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Shahrukh की Dunki वाले 'डंकी रूट्स' असल में कितने खतरनाक हैं?

अपील की जाती है- "विदेश जाने के लिए ये रास्ते न अपनाएं". लोग फिर भी नहीं मानते. क्या हैं ये डंकी रूट्स, इन रास्तों में क्या भयानक खतरे हैं, खर्चा कितना होता है, इन सभी सवालों के जवाब जानेंगे.

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shah rukh khan dunki
शाहरुख खान की डंकी का एक दृश्य और बॉर्डर पार करते प्रवासियों का प्रतीकात्मक चित्र (फोटोसोर्स- IMDB और Getty से साभार)
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शिवेंद्र गौरव
20 दिसंबर 2023 (अपडेटेड: 20 दिसंबर 2023, 10:33 PM IST)
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Shahrukh Khan की Dunki कल 21 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है. Rajkumar Hirani की इस फिल्म के लिए लोगों में खासा उत्साह है. मूवी में पहली बार शाहरुख और राजू हीरानी साथ काम कर रहे हैं. फिल्म की कहानी 'डंकी रूट्स' की बात करती है. पंजाब (punjab), हरियाणा (haryana) के लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स देखें, तो ऐसे कई वीडियो और टेक्स्ट मिल जाएंगे, जिनमें इन 'डंकी रूट्स' में पड़ने वाले पनामा के जंगल दिखाए गए हैं. और एक सलाह दी गई है-

"विदेश जाने के लिए ये रास्ते न अपनाएं, बेहतर होगा अपने ही देश में रोजगार तलाशें."

ये सलाह बेअसर ही मानिए. भारत और पाकिस्तान के डंकी ट्रैवलर्स, गैरकानूनी तरीके से अमेरिका और बाकी देशों की सीमा पार करने की कोशिश नहीं बंद करते. उन्हें रास्ते में जान से मार दिए जाने का डर शायद बिल्कुल नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी कमलदीप सिंह की एक खबर के मुताबिक, डंकी रूट्स से विदेश जाने का जोखिम, इधर पंजाब और हरियाणा के अलावा गुजरात के लोग भी खूब उठा रहे हैं. शायद इन लोगों पर शाहरुख की मूवी का कुछ असर हो.

दुबई में एक कार्यक्रम के दौरान, शाहरुख खान ने फिल्म के टाइटल 'डंकी' के पीछे की कहानी बताई. उन्होंने कहा,

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क्या हैं ये डंकी रूट्स, इन रास्तों में क्या भयानक खतरे हैं, खर्चा कितना होता है, इन सभी सवालों के जवाब जानेंगे.

पहला पड़ाव: लैटिन अमेरिका

सबसे मशहूर 'डंकी रूट' है- सबसे पहले किसी लैटिन अमेरिकी देश पहुंचना, फिर वहां से अमेरिका. इक्वाडोर, बोलीविया और गयाना जैसे कई लैटिन अमेरिकी देशों में भारतीयों को ‘वीजा ऑन अराइवल’ (पहुंचने पर वीजा देने) की सुविधा है. ब्राजील और वेनेजुएला जैसे कुछ देश भी भारतीयों को आसानी से टूरिस्ट वीजा दे देते हैं. जो देश, USA की सीमा से जितना नजदीक होता है, भारत से उस देश का वीजा मिलना उतना ही मुश्किल होता है. किसी प्रवासी का रूट क्या रहेगा, वो पहले किस देश में घुसेगा, ये इस बात से भी तय होता है वो जिस एजेंट के जरिए सफ़र कर रहा है, उसके किस देश के ह्यूमन ट्रैफिकिंग नेटवर्क से लिंक हैं. कुल-मिलाकर लैटिन अमेरिकी देशों में दाखिल होना मुश्किल नहीं है, लेकिन इसमें महीनों का वक़्त भी लग सकता है.

पंजाब का एक शख्स 8 महीने बाद ब्राजील पहुंचा. उसने अखबार को बताया,

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हालांकि अमेरिका जाना हो, तो कुछ एजेंट दुबई से मेक्सिको के लिए सीधे वीजा की भी व्यवस्था कर देते हैं. लेकिन पुलिस और बाकी अधिकारियों की सक्रियता के चलते, सीधे मेक्सिको में लैंड करना ज्यादा खतरनाक है. इसलिए ज्यादातर एजेंट, अपने क्लाइंट्स को लैटिन अमेरिकी देशों में ही ले जाते हैं. उसके बाद कोलंबिया. और फिर मेक्सिको होते हुए अमेरिका.

पनामा का खतरनाक जंगल

बाद का सफ़र समझने के लिए पहले इस इलाके की थोड़ी जियोग्राफी समझनी जरूरी है. कोलंबिया के बाद, एक संकरे रास्ते सरीखा इलाका पार कर पनामा है. वहां से निकलने के बाद पहले कोस्टा रिका, फिर निकरागुआ और फिर ग्वाटेमाला पड़ता है. और फिर उत्तरी अमेरिका के मेक्सिको का बॉर्डर मिलता है.

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इलाके का प्रतीकात्मक नक्शा (स्क्रीनग्रैब- गूगल मैप)

प्रवासी लोग पहले कोलंबिया से पनामा में घुसते हैं. इन दोनों देशों के बीच खतरनाक डेरियन गैप जंगल है. इस जंगल को  पार करना माने जानलेवा खतरों से गुजरना. साफ़ पानी नहीं है, जंगली जानवर हैं और सबसे खतरनाक हैं यहां एक्टिव आपराधिक गिरोह. डकैती, लूट, यहां तक कि रेप, यहां सब मुमकिन है. गौरतलब बात ये है कि आपके साथ कुछ भी बुरा घटता है, तो आप कोई कानूनी मदद नहीं ले सकते. न अपराध का कोई मामला दर्ज होगा और न किसी को सजा होगी. किसी प्रवासी की मौत हो गई, तो शव का अंतिम संस्कार भी होना मुश्किल है, घर तक लाश पहुंचना तो दूर की बात है. यूं राम भरोसे अगर सबकुछ ठीक रहा, तो भी इस इलाके को पार करने में करीब दस दिन का वक़्त लगेगा.

पनामा पार हुआ, तो मेक्सिको के पहले पड़ेगा ग्वाटेमाला. ये डंकी रूट का सबसे बड़ा को-ऑर्डिनेशन सेंटर है. यहां से मेक्सिको में घुसने के लिए नए एजेंट लगते हैं. पुराना एजेंट, अपने क्लाइंट्स को उन्हें सौंप देता है. इसके बाद शुरू होता है अमेरिकी एजेंसियों के साथ लुकाछिपी का खेल. इसी साल अगस्त में पंजाब के गुरदासपुर के एक 26 साल के युवक गुरपाल सिंह और 5 अन्य भारतीयों की अवैध रास्ते से मेक्सिको जाते वक़्त सड़क हादसे में मौत हो गई थी. गुरपाल ने पंजाब में अपनी बहन को आख़िरी कॉल की थी. और बताया था कि उन्हें मेक्सिको की पुलिस ने रोक लिया था, जिनसे बचने के लिए उन्हें जल्दबाजी में बस लेनी पड़ी. लेकिन कुछ देर बाद ही बस हादसे का शिकार हो गई. गुरपाल की मौत की खबर पंजाब में उनके परिवार को मिलने में एक हफ्ते से ज्यादा का वक़्त लगा. सरकार को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और 25 दिन बाद गुरपाल का शव उनके पैतृक गांव पहुंचा.

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डेरियन गैप जंगल से गुजरते प्रवासी (फोटो सोर्स- AP)
जंगल का कोई विकल्प? 

पनामा के जंगल के खतरों से बचने के लिए कोलंबिया से एक और रूट भी है. कोलंबिया के पास एक द्वीप है- सैन एंड्रियास. यहां से नाव लेकर निकरागुआ तक जाना होता है और वहां से मछुआरों की नावों में बैठकर करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर, एक और जगह से नाव लेनी होती है. ये नावें मेक्सिको के तटों तक पहुंचाती हैं. ये तरीका भी कम खतरनाक नहीं है.

अमेरिका के कंटीले तार

USA और मेक्सिको के बीच, 3410 किलोमीटर लंबा बॉर्डर है. इस पर कंटीले तारों की बाड़ है. प्रवासियों को इस फेंसिंग के उस तरफ कूदकर पार करना होता है. कई लोग इस तरह बॉर्डर पार नहीं करना चाहते हैं, तो वो रियो ग्रांडे नदी का रास्ता चुनते हैं. ये भी बॉर्डर पर है. मेक्सिको की इस सीमा पर बहुत सक्रिय होने के बजाय अमेरिकी अधिकारी लोगों के बॉर्डर पार करने के बाद ज्यादा सख्त होते हैं. प्रवासियों को पकड़कर कैंपों में डाल दिया जाता है. और उसके बाद मामला किस्मत का है. अधिकारी तय करते हैं कि प्रवासी शिविर में रखे जाने लायक हैं या नहीं.

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अमेरिका के बॉर्डर की बाड़ेबंदी, जिसे प्रवासी कूदकर पार करते हैं. (फोटो सोर्सं- AFP)
एक और रास्ता भी है

आजकल, अमेरिका के लिए एक और डंकी रूट बन गया है. लोग पहले यूरोप जाते हैं, फिर वहां से मेक्सिको. एक प्रवासी डंकी रूट्स के जरिए 9 देशों को पार करके अमेरिका पहुंचा. उसने अखबार को बताया कि

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डंकी रूट्स के जरिए अमेरिका जैसे देशों में पहुंचने की ख्वाहिश रखने वाले लोग जोखिमों के बावजूद इस सफ़र के लिए मोटा पैसा खर्च करते हैं. एक आदमी के लिए इस सफ़र का खर्चा 15 लाख से 40 लाख तक हो सकता है. कभी-कभी कीमत 70 लाख भी पहुंच जाती है. माने, जितने में एजेंट के साथ सौदा पट जाए. एजेंट्स का वादा होता है कि जितना ज्यादा पैसा खर्च करोगे, उतना आसान सफ़र रहेगा.

भारत के एजेंट्स का लिंक अमेरिका तक के एजेंट्स से रहता है. अगर किसी वजह से भारत वाले एजेंट से अगले एजेंट तक उसका हिस्सा नहीं पहुंचा, तो डंकी ट्रैवलर की जान पर बन आती है. एक ट्रक ड्राइवर ने अखबार को बताया कि उसने तीन बार में पूरा पैसा अदा किया. एक बार सफ़र शुरू करने से पहले, फिर कोलंबिया पहुंचने के बाद और फिर अमेरिकी बॉर्डर के इस पार पहुंचने पर. अगर उसके पेरेंट्स आखिर तक पैसा न भेजते, तो मेक्सिको के तस्कर उसे गोली मार देते. फिलहाल, ये ट्रक ड्राइवर, अमेरिका में अपनी शिविर में रहने की फाइल क्लियर होने का इंतजार कर रहा है.

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