एक राजा हुए थे पृथु. गुड गवर्नेंस वाले राजा. प्रजा के हित का ध्यान रखने वाले.बात तब की है, जब हर जगह भुखमरी और अराजकता फैली थी और इससे निपटने के लिए पूर्णराज्य के दर्जे या विशेष पैकेज की मांग जैसे विकल्प नहीं खुले थे. बिल्लाई प्रजापृथु के पास पहुंचकर बोली, पृथ्वी सारी मेडिसिन यानी औषधियां लील गई है. अब प्रजाके लिए हो रही है दवा की शॉर्टेज. प्लीज हेल्प महाराज. पृथु को आया गुस्सा. बाणलिया और दौड़ पड़े पृथ्वी के पीछे. घबराई पृथ्वी ने फौरन गेटअप बदला और बन गई गाय.पर पृथु ने पीछा नहीं छोड़ा. आखिर में पृथ्वी ने पृथु से बोल ही दिया, राजा एक लेडीको मारने का पाप करोगे क्या? पृथु ने हाजिरजवाबी से कहा कि विलेन के मरने से अगरपब्लिक में खुशी फैलती है तो यही सही. पृथ्वी ने झट से कहा, ठहरो राजा. एक आइडियाहै. मैंने जो औषधियां खाई हैं, उन्हें मैं दूध की तरह बाहर निकाल सकती हूं, बस एकबछड़े का जुगाड़ कर लीजिए. आप मुझे यानी अपनी पृथ्वी को समतल कर दीजिए, मैं हर जगहदूध गिराकर औषधियां बो दूंगी. पृथु बोले, हां आइडिया तो अच्छा है, रुको. पृथु नेफटाफट सारा अरेंजमेंट किया और गाय रूपी पृथ्वी ने वाया दूध सारी औषधियां बोनी शुरूकर दीं. फिर क्या था. राक्षस, देवता, सर्प, मुनि, पर्वत, गंधर्व सबसे अपना डिब्बालेकर पहुंच लिए. पृथ्वी ने सबको दूध दिया. उनका पोषण किया. इसलिए पृथ्वी या गाय कोसबको जन्म देने वाली, पोषण करने वाली कहा गया. विष्णु पुराण, तेरहवां अध्याय