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कोई व्यक्ति अगर धर्म बदल ले तो जाति तय कैसे होती है?

अदालतों ने इस बारे में क्या कहा है?

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सांकेतिक तस्वीर.
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डेविड
15 जुलाई 2021 (अपडेटेड: 16 जुलाई 2021, 08:38 AM IST)
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सुपरस्टार शाहरुख खान की एक फिल्म है. स्वदेस. इसमें शाहरुख ने नासा के वैज्ञानिक का रोल निभाया है. फिल्म के एक सीन में मोहन भार्गव (यानी शाहरुख) यूपी के एक गांव के लोगों के साथ ग्रामीण व्यवस्था पर बहस कर रहा होता है. इसमें दोनों तरफ से जातिवाद के पक्ष और विपक्ष में दलीलें दी जाती हैं. मोहन भार्गव अपने तर्कों से गांव वालों को ये समझाने की खूब कोशिश करता है कि जातिवाद जैसी व्यवस्थाओं ने भारतीय समाज को कहां पहुंचा दिया है. इसी बहस के दौरान गांव के एक प्रतिष्ठित वृद्ध कहते हैं- ये सब जात-पात, ऊंच-नीच हमने थोड़े न बनाया है. पीढ़ियों से ऐसा चला आ रहा है. एक बात सुन लो. जो कभी नहीं जाती, उसी को जाति कहते हैं.
भारतीय समाज, और विशेषकर हिंदू समाज के इतिहास को देखते हुए ये बात गलत नहीं लगती. हमारे देश में जाति लेकर पैदा हुआ व्यक्ति इसे खुद से अलग करने की कितनी ही कोशिश कर ले, कामयाब नहीं हो सकता. वो अपने रहने की जगह बदले, नाम बदले या धर्म ही क्यों न बदल ले, जाति से पीछा नहीं छुड़ा सकता.
भारत में धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों में दलित और ओबीसी समाज के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है. लेकिन आपने गौर किया होगा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी उनके लिए दलित मुसलमान, दलित सिख या दलित ईसाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है.
ऐसे में मन में कई सवाल उठते हैं. मसलन, धर्म परिवर्तन के बाद जाति का क्या होता है? क्या उसके बाद भी जाति बनी रहती है? और इस्लाम, सिख धर्म या ईसाइयत मानने वाले इस बारे में क्या सोचते हैं? धर्म बदलने से जाति से मुक्ति मिल जाती है? भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता को मूल अधिकारों में रखा गया है. हर नागरिक अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसके कर्मकांडों की प्रैक्टिस करने के लिए स्वतंत्र है. वो चाहे तो जरूरत महसूस होने पर धर्म बदल ले. जरूरत न हो तो किसी भी धर्म को न माने. ये बड़ी वजह है कि सामाजिक और धार्मिक परंपराएं अक्सर संवैधानिक मूल्यों से टकराती दिखती हैं.
धर्म परिवर्तन से जुड़ी खबरें समय-समय पर सुर्खियां बटोरती हैं. भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज के लिए ये बेशक एक अहम मुद्दा है. कट्टर हिंदू संगठन इसके लिए 'लव जिहाद' को जिम्मेदार मानते हैं. वहीं, हिंदुओं का ही एक बड़ा तबका धर्म परिवर्तन के लिए 'ब्राह्मणवादी व्यवस्था' को दोष देते हैं. इनमें अधिकतर दलित या ओबीसी समाज के लोग होते हैं. हालांकि मुसलमान, सिख या ईसाई बनने के बाद भी दलित या पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की मांग होती है. ऐसे में ये सवाल लाजमी है कि आखिर अलग-अलग धर्मों में यात्रा करने के दौरान जाति का होता क्या है?
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सांकेतिक फोटो

इसका जवाब ढूंढने की कोशिश में हमने ये जाना कि इसका कोई सीधा जवाब नहीं है. इसकी एक बड़ी वजह ये है कि किसी धर्म में जाति व्यवस्था के लिए कोई स्थान न होना और उस धर्म को मानने वालों का जातिवादी न होना, अलग-अलग बात है. अपने-अपने धर्मों के लिए लोग दावा करते हैं कि उनके धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है. इस लिहाज से देखा जाए तो धर्म बदलने पर जाति खत्म हो जानी चाहिए. हालांकि ये बात व्यावहारिकता के स्तर पर कितनी वास्तविक है? मुस्लिम, सिख या ईसाई बनने पर जाति का क्या होता है? हमने इस मुद्दे पर कुछ जानकारों से बात की. मानवाधिकार और ईसाई राजनीतिक कार्यकर्ता जॉन दयाल ने हमें बताया,
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दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के एक सदस्य से जब हमने धर्म परिवर्तन और जाति को लेकर सवाल किया तो पहले उन्होंने कहा कि सिखों में कोई जाति नहीं है. लेकिन फिर उन्होंने इसे पेचीदा मुद्दा बताते हुए कुछ और कहने से इन्कार कर दिया. नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने हमें बताया,
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वहीं, मुस्लिम वुमन स्कॉलर और पत्रकार शीबा असलम फ़हमी ने हमसे बातचीत में कहा,
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भारत के बहुसंख्यकों के लिए धर्म परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है. (फाइल फोटो- पीटीआई)
क्या कहती हैं अदालतें? फरवरी 2015 की बात है. केरल के एक व्यक्ति केपी मनु
 ईसाई से हिंदू बन गए थे. उनके दादा हिंदू से ईसाई बने थे. पिता ने भी ईसाई जीवन बिताया. लेकिन पोता यानी मनु 24 साल की उम्र में ईसाई धर्म छोड़कर हिंदू बन गए. वो शेड्यूल कास्ट के तहत आने वाली पुलिया जाति से आते थे. सो ईसाई से हिंदू बनने के बाद अनुसूचित जाति के कोटे से सरकारी नौकरी करने लगे.
लेकिन इस पर आपत्ति दर्ज की गई और मामला कोर्ट तक पहुंच गया. कहा गया कि ऐसे व्यक्ति को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता जो ईसाई से हिंदू बन गया हो. उधर, राज्य सरकार ने मनु को नौकरी से निकालने और 15 लाख रुपए वसूलने के निर्देश दे दिए. इस दौरान मामला पहले हाई कोर्ट पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट. शीर्ष अदालत ने इस मामले को लेकर अपने फैसले में जो कहा, उस पर गौर फरमाइए,
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सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कहता है कि रीकंवर्जन में व्यक्ति उसी जाति को पा जाता है, जो पूर्व में उसकी पीढ़ियों की जाति रही है. धर्म बदल सकते हैं जाति नहीं
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Livelaw की खबर का स्क्रीनशॉट.

एक और मामले की बात कर लेते हैं. ऊपर लगी तस्वीर लाइव लॉ की 29 अप्रैल 2016 की एक खबर का स्क्रीनशॉट है. इसकी हेडिंग है- A person can change his religion and faith but not the caste to which he belongs, as caste has linkage to birth; SC
यानी- एक व्यक्ति अपना धर्म और आस्था बदल सकता है, लेकिन उस जाति को नहीं जिससे वे संबंधित है, क्योंकि जाति का संबंध जन्म से है: सुप्रीम कोर्ट ये मामला क्या था? मोहम्मद सादिक. पंजाब के मशहूर गायक. उनका जन्म मुस्लिम माता-पिता से हुआ. वे डूम कम्युनिटी से आते हैं जो कि पंजाब की एक अनुसूचित जाति है. मोहम्मद सादिक के परिवार के सदस्य इस्लाम धर्म का पालन करते थे, लेकिन सादिक ने अपना धर्म बदल लिया. मुस्लिम से सिख धर्म अपना लिया. कांग्रेस के टिकट पर मोहम्मद सादिक ने 2012 के विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट भदौड़ से चुनाव भी लड़ा था और जीते थे. उसी सीट पर शिरोमणि अकाली दल-भाजपा के उम्मीदवार दरबारा सिंह गुरु ने सादिक के चुनाव को कोर्ट में चुनौती दी थी. आरोप लगाया कि मुस्लिम होने के बावजूद सादिक ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ा.
याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि सादिक ये साबित करने में असफल रहे कि उन्होंने इस्लाम छोड़ सिख धर्म अपना लिया है. कोर्ट ने कहा कि सादिक मुस्लिम हैं, लिहाजा वे आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के हकदार नहीं हैं.
बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. उसने अपने फैसले में कहा कि जरूरी नहीं कि दूसरा धर्म अपनाने वाला व्यक्ति नाम बदले. शीर्ष अदालत ने ये भी कहा,
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एक्सपर्ट क्या कहते हैं? हम 'धर्म परिवर्तन और जाति' का सवाल लीगल एक्सपर्ट के पास भी लेकर गए. हैदराबाद स्थित NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और इंडियन ऐकडेमिक एंड लीगल एक्सपर्ट फैजान मुस्तफा ने हमें बताया,
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फैजान मुस्तफा ने आगे कहा,
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हमने स्वदेस फिल्म के एक संवाद के हवाले से कहा था कि जो कभी नहीं जाती, उसी को जाति कहते हैं. धार्मिक नुमाइंदों या कार्यकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और अदालती उदाहरणों को जानने के बाद यही समझ आता है कि धर्म परिवर्तन का जाति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. सुप्रीम कोर्ट ने भी जाति को जन्मजात माना है. भले कोई व्यक्ति किसी धर्म को छोड़कर किसी दूसरे धर्म में चला जाए, उसकी जाति बनी रहती है.

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