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केके पाठक, नीतीश के वो करीबी अधिकारी जो बिहार को 'डंडे की मार' से पढ़ाना चाहते हैं!

KK Pathak के बारे में अधिकतर लोगों ने अपनी बात कुछ इस तरह शुरू की, केके पाठक काम तो ठीक ही कर रहे हैं लेकिन... इस स्टोरी में हम इस 'लेकिन' का जवाब ढूंढेंगे.

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who is kk pathak
नीतीश कुमार और केके पाठक. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे/PTI)
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25 जनवरी 2024 (Updated: 25 जनवरी 2024, 20:35 IST)
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साल 2005. मार्च का महीना, कुछ दिनों पहले तक बिहार में राबड़ी देवी की सरकार थी. लालू यादव का गृह जिला- गोपालगंज. यहां के सांसद थे- अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव. साधु यादव के साथ सिर्फ एक सांसद की ही पहचान नहीं थी. साधु राबड़ी देवी के भाई हैं, यानी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के साले. साधु गोपालगंज में MPLADS फंड से पैसों की व्यवस्था करके पुल बनवाते हैं. पुल का उद्घाटन होना था. उद्घाटन एक ‘VIP’ करने वाले थे. लेकिन ‘VIP’ के आने में देरी हो गई. जिले के DM ने ‘VIP’ का इंतजार करने की बजाए एक सफाईकर्मी से अस्पताल का उद्घाटन करवा दिया. जाहिर है इस DM ने दो पूर्व मुख्यमंत्री और एक सांसद से टक्कर ले ली. उस अफसर का नाम था- केके पाठक.

अब कहानी को फास्ट फॉरवर्ड करते हैं. एक वीडियो वायरल होता है. वीडियो नवंबर 2022 का था. वीडियो में पाठक एक मीटिंग में थे. अपने जूनियर्स और बिहार के लोगों के लिए ‘अपशब्द’ का इस्तेमाल किया. एक अधिकारी को तो उनके पद का नाम लेते हुए सीधे तौर पर गाली देते दिखे. वीडियो जब फरवरी 2023 में वायरल हुआ तो सुर्खियां बनीं. उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने पाठक को चेतावनी दी. कहा कि ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. मामला यहीं नहीं रुका. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जानकारी हुई. उन्होंने जांच के आदेश दिए गए. पाठक के और भी वीडियो वायरल हुए. किसी में उनको शिक्षकों को तो किसी में उनको अधिकारियों को हड़काते देखा गया.

वैशाली जिले के एक स्कूल में शिक्षिका को हड़काते केके पाठक, दिसंबर 2023. (वायरल वीडियो का स्क्रिनशॉट)

अब साल 2023 का नवंबर महीना. तब पाठक को शिक्षा विभाग का कमान मिल गया था. मौका था नवनियुक्त शिक्षकों को नियुक्ति पत्र सौंपने का. राजधानी पटना के गांधी मैदान में मंच सजा था. नीतीश ने मंच से कहा कि शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक कितना अच्छा काम कर रहे हैं! इतना कहकर मुख्यमंत्री ने भी एक ‘लेकिन’ लगाया और कहा कि कुछ लोग इनके खिलाफ बोलते हैं. हम जानने की कोशिश करेंगे कि वो कौन लोग हैं जो केके पाठक के खिलाफ बोलते हैं? और इसका कारण क्या है?

खबरों में KK Pathak

हाल-फिलहाल में केके पाठक को लेकर जो सुर्खियां बनीं वो सब अमूमन इन खबरों के आसपास थीं- एक कि उन्होंने पटना के जिलाधिकारी के एक आदेश को अनुचित बताकर उसे मानने से इनकार कर दिया. आदेश था कि ठंड के कारण बिहार के स्कूलों को बंद रखा जाए. दूसरी खबर जुड़ी है पाठक के इस्तीफे की अटकलों को लेकर. 8 जनवरी को केके पाठक छुट्टी पर गए. अफवाह उड़ गई कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया. लेकिन 19 जनवरी को मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद उन्होंने फिर से अपना काम संभाल लिया.

19 जनवरी को पाठक छुट्टी से वापस आए. अगले दिन 20 जनवरी को नीतीश कैबिनेट में एक बड़ा फेरबदल हुआ. तत्कालीन शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर अब पूर्व शिक्षा मंत्री हो गए. वो नीतीश सरकार में राजद कोटे से मंत्री हैं. उनसे शिक्षा मंत्रालय छीन लिया गया. चंद्रशेखर शिक्षा मंत्री से गन्ना मंत्री बना दिए गए.

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बताया गया कि चंद्रशेखर और पाठक में बनती नहीं थी. पाठक अपने फैसलों में चंद्रशेखर की दखलअंदाजी को पसंद नहीं करते थे. इसलिए वो छुट्टी पर चले गए थे. इस दौरान चंद्रशेखर से जब पाठक के छुट्टी पर जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, काम करने का मन नहीं होगा इस्तीफा दे दिए होंगे. हालांकि, इस्तीफे की बात अफवाह निकली और चंद्रशेखर के हाथ से शिक्षा मंत्रालय चला गया. आखिर इसके पीछे की क्या वजहें रहीं होंगी? क्या एक जनप्रतिनिधि और एक नौकरशाह में पावर और दबदबे की लड़ाई चल रही थी?

KK Pathak बनाम चंद्रशेखर

नीतीश सरकार के सहयोगी दल CPI(ML) से पालीगंज के विधायक हैं संदीप सौरभ. उन्होंने लल्लनटॉप को बताया कि वो शिक्षा विभाग में बहाली से जुड़ी कुछ समस्याओं को लेकर चंद्रशेखर के पास गए थे. उन्होंने पूर्व शिक्षा मंत्री को इस संबंध में एक चिट्ठी दी. चिट्ठी में कुछ समस्याओं का ज़िक्र था. और उन समस्याओं के समाधान की मांग की गई थी. 

बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर और केके पाठक. (फाइल फोटो)

बकौल संदीप, मंत्री जी ने सामने से उनको एक और चिट्ठी दिखा दी. मंत्री जी की चिट्ठी में भी लगभग उन्हीं समस्याओं की बात की गई थी जो संदीप की चिट्ठी में थी. ये चिट्ठी लिखी गई थी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को. मंत्री जी ने संदीप को बताया कि उन्होंने इन समस्याओं के बारे में पहले ही मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी है. लेकिन इसका कोई समाधान नहीं निकल पा रहा है. संदीप ने इसका कारण केके पाठक को बताया.

पाठक के विवादित निर्णय

पाठक के वो कौन से निर्णय थे जिन पर चंद्रशेखर से तकरार हो गई? और जिनपर जमके हंगामा हुआ. इस पर संदीप ने शिक्षा विभाग में पाठक के आउटसोर्सिंग के निर्णय को एक बड़ा मुद्दा बताया. कहा,

"केके पाठक के आदेश पर चार एजेंसियां अब बिहार के कॉलेजों में प्राध्यापक की ‘सप्लाई’ करेंगे. ये मजाक की हद है. कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह की बहालियों में ना तो कोई पारदर्शिता होती है और ना ही आरक्षण का रोस्टर."

एक आउटसोर्सिंग एजेंसी की तरफ से जारी किया गया पत्र

उन्होंने आगे बताया,

“इसी तरह प्रत्येक जिले में बिना किसी टेंडर के एक-एक आउटसोर्सिंग एजेंसी को सरकारी स्कूलों में गेस्ट शिक्षक व अन्य पदों की ‘सप्लाई’ का ठेका दे दिया गया है. सरकार इसे संज्ञान में ले. इसमें भारी भ्रष्टाचार, अनियमितता और कानूनों का उल्लंघन है. तत्काल इस तरह के सभी आदेशों को रद्द किया जाए.”

MLA संदीप सौरभ ने आरोप लगाया कि आउटसोर्सिंग में पैसे लेकर बहाली की जा रही है.

बात इतनी ही नहीं है. केके पाठक ने बिहार के स्कूलों में शिक्षकों के आने-जाने के समय और उनकी छुट्टियों में भी बदलाव किए हैं. इनमें बच्चों का नाम काटना भी शामिल है. साथ ही शिक्षकों के वेतन कटौती के मामले भी बढ़े हैं. पाठक ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित विधान पार्षद (MLC) प्रो. संजय कुमार सिंह के पेंशन पर भी रोक लगा दी थी. जिसको लेकर पिछले साल दिसंबर महीने में नीतीश सरकार के ही एक और सहयोगी दल CPI ने पाठक के इस्तीफे की मांग की थी. संजय सिंह शिक्षक संघ फुटाब के महासचिव हैं. फुटाब के कार्यकारी अध्यक्ष कन्हैया बहादुर सिन्हा के पेंशन पर भी रोक लगा दी गई थी. कारण कि उन्होंने एक अखबार से बातचीत में बिहार की एजुकेशन पॉलिसी की आलोचना की थी.

 

शिक्षा विभाग का पत्र.

MLC संजय सिंह ने लल्लनटॉप को बताया,

“केके पाठक संविधान के मौलिक अधिकारों को चुनौती दे रहे हैं."

इस पर संदीप सौरभ ने बताया कि पाठक शिक्षकों को मीडिया से बात नहीं करने देते. शिक्षक अगर कोई संगठन बनाते हैं या किसी संगठन का हिस्सा बनते हैं तो उन पर कार्रवाई कर दी जाती है. उन्होंने कहा कि ऐसे हालात इमरजेंसी के टाइम में भी नहीं थे.

दरभंगा में एक स्कूल में शिक्षकों के साथ पाठक, अगस्त 2023. (तस्वीर साभार: इंडिया टुडे)

18 अगस्त 2023 को बिहार शिक्षा विभाग ने बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के VC और प्रो-वीसी का भी वेतन रोक दिया था. हालांकि, राजभवन ने एक दिन बाद इस फैसले को पलट दिया.

शिक्षकों की समस्या क्या है?

अपर मुख्य सचिव ने जो निर्णय लिए उसमें एक पक्ष शिक्षकों का भी है. लल्लनटॉप ने इस स्टोरी के लिए कम-से-कम आधा दर्जन शिक्षकों से बात की है. लगभग सभी ने अपनी बात में जोड़ा कि केके पाठक काम तो अच्छा ही कर रहे हैं लेकिन… सबने इस वाक्य के बाद 'लेकिन' क्यों लगाया? जवाब दिया MLC संजय कुमार सिंह ने. बताया,

“पाठक शिक्षा में सुधार की बात कर रहे हैं जो सब चाहते हैं. लेकिन उनको पहले अपना (शिक्षा विभाग का) आकलन करना चाहिए. पाठक सिर्फ कागजी तौर पर विकास की बात करते हैं. अपनी कमी नहीं देखते.”

उन्होंने आगे कहा,

"एक शिक्षक को डरा-धमका कर आप सही शिक्षा नहीं दिला सकते. सरकारी स्कूल में गरीब परिवार के बच्चे पढ़ते हैं. जिनके पास ठंडी के ठीक-ठाक कपड़े तक नहीं होते. ऐसे में कड़ाके की ठंडी में उनको स्कूल में बुलाया जा रहा है. और बच्चों को कुछ हो जाता है तो ये भी शिक्षकों की ही जिम्मेवारी होती है. स्कूलों में कोई व्यवस्था नहीं है."

संजय सिंह ने ये भी कहा कि किसी भी विभाग को जनप्रतिनिधि और नौकरशाह को मिलकर चलाना चाहिए. लेकिन यहां तो सिर्फ नौकरशाह की चल रही है. उन्होंने कहा कि विभाग में मंत्री और पाठक के बीच तकरार थी. जिसके कारण चंद्रशेखर से शिक्षा मंत्रालय ले लिया गया.

 इसके अलावा, शिक्षकों ने लल्लनटॉप से बातचीत में पाठक के जिन निर्णयों की आलोचना की उसमें ‘छुट्टियों में कटौती’ एक बड़ा मुद्दा था. एक महिला शिक्षिका ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया,

"पाठक शिक्षकों पर राज करना चाहते हैं. शिक्षकों पर उनका अधिकार है लेकिन बच्चों पर तो नहीं है न."

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए समझाया,

"पिछले साल रक्षाबंधन की छुट्टी रद्द कर दी गई थी. इसके बाद स्कूल में शिक्षक तो पहुंच गए लेकिन बच्चे ही नहीं आए."

एक नवनियुक्त शिक्षक ने केके पाठक के उस फैसले पर भी सवाल उठाया जिसमें शिक्षकों की कंप्यूटर के जरिए रैंडम बहाली की गई. उन्होंने बताया कि सभी नए शिक्षकों को उनके घरों से बहुत दूर के स्कूलों में बहाल किया गया है. दिव्यांग शिक्षकों को भी होमटाउन नहीं दिया गया.

अक्टूबर 2023 में, बिहार शिक्षा विभाग ने कम एटेंडेंस होने के कारण सरकारी स्कूलों के 20 लाख से अधिक बच्चों का नाम काट दिया था. जिन बच्चों के नाम काटे गए उनमें से 2.66 लाख बच्चे ऐसे थे जो क्लास 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा देने वाले थे. शिक्षा विभाग के इस फैसले के लिए भी केके पाठक की आलोचना की गई.

विवादों में Pathak

पिछले साल दिसंबर महीने में एक और खबर आई जिसमें पता चला कि पाठक से बिहार के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेक भी नाराज हैं. उन्होंने एक बैठक में कहा कि बिहार का शिक्षा विभाग उच्च शिक्षा में अड़ंगा लगा रहा है. अब थोड़ा और पीछे चलते हैं और पाठक से जुड़े कुछ और विवादों पर नजर डालते हैं.

साल 1996 में पाठक गिरिडीह जिले की कमान संभाल रहे थे. The Print की एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने यहां एक पत्रकार को कथित तौर पर पीट दिया था. क्योंकि पाठक कहना था कि पत्रकार ने उनके बारे में गलत रिपोर्ट छापी थी.

साल 2016 में केके पाठक ने भाजपा नेता सुशील मोदी को एक कानूनी नोटिस भेजा था. कहा था कि सुशील ने उनको ‘सनकी’ कह के उनका अपमान किया है.

SBI बैंक की तरफ से साल 2018 में पाठक पर अपने पावर का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा. मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने पाठक पर 1.75 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. दरअसल उन्होंने 2016 में SBI के 7 ब्रांच मैनेजर्स के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का आदेश दिया था. पाठक तब निबंधन, उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग के प्रधान सचिव थे.

पाठक ने कनपटी पर रखा बंदूक

साल 2019 में केके पाठक लघु सिंचाई विभाग के प्रधान सचिव थे. उन पर पटना में एक ठेकेदार को डंडे से पीटने और उसकी कनपटी पर बंदूक रखने का आरोप लगा. इस मामले में पाठक पर सचिवालय थाने में मामला दर्ज किया गया था.

सितंबर 2023 में पाठक पर पटना हाईकोर्ट के अवमानना के लिए 20 हजार रूपए का जुर्माना लगा. मामला नियोजित शिक्षक की बहाली से जुड़ा था. एक शिक्षिका ने मुकदमा दायर कर आरोप लगाया था कि बहाली में शिक्षा विभाग ने पारदर्शिता नहीं बरती. कोर्ट ने जवाब देने के लिए विभाग को दो महीने का समय दिया. जब ऐसा नहीं हुआ तो कोर्ट ने इसे अवमानना मानते हुए विभाग के सचिव केके पाठक पर जुर्माना लगा दिया.

केके पाठक से जुड़े विवादों की लिस्ट इससे भी ज्यादा लंबी है. लेकिन सवाल ये है कि इतने सारे तकरारों के बावजूद पाठक अभी भी अपना दबादबा कायम रखने में सक्षम कैसे हैं? इस बारे में MLA संदीप सौरभ स्पष्ट बताते हैं,

"केके पाठक के सर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का हाथ है. ये मुख्यमंत्री का पूर्वाग्रह ही है जो वो अभी तक बने हुए हैं."

पाठक की बढ़ती लोकप्रियता के बारे में उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के जरिए ऐसा माहौल बना दिया गया है कि केके पाठक बिहार बदलने वाले हैं. जबकि उनके द्वारा लिए गए सारे निर्णय गलत साबित हो रहे हैं. उन्होंने कहा,

“जो लोग उनका (केके पाठक) गुणगान कर रहे हैं. उनमें ज्यादातार ऐसे मिडिल क्लास के लोग हैं जिनके खुद के बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ते और जिनके परिवार में कोई शिक्षक भी नहीं है. इसलिए उनको असल समस्याओं के बारे में पता ही नहीं है.”

KK Pathak और Nitish Kumar

55 साल के केके पाठक का पूरा नाम है केशव कुमार पाठक. 1990 बैच के IAS अधिकारी हैं. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. 2005 में नीतीश जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो केके पाठक बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण और बाद में बिहार राज्य आवास बोर्ड (BIADA) के प्रबंध निदेशक बनाए गए. 2010 में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने से पहले उन्होंने शिक्षा विभाग में सचिव के रूप में भी काम किया.

2015 में बिहार में जब महागठबंधन की सरकार बनी तो नीतीश कुमार ने पाठक को वापस बुलाया. 2015 में शराबबंदी की बहाल करने के प्रयासों के लिए भी चर्चा में रहे. 2017-18 में फिर से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले गए. फिर से वापस आए 2021 में. इस बार प्रोमोशन के साथ आए. और तब से नीतीश के करीबी बताए जाते हैं. (ये भी पढ़ें: नीतीश के करीबी गुम क्यों हो जाते हैं?)

वीडियो: बिहार के IAS केके पाठक का वीडियो वायरल, अधिकारी और लोगों को गाली देने का आरोप!

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