एक जर्नलिस्ट हैं. नाम हैं जोबी वैरिक. उन्होंने एक किताब लिखी इस साल. ब्लैकफ्लैग्स- द राइज ऑफ आईएसआईएस. इसमें ओसामा बिन लादेन के बाद की कहानियां हैं. सच्चीमुच्ची वाली. पहले हिस्से में जॉर्डन के गुंडे और फिर टेररिस्ट बने अबू मुसाब अलजरकावी की. दूसरे हिस्से में अबू बक्र अल बगदादी की. झाम किताब है. इसीलिए इसे इससाल का पुलित्जर प्राइज मिला है. नॉन फिक्शन कैटिगरी में. लल्लनटॉप आपके लिए लायाहै तीन किस्से. जिनसे पता चलता है कि जेहाद के नाम पर लोगों को मार रहे, औरतों कारेप कर रहे लोग कितने बड़े गधे हैं .1. अडल्ट सिनेमा में बम फोड़ा तो क्या हुआइन काले झंडे वाले झंडू आतंकवादियों को इस्लाम की एक किताब की भविष्यवाणी पर भरोसाहै. किताब का नाम है हदीस. इसमें लिखा है पूर्व से काले झंडेधारी आएंगे. ये बहुतताकतवर होंगे. इनके बाल लंबे होंगे. दाढ़ी होगी. इनके जो सरनेम होंगे, वो इनकेगांवों, कस्बों, कबीलों के नाम होंगे. तो बगदादी का बाप और लादेन का लौंडा यानीटेरर लिस्ट में बीच की कड़ी जॉर्डन का लुच्चा जरकावी ये सब कहता था. बोलता था हमवही हैं, जिनकी बात हदीस करता है. काले झंडे वाले लड़ाके. ये मूरख इस्लाम को बदनामकर रहे थे. बाद में जरकावी अमरीका के मिसाइल हमले में टैं बोल गया. उसके कुछ सालबाद बगदादी के नेतृत्व में आईसिस बना. उन्होंने भी इसी लंतरानी को आगे बढ़ाया. येलोग भी जरकावी को मुजाहिद शेख कहते रहे. शेख का एक चेला था. निरा गधा. ये उसकीकहानी है. जरकावी का एक गुरु था. इस्लाम के नाम पर शुद्धीकरण की बात करता था.मकदीसी नाम था उसका. उसने जॉर्डन की राजधानी अम्मान के आसपास के गुंडे इकट्ठे किए.देने लगा धार्मिक शिक्षा. असल मकसद था उनसे तोड़ फोड़ बमबाजी करना. तो उसके चेलेकभी जाकर शराब की दुकान के बोर्ड तोड़ आते, तो कभी वीडियो शॉप पर गोली चला देते. एकबार ग्रुप के एक मेंबर ने कहा. मैं जेहाद करूंगा. उसे बम फोड़ने का काम दिया गया.कहां, एक अडल्ट फिल्में दिखाने वाले मूवी हॉल में. इस सिनेमाघरों को सलवा कहा जाताहै जॉर्डन में. जेहादी गया. कुछ ही देर में धमाका हो गया. कितने मरे, कितने घायलहुए... कोई नहीं मरा. घायल बस एक आदमी हुआ. उसकी दोनों टांगें उड़ गईं. ये आदमी वहीथा, जो बम लगाने गया था. ऐसा कैसे हो गया. क्या बम पहले ही फट गया. नहीं, ये भटोरेलाल बम लेकर गए. फिल्म चल रही थी भीतर. कुर्सी के नीचे झोला रखा. कुर्सी के ऊपरअपनी तशरीफ रखी. मन लगाकर फिल्म देखने लगे. भूल गए कि बम भी फटना है. बम फटा तोउन्हीं की ऐसी तैसी कर दी. पुलिस ने पकड़ा तो जॉर्डन की कुख्यात अल जब्र जेल में रखदिया. यहां जरकावी ने इसकी बड़ी सेवा की.2. भइया ये टैटू मिटता क्यों नहींजरकावी का पढ़ाई लिखाई में ज्यादा मन नहीं लगता था. और तब तो वो अपने लिए ये केआरएसेट नहीं कर सकता था कि मैं कुछ ऐसा करूं कि अमरीका मुझ पर 25 लाख डॉलर का ईनामरखे. तो लड़कपने के दिनों में वो मारपीट करता, छुरी चलाता, जुआ खेलता. फिर उसकीअम्मी को लगा कि बालक बर्बाद हो रहा है. उसे धार्मिक शिक्षा वाले अड्डों पर भेजनेलगीं. यहां उसे लगा कि ज्ञान के कपाट खुल गए हैं. उस जमाने में अफगानिस्तान मेंलड़ाई चल रही थी. अस्सी के दौर के आखिरी कुछ साल थे. सोवियत रूस काबुल से अलविदा कीनमाज पढ़ चुके थे. अमरीका से बंदूक और पाक से जमीनी सपोर्ट पाए मुजाहिदीन जीत रहेथे. जरकावी जाकर उनके साथ शामिल हो गया. मगर यहां उसे बड़ी शर्म आती, अपनी एक हरकतके चलते. दरअसल अम्मान में रहने के दौरान जरकावी ने अपनी बांह पर एक टैटू गुदवालिया था. माचो फील करने के लिए. मगर उस इस्लाम में तो ये सब घटिया चीजें मानी जातीथीं, जिसे मानने समझने का वो दावा करता था. तो उसे लगा कि साथी मुजाहिदीन मेरा टैटूदेखकर क्या सोचेंगे. बेचारा भरी गर्मी में भी पूरी बांह वाले कपड़े पहनता. फिर उसनेटैटू हटाने के लिए कई जतन किए. कभी कोई जालिम लोशन लगाता तो कभी खाल जलाता. मगर कुछन हुआ. आखिर में उसने छुरा लेकर अपनी वो बांह बुरी तरह काट पीट दी. टैटू तो नहींगया, मगर उसकी असल शकल भी दिखनी बंद हो गई. तब जाकर जरकावी को कुछ राहत मिली.3. खलीफा भी बन जाएंगे, पहले दांत तो मांज लें.ये तीसरी कहानी आईएसआईएस के पापा बगदादी की है. जुलाई 2014 को जनाब इराक के मोसुलशहर पहुंचे. शहर उसके काले लबादे वाले लड़ाकों के कब्जे में था. यहां मुसलमानों केबीच बेहद पॉपुलर और अपने आर्किटेक्चर की वजह से चर्चित अल नूरी मस्जिद है. जुमे केदिन बगदादी इस मस्जिद में गया. यहां उसे लेक्चर झाड़ना था. इसमें क्या नई बात है.नई बात ये थी कि इस पूरे वाकये की वीडियो रेकॉर्डिंग होनी थी. क्योंकि यहीं परबगदादी खुद के खलीफा होने का ऐलान करने वाला था. खलीफा इस्लाम धर्म शुरू करने वालेमोहम्मद साहब के गद्दी पर बैठने वाले वंशजों का कहा जाता था. इनमें से कई महान शासकसाबित हुए. मगर ये हजार बरस पहले की बात थी. अब तो सब जगह डेमोक्रेसी का डंका है.सिर्फ इस्लाम के नाम पर कोई भी दो कंट्री मिलकर एक नहीं हुए. तो इस्लाम का सूबाकैसे बनता. बहरहाल, बगदादी ने पहले पब्लिक अपीयरेंस में जमकर नौटंकी की. अपने कबीलेकी वजह से वह मोहम्मद साहब की वंशावली से जुड़ा था. इसलिए उस पाजी को लगता था कि वहएक महान आदमी की गद्दी का सीधा दावेदार है. ग्रैंड ईवनिंग के लिए बगदादी ने कालाचोंगा पहना. पगड़ी भी काली थी. जैसे मोहम्मद साहब ने अपने आखिरी सरमन के दौरान पहनीथी. गनीमत है बगदादी ने काला चश्मा नहीं लगाया था, वर्ना डीजे वाले बाबू गाना भीबजा ही देते. जनाब ने भाषण के लिए जो पोडियम था, उसकी तरफ सीढ़िया चढ़ना शुरू किया.एक सीढ़ी चढ़ता, फिर रुकता. दाएं बाएं देखता. खड़ी पब्लिक को. गौर से. कहते हैं किमोहम्मद साहब भी ऐसा ही करते थे. ठहरकर लोगों को गौर से देखते. फिर डायस पर आया.जनता को लगा कि अब स्पीच होगी. प्रेयर होगी. मगर ये क्या. उसने अपनी जेब से एक डंडीनिकाली. मिसवाक नाम की जड़ी की. और लगा दांत मांजने. यहां भी मोहम्मद साहब कारिफरेंस था. उनके हवाले से हदीस में लिखा गया है कि दांतों की हाईजीन के लिए मिसवाककी डंडी चबानी चाहिए. इससे अल्लाह को खुशी मिलती है. तो अगली बार जब आप मिसवाक वालेटूथपेस्ट का ऐड देखें, तो इसे याद करें . दातून करने के बाद जरकावी ने इस सदी के अबतक के वक्त का सबसे कुख्यात ऐलान किया. मेरे मुजाहिदीन भाइयों, अल्लाह ने ये जीत दीहै. मैं भी आपकी तरह उसका ही एक सेवक हूं. अब सब जगह इस्लाम का राज होगा. हमलाएंगे.ब्लैक फ्लैग्स किताब को बैनटैम प्रेस ने छापा है. इंडिया में इसे पेंग्विन रैंडमहाउस पब्लिकेशऩ डिस्ट्रीब्यूट कर रहा है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ेंयकीन नहीं आता, ये महान आदमी सिगरेट पीता था!अटल बिहारी ने सुनाया मौलवी साब का अजीब किस्सादेश के सबसे बेबस राष्ट्रपति का किस्सा