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शशि कपूर की वो पांच फ़िल्में, जो आपको बेहतर इंसान बना देंगी

उनकी ये फिल्में ढूंढ-ढूंढ कर देखी जानी चाहिए.

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मुबारक
4 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 18 मार्च 2022, 06:59 AM IST)
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शशि कपूर. वो अभिनेता जिन्होंने अपने अभिनय में इतनी ज़्यादा रेंज दिखाई कि रश्क़ होता है. शशि उन अभिनेताओं में से थे जिन्होंने पैरलल और कमर्शियल दोनों तरह की फिल्मों में सफलता अर्जित की. जहां एक तरफ वो 'नमक हलाल', 'दीवार', 'सुहाग', 'त्रिशूल', 'शान' जैसी कमर्शियल हिट्स का हिस्सा रहें, वहीं 'विजेता', '36 चौरंगी लेन', 'उत्सव', 'जुनून', 'कलयुग' जैसी फ़िल्में भी बनाई. हिंदी सिनेमा के सर्वाधिक प्रतिष्ठित दादासाहेब फालके पुरस्कार से नवाज़े गए इस अभिनेता को भारत सरकार ने पद्म भूषण देकर सम्मानित किया है. आज उनकी उन पांच फिल्मों पर बात करेंगे, जो शायद बहुतेरी जनता की निगाहों से ना गुज़री हो और जिन्हें देखा जाना चाहिए.

जुनून (1978):

1978 की आई ये फिल्म शशि कपूर की अभिनय में मास्टरी का मूर्तिमंत उदाहरण है. भारतीय सिनेमा के इतिहास में इस फिल्म को उतना उंचा स्थान कभी नहीं मिला जिसकी ये हक़दार थी. रस्किन बॉण्ड की लंबी कहानी ‘फ्लाइट ऑफ़ पिजन्स’ पर बनी ये फिल्म सिनेमाई ब्रिलियंस के हिसाब से अपने वक़्त से कहीं आगे की चीज़ थी. प्यार, जुनून, मौत, और अंधे-राष्ट्रवाद की डिस्टर्बिंग गाथा है ये फिल्म. जंग की निरर्थकता को रेखांकित करते हुए प्रेम की प्रासंगिकता का स्ट्रोंग स्टेटमेंट देता है शशि कपूर का ये मास्टरपीस.
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इस सामंती सरदार जावेद ख़ान को एक अंग्रेज़ लड़की से प्यार हो गया है. 1857 के ग़दर के फ़ौरन बाद जब अंग्रेजों का क़त्लेआम होना शुरू हुआ था, तब एक अंग्रेज़ महिला मरियम अपनी बेटी रुथ के साथ एक सामूहिक नरसंहार से बच के भागी है. एक हिंदू परिवार ने उसे शरण दी है. सरदार जावेद ख़ान उसे अपने घर ले जाता है और यहीं से शुरू होती है भावनाओं के उथलपुथल की दास्तां. पूरी कहानी नहीं बताएंगे लेकिन कर्तव्य, वचनबद्धता और प्रेम के बीच पिसते एक शख्स का इतना बढ़िया चित्रण हिंदी सिनेमा में बहुत रेयर देखने को मिलता है.  

कलयुग (1981):

जूनून के बाद शशि कपूर की श्याम बेनेगल के साथ ये दूसरी फिल्म थी. प्रकाश झा की ‘राजनीति’ तो देखी होगी आपने. महाभारत की कहानी को आज की राजनीति में ढाल कर पेश किया था प्रकाश झा ने. कम ही लोग जानते हैं कि उनसे बरसों पहले शशि-श्याम की जोड़ी ये काम कर चुकी थी. बस राजनीतिक परिवारों की जगह उद्योगपतियों का ख़ानदान था. शशि ने कर्ण की भूमिका निभाई थी. अनाथ करण सिंह की भूमिका को उन्होंने बेइंतेहा गरिमा के साथ निभाया. इस फिल्म की ख़ासियत ये थी कि इसकी सारी कास्ट अपने-अपने रोल के लिए सटीक थी. किसी को भी रिप्लेस करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. एक निर्माता के तौर पर शशि कपूर का इसकी कास्टिंग में बहुत बड़ा रोल था. और महज़ इसी बात से उनका कद बड़ा हो जाता है.
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'कलयुग' श्याम बेनेगल और शशि कपूर दोनों का ही बेहतरीन काम है. 'कलयुग' के एक सीन में शशि कपूर: https://www.youtube.com/watch?v=WmJSpwCom1k

मुहाफ़िज़ (In Custody, 1993):

'मुहाफ़िज़' एक और नगीना है जो अननोटिस्ड चला गया. अनीता देसाई के बुकर प्राइज के लिए नॉमिनेटेड उपन्यास ‘In Custody’ पर आधारित ये फिल्म 'गुमनामी' के अंधेरे में दम तोड़ते शायर और उसकी शायरी का खो चुका दस्तावेज़ है. भोपाल की एक खंडहरनुमा हवेली में एकांतवास भोग रहे शायर नूर साहब को ज़माना लगभग भुला चुका है. सिवाय देवेन के. अपने प्रिय शायर को खोजता हुआ और उसकी विरासत को संभालने की ज़िद से भरा हुआ देवेन परत दर परत नूर साहब की ज़िंदगी को खोलता रहता है. कभी हैरान रहता है, तो कभी शर्मसार होता है. एक तिरस्कृत शायर की ज़िंदगी के कितने ही रंग शशि साहब ने आसानी से पेश किये हैं. अपनी दो बीवियों के आपसी कलह को बर्दाश्त करता, शराबनोशी की उच्चतम लिमिट को रोज़ ही छूता और अपने माजी के ज़िक्र से भी बिदकता ये अज़ीम शायर उस दौर की परछाई भी नहीं बचा है, जब पसीना गुलाब था. सिर्फ देवेन ही है जो उसे याद दिलाने बार-बार आ जाता है कि उसे गुमनाम नहीं मरना है. देवेन की इसी ज़िद का नतीजा ये निकलता है कि अपनी तमाम विरासत का मुहाफ़िज़ वो देवेन को बना देते हैं. शशि की आवाज़ में फैज़ के शेर सुनना इस फिल्म का सबसे बड़ा हासिल है.
“जो रुके तो कोह-ए-गिरां थे हम, जो चले तो जां से गुज़र गये रहे-यार हमने क़दम-क़दम, तुझे यादगार बना दिया”
इस फिल्म का क्लाइमेक्स सीन भुलाए नहीं भूलता. मय्यत जा रही है धीरे-धीरे और बैकग्राउंड में फैज़ का कलाम गूंज रहा है. उनकी नज़्म ‘आज बाज़ार में पा-ब-जौलां चलो’ का इतना खूबसूरत इस्तेमाल हुआ है कि उसे बार-बार सुनने का मन करता है. आप भी सुनिए: https://www.youtube.com/watch?v=fzLOFgVm218

न्यू डेल्ही टाइम्स (1986):

एक ईमानदार पत्रकार की सिस्टम के खिलाफ़ अकेले दम पर लड़ी गई लड़ाई का रोजनामचा है ये फिल्म. इस फिल्म के बारे में बहुत कम से भी कम लोगों ने सुना होगा. लेकिन इस बात से इसकी वैल्यू कम नहीं हो जाती. मीडिया, राजनीति और मीडिया में राजनीति पर बहुत ही बोल्ड टेक थी ये फिल्म. ये फिल्म 1986 में बनी थी, जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आगमन अभी ढंग से हुआ भी नहीं था.
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धर्मपुत्र (1961):

हिंदी सिनेमा के सौ वर्ष पूरे होने पर दिल्ली के सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में सेंटेनरी फिल्म-फेस्टिवल आयोजित किया गया था. उसी फेस्टिवल में देखी थी धर्मपुत्र. वो एक अविस्मरणीय अनुभव था. पूरी तरह इत्तेफ़ाक से हासिल हुई धार्मिक आइडेंटिटी को ओढ़े-बिछाए रखने वाले हर एक शख्स को ये फिल्म हर हाल में देखनी चाहिए.
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धार्मिक पैमाने पर लोगों को परखने की निरर्थकता का उसे अहसास होता है और इसी वजह से वो लोग उसकी जान के ग्राहक बन जाते हैं जिनका कि कभी वो लीडर हुआ करता था. इस फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष था इसके लिखे डायलॉग. अख्तर-उल-इमान के लिखे कुछ एक डायलॉग देखिए जो दुखद है कि आज 2017 में भी प्रासंगिक हैं.
“हिंदू - मुस्लिम दो कौमों का नहीं, तारीख़ के एक दौर का नाम है. हिंदू-मुस्लिम इस देश की एक तहज़ीब, एक सभ्यता का नाम है. हिंदू-मुस्लिम इस धरती के उन दो बेटों का नाम है, जिनकी ख़ुशी और ग़म, जिनका जीना और मरना एक है. ये दोनों एक थे, एक ही हैं और एक ही रहेंगे.” “ज़माना देखते-देखते बदल जाता है, वो ज़मीं-आसमान, जहां कल मुहब्बत के नारे गूंजते थे, आज वहां नफरत के शोले भड़क रहे हैं. इंसान कितनी जल्दी बदल जाता है, कितनी जल्दी हर बात भूल जाता है. ” “धर्म आदमी को इंसान नहीं बनाता, इंसान को इंसान से लड़ाता है.” "बंटवारा तो सगे भाइयों में भी होता है, मगर तलवार मारकर खून को खून से अलग नहीं किया जा सकता.”
और अंत में मुकरी का शशि कपूर पर फट पड़ते हुए ये कहना कि,
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शशि कपूर के करियर का ये कोहिनूर बार-बार देखा-दिखाया जाना चाहिए. देखिए वो सीन और साहिर का लिखा शानदार गीत 'ये किसका लहू है कौन मरा':
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इन पांचो फिल्मों को मस्ट वॉच की लिस्ट में लिख लीजिए अभी. भूल जाएंगे वरना.
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