मोदी को क्लीन चिट का विरोध करने वाले लवासा अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते थे, पर खेल हो गया
लवासा का कार्यकाल अक्टूबर, 2022 तक था, लेकिन अब उन्हें इस्तीफा देना पड़ रहा है.
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अशोक लवासा चुनाव आयोग में रहते तो CEC बन सकते थे, पर अब एशियन डेवलपमेंट बैंक के उपाध्यक्ष बनाए गए हैं. 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने मोदी को क्लिनचीट देने पर आपत्ति दर्ज कराई थी. (फोटो-पीटीआई)
अशोक लवासा. चुनाव आयुक्त. फिर खबरों में हैं. उन्हें एशियाई विकास बैंक (ADB) का वाइस प्रेसिडेंट नियुक्त किया गया है. चुनाव आयोग में लवासा का कार्यकाल अक्टूबर, 2022 तक था. लवासा ने 23 जनवरी, 2018 को चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला था. वह मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के बाद अगले साल अप्रैल में मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते थे. लेकिन अब उन्हें ADB भेजा जा रहा है.
क्या कहा एडीबी ने
फिलीपींस स्थित बैंक ने एक बयान में कहा कि ADB ने अशोक लवासा को निजी क्षेत्र और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के कारोबार के लिए उपाध्यक्ष नियुक्त किया है. वह दिवाकर गुप्ता की जगह लेंगे, जो 31 अगस्त को रिटायर हो रहे हैं. एडीबी ने कहा है कि लवासा का भारतीय सिविल सेवा के क्षेत्र में बेहतर करियर रहा है. उन्हें सार्वजनिक नीति और निजी क्षेत्र की भूमिका का गहरा ज्ञान है. पेरिस समझौते की जलवायु परिवर्तन वार्ता में उन्होंने भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. साथ ही भारत के राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदानों को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आर्थिक मामले विभाग में संयुक्त सचिव के तौर पर उन्होंने ADB की कई परियोजनाओं में नजदीकी से काम किया. इन परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की कंपनियां भी शामिल थीं.
किसके कहने पर ADB भेजे जा रहे हैं लवासा
न्यूज एजेंसी पीटीआई को सूत्रों ने बताया कि ADB में लवासा की नियुक्त भारत सरकार की सिफारिश पर हुई है. एडीबी और अन्य एजेंसियों के कामकाज की जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय संस्था तब तक किसी की नियुक्ति की घोषणा नहीं करती है, जब तक कि वह व्यक्ति जिसे नियुक्त किया जा रहा है, वो अपनी स्वीकृति नहीं दे देता. साथ ही इतने ऊंचे स्तर पर कोई भी नियुक्ति सरकार की सहमति के बिना भी नहीं होती है.
हालांकि 'इंडियन एक्सप्रेस' ने जब ADB से पूछा कि क्या लवासा की नियुक्ति के लिए सरकार से सलाह ली गई थी, तो अखबार को इसका सीधा जवाब नहीं मिला. वहीं लवासा ने भी इस मामले में किसी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि लवासा ने अभी इस्तीफा नहीं दिया है. उन्हें ADB में सितंबर में कार्यभार संभालना है.
इतिहास में ऐसे दूसरे आयुक्त
निर्वाचन आयोग के इतिहास में लवासा दूसरे ऐसे आयुक्त होंगे, जिन्हें कार्यकाल पूरा करने से पहले ही कहीं और भेजा जा रहा है. आगे उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा. इससे पहले 1973 में मुख्य चुनाव आयुक्त नागेन्द्र सिंह को इस्तीफा देना पड़ा था. उन्हें हेग में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तों और कामकाज) अधिनियम, 1991 के प्रावधानों के मुताबिक, कोई भी चुनाव आयुक्त या मुख्य चुनाव आयुक्त अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेज सकता है. हालांकि बताया जा रहा है कि लवासा ने अब तक अपना इस्तीफा नहीं दिया है.बन सकते थे अलगे मुख्य चुनाव आयुक्त
लवासा ने 23 जनवरी, 2018 को चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला था. वह मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के बाद अगले साल अप्रैल में मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते थे. ऐसे में आयोग उनके नेतृत्व में जनसंख्या और विधानसभा सीटों के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा सहित अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव कराता. लवासा के बाद वरिष्ठता क्रम में तीसरे यानी सबसे कनिष्ठ आयुक्त सुशील चंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त के पद के दावेदार होंगे.
2019 लोकसभा चुनाव में इस वजह से चर्चा में रहे
लोकसभा चुनाव 2019. मई का महीना. देश के कई हिस्सों में चुनाव प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी की जनसभाएं थीं. नरेंद्र मोदी पर आरोप लगे कि उन्होंने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया. इसके खिलाफ़ चुनाव आयोग में शिकायत की गई. कुल चार शिकायतें. आरोप थे कि नरेंद्र मोदी ने लातूर और चित्रदुर्गा में दिए गए भाषण में पहली बार वोट दे रहे लोगों से बालाकोट एयर स्ट्राइक के नाम पर वोट हासिल करने की कोशिश की थी, वहीं वर्धा और नांदेड़ में नरेंद्र मोदी ने बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक संबंधी भाषण दिया था.
इन शिकायतों की जांच के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा, चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और अशोक लवासा की टीम बैठी थी. इन सभी शिकायतों में अशोक लवासा ने असहमति जताई थी, जबकि सुनील अरोड़ा और सुशील चंद्रा ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी. मतलब 2-1 के बहुमत से पाया गया कि नरेंद्र मोदी ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया था. तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के भी भाषणों की भी शिकायत की गई थी. उन्हें भी आचार संहिता उल्लंघन के आरोपों पर क्लीन चिट मिल गई थी.
लेटर लिख उठाए सवाल
आयोग की क्लीन चिट में लवासा की आपत्ति का कोई ज़िक्र नहीं किया गया. उन्होंने लेटर लिखकर मांग की थी कि तीन सदस्यीय आयोग में अगर किसी मुद्दे पर किसी सदस्य का विचार अलग है, तो उसे भी ऑन रिकॉर्ड किया जाए. वह चाहते थे कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश में बेंच के जजों के अलग-अलग विचारों का फैसले में जिक्र होता है, वैसा ही चुनाव आयोग के मामले में भी हो. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसके बाद अशोक लवासा ने आयोग की आदर्श आचार संहिता की मीटिंगों में शामिल होने से इनकार कर दिया.मोदी के खिलाफ आवाज उठाने की सजा मिली?
इसके बाद लवासा, उनकी पत्नी, बेटे और बेटी को कई तरह के नोटिस भेजे गए. कहा गया कि मोदी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की सज़ा मिल रही है.साल 2019 में अगस्त के महीने में इनकम टैक्स विभाग ने अशोक लवासा की पत्नी नोवेल लवासा को उनके इनकम टैक्स रिटर्न में गड़बड़ी के लिए नोटिस जारी किया. कुछ ही दिनों बाद अशोक लवासा के बेटे अबीर लवासा और उनकी बहन शकुन्तला लवासा भी आयकर विभाग के घेरे में आए. बच्चों की डॉक्टर शकुन्तला लवासा को आयकर विभाग ने नोटिस भेजा. शकुन्तला लवासा ने गुड़गांव में एक अपार्टमेन्ट खरीदा था, इसी अपार्टमेन्ट पर आयकर विभाग ने नोटिस भेजा था. रुपाली बिल्डवेल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा बनायी गई चार मंजिला इमारत में शकुन्तला लवासा ने घर खरीदा, जिसमें पहले से अशोक लवासा और नोवेल लवासा के अपार्टमेन्ट मौजूद थे.

हालांकि आईटी विभाग ने कथित स्टाम्प ड्यूटी चोरी के मामले में अशोक लवासा के परिवार को क्लीन चिट दे दी थी.
लवासा की भी जांच हुई
दूसरी ओर अशोक लवासा पर आरोप लगे कि नोटबंदी के बाद 4.93 लाख रुपए नकद जमा किया. गुड़गांव में एक इमारत के निर्माण के लिए 46.65 लाख रुपए नकद दिए. साथ ही घरेलू नौकर के बैंक खाते से किसी बिल्डर को 9.57 लाख रुपए का भुगतान किया. इनकम टैक्स की एक रिपोर्ट में अशोक लवासा पर कई आरोप लगाए गए.अशोक लवासा साल 2009 से 2013 तक ऊर्जा मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी, एडिशनल सेक्रेटरी और स्पेशल सेक्रेटरी जैसे पदों पर कार्यरत थे. लवासा पर ये आरोप लगाए गए कि उन्होंने बतौर IAS अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान अपने पद का इस्तेमाल कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया. लवासा और उनकी फैमिली पर लगे आरोपों की जांच चल ही रही है.

सितंबर, 2019 में खबर आई थी कि अशोक लवासा की बेटी अवनि लवासा जो जम्मू-कश्मीर के लेह की डिप्टी इलेक्शन ऑफिसर हैं, लेह में पत्रकारों को रिश्वत देने के आरोप में बीजेपी नेताओं की जांच कर रही हैं. अवनि ने उन नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए कोर्ट में आवेदन दिया था.
जनवरी, 2010 में अवनि लवासा को जम्मू-नगर निगम का कमिश्नर नियुक्त किया गया था. नई नियुक्ति से पहले वो जेएंडके इकनॉमिक रिकंस्ट्रक्शन एजेंसी की सीईओ थीं.
चलते-चलते ये भी जान लीजिए कि ऑस्ट्रेलिया की सदर्न क्रॉस यूनिवर्सिटी से एमबीए डिग्रीधारक, मद्रास यूनिवर्सिटी से रक्षा और रणनीतिक अध्ययन में एमफिल करने वाले अशोक लवासा 1980 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के हरियाणा कैडर के अधिकारी है. वह वित्त सचिव के पद से अक्टूबर, 2017 में रिटायर हुए थे.
अशोक लवासा ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट नहीं दी, तो उनके खिलाफ जांच बैठा दी गई?