विदेश नीति के इस सबसे बड़े मोर्चे पर मोदी जी औंधे मुंह गिरे हैं
मोदी जी चार दिन भारत में रहते हैं, फिर उड़ान भर लेते हैं. लेकिन रिज़ल्ट ज़ीरो है.
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मोदी जी पर जितने मीम बनते हैं, उनमें से आधे उनकी विदेश यात्राओं पर होते हैं. वो इतनी यात्राएं करते हैं कि विकिपीडिया पर एक पेज ''List of international prime ministerial trips made by Narendra Modi'' नाम से भी बना हुआ है. इसके मुताबिक मोदी जी अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप पर जा चुके हैं. 38 यात्राओं में उन्होंने 55 देशों में दस्तक दी. वहां फोटू खिंचवाई. नेताओं से मिले.
सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं लेकिन वो आपात स्थितियों में ही दखल देती हैं. तो मोदी जी की विदेश यात्राओं की वजह ये बताई जाती है कि इनसे दूसरे देशों से भारत के संबंध बेहतर होते हैं. इसी को जटिल हिंदी में विदेश नीति कहते हैं. लेकिन विदेश नीति का आधार तस्वीरें और सौजन्य मुलाकात नहीं होता. उसका आधार होता है व्यापार. व्यापार में भी निर्यात. माने एक्सपोर्ट. ताकि पैसा देश में आए और उससे वो चीज़ें खरीदी जा सकें जो देश में नहीं होतीं. तो मोदी जी इस मामले में कितने कामयाब रहे हैं?

अपने कार्यकाल की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों पर ध्यान देना शुरू किया था. इस फोटो में वो दक्षिण कोरिया की राष्ट्रपति के साथ नज़र आ रहे हैं. (फोटोःपीआईबी)
इसका जवाब वरिष्ठ पत्रकार अंशुमान तिवारी के कॉलम 'अर्थात' में मिलता है, जो उन्होंने इंडिया टुडे मैग्ज़ीन के लिए लिखा है. इस बार के 'अर्थात' का शीर्षक है 'अर्थात्ः दुनिया न माने'. हम तिवारी के लेख की खासम-खास बातें यहां प्रस्तुत कर रहे हैं:
यकीनन मोदी सरकार के कूटनीतिक अभियान लीक से हटकर "आक्रामक'' थे लेकिन फिर विदेश व्यापार को सांप नहीं, पूरा का पूरा ड्रैगन सूंघ गया. कुछ आंकड़ों पर गौर करें-
- पिछले चार सालों में भारत का (मर्चेंडाइज) निर्यात बुरी तरह पिटा. 2013 से पहले दो सालों में 40 और 22 फीसदी की रफ्तार वाली निर्यात बढ़त बाद के पांच वर्षों में पांच फीसदी के अंदर सिमट गई. बीच-बीच में माइनस में तक रही. पिछले वित्त वर्ष (फाइनेंशियल ईयर) में निर्यात दस फीसदी बढ़ा. बावजूद इसके हम एशिया में अपने प्रतिस्पर्धी देशों — थाइलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और कोरिया से कहीं पीछे हैं.

निर्यात न हो तो देश का पैसा धीरे-धीरे बाहर चला जाता है और बाहर से ज़रूरी चीज़ें मंगाने के लिए पैसा नहीं बचेगा. (फोटोःरॉयटर्स)
- अमूमन भारत में बाज़ार ठंडा रहने के पीछे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मंदी बता दी जाती है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. पिछले दो सालों में दुनिया की विकास दर बढ़ी है. अतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का अनुमान है कि इस साल भी ये बढ़ने ही वाली है. (2016 में ये 3.2% थी, 2017 में 3.7% और 2018 में 3.9 % रह सकती है.) डब्ल्यूटीओ के मुताबिक लगभग एक दशक बाद विश्व व्यापार (माने इंटरनैशनल ट्रेड) 3% की औसत विकास दर से ऊपर (4.7%) गया है. लेकिन भारत विश्व व्यापार में तेजी का कोई लाभ नहीं ले पा रहा है.
- पिछले पांच सालों में चीन ने सस्ता सामान मसलन कपड़े, जूते, खिलौने वगैरह का उत्पादन कम किया है और अब वो मध्यम और उच्च तकनीक के उत्पाद बनाने लगा है. लेकिन ये खाली जगह भारत की जगह विएतनाम और बांग्लादेश जैसे छोटे देश भर रहे हैं. क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत विएतनाम और बांग्लादेश भारत को उन क्षेत्रों में भी चुनौती दे रहे हैं जहां कभी हमारा डंका बजता था - माने कपड़े और फुटवियर. वो भी तब, जब इनके लिए ज़रूरी कच्चे माल की सप्लाई बढ़ी है. इनके अलावा ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट्स में भी बढ़ोतरी पिछले सालों से काफी कम रही है.

500 और 1000 के पुराने नोट बंद होने का सबसे बुरा असर छोटे व्यापारियों पर पड़ा. (फोटोःरॉयटर्स)
- मोदी जी के सबसे साहसिक कदम माने नोटबंदी और सबसे बड़े आर्थिक सुधार यानी जीएसटी ने भी बहुत नुकसान किया. इनकी मार ठीक तब पड़ी जब भारत में निर्यात को नई ताकत की जरूरत थी. नतीजतन जीडीपी में निर्यात का हिस्सा 2017-18 में 15 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया. सबसे ज्यादा गिरावट आई कपड़ा, चमड़ा, आभूषण जैसे क्षेत्रों में, जहां सबसे ज्यादा रोजगार हैं.
- ये भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह सब उस वक्त हुआ जब भारत में मेक इन इंडिया की मुहिम चल रही थी. शुक्र मनाइए कि भारतीय शेयर बाजार में थोड़ा-बहुत विदेशी निवेश आ रहा था और तेल की कीमतें कम थीं, जिससे विदेशी मुद्रा माने फॉरेन एक्सचेंज का खज़ाना बचा रहा. निर्यात के भरोसे रहते तो हालत और खराब हो सकती थी. लेकिन ये दिन भी अब लदने वाले हैं. UNCTAD माने यूनाइटेड नेशन्स कॉनफ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट की ताज़ा रिपोर्ट ने भारत में विदेशी निवेश घटने की चेतावनी दी है जबकि विदेशी निवेश के उदारीकरण में मोदी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया कार्यक्रम का भी खास असर पड़ना अभी बाकी है. (फोटोःरॉयटर्स)
तो इन आंकड़ों की वजह क्या है? विश्व बाज़ार की तमाम तेज़ी के बावजूद भारत में व्यापार ने उलटी गिनती क्यों गिनी. एक कारण ये है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की दुनिया में हालात तेजी से बदलते रहते हैं. जब तक हम समझ पाते तब तक अमेरिका ने भारत से आयात पर बाधाएं लगानी शुरू कर दीं. आइएमएफ के मुताबिक आने वाले सालों में अमेरिका और यूरोप के देशों में आयात घटेगा. जिस तरह हमने सस्ते तेल के फायदे गंवा दिए ठीक उसी तरह निर्यात बढ़ाने और नए बाजार में स्थापित होने का मौका भी खो दिया है. शायद यही वजह है कि चार साल के अपने काम के हिसाब-किताब में सरकार ने विदेश नीति की सफलताओं पर बहुत रोशनी नहीं डाली है.
भारत के जीडीपी में निर्यात का हिस्सा एक वक्त 19 फीसदी तक रहा है. और इस निर्यात में भी 40 फीसदी हिस्सा छोटे उद्योगों का है. यानी कि निर्यात बढ़ेगा तो रोज़गार बढ़ेगा. रोज़गार बढ़ाना केंद्र की भाजपा (एनडीए) के सबसे बड़े वादों में से एक था. इसलिए पीएम मोदी की विदेश नीति की समीक्षा बहुत ज़रूरी है. इसपर बात होनी चाहिए और बहस भी.
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सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं लेकिन वो आपात स्थितियों में ही दखल देती हैं. तो मोदी जी की विदेश यात्राओं की वजह ये बताई जाती है कि इनसे दूसरे देशों से भारत के संबंध बेहतर होते हैं. इसी को जटिल हिंदी में विदेश नीति कहते हैं. लेकिन विदेश नीति का आधार तस्वीरें और सौजन्य मुलाकात नहीं होता. उसका आधार होता है व्यापार. व्यापार में भी निर्यात. माने एक्सपोर्ट. ताकि पैसा देश में आए और उससे वो चीज़ें खरीदी जा सकें जो देश में नहीं होतीं. तो मोदी जी इस मामले में कितने कामयाब रहे हैं?

अपने कार्यकाल की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों पर ध्यान देना शुरू किया था. इस फोटो में वो दक्षिण कोरिया की राष्ट्रपति के साथ नज़र आ रहे हैं. (फोटोःपीआईबी)
इसका जवाब वरिष्ठ पत्रकार अंशुमान तिवारी के कॉलम 'अर्थात' में मिलता है, जो उन्होंने इंडिया टुडे मैग्ज़ीन के लिए लिखा है. इस बार के 'अर्थात' का शीर्षक है 'अर्थात्ः दुनिया न माने'. हम तिवारी के लेख की खासम-खास बातें यहां प्रस्तुत कर रहे हैं:
यकीनन मोदी सरकार के कूटनीतिक अभियान लीक से हटकर "आक्रामक'' थे लेकिन फिर विदेश व्यापार को सांप नहीं, पूरा का पूरा ड्रैगन सूंघ गया. कुछ आंकड़ों पर गौर करें-
- पिछले चार सालों में भारत का (मर्चेंडाइज) निर्यात बुरी तरह पिटा. 2013 से पहले दो सालों में 40 और 22 फीसदी की रफ्तार वाली निर्यात बढ़त बाद के पांच वर्षों में पांच फीसदी के अंदर सिमट गई. बीच-बीच में माइनस में तक रही. पिछले वित्त वर्ष (फाइनेंशियल ईयर) में निर्यात दस फीसदी बढ़ा. बावजूद इसके हम एशिया में अपने प्रतिस्पर्धी देशों — थाइलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और कोरिया से कहीं पीछे हैं.

निर्यात न हो तो देश का पैसा धीरे-धीरे बाहर चला जाता है और बाहर से ज़रूरी चीज़ें मंगाने के लिए पैसा नहीं बचेगा. (फोटोःरॉयटर्स)
- अमूमन भारत में बाज़ार ठंडा रहने के पीछे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मंदी बता दी जाती है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. पिछले दो सालों में दुनिया की विकास दर बढ़ी है. अतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का अनुमान है कि इस साल भी ये बढ़ने ही वाली है. (2016 में ये 3.2% थी, 2017 में 3.7% और 2018 में 3.9 % रह सकती है.) डब्ल्यूटीओ के मुताबिक लगभग एक दशक बाद विश्व व्यापार (माने इंटरनैशनल ट्रेड) 3% की औसत विकास दर से ऊपर (4.7%) गया है. लेकिन भारत विश्व व्यापार में तेजी का कोई लाभ नहीं ले पा रहा है.
- पिछले पांच सालों में चीन ने सस्ता सामान मसलन कपड़े, जूते, खिलौने वगैरह का उत्पादन कम किया है और अब वो मध्यम और उच्च तकनीक के उत्पाद बनाने लगा है. लेकिन ये खाली जगह भारत की जगह विएतनाम और बांग्लादेश जैसे छोटे देश भर रहे हैं. क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत विएतनाम और बांग्लादेश भारत को उन क्षेत्रों में भी चुनौती दे रहे हैं जहां कभी हमारा डंका बजता था - माने कपड़े और फुटवियर. वो भी तब, जब इनके लिए ज़रूरी कच्चे माल की सप्लाई बढ़ी है. इनके अलावा ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट्स में भी बढ़ोतरी पिछले सालों से काफी कम रही है.

500 और 1000 के पुराने नोट बंद होने का सबसे बुरा असर छोटे व्यापारियों पर पड़ा. (फोटोःरॉयटर्स)
- मोदी जी के सबसे साहसिक कदम माने नोटबंदी और सबसे बड़े आर्थिक सुधार यानी जीएसटी ने भी बहुत नुकसान किया. इनकी मार ठीक तब पड़ी जब भारत में निर्यात को नई ताकत की जरूरत थी. नतीजतन जीडीपी में निर्यात का हिस्सा 2017-18 में 15 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया. सबसे ज्यादा गिरावट आई कपड़ा, चमड़ा, आभूषण जैसे क्षेत्रों में, जहां सबसे ज्यादा रोजगार हैं.
- ये भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह सब उस वक्त हुआ जब भारत में मेक इन इंडिया की मुहिम चल रही थी. शुक्र मनाइए कि भारतीय शेयर बाजार में थोड़ा-बहुत विदेशी निवेश आ रहा था और तेल की कीमतें कम थीं, जिससे विदेशी मुद्रा माने फॉरेन एक्सचेंज का खज़ाना बचा रहा. निर्यात के भरोसे रहते तो हालत और खराब हो सकती थी. लेकिन ये दिन भी अब लदने वाले हैं. UNCTAD माने यूनाइटेड नेशन्स कॉनफ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट की ताज़ा रिपोर्ट ने भारत में विदेशी निवेश घटने की चेतावनी दी है जबकि विदेशी निवेश के उदारीकरण में मोदी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया कार्यक्रम का भी खास असर पड़ना अभी बाकी है. (फोटोःरॉयटर्स)
तो इन आंकड़ों की वजह क्या है? विश्व बाज़ार की तमाम तेज़ी के बावजूद भारत में व्यापार ने उलटी गिनती क्यों गिनी. एक कारण ये है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की दुनिया में हालात तेजी से बदलते रहते हैं. जब तक हम समझ पाते तब तक अमेरिका ने भारत से आयात पर बाधाएं लगानी शुरू कर दीं. आइएमएफ के मुताबिक आने वाले सालों में अमेरिका और यूरोप के देशों में आयात घटेगा. जिस तरह हमने सस्ते तेल के फायदे गंवा दिए ठीक उसी तरह निर्यात बढ़ाने और नए बाजार में स्थापित होने का मौका भी खो दिया है. शायद यही वजह है कि चार साल के अपने काम के हिसाब-किताब में सरकार ने विदेश नीति की सफलताओं पर बहुत रोशनी नहीं डाली है.
भारत के जीडीपी में निर्यात का हिस्सा एक वक्त 19 फीसदी तक रहा है. और इस निर्यात में भी 40 फीसदी हिस्सा छोटे उद्योगों का है. यानी कि निर्यात बढ़ेगा तो रोज़गार बढ़ेगा. रोज़गार बढ़ाना केंद्र की भाजपा (एनडीए) के सबसे बड़े वादों में से एक था. इसलिए पीएम मोदी की विदेश नीति की समीक्षा बहुत ज़रूरी है. इसपर बात होनी चाहिए और बहस भी.
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