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कभी धनगरों के लिए आरक्षण मांगने वाले देवेंद्र फडनवीस मराठा आरक्षण क्यों नहीं दे पा रहे हैं?

मांग एक बार फिर ज़ोर-शोर से उठाई गई है. लेकिन सरकार को सूझ नहीं रहा कि करें तो क्या.

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25 जुलाई 2018 (अपडेटेड: 25 जुलाई 2018, 11:33 PM IST)
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मराठा आरक्षण आंदोलन में निकाली जाने वाली सभी रैलियों में भगवा ध्वज और शिवाजी की तस्वीरें ज़रूर होती हैं.
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मराठा. महाराष्ट्र का वो ताकतवर समाज जो आरक्षण की मांग को लेकर लंबी-लंबी मौन रैलियां निकालता रहा है. लाख-लाख आदमी जुटते और चूं नहीं होती. लेकिन सरकार को सब सुनाई पड़ता. लेकिन औरंगाबाद में एक मराठा लड़के के गोदावरी नदी में कूदकर खुदकुशी के बाद यही समाज दोबारा अपनी मांग को लेकर सड़क पर उतर आया है और इस बार हिंसक हो गया है. पश्चिम महाराष्ट्र में कई जगह छिटपुट तोड़फोड़ और आगज़नी हुई है. खासकर मुंबई में. कई जगह दुकानें बंद करा दी गईं और 25 जुलाई को मुंबई बंद की कोशिश भी हुई. दीगर आंदोलनों से इतर मराठा आरक्षण की मांग कोई एक संगठन या नेता नहीं कर रहा है. कई सारे मराठा संगठन हैं जो मराठा मोर्चा या मराठा क्रांति मोर्चा के तहत आंदोलन कर रहे हैं. इस मामले में जो कुछ आपके जानने लायक है, हम सवाल-जवाब की शक्ल में ले आए हैं. पढ़िएः
कौन हैं मराठा?
महाराष्ट्र का एक ताकतवर जाति समूह. इसमें कई जातियां आती हैं. शिवाजी महाराज भोंसले मराठा थे. उनके ज़माने से मराठा महाराष्ट्र में कभी कमज़ोर नहीं रहे. इनके पास खेती लायक ज़मीनें हैं और राजनीति से लेकर पढ़ाई-लिखाई-नौकरी में मराठा समाज का पर्याप्त दखल है. आज़ादी के बाद महाराष्ट्र में पहले मास लीडर वसंत दादा पाटील और आज के ज़माने में महाराष्ट्र में रसूख और खासकर धनबल के मामले में सबसे मज़बूत नेता शरद पवार, दोनों मराठा हैं. हालांकि सभी मराठा समृद्ध नहीं होते. ये समाज महाराष्ट्र में जनरल कैटेगरी में आता है और राज्य की आबादी का तकरीबन 30 फीसदी हैं.
शिवाजी. मराठा स्वाभिमान का सबसे बड़ा प्रतीक. (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)
शिवाजी. मराठा स्वाभिमान का सबसे बड़ा प्रतीक. (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)

महाराष्ट्र में किसे-किसे मिला हुआ है आरक्षण?
ओबीसी - 19 %
अनुसूचित जाति - 13 %
अनुसूचित जनजाति - 7 %
स्पेशल बैकवर्ड कास्ट - 13 %
कुल आरक्षण - 52 %
आरक्षण की मांग में अब तक क्या हुआ है?
मांग बहुत पुरानी है. इधर कुछ सालों से मराठा ज़्यादा लामबंद हुए क्योंकि खेती में लगातार नुकसान हुआ है और नौकरियां ज़्यादा हैं नहीं. 2014 में कांग्रेस-एनसीपी को साफ अंदाज़ा था कि उनकी सरकार दोबारा नहीं बनने वाली. सरकार को बचाने का आखिरी दांव कहिए कि आने वाली सरकार की मुसीबतें बढ़ाने वाली शैतानी, पृथ्वीराज चव्हाण ने 25 जून, 2014 को एक आर्डिनेंस निकालकर मराठा समुदाय को 16 और मुसलमानों को 5 फीसदी आरक्षण दे दिया था. इस ऑर्डिनेंस का वही हुआ जो हर कोई जानता था. ये अदालत में टिक नहीं सकता था. ऑर्डिनेंस के खिलाफ बंबई हाईकोर्ट में याचिकाएं लग गईं और हाईकोर्ट ने इसपर स्टे लगा दिया. सरकार से कहा कि संवैधानिक प्रक्रिया का पालन कीजिए तभी जाकर आरक्षण टिकेगा. सरकारी शिक्षा क्षेत्र में मुसलमानों को मिले 5 % आरक्षण पर रोक नहीं लगाई गई.
देवेंद्र फडनवीस कह रहे हैं कि गायकवाड़ कमीशन की रिपोर्ट आ जाए. तब कोर्ट का फैसला आएगा. इसके बाद ही उनकी सरकार आरक्षण के मामले में कुछ कर सकती है. (फोटोःट्विटर)
देवेंद्र फडनवीस कह रहे हैं कि गायकवाड़ कमीशन की रिपोर्ट आ जाए. तब कोर्ट का फैसला आएगा. इसके बाद ही उनकी सरकार आरक्षण के मामले में कुछ कर सकती है. (फोटोःट्विटर)

इसके बाद महाराष्ट्र बैकवर्ड क्लास कमीशन को ये ज़िम्मेदारी दी गई कि वो राज्य में जातियों के पिछड़ेपन पर एक रिपोर्ट तैयार करे. रिटायर्ड जस्टिस गायकवाड़ की अध्यक्षता वाला ये कमीशन फिलहाल हर ज़िले में जनसुनवाई कर रहा है. बंबई हाईकोर्ट इस कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद आरक्षण पर अपनी राय रखेगा. याद रहे कि यही कमीशन 2008 में मराठा समुदाय को सामाजिक और आर्थिक रूप से समृद्ध बता चुका है.
मराठा क्या चाहते हैं?
विलासराव देशमुख ने 2001 में कुनबी मराठाओं को ओबीसी में शामिल किया था. अब भी सरकार के लिए सबसे आसान तरीका है सभी मराठा जातियों को ओबीसी मान ले. इससे सुप्रीम कोर्ट की 52 % आरक्षण की सीमा भी बनी रहेगी. लेकिन महाराष्ट्र में पहले ही 350 जातियां ओबीसी में शामिल हैं. मराठा भी ओबीसी हो गए तो किसी भी ओबीसी को आरक्षण का लाभ मिलना दूभर हो जाएगा. क्योंकि कंपटीशन बहुत ऊपर पहुंच जाएगा. फिर मराठा भी ओबीसी होने में खास दिलचस्पी नहीं ले रहे. उन्हें कैटेगरी वाला आरक्षण नहीं चाहिए. उन्हें सिर्फ अपने लिए 16 % आरक्षण ही चाहिए.
मराठा मोर्चा के प्रदर्शन आमतौर पर शांत रहे हैं. मूक भी. ये पहली बार है कि बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है. (फोटोः ट्विटर)
मराठा मोर्चा के प्रदर्शन आमतौर पर शांत रहे हैं. मूक भी. ये पहली बार है कि बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है. (फोटोः ट्विटर)

आंदोलन अभी क्यों तेज़ हुआ?
महाराष्ट्र (खासकर मराठवाड़ा) में लगातार आंदोलन हो रहे हैं. हाल ही में दूध की कीमतों को लेकर किसानों का आंदोलन हुआ. न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर किसान नाराज़ हैं ही. इसीलिए सरकार के खिलाफ कोई भी आंदोलन खड़ा होने के हिसाब से मुफीद स्थितियां हैं. लेकिन मराठा आरक्षण आंदोलन के यकायक ज़ोर पकड़ने की कोई ठोस वजह नहीं है. औरंगाबाद वाली खुदकुशी ने एक फैक्टर मात्र है. बड़े कारण दो हो सकते हैं. पहला ये कि आने वाले साल के आम चुनाव हैं. तो सरकार और खासकर भाजपा पर दबाव बनाना है. फिर महाराष्ट्र में बंपर भर्तियां होने वाली हैं. कुल 72,000. इनमें से 36,000 के लिए इसी साल नोटिफिकेशन निकल जाएगा. बाकी के लिए अगले साल. तो मराठा चाहते हैं कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने से पहले आरक्षण को लेकर स्थिति साफ हो जाए.
इस तेज किया किसने?
राज्य में अलग अलग प्रकट रूप से गैरराजनीतिक मोर्चे हैं, जो अभियान चला रहे हैं. अब इन सबको सामूहिक रूप से मराठा क्रांति मोर्चा कहा जा रहा है.
मराठा मोर्चा का काफी ज़ोर इस बात पर है कि वो राजनीति और राजनेताओं से दूर रहता है.
मराठा मोर्चा का काफी ज़ोर इस बात पर है कि वो राजनीति और राजनेताओं से दूर रहता है.

और किस-किस को चाहिए आरक्षण?
मराठा अकेले नहीं हैं जिन्हें आरक्षण चाहिए. धनगर समुदाय (माने गड़रिया समुदाय, राज्य की 8 फीसद के करीब आबादी) की मांग है कि उसे एसटी के तहत आरक्षण मिल जाए. मुंबई का टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (TISS)धनगर समाज के पिछड़ेपन पर एक रिपोर्ट अलग से तैयार कर रहा है. देवेंद्र फडनवीस खुद 2012-13 में ज़ोर-शोर से धनगर आरक्षण आंदोलन में शामिल हुए थे. तब उनके साथ गोपीनाथ मुंडे भी होते थे. सब जानते थे कि धनगर को एसटी का दर्जा मिलना दूर की कौड़ी थी, लेकिन मुंडे का प्लान था कि इसी तरह ओबीसी जातियों को लामबंद करके मराठा वर्चस्व को तोड़ा जा सकता है. मराठा वर्चस्व यानी मुख्य रूप से कांग्रेस और एनसीपी का वर्चस्व.
फिर कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने जाते-जाते मुसलमानों को 5 फीदसी आरक्षण (नौकरियों में भी) देने की घोषणा की थी, जिसपर हाईकोर्ट ने स्टे लगा दिया था. मराठा आरक्षण पर सरकार अगर कोर्ट की राय के खिलाफ आगे बढ़ती है तो स्वाभाविक रूप से मुस्लिम समाज ये चाहेगा कि उनके मामले में भी सरकार पहल करे.
मराठा के अलावा धनगर समाज भी अपने लिए आरक्षण चाहता है. बिना देरी. लेकिन धनगर आरक्षण का मामला फिलहाल धीमा पड़ा हुआ है.
मराठा के अलावा धनगर समाज भी अपने लिए आरक्षण चाहता है. बिना देरी. लेकिन धनगर आरक्षण का मामला फिलहाल धीमा पड़ा हुआ है.

फडनवीस सरकार का स्टैंड क्या है?
महाराष्ट्र में मराठा आशीर्वाद के बिना सत्ता में आना या बने रहना हमेशा मुश्किल ही रहेगा. इसलिए महाराष्ट्र में कोई सियासी पार्टी ये कह ही नहीं सकती कि वो मराठा आरक्षण के पक्ष में नहीं. तो देवेंद्र फडनवीस भी यही कह रहे हैं कि मराठा समुदाय को आरक्षण मिलना चाहिए.
फडनवीस सरकार ने दिसंबर 2016 में 2,500 पन्नों का एफिडेविट बंबई हाईकोर्ट को दिया था, जिसमें 80 फीसद मराठाओं को 'सामाजिक और आर्थिक' रूप से पिछड़ा बताया गया था. इस एफिडेविट में पुणे के गोखले इंस्टीट्यूट की चार रिपोर्ट्स का ज़िक्र है जिसके मुताबिक मराठा समाज से आने वाले लोग गन्ना कटाई, खेत मजूरी, हम्माली और दूसरों के घरों में भी काम करते हैं.
महाराष्ट्र के पहले मास लीडरों में से एक वसंत दादा पाटील. मराठा थे. आज मराठवाड़ा के गन्ना बेल्ट में शरद पवार का ज़बरदस्त रसूख है. वो भी मराठा हैं. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
महाराष्ट्र के पहले मास लीडरों में से एक वसंत दादा पाटील. मराठा थे. आज मराठवाड़ा के गन्ना बेल्ट में शरद पवार का ज़बरदस्त रसूख है. वो भी मराठा हैं. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

हाल की भर्तियों को लेकर फडनवीस कह रहे हैं कि वो 16 फीसदी सीटें छोड़कर भर्ती करवाएंगे. ताकि जब आरक्षण का रास्ता साफ हो तो बैकलॉग भर्ती में मराठा नौकरी पा सकें.
पंढरपुर का विट्ठल रुखमाई मंदिर सभी वर्णों-जातियों के मराठियों (मराठा जाति है और मराठी सांसकृतिक पहचान) के लिए सबसे पवित्र तीर्थों में से है. यहां हर साल होने वाली आषाढ़ी एकादशी पूजा में महाराष्ट्र के सीएम ज़रूर शामिल होते हैं. इस साल ये पड़ी 23 जुलाई को. लेकिन फडनवीस नहीं पहुंचे. उन्होंने कहा कि राज्य के खुफिया तंत्र ने उन्हें आगाह किया था कि पंढरपुर में गड़बड़ हो सकती है. फडनवीस ने पूजा से पहले मराठा गुटों से आग्रह किया था कि वो कार्यक्रम शांति से निपट जाने दें. लेकिन पूजा में उनकी नामौजूदगी ने नुकसान ही किया. ये मराठा क्रांति मोर्चा के चलते पैदा हुए ज़बरदस्त दबाव को दिखाता है.
लेकिन सच ये है कि दबाव कितना भी बढ़ जाए, देवेंद्र फडनवीस ज़्यादा कुछ कर ही नहीं सकते. वो लगातार मराठा समुदाय के लिए नई योजनाओं का ऐलान तो कर रहे हैं, जैसे हर ज़िले में हॉस्टल, स्कॉलरशिप और ब्याज़ माफी योजनाएं, लेकिन आरक्षण वाली मांग का वो क्या करें, उन्हें ठीक सूझ नहीं रहा.


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