ताला खोलने के लिए चाहिए चाबी. पंजाबी में कहें तो किल्ली. और हर किसिम का तालाखोले जो चाबी. वो कहाए गुरकिल्ली. मास्टर की. दलितों को ये चाबी कांशीराम ने थमाई.इसके पहले क्या था. ये था कि कांग्रेस ब्राह्रमणों, दलितों और मुसलमानों के वोटपाकर सत्ता में पहुंचती थी. सत्ता के शीर्ष पर कोई ब्राह्मण या ठाकुर बैठता था. कुछदलितों को कैबिनेट में एडजस्ट कर लिया जाता था. इसी एडजस्टमेंट की सीढ़ी चढ़तेचढ़ते जो सबसे ऊपर पहुंचे. वह थे बाबू जगजीवन राम. बाबू जी बिहार के दलित नेता थे.इनकी बेटी मीरा कुमार सासाराम से सांसद रही हैं. स्पीकर भी. मगर यहां बात बाबू जीकी हो रही थी. कांग्रेस का तो गांधी काल चल रहा था. सो वह पीएम तो क्या डिप्टी पीएमभी न बने. डिफेंस मिनिस्टर जरूर रहे. 1971 के युद्ध में उनकी बड़ी सराहना हुई. फिरआई इमरजेंसी. जगजीवन राम चुप रहे. इमरजेंसी हटी तो वह पाला बदलकर जनता पार्टी केखेमे में आए. चुनाव हुए, कांग्रेस आउट, जनता पार्टी इन. पीएम के तीन दावेदार. दो तोपूर्व कांग्रेसी. मोरार जी देसाई. जो 1965 में लाल बहादुर शास्त्री से रेस हार गएथे. दूसरे बाबू जगजीवन राम. तीसरे थे चौधरी चरण सिंह. जेपी ने आखिर में मोरार जी केनाम पर मुहर लगाई. बाकी उनकी अपनी फील्डिंग तो चल ही रही थी. बाबू जी फिर रह गए.चौधरी चरण सिंह ने टंगड़ी मार लंगड़ी सरकार गिराई, तब भी जगजीवन राम ने बड़ी कोशिशकी. चंद्रशेखर उन दिनों जनता पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे. उनका तखल्लुस अध्यक्षजी वहीं से पड़ा. उन्होंने भी भागदौड़ की. मगर नेता सब ऐसे कि सरकार गिर जाए, मगरजगजीवन राम पीएम न बन पाएं. उसके बाद कांग्रेस में कोई दलित नेता इतना ऊपर नहीं चढ़पाया. मगर जब जगजीवन राम आखिरी दांव चल रहे थे. तब एक सरकारी मुलाजिम नौकरी छोड़कभी साइकिल कभी बस से सफर कर एक मूवमेंट खड़ा कर रहा था. उसका नाम कांशीराम था. वहजानता था. कि अंबेडकर का ज्ञान और जगजीवन राम की निष्ठा से दलितों का जरूरत भर भीभला नहीं हुआ. वह कहता था. कि अंबेडकर ने किताबें इकट्ठा कीं. मैंने लोगों कोइकट्ठा किया. उस व्यक्ति का नाम कांशीराम था. आज मैं आपको उनकी कहानी सुना रहा हूं.बताइए तो जरा. कितनी तारीख है आज. 15 मार्च. यही तारीख तब भी थी. साल था 1934.पंजाब के रोपड़ जिले के पिरथीपुर बंगा गांव में उनका जन्म हुआ. अब बहुजन आंदोलन सेजुड़े लोग इस गांव में बने कांशीराम के घर को चन साहिब पुकारते हैं. चन का अर्थहोता है घर. साहिब कांशीराम के लिए उपाधि के तौर पर इस्तेमाल होता है. कांशीराम को1957 में पहली सरकारी नौकरी मिली. सर्वे ऑफ इंडिया में. मगर उन्होंने बॉन्ड साइनकरने से इनकार कर दिया. फिर अगले बरस 1958 में एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डिवेलपमेंटलैबोरेटरी में बतौर रिसर्च असिस्टेंट नौकरी मिल गई. तैनाती हुई पूना (अब पुणे) में.यहीं पर वह बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और ज्योतिबा फुले के लेखन के संपर्क में आए.और यहीं से उनके कायांतरण की शुरुआत हुई. महाराष्ट्र में दलित आंदोलन अंबेडकर केचलते मजबूत था. साहित्य में, संगीत में, समाज में प्रतिरोध के कई स्वर थे. मगर कईअंतरविरोध भी थे. और कांशीराम के वक्त जो आंदोलन के अलंबरदार थे, वह बंटे हुए थे.इन सबको देख समझ कांशीराम ने अपनी योजना बनाई. और उसके लिए सबसे पहले लिखा एक खत.खुला नहीं, मुंदा. घरवालों को भेज दिया. पूरे 24 पन्ने का. इसमें उन्होंने लिखा कि1. अब कभी घर नहीं आऊंगा. 2. कभी अपना घर नहीं खरीदूंगा. 3. गरीबों दलितों का घर हीमेरा घर होगा. 4. सभी रिश्तेदारों से मुक्त रहूंगा 5. किसी के शादी, जन्मदिन, अंतिमसंस्कार में शामिल नहीं होऊंगा. 6. कोई नौकरी नहीं करूंगा. 7. जब तक बाबा साहबअंबेडकर का सपना पूरा नहीं हो जाता, चैन से नहीं बैठूंगा. कांशीराम ने इनप्रतिज्ञाओं का पालन किया. वह अपने पिता के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुए.वह जिस जमात की लड़ाई लड़ रहे थे. वह कई चीजों से जूझ रही थी. जाति, अशिक्षा,गरीबी. कांशीराम ने तय किया कि तय फर्मे तोड़ने होंगे. कलफ का कुर्ता पहनकरगांधीवादी बातें करके अपनी बिरादरी का भला होने से रहा. वह सेकंड हैंड कपड़ों केबाजार से अपने लिए पैंट कमीज खरीदने लगे. कभी नेताओं वाली यूनिफॉर्म नहीं पहनी. बादके दिनों में सफारी सूट पहनने लगे. कांशीराम ने सीधे अपनी पार्टी या संगठन खड़ाकरना शुरू नहीं कर दिया. 1964 में उन्होंने रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया ज्वाइन कीथी. आजकल इसी के एक धड़े अठावले गुट के नेता रामदास एनडीए के सहयोगी हैं. कुछ हीबरसों में कांशीराम को समझ आ गया कि आरपीआई चुनावों में हिस्सा तो लेती है. मगरसरकारी, गैर सरकारी क्षेत्रों में जो दलित पिछड़े शोषित तबके के लोग हैं, उन्हेंसाथ लाने का कोई प्रोग्राम इनके पास नहीं. सत्ता में बने रहने का और उसे औजार केतौर पर इस्तेमाल करने के लिए भी जिस डिजाइन की जरूरत है, वह नदारद है. फिर कांशीरामने पूरे देश में घूमना शुरू किया. अलग अलग तबके के लोगों से मिले. दिक्कतें समझीं.अंबेडकर के जन्मदिन के दिन 14 अप्रैल 1973 को ऑल इंडिया बैकवर्ड माइनॉरिटीकम्युनिटीज एम्प्लॉईज फेडरेशन (बामसेफ) का गठन किया. 6 दिसंबर 1978 को इस संगठन कोनए सिरे से दुरुस्त किया गया. इसके बाद बना डीएस 4 यानी दलित शोषित समाज संघर्षसमिति. साल था 1981. इनके कामकाज के सिलसिले में कांशीराम ने देश घूमा तो उन्हेंसबसे ज्यादा गुंजाइश उत्तर प्रदेश में समझ आई. पंजाब में भी अच्छा रेस्पॉन्स मिला.1984 में बीएसपी के गठन के साथ ही कांशीराम चुनावी राजनीति में कूद पड़े. उन दिनोंकही कांशीराम की एक बात योगेंद्र यादव आम आदमी पार्टी के दिनों में बहुत दोहरातेथे. पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा चुनाव हरवाने के लिए. और फिर तीसरे चुनाव सेजीत मिलनी शुरू हो जाती है. खैर, पहले चुनाव में इंदिरा लहर के दौरान बीएसपी काखाता नहीं खुला. मगर हिम्मत खुल गई. दलितों की अपनी पार्टी. उत्तर भारत में जड़ेंजमाती. मनुवाद और ब्राह्मणवाद को खुले आम गरियाती. गांधी को और कांग्रेस को सिरे सेखारिज करती. इस दौरान सधे हुए शब्द नहीं तलाशे जाते. खुंखार और खुरदुरे ढंग से कहाजाता. इसी दौर में नारे आए थे. ठाकुर ब्राह्मण बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएस 4. याफिर तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार. हालांकि बीएसपी अब आधिकारिक तौर परइन नारों को अपने से नहीं जोड़ती. कांशीराम की शिष्या मायावती समझ गई हैं कि कोरवोट के आगे बढ़ने के लिए बहुजन को सर्वजन में बदलना होगा. कांशीराम 1984 के चुनावके बाद ये तय कर चुके थे कि रसरी को तब तक आना जाना होगा, जब तक सिल पर निसान नबने. इसलिए उन्होंने राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान वेस्ट यूपी में जब भीउपचुनाव हुए, मायावती को मैदान में उतारा. एक बार बिजनौर से, एक बार हरिद्वार से.और आखिर में 1989 के चुनाव में इसी बिजनौर सीट से बीएसपी का खाता खुला. मायावतीलोकसभा पहुंचीं. इस चुनाव में कांशीराम ने देश के अगले प्रधानमंत्री विश्वनाथप्रताप सिंह के खिलाफ इलाहाबाद से चुनाव लड़ा. बीएसपी का मूवमेंट लगातार मजबूत होतागया. राममंदिर और मंडल के दौर में कांशीराम ने अपने मूल सपने की तरफ लौटना रणनीतिकतौर पर मुनासिब समझा. उनकी पार्टी ने मुलायम सिंह यादव की नई नई बनी समाजवादीपार्टी के साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ा. चुनाव के बाद 1993 में मुलायम सिंह के नेतृत्वमें गठबंधन सरकार बनी. बीएसपी के मिशनरी कार्यकर्ता अब माननीय कैबिनेट मंत्री थे.सत्ता के गलियारों में दक्खिन टोला की ये पहली सीधी आमद थी. मुझे याद है अपने जिलाजालौन का एक किस्सा. कोंच की सुरक्षित सीट से चैनसुख भारती चुनाव जीतकर पहुंचे थे.इलाके के लोग बताते हैं कि वह लखनऊ टूटी चप्पल पहनकर गए थे. बहिन जी ने उन्हें देखकहा. जाइए, अब आप सत्ता में आ गए हैं. नई चप्पलें पहनकर सदन में जाइए. कांशीराम समझगए थे कि मायावती ही उनकी राजनीतिक वारिस होंगी. तेर तर्रार भाषण शैली, संगठनक्षमता और कड़ाई के साथ काडर से अपनी बातें मनवाना. जल्द ही मायावती की यह स्टाइलमुलायम सिंह को अखरने लगी. उधर मौके की तलाश में बैठे बीजेपी के पॉलिटिकल मैनेजरोंने कांशीराम को अपनी बात समझाई. कांशीराम तो कब से यही चाहते थे. सवर्णों की पार्टीके कंधे पर चढ़ दलित की बेटी पहली बार मुख्यमंत्री बन गई. साल था 1995. कांशीराम केमिशन की ये पहली बड़ी कामयाबी थी. उसके बाद का इतिहास ज्यादातर लोगों को पता है.1996 में कांग्रेस के साथ बीएसपी का गठबंधन. मायावती का दो बार और बीजेपी संगगठजोड़ कर मुख्यमंत्री बनना. 2007 में अपने दम पर सरकार बनाना. पूर्ण बहुमत के साथ.इन सबके पीछे कांशीराम की दिन रात की मेहनत, रणनीति और बुलंद इरादों की पृष्ठभूमिहै. हालांकि उन पर ये इल्जाम भी लगा कि आखिर में उन्होंने संगठन पूरी तरह सेमायावती को सौंप दिया. कठिन दिनों के तमाम साथियों की तरफ से आंखें मूंद लीं.कांशीराम का यही कहना है कि मुझे मायावती में ही नेतृत्व की सर्वश्रेष्ठ संभावनादिखी. इसलिए मैंने उन्हें ग्रूम किया. बीएसपी का चुनाव निशान हाथी क्यों. इसका जवाबदेते हुए उन्होंने सत्तर के दशक में हुए नारा मवेशी आंदोलन का जिक्र किया. दलितोंने ब्राह्मणवाद से मुक्ति बौद्ध धर्म अपनाकर पाई. इस धर्म में हाथी के प्रतीक काबहुतायत से इस्तेमाल है. जिस अंबेडकर की विरासत को संभालने का बीएसपी ने दावा किया,उनकी पार्टी आरपीआई का भी यही चुनाव निशान था. इसके अलावा हाथी दलितों की ताकत काभी प्रतीक था. जिस पर अब तक सवर्ण महावत सवार था. कांशीराम जानते थे कि सत्ता पानेके लिए दलितों को नए सिरे से तमाम सामाजिक प्रतीक, किस्से, नायक और यकीन मुहैयाकराने होंगे. इसके लिए इतिहास की सबऑल्टर्न वाचिक परंपरा का सहारा लिया गया. दलितसमाज से आते वीरों मसलन, ऊदा देवी, बिजली पासी, झलकारी बाई को सत्ता में आने पर वहीमान दिया गया, जो अब तक दूसरे दलों के बड़े नेताओं और इतिहास पुरुषों को दिया जारहा था. उन दिनों गलियों में अकसर ये नारा लगता था कि बाबा तेरा मिशन अधूरा,कांशीराम करेगा पूरा. कांशीराम जानते थे कि इस मिशन को पूरा करने में सिर्फ सवर्णही बाधक नहीं हैं. अपने तबके के वे सरकारी दलाल भी बाधक हैं, जो अब तक मलाई खाते आएहैं. अपने भाइयों को बिसूरकर. उनको ध्यान में रखकर कांशीराम ने 1982 में ही एककिताब लिख दी थी. द चमचा एज. एन इरा ऑफ द स्टूजेस. इसमें उन्होंने कांग्रेसी दलितनेताओं की जमकर धज्जियां उड़ाईं. 9 अक्टूबर 2006 को कांशीराम का देहांत हुआ. उसकेपहले कुछ बरस वह बीमार रहे. कंट्रोवर्सी हुई कि मायावती ने उन्हें कैद में रखा है.कोर्ट का दखल हुआ. परिवार को अंतिम संस्कार में शामिल होने की इजाजत मिली. मगरकांशीराम के वारिस के तौर पर सारे रिचुअल मायावती ने निभाए. वही उनकी वारिस थी भीं.और एक बरस के भीतर ही सत्ता की गुरकिल्ली अपने दम हासिल कर उन्होंने साहिब के यकीनको सच साबित कर दिया. ये बात भी कही जानी चाहिए कि मायावती बीएसपी के मूवमेंट कोयूपी के बाहर नहीं ले जा पाईं. दूसरी पांत के मजबूत नेता नहीं खड़े कर पाईं. पर उसपर बाद फिर कभी. फिलहाल तो याद आ रहे हैं ढाई वाकये. आधा तो कांशीराम की वसीयत काहिस्सा- 1. मेरी ख्वाहिश है कि कुमारी मायावती दीर्घायु होकर मिशन के लिए काम करतीरहें. 2. मेरी अस्थियां नदियों में न बहाई जाएं. बल्कि उन्हें बहुजन समाज प्रेरणाकेंद्र में रख दिया जाए. 3. मायावती की अस्थियां भी मेरे बगल में पार्टी कार्यालयमें ही रखी जाएं. ये आधा वाकया है क्योंकि मायावती अभी स्वस्थ हैं, सक्रिय हैं औरबीएसपी को 2014 की चुनावी हार के बाद नए सिरे से झाड़ पोंछ 2017 के विधानसभा चुनावके लिए तैयार कर रही हैं. प्रकृति उन्हें लंबा स्वस्थ जीवन दे. और बाकी दो किस्सोंमें पहला, रोपड़ गेस्ट हाउस से जुड़ा. कांशीराम के पिता. हरी सिंह. रविदासी सिख.चमार जाति के लोगों को पंजाब में रविदासी कहा जाता है. संत रविदास को मानने की वजहसे. तो हरी सिंह को बेगार करना पड़ता था. सरकारी हुक्कामों की जब तब सेवा. डाकबंगले में ऊंची शहतीर वाला कमरा. उस पर पंखा लगा. जिस पर लगी रस्सी को एक आदमीहिलाता रहता. जैसे चंवर डुलता है न राजाओं और भगवानों की फोटू के पीछे. वैसा ही. तोकांशीराम के पिता हरी सिंह कई कई दिनों तक यही मजूरी करते रहते. एक बार कांशी कोबापू की याद आई. वहां पहुंचे. तो देखा. सुबह का वक्त है. और बापू पंखा चलाते चलातेसो गए हैं. निढाल. बच्चा लौट आया. बरसों बरस बीत गए. अब कांशीराम सांसद हैं. यूपीके इटावा से. केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार है. कांशीराम एक संसदीय समिति केसदस्य हैं. समिति पंजाब के दौरे पर गई है. कांशीराम सर्किट हाउस में रुके हैं. रातमें अचानक उनकी नींद खुल जाती है. गर्मी और पसीना. वह हड़बड़ाकर बाहर आते हैं.उन्हें लगता है गोया बापू बाहर बैठे पंखा झुला रहे थे. गोया वह सो गए. ये वहीडाकबंगला था. जो अब रोपड़ के राजकीय अतिथि गृह में तब्दील हो गया. और तब्दील हो गयादलितों का जमीर. जिसे बदलने के लिए कांशीराम ने खुद को गलाया था. दूसरा किस्सा,जनवादी चेतना के कवि बाबा नागार्जुन से जुड़ा. जो वरिष्ठ पत्रकार और अब फिल्मकारहोने को हुए अविनाश दास का लिखा है. तो उसे ज्यों का त्यों उन्हीं के शब्दों मेंपेश किए दे रहे हैं. '...वह 10 जुलाई, 1997 की शाम थी. शहर दरभंगा. खाजासराय वालेमकान (पंडासराय और रायसाहब पोखर के बाद इसी मोहल्ले में बाबा के बड़े बेटे शोभाकांतजी ने किराये पर घर लिया था) में बाबा बरामदे में बैठे थे. गया, तो दो-चार बातेंहुईं. रुक-रुक कर बात करते थे उन दिनों. बातों का सिरा भी बीच-बीच से गायब हो जाताथा. लेकिन दिमाग की बेचैनी इन टूटे हुए सिरों से भी अर्थपूर्ण ढंग से निकलती थी.आखिरी दिनों में शायद ज्यादा आत्मविश्वास आ जाता है. उस दिन उन्होंने कहा कि एककविता आयी है, लिखो. कागज़ और कलम सामने ही था. जिस लय में बाबा ने इसे लिखवाया, वहलय मैं अपनी जिंदगी में अब भी ढूंढ़ता हूं. बाबा की इस कविता में (मुझे लगता है)दृश्य जैसे उनके मन में आये होंगे, उन्होंने वैसे ही उसे कागज पर उतारने का मनबनाया होगा. बीमारी और जिन्दगी के वे आखिरी दिन बाबा के ...और उन आखिरी दिनों मेंमन में आने वाले चित्रों-छायाओं को शब्द देने के उनके उल्लास का मैं चश्मदीद ..एतद्द्वारा ऐलान करता हूं कि यह कविता हिंदी के जन कवि नागार्जुन की आखिरी कविता है.' (पेश है उसी कविता का कांशीराम से जुड़ा हिस्सा) दलितेंद्र कांशीराम भाषण देतेधुरझार सब रहते हैं दंग बज रहे दलितों के मृदंग जय-जय हे दलितेंद्र आपसे दहशत खाताकेंद्र मायावती/आपकी शिष्या करे चढ़ाई बाबा विश्वनाथ पर प्रभो, आपसे शंकित हैकेंद्र जय जय हे दलितेंद्र--------------------------------------------------------------------------------वीडियो देखें: