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नइहर में बांस तोड़ने की बात सुनकर दुलार काका की बिटिया रो दी

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए, अभिषेक त्रिपाठी की कहानी 'सिंदूर की लाल रेखा'.

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आशीष मिश्रा
16 जून 2016 (अपडेटेड: 16 जून 2016, 01:26 PM IST)
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"दुलहिन रहैं बेमार निरहुआ सटल रहै"

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पिलुवा उस दिन ज़ोर-ज़ोर से अपनी 1300 रुपये वाली बिना सिम की चाइनीज़ मोबाइल मे श्रृंगार रस से परिपूरित कविता बजा रहा था, घर के भीतर से यह गाना सुनकर इमरती भौजी कई कई बार शरम के मारे गड़ी जा रही थी, अग़ल-बग़ल के घर वाले पिलुवा को देखकर कंटीली हंसी छोड आगे बढ जाते या फिर "जिया हो निरहू" जैसे उपमान से नवाज़ कर मन ही मन मगन हो रहे थे. फुलेसरी, जो पड़ोस के दुलार काका की बिटिया थी, भौजी को छेड़ने के लिये घर के भीतर तक पहुंच गई थी. फुलेसरी इतना सुनकर ही चुप हो गई. आंखों से आंसुओं की दो-तीन बूंद गालों पर ढुलक आए. इन आंसुओं को वह इमरती से बचाने की लाख कोशिशों के बाद भी ना बचा पाई. इमरती इन आंसुओं में पीड़ा देख चुकी थी पास आकर संवेदना से उसके सर पर हाथ फेरा. दुखी मन जब संवेदनाओं का साथ पाता है तो सारे दुख सारे क्लेश एक ही बार में आंसुओं के साथ बहा देना चाहता है. कुछ यही हाल फुलेसरी का भी हुआ, इमरती के कंधे अब उसका सहारा बन चुके थे. आर्तनाद करता हुआ बरसों से जमा हुआ लावा आंखों से मोतियों की मानिन्द बरसने लगा. कुछ देर तक ढाढ़स बंधाने के बाद जब आंसुओं ने सिसकियों का रुप लिया तो इमरती रोने का मर्म जानना चाहा. इतना ही कहकर वह लाल आंखें लिए घर से बाहर चली गई, इमरती अभी भी इसी उधेड़बुन में पड़ी रही कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है इसके साथ? रात काफ़ी गहरी हो चुकी थी. पूर्णिमा का चांद सिर के ऊपर अपनी शीतलता से आह्लादित कर रहा था, घड़ी की सुईयां ग्यारह से कुछ ऊपर का ही इशारा कर रही थी. हर कोई इस चांदनी रात के आग़ोश में सो चुका था. एक इमरती को छोड़कर, अभी भी फुलेसरी की लाल-लाल सजल आंखें उसे झकझोर रही थी. आख़िर ऐसा तो उसने कुछ कहा भी नहीं था. अपनी ही सोच में गुमसुम इमरती का ध्यान टूटा पिलुवा के करवट बदलने से. वह ख़ुद को सहेजने लगी कि तभी पिलुवा की भी आंख खुल गई. नींद अभी भी इमरती की आंखों से कोसों दूर थी. एक स्त्री का दर्द एक स्त्री ही बेहतर समझ सकती है. फुलेसरी का चेहरा बार-बार उसकी आंखों के सामने आ जाता. कितनी तो मासूमियत भरी है उसमें. इतना सारा कुछ अपने अंदर समेटे कभी ज़ाहिर नहीं करती. हमेशा मुस्कुराता हुआ चेहरा ही देखा है. प्रकृति से भी लड़ने का एक हौसला चाहिए. शायद उसी हौसले को समेटकर वह अपनी नियति से लड़ रही है. लेकिन कब तक ? छोटी-छोटी विपत्तियों में इंसान को टूटते हुए देखा है. एक दिन फुलेसरी भी बिखर जाएगी. बहुत अधिक कठोर हो चुका इंसान जब बिखरता है तो लाख कोशिशों के बावजूद कोई उसे समेट नहीं सकता, आज उसके बिखरने की टूटने की शुरुआत हो चुकी है. आख़िर कब तक अपने आपको इस समाज की आग में वह तपा पाएगी, एक छोटी सी लौ उसका सब कुछ जलाकर ख़ाक कर देगी. सब कुछ. सुबह जब इमरती पिलुवा के लिये चाय लेकर आई तो अपने बाबू जी से फ़ोन पर बात करने के लिये बोली. "नइहर की बहुत याद आ रही " पिलुवा बोला "माई-बाप को छोड़कर विदा होना पड़ता ना तब समझ में आता. फ़ोन मिलाकर बुला दीजिए. बाबू और लाखन से मिलने का मन हो रहा, हम जा नहीं पाएंगे कह दो वही दोनों आ जाय." पूरी रात की क़ुर्बानी देकर इमरती, फुलेसरी के लिये एक नतीजे पर पहुंची थी. अब इसमें उसे अपने बाबू और भाई लाखन का सहयोग चाहिए था. वैसे बाबू दक़ियानूसी तो नहीं है, पर कौन जाने समाज से लड़ने, ताने, उलाहने सुनने की हिम्मत उनके बूढे हो चुके कंधों में हो या ना हो. पूरा दिन इमरती का यही सोचते हुआ बीता कि बाबू जी से क्या कहेगी. अभी तक उसने अपने मन की बात तो पिलुवा को भी नहीं बताई है. पिलुवा कह गया था कि इतवार को दोनों लोग आ रहे है. अभी तो चार दिन है, पूरे चार दिन इमरती का इसी उधेड़बुन में बीता कि वह बात कहां से शुरु करेगी. इतवार को मदद के बहाने इमरती ने फुलेसरी को बुला लिया था. बाबू और लाखन को पानी और चाय फुलेसरी ने ही दिया था. इस बीच इमरती ज़मीन पर बैठी पूरे गांव का हालचाल लेती रही. पिलुवा भी पास में ही एक स्टूल पर बैठा हुआ था. फुलेसरी चाय पानी देकर अपने घर चली गई थी. बाबू थोड़ी देर तक शांत इमरती को देखते रहे. फिर इमरती, पिलुवा की तरफ घूमी. जो अब तक निर्वाक हो उन दोनों की बातें सुन रहा था. जाईं जी आप दुलार काका से तुरंत बात करी और लेके आई जादा समय ना है आज ही सारी बात पक्की कर दीं. पिलुवा गर्व के भाव से इमरती को देखा और छाती चौड़ी किए, दुलार काका के पास पहुंच गया. थोड़ी ही देर में भरी आंखों के साथ दुलार काका बाबू जी के सामने खड़े थे. रिश्ता पक्का हो चुका था, गोदभराई आज ही होगी. फुलेसरी को तैयार करके इमरती ख़ुद ले आई. बाबू जी और कुछ तो लाए नहीं थे. चौराहे से एक नारियल, साड़ी, सवा किलो लड्डू और एक हज़ार एक रुपये फुलेसरी के कोइछा में इमरती के हाथ से डलवा दिए. तभी इमरती अपने हाथ से मां की दी हुई अंगूठी निकालकर फुलेसरी को पहनाते हुए बोली. "अब तुम्हारे भाग्य में भी ई सिन्दूर की गहरी लाल रेखा आ गई है, आज से तुम हमको भौजी कहना और हम तुमको भौजी कहा करेंगे " आस-पास खड़े सभी लोग ठहाके लगाकर हंस पड़े. फुलेसरी की आंखों में एक बार फिर से आंसू छलक रहे थे. पर ये आंसू अबकी बार इमरती के लिए कृतज्ञता के थे.
 

'मस्से को छूने से भीतर की सारी घटिया बातें निकल जाती'

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