदमी ने उन्हें संखिया खिला दी थी. इस आशा से कि संसार एक पापी के भार से मुक्त हो जाए. पर दूसरे ही दिन हीरोजी उसके यहां पहुंचे. हंसते हुए उन्होंने कहा – यार, कल का नशा नशा था. रामदुहाई, अगर आज भी वह नशा करवा देते, तो तुम्हें आशीर्वाद देता. लेकिन उस आदमी के पास संखिया मौजूद न थी.

हीरोजी के दर्शन प्राय: चाय की दुकान पर हुआ करते हैं. जो पहुंचता है, वह हीरोजी को एक प्याला चाय का अवश्य पिलाता है. उस दिन जब हम लोग चाय पीने पहुंचे, तो हीरोजी एक कोने में आंखें बंद किए हुए बैठे कुछ सोच रहे थे. हम लोगों में बातें शुरू हो गईं, और हरिजन-आंदोलन से घूमते-फिरते बात आ पहुंची दानवराज बलि पर. पंडित गोवर्धन शास्त्री ने आमलेट का टुकड़ा मुंह में डालते हुए कहा – “भाई, यह तो कलियुग है. न किसी में दीन है, न ईमान. कौड़ी-कौड़ी पर लोग बेईमानी करने लग गए हैं. अरे, अब तो लिख कर भी लोग मुकर जाते हैं. एक युग था, जब दानव तक अपने वचन निभाते थे, सुरों और नरों की तो बात ही छोड़ दीजिए. दानवराज बलि ने वचनबद्ध हो कर सारी पृथ्वी दान कर दी थी. पृथ्वी ही काहे को, स्वयं अपने को भी दान कर दिया था.”

हीरोजी चौंक उठे. खांस कर उन्होंने कहा – “क्या” बात है? जरा फिर से तो कहना!”
सब लोग हीरोजी की ओर घूम पड़े. कोई नई बात सुनने को मिलेगी, इस आशा से मनोहर ने शास्त्रीजी के शब्दों को दोहराने का कष्ट उठाया “हीरोजी! ये गोवर्धन शास्त्री जो हैं, सो कह रहे हैं कि कलियुग में धर्म-कर्म सब लोप हो गया. त्रेता में तो दैत्यराज बलि तक ने अपना सब कुछ केवल वचनबद्ध होकर दान दिया था.”

हीरोजी हंस पड़े – “हां, तो यह गोवर्धन शास्त्री कहनेवाले हुए और तुम लोग सुननेवाले, ठीक ही है. लेकिन हमसे सुनो, यह तो कह रहे हैं त्रेता की बात, अरे, तब तो अकेले बलि ने ऐसा कर दिया था; लेकिन मैं कहता  हूं कलियुग की बात. कलियुग में तो एक आदमी की कही हुई बात को उसकी सात-आठ पीढ़ी तक निभाती गई और यद्यपि वह पीढ़ी स्वयं नष्ट हो गई, लेकिन उसने अपना वचन नहीं तोड़ा.”

हम लोग आश्चर्य में पड़ गए. हीरोजी की बात समझ में नहीं आई, पूछना पड़ा – “हीरोजी, कलियुग में किसने इस प्रकार अपने वचनों का पालन किया है?”

“लौंडे हो न!” हीरोजी ने मुंह बनाते हुए कहा – “जानते हो मुगलों की सल्तनत कैसे गई?”

“हां, अंगरेजों ने उनसे छीन ली.”

“तभी तो कहता हूँ कि तुम सब लोग लौंडे हो. स्कूली किताबों को रट-रट कर बन गए पढ़े-लिखे आदमी. अरे, मुगलों ने अपनी सल्तनत अंगरेजों को बख्श दी.”

हीरोजी ने यह कौन-सा नया इतिहास बनाया? आंखें कुछ अधिक खुल गईं. कान खड़े हो गए. मैंने कहा – “सो कैसे?”

“अच्छा तो फिर सुनो!” हीरोजी ने आरम्भ किया – “जानते हो शहंशाह शाहजहां की लड़की शहजादी रौशनआरा एक दफे बीमार पड़ी थी, और उसे एक अंगरेज डॉक्टर ने अच्छा किया था. उस डॉक्टर को शहंशाह शाहजहां ने हिन्दुस्तान में तिजारत करने के लिए कलकत्ते में कोठी बनाने की इजाजत दे दी थी.”

“हां, यह तो हम लोगों ने पढ़ा है.”

“लेकिन असल बात यह है कि शहजादी रौशनआरा – वही शहंशाह शाहजहां की लड़की -हां , वही शहजादी रौशनआरा एक दफे जल गई. अधिक नहीं जली थी. अरे, हाथ में थोड़ा-सा जल गई थी, लेकिन जल तो गई थी और थी शहजादी. बड़े-बड़े हकीम और वैद्य बुलाए गए. इलाज किया गया; लेकिन शहजादी को कोई अच्छा न कर सका – न कर सका. और शहजादी को भला अच्छा कौन कर सकता था? वह शहजादी थी न! सब लोग लगाते थे लेप, और लेप लगाने से होती थी जलन. और तुरंत शहजादी ने धुलवा डाला उस लेप को. भला शहजादी को रोकनेवाला कौन था. अब शाहंशाह सलामत को फिक्र हुई! लेकिन शहजादी अच्छी हो तो कैसे? वहां तो दवा असर करने ही न पाती थी.

“उन्हीं दिनों एक अंगरेज घूमता-घामता दिल्ली आया. दुनिया देखे हुए, घाट-घाट का पानी पिए हुए पूरा चालाक और मक्कार! उसको शहजादी की बीमारी की खबर लग गई. नौकरों को घूस देकर उसने पूरा हाल दरियाफ्त किया. उसे मालूम हो गया कि शहजादी जलन की वजह से दवा धुलवा डाला करती है. सीधे शाहंशाह सलामत के पास पहुंचा. कहा कि डॉक्टर हूं. शहजादी का इलाज उसने अपने हाथ में ले लिया. उसने शहजादी के हाथ में एक दवा लगाई. उस दवा से जलन होना तो दूर रहा, उलटे जले हुए हाथ में ठंडक पहुंची. अब भला शहजादी उस दवा को क्यों धुलवाती. हाथ अच्छा हो गया. जानते हो वह दवा क्या थी?” हम लोगों की ओर भेद भरी दृष्टि डालते हुए हीरोजी ने पूछा.

“भाई, हम दवा क्या जानें?” कृष्णानन्दन ने कहा.

“तभी तो कहते हैं कि इतना पढ़-लिख कर भी तुम्हें तमीज न आई. अरे वह दवा थी वेसलीन – वही वेसलीन, जिसका आज घर-घर में प्रचार है.”

“वेसलीन! लेकिन वेसलीन तो दवा नहीं होती,” मनोहर ने कहा.
हीरोजी संभल कर बैठ गए. फिर बोले – “कौन कहता है कि वेसलीन दवा होती है? अरे, उसने हाथ में लगा दी वेसलीन और घाव आप-ही-आप अच्छा हो गया. वह अंगरेज बन बैठा डॉक्टर – और उसका नाम हो गया.

शाहंशाह शाहजहां बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने उस फिरंगी डॉक्टर से कहा – ”मांगो.” उस फिरंगी ने कहा – ”हुजूर, मैं इस दवा को हिन्दुस्तान में रायज करना चाहता हूं, इसलिए हुजूर, मुझे हिन्दुस्‍तान में तिजारत करने की इजाजत दे दें.”

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बादशाह सलामत ने जब यह सुना कि डॉक्टर हिंदुस्तान में इस दवा का प्रचार करना चाहता है, तो बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने कहा – ”मंजूर! और कुछ मांगो.” तब उस चालाक डॉक्टर ने जानते हो क्या मांगा? उसने कहा – ”हुजूर, मैं एक तंबू तानना चाहता हूं, जिसके नीचे इस दवा के पीपे इकट्ठे किए जावेंगे. जहां पनाह यह फरमा दें कि उस तंबू के नीचे जितनी जमीन आवेगी, वह जहां पनाह ने फिरंगियों को बख्श दी.” शाहंशाह शाहजहां थे सीधे-सादे आदमी, उन्होंने सोचा, तंबू के नीचे भला कितनी जगह आवेगी. उन्होंने कह दिया – ”मंजूर.”

“हां तो शाहंशाह शाहजहां थे सीधे-सादे आदमी, छल-कपट उन्हें आता न था. और वह अंगरेज था दुनिया देखे हुए. सात समुद्र पार करके हिंदुस्तान आया था! पहुंचा विलायत, वहां उसने बनवाया रबड़ का एक बहुत बड़ा तंबू और जहाज पर तंबू लदवा कर चल दिया हिंदुस्तान. कलकत्ते में, उसने वह तंबू लगवा दिया. वह तंबू कितना ऊंचा था, इसका अंदाज आप नहीं लगा सकते. उस तंबू का रंग नीला था. तो जनाब, वह तंबू लगा कलकत्ते में, और विलायत से पीपे-पर-पीपे लद-लदकर आने लगे. उन पीपों में वेसलीन की जगह भरा था एक-एक अंगरेज जवान, मय बंदूक और तलवार के. सब पीपे तंबू के नीचे रखवा दिए गए. जैसे-जैसे पीपे जमीन घेरने लगे, वैसे-वैसे तंबू को बढ़ा-बढ़ा कर जमीन घेर दी गई. तंबू तो रबड़ का था न, जितना बढ़ाया, बढ़ गया. अब जनाब, तंबू पहुंचा प्लासी. तुम लोगों ने पढ़ा होगा कि प्लासी का युद्ध हुआ था. अरे सब झूठ है. असल में तंबू बढ़ते-बढ़ते प्लासी पहुंचा था, और उस वक्त मुगल बादशाह का हरकारा दौड़ा था दिल्लीं. बस यह कह दिया गया कि प्लासी की लड़ाई हुई. जी हां, उस वक्त दिल्ली में शाहंशाह शाहजहां की तीसरी या चौथी पीढ़ी सल्तनत कर रही थी.

हरकारा जब दिल्ली‍ पहुंचा, उस वक्त बादशाह सलामत की सवारी निकल रही थी. हरकारा घबराया हुआ था. वह इन फिरंगियों की चालों से हैरान था. उसने मौका देखा न महल, वहीं सड़क पर खड़े होकर उसने चिल्ला कर कहा – ”जहांपनाह, गजब हो गया. ये बदतमीज फिरंगी अपना तंबू प्लासी तक खींच लाए हैं, और चूंकि कलकत्ते से प्लासी तक की जमीन तंबू के नीचे आ गई है, इसलिए इन फिरंगियों ने उस जमीन पर कब्जा कर लिया है. जो इनको मना किया तो इन बदतमीजों ने शाही फरमान दिखा दिया.” बादशाह सलामत की सवारी रुक गई थी. उन्हें बुरा लगा. उन्होंने हरकारे से कहा – “म्याँ हरकारे, मैं कर ही क्या सकता हूं. जहां तक फिरंगियों का तंबू घिर जाए, वहां तक की जगह उनकी हो गई, हमारे बुजुर्ग यह कह गए हैं.” बेचारा हरकारा अपना-सा मुंह ले कर वापस आ गया.

“हरकारा लौटा और इन फिरंगियों का तंबू बढ़ा. अभी तक तो आते थे पीपों में आदमी, अब आने लगा तरह-तरह का सामान. हिंदुस्तान का व्यापार फिरंगियों ने अपने हाथ में ले लिया. तंबू बढ़ता ही रहा और पहुंच गया बक्सर. इधर तंबू बढ़ा और उधर लोगों की घबराहट बढ़ी. यह जो किताबों में लिखा है कि बक्सर की लड़ाई हुई, यह गलत है भाई. जब तंबू बक्सर पहुंचा, तो फिर हरकारा दौड़ा.

“अब जरा बादशाह सलामत की बात सुनिए. वह जनाब दीवान खास में तशरीफ रख रहे थे. उनके सामने सैकड़ों, बल्कि हजारों मुसाहब बैठे थे. बादशाह सलामत हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे. सामने एक साहब जो शायद शायर थे, कुछ गा-गा कर पढ़ रहे थे और कुछ मुसाहब गला फाड़-फाड़ कर ”वाह-वाह’ चिल्ला रहे थे. कुछ लोग तीतर और बटेर लड़ा रहे थे. हरकारा जो पहुंचा तो यह सब बंद हो गया. बादशाह सलामत ने पूछा – “म्याँ हरकारे, क्या हुआ? इतने घबराए हुए क्यों हो?” हांफते हुए हरकारे ने कहा – “जहांपनाह, इन बदजात फिरंगियों ने अंधेर मचा रखा है. वह अपना तंबू बक्सर खींच लाए.” बादशाह सलामत को बड़ा ताज्जुब हुआ. उन्होंने अपने मुसाहबों से पूछा – “म्याँ, हरकारा कहता है कि फिरंगी अपना तंबू कलकत्ते से बक्सर तक खींच लाए. यह कैसे मुमकिन है?” इस पर एक मुसाहब ने कहा – “जहांपनाह, ये फिरंगी जादू जानते हैं, जादू !”

दूसरे ने कहा – “जहांपनाह, इन फिरंगियों ने जिन्नात पाल रखे हैं – जिन्नात सब कुछ कर सकते हैं.” बादशाह सलामत की समझ में कुछ नहीं आया. उन्होंने हरकारे से कहा – “म्याँ हरकारे, तुम बतलाओ यह तंबू किस तरह बढ़ आया.”

हरकारे ने समझाया कि तंबू रबड़ का है. इस पर बादशाह सलामत बड़े खुश हुए. उन्होने कहा – “ये फिरंगी भी बड़े चालाक हैं, पूरे अकल के पुतले हैं.” इस पर सब मुसाहबों ने एक स्वर में कहा – “इसमें क्या शक है, जहांपनाह बजा फरमाते हैं.” बादशाह सलामत मुस्कुराए – “अरे भाई, किसी चोबदार को भेजो, जो इन फिरंगियों के सरदार को बुला लावे. मैं उसे खिलअत दूंगा.”

सब मुसाहब कह उठे – ”वल्लाह! जहां पनाह एक ही दरियादिल हैं – इस फिरंगी सरदार को जरूर खिलअत देनी चाहिए.” हरकारा घबराया. वह आया था शिकायत करने, यहां बादशाह सलामत फिरंगी सरदार को खिलअत देने पर आमादा थे. वह चिल्ला उठा – “जहां पनाह! इन फिरंगियों ने जहां पनाह की सल्तनत का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने तंबू के नीचे करके उस पर कब्जा कर लिया है. जहांपनाह, ये फिरंगी जहांपनाह की सल्तनत छीनने पर आमादा दिखाई देते हैं.”

मुसाहब चिल्ला उठे – “ऐ, ऐसा गजब.” बादशाह सलामत की मुस्कुराहट गायब हो गई. थोड़ी देर तक सोच कर उन्होंने कहा – “मैं क्या कर सकता हूं? हमारे बुजुर्ग इन फिरंगियों को उतनी जगह दे गए हैं, जितनी तंबू के नीचे आ सके. भला मैं उसमें कर ही क्या सकता हूं? हां, फिरंगी सरदार को खिलअत न दूंगा.” इतना कह कर बादशाह सलामत फिरंगियों की चालाकी अपनी बेगमात से बतलाने के लिए हरम में अंदर चले गए. हरकारा बेचारा चुपचाप लौट आया.

“जनाब! उस तंबू ने बढ़ना जारी रखा. एक दिन क्या देखते हैं कि विश्वनाथपुरी काशी के ऊपर वह तंबू तन गया. अब तो लोगों में भगदड़ मच गई. उन दिनों राजा चेतसिंह बनारस की देखभाल करते थे. उन्होंने उसी वक्त बादशाह सलामत के पास हरकारा दौड़ाया. वह दीवान खास में हाजिर किया गया. हरकारे ने बादशाह सलामत से अर्ज की कि वह तंबू बनारस पहुंच गया है और तेजी के साथ दिल्ली की तरफ आ रहा है. बादशाह सलामत चौंक उठे. उन्होंने हरकारे से कहा – “तो म्याँ हरकारे, तुम्हीं बतलाओ, क्या किया जाय?”

वहां बैठे हुए दो-एक उमराओं ने कहा “जहांपनाह, एक बड़ी फौज भेज कर इन फिरंगियों का तंबू छोटा करवा दिया जाय और कलकत्ते भेज दिया जाय. हम लोग जा कर लड़ने को तैयार हैं. जहांपनाह का हुक्म भर हो जाए. इस तंबू की क्या हकीकत है, एक मर्तबा आसमान को भी छोटा कर दें.” बादशाह सलामत ने कुछ सोचा, फिर उन्होंने कहा – “क्या बतलाऊं हमारे बुजुर्ग शहंशाह शाहजहां, इन फिरंगियों को तंबू के नीचे जितनी जगह आ जाए, वह बख्श गए हैं. बख्शीशनामा की रूह से हम लोग कुछ नहीं कर सकते. आप जानते हैं, हम लोग अमीर तैमूर की औलाद हैं. एक दफा जो जबान दे दी वह दे दी. तंबू का छोटा कराना तो गैरमुमकिन है. हां, कोई ऐसी हिकमत निकाली जाय, जिससे फिरंगी अपना तंबू आगे न बढ़ा सकें. इसके लिए दरबार आम किया जाय और यह मसला वहां पेश हो.”

“इधर दिल्ली में तो यह बातचीत हो रही थी और उधर इन फिरंगियों का तंबू इलाहाबाद, इटावा ढंकता हुआ आगरे पहुंचा. दूसरा हरकारा दौड़ा. उसने कहा “जहांपनाह, वह तंबू आगरे तक बढ़ आया है. अगर अब भी कुछ नहीं किया जाता, तो ये फिरंगी दिल्ली पर भी अपना तंबू तान कर कब्जा कर लेंगे.” बादशाह सलामत घबराए – दरबार आम किया गया. सब अमीर-उमरा इकठ्ठा हो गए तो बादशाह सलामत ने कहा “आज हमारे सामने एक अहम मसला पेश है. आप लोग जानते हैं कि हमारे बुजुर्ग शाहंशाह शाहजहां ने फिरंगियों को इतनी जमीन बख्श दी थी, जितनी उनके तंबू के नीचे आ सके. इन्होंने अपना तंबू कलकत्ते में लगवाया था. लेकिन वह तंबू है रबड़ का, और धीरे-धीरे ये लोग तंबू आगरे तक खींच लाए. हमारे बुजुर्गों से जब यह कहा गया, तब उन्होंने कुछ करना मुनासिब न समझा. क्योंकि शहंशाह शाहजहां अपना कौल हार चुके हैं. हम लोग अमीर तैमूर की औलाद हैं और अपने कौल के पक्के हैं. अब आप लोग बतलाइए, क्या किया जाए.”

अमीरों और मंसबदारों ने कहा “हमें इन फिरंगियों से लड़ना चाहिए और इनको सजा देनी चाहिए. इनका तंबू छोटा करवा कर कलकत्ते भिजवा देना चाहिए.” बादशाह सलामत ने कहा – “लेकिन हम अमीर तैमूर की औलाद हैं. हमारा कौल टूटता है.” इसी समय तीसरा हरकारा हांफता हुआ बिना इत्तला कराए ही दरबार में घुस आया. उसने कहा – “जहांपनाह, वह तंबू दिल्ली पहुंच गया. वह देखिए, किले तक आ पहुंचा.”

सब लोगों ने देखा. वास्तव में हजारों गोरे खाकी वर्दी पहने और हथियारों से लैस, बाजा बजाते हुए तंबू को किले की तरफ खींचते हुए आ रहे थे. उस वक्त बादशाह सलामत उठ खड़े हुए. उन्होंने कहा – “हमने तय कर लिया. हम अमीर तैमूर की औलाद हैं. हमारे बुजुर्गों ने जो कुछ कह दिया, वही होगा. उन्हों ने तंबू के नीचे की जगह फिरंगियों को बख्श दी थी. अब अगर दिल्ली भी उस तंबू के नीचे आ रही है, तो आवे! मुगल सल्तनत जाती है, तो जाए. लेकिन दुनिया यह देख ले कि अमीर तैमूर की औलाद हमेशा अपने कौल की पक्की‍ रही है.” इतना कह कर बादशाह सलामत मय अपने अमीर-उमरावों के दिल्ली के बाहर हो गए और दिल्ली पर अंगरेजों का कब्जा हो गया. अब आप लोग देख सकते हैं, इस कलियुग में भी मुगलों ने अपनी सल्तनत बख्श दी.”

हम सब लोग थोड़ी देर तक चुप रहे. इसके बाद मैंने कहा – “हीरोजी, एक प्याला चाय और पियो.”

हीरोजी बोल उठे – “इतनी अच्छी कहानी सुनाने के बाद भी एक प्याला चाय? अरे, महुवे के ठर्रे का एक अद्धा तो हो जाता.”


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