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हमारी फिल्म sexuality vs manhood पर है, वहीं ‘गैंग्स..’ बदले की कहानी थी

(Interview) 1 जुलाई को रिलीज हो रही व्यंग्यात्मक एडल्ट कॉमेडी केरी ऑन कुत्तों के लेखक हिमांशु ओंकार त्रिपाठी से बातचीत.

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फिल्म का पोस्टर.
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गजेंद्र
29 जून 2016 (अपडेटेड: 29 जून 2016, 09:08 PM IST)
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उड़ता पंजाब और रमन राघव 2.0 जैसी फिल्मों ने हाल ही में आह्लादित किया है. हमारे बीच के विषय, उन पर बहुत ही सुलझी हुई और आगे की सोच, आला दर्जे के प्रस्तुतिकरण और बहुत ऊंचे प्रभाव मूल्यों के साथ ये फिल्में बनीं. धीरे-धीरे ऐसी फिल्मों की संख्या बढ़ती हुई लग रही हैं. जहां कहानी और किरदारों की मांग के मुताबिक अपशब्दों के प्रयोग से फिल्म लेखक, निर्देशक और निर्माता घबरा नहीं रहे. वे ए सर्टिफिकेट के साथ अपनी फिल्में ला रहे हैं और युवा दर्शकों तक सीधा पहुंच रहे हैं.
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इसका ट्रेलर जून के शुरू में आया था और बिना किसी स्टार की मौजूदगी के ध्यान बंटाने में सफल रहा.
https://www.youtube.com/watch?v=lRhlJUNx0R0
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इन तीन के अलावा दो नए चेहरे हैं. करण महावर जो सूरज के रोल में हैं उन्हें सब टची लौंडा कहते हैं. अराधना जगोता फिल्म में ज्योति का रोल कर रही हैं. ट्रेलर में उसका डायलॉग भी याद रह जाता है. जब तक टच फोन नहीं दोगे न, टच भी नहीं करने देंगे. फिल्म में ऐसे ही चुटकी भरे संवाद खूब लग रहे हैं. पीयूष मिश्रा का नरेशन भी चीजों को खास बनाता है.
फिल्म का निर्देशन अशोक यादव ने किया है. उनकी ये पहली फिल्म है. कहानी और स्क्रीनप्ले लिखा है हिमांशु ओंकार त्रिपाठी और अशोक ने. हिमांशु की भी ये पहली फिल्म है.
केरी ऑन कुत्तों की जर्नी, इसके पीछे की सोच और अन्य पहलुओं पर हिमांशु से बात हुई. उन्होंने अपने बारे में भी बताया:
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हिमांशु ओंकार

लेखन 2008 से

मैंने फिल्म स्कूल में दाखिला लिया था 2008 में. दिल्ली में. तब से ही लिख रहा हूं. मुझे उस स्कूल ने नहीं वहां के शिक्षक ने बनाया है इसलिए स्कूल का नाम नहीं बताऊंगा. केरी ऑन कुत्तों पहली फिल्म है.

संपूर्णता में एक डायरेक्टर हूं

मैं एक एक्सीडेंटल राइटर हूं. पहले मैं एक फिल्ममेकर हूं. मैं डायरेक्टर की तरह सोचता हूं. संपूर्णता में एक डायरेक्टर हूं जो कैमरा, स्टोरी, डायरेक्शन, एडिटिंग सब सोचता है.

केरी ऑन कुत्तों

फिल्म स्कूल में शॉर्ट फिल्में बनाता था. वहीं तब केरी ऑन कुत्तों की थीम पर काम करने लगे. अशोक (निर्देशक) सीनियर थे. वो कोई सेक्स कॉमेडी पर काम कर रहे थे. मैंने उन्हें स्क्रीनप्ले पढ़ने के लिए दिया था. उन्हें अच्छा लग गया. बीते नवंबर तक मुझे लगता था कि ये फिल्म बनेगी ही नहीं, कोई मजाक चल रहा है. सब मजाक में ही लगे रहते थे. किसी भी चाय की टपरी पर बातें करते रहते थे. मैंने और अशोक ने काठमांडू पैदल घूमकर इस स्क्रिप्ट की रीराइटिंग की. हम घूमते रहते थे. बात करते थे. चाय पीते थे. ऐसे करके फाइनल स्क्रिप्ट लॉक की. हम लोगों के लिखने का तरीका बहुत अक्खड़ था. लेकिन इससे आप नेचुरल तरीके से किसी सीन को चर्चा करके निकाल ले जाते हो. ऑफिस की चारदीवारी में ऐसा होता नहीं. दफ्तरों में बैठ लिखते हैं तो असल जिंदगी से दूर हो जाते हैं. वहां सड़कों पर भटकते हुए स्क्रिप्ट में आई बड़ी से बड़ी मुश्किल सुलझा लेते थे.

समाज के बीच ही रहना है

मुझे लगता है कि फिल्मों में आगे जाने के बाद भी ऑफिस में बैठकर स्क्रिप्ट लिखने वाले जोन में हम नहीं जा पाएंगे. क्योंकि हमें आदत नहीं हैं. हम जिंदगी से हट नहीं सकते. राइटर-डायरेक्टर होने का मतलब है समाज की नब्ज़ पकड़े रहें. राइटर एसी रूम में, 20 बुद्धिजीवियों के बीच बैठकर काम नहीं कर सकता. इसलिए मैं अंधेरी में (मुंबई के) रहता नहीं क्योंकि यहां बहुत राइटर-डायरेक्टर रहते हैं.

हमारी लल्लनटॉप भाषा है

समाज के करीब होने के कारण ही हमारी फिल्म में एक किस्म की लंठई है. जैसे आपका द लल्लनटॉप है. एकदम लंठ भाषा में लिखते हैं. हमारी फिल्म और उसकी भाषा भी वैसी ही है.

मनोरंजन/सार्थकता

सार्थक की परिभाषा क्या होती है? हमारे लिए ये है कि समाज में किस तरीके से चीजें चल रही हैं. कि किसी बंदे को कोई समस्या आ गई है. कि पात्र को सिर्फ इसलिए घर से निकाल दिया जाता है क्योंकि बाप उसे अफोर्ड नहीं कर पा रहा है. हमने समाज की जटिलता अपनी कहानी में spoon-feed नहीं की है. सिंपल तरीके से दिखाई है. समझना पड़ेगा थोड़ा कि जो चीज है तो क्यों है. केरी sexually frustrated है तो क्यों है? वो आगे क्यों निकलना चाहता है? हमारी कहानी के किरदार समाज के वो विद्रोही हैं जिन्हें फ्रीडम चाहिए. किसी को धंधे से, किसी को संघर्ष वाली लाइफ से, किसी को रूढ़ियों से, या किसी अन्य चीज से फ्रीडम चाहिए. विशेष रूप से कहूं तो जब किसी गलत चीज के साथ कोई अच्छी चीज मर जाती है तो वो केरी ऑन कुत्तों होती है. वो पात्र आजादी खोजते-खोजते एक दुखांत की ओर पहुंच जाते हैं.

गैंग्स.. जैसी फिल्मों से तुलना

तुलनाओं की दरअसल एक श्रंखला होती है. कोई सरकार बनाएगा तो बोला जाएगा कि द गॉडफादर से प्रेरित है. गैंग्स ऑफ वासेपुर को लेकर बोलते हैं कि सिटी ऑफ गॉड जैसी है. जबकि असल में हमारी फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर नहीं है बल्कि उस जॉनर की फिल्म है. शैली है. जैसे पाश्चात्य होती है, भारतीय है. मैथिली है. हमारा जॉनर क्राइम और सटायर है. हमारी थीम ही अलग है गैंग्स से. हमारी फिल्म का प्रमुख मुद्दा है Sexuality vs Manhood. गैंग्स में बदला था. जबकि हमारे पात्र फ्रीडम खोज रहे हैं.

कैसी आजादी

हमारे समाज की कुछ परिभाषाएं हैं. जैसे एक ये है कि जब शादी होती है तभी कौमार्य भंग करो यानी वर्जिनिटी लूज़ करो. हमारा कैरेक्टर उस परिभाषा से बाहर आजाद होना चाहे तो समाज गलत कहता है. इन पात्रों ने कभी हार माननी सीखी नहीं है. वे लड़ेंगे और उसके लिए जान दे देंगे. इनका एक दुखांत होता है जैसे शेक्सपीयर के लिखे, जैसे हैमलेट के पात्रों का होता है कि सब मर जाते हैं.

सब मर जाते हैं?

दुखांत होता है, इसका मतलब ये नहीं कि मर जाते हैं. ये सब ट्रैजिक किरदार हैं.

Liberal होने की हद

जिसे हम विकास बोलते हैं. पहले हम और सब जानवर साथ रहते थे न? लेकिन इंसानों ने चुना कि हम विकसित होंगे. तो वे आगे बढ़े. हम बढ़ते गए. आगे भी हमारा विकास बढ़ता जाएगा. आगे हम स्वतंत्रता के नए-नए डाइमेंशन पार करते जाएगे. जो बुनियाद है विकास की वो है Seeking the ultimate freedom. मानवता की बुनियाद भी यही है. इसीलिए सब लोग भाग रहे होते हैं. आज हम पब्लिक में हाथ पकड़ते हैं. पहले नहीं करते थे.

अतीत

बलिया, यूपी का रहने वाला हूं. आरएसएस का बैकग्राउंड है. शिशु मंदिर में पढ़ा. शाखा जाता था. लिट्रेचर कभी नहीं पढ़ा. रात को पढ़ता, सुबह परीक्षा देने जाता था. राइटर एक्सीडेंट से बन गया. क्योंकि पूस की रात पढ़ ली थी प्रेमचंद की लिखी. फिल्म स्कूल जाना था तो सोचा लोग क्या कहेंगे राइटर बनना है, कौन सी कहानी पढ़ी है? तो सोचा पूस की रात बता दूंगा. प्रेमचंद को पढ़ा है. अज्ञेय बहुत पढ़ा है. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय. आरएसएस की विचारधारा में पाल कर रखा गया. 21 साल की उम्र में केरी ऑन कुत्तों लिखी थी. अब 25 का हूं.

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RSS की विचारधारा

मैं गोरखपुर के हॉस्टल में रहता था. योगा करता था. लोग तो फैशन के चलते आज करने लगे हैं. हम हाफ पैंट पहनते थे. शाखा में प्रार्थना करते थे. आरएसएस कभी कुछ करने के लिए फोर्स नहीं करता. जैसी धारणा है वैसा है नहीं. मेरी क्लास में वसीम अहमद नाम का लड़का भी पढ़ता था जो अभी नाइजीरिया में काम कर रहा है.

मौजूदा जुड़ाव

अब जा नहीं पाता हूं RSS के आयोजनों में. मौका मिले तो चंदा देने की कोशिश करता हूं.

विरोधाभास खोजने हैं

गोरखपुर की दुनिया अलग थी. दिल्ली पहुंचे तो दुनिया बड़ी हो गई. मुंबई पहुंचा तो दुनिया और बड़ी हो गई. तो दुनिया बहुत बड़ी है. बहुत कुछ सीखना है. चुनौती देनी है खुद को. हो सकता है मैं दक्षिणपंथ का विरोधाभास खोजूं. लेफ्ट को खोजूं. मेरे लिए तटस्थता बहुत जरूरी है. प्रोग्रेसिव होना बहुत जरूरी है.

रूचि वाले विषय

मैं फैंटेसी, एनिमेशन वाला आदमी हूं. खाली टाइम में नॉवेल और कविता लिखता रहता हूं. फाइंडिंग नीमो और फाइंडिंग डोरी वाला आदमी हूं. फीचर फिल्मों में आगे कोशिश में रहूंगा कि केरी ऑन कुत्तों का जॉनर फिर से न करूं. नई चीजें करूं. नए किरदार दुनिया को हम दें, नए नजरिए दें. दृष्टिकोण दुनिया को देना बहुत जरूरी है. जैसे मार्टिन लूथर से पहले नहीं था वो दृष्टिकोण. उन्होंने दिया. नजरिए गलत भी हो सकते हैं, सही भी. निर्भर करता है सामने वाले पर.

फैमिली

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सपोर्ट है

मेरी तबीयत खराब थी तो मुझसे मिलने पापा आए थे. मैंने फिल्म का ट्रेलर दिखाया. पहले लगा कि इसमें इतनी गालियां हैं क्या बोलेंगे? डर लग रहा था. जूते से मारने न लगें. लगता है डर शुरू में! उन्होंने लेकिन कहा मुझे दिखाओ. हमारे माता-पिता बहुत लिबरल होते हैं. वीडियो देखा और बोला कि मुझे ब्लूटूथ से भेज दे. वो बलिया लेकर गए ट्रेलर वीडियो. बहुत खुश थे कि कुछ कर रहा हूं. बहुत ही हंबल बैकग्राउंड से हूं. मेरे जीजा हैं महेश वो दूसरे पिता की तरह हैं. वो कहते हैं वही करना जो तुम्हे करना है. मेरे खाते में पैसे डाल देते हैं. बहुत सपोर्ट है. बहुत जरूरी होता है. मैं लकी हूं.
https://www.youtube.com/watch?v=LGw8Sj7wJqU

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