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जब धरती ने पहली बार उगला काला सोना, कैसे हुई थी कच्चे तेल की खोज?

तब पेट्रोल और डीजल कुछ भी ईजाद नहीं हुआ था. बल्ब भी नहीं जला था. क्या तब रात को घरों में अंधेरा ही रहता था? अगर नहीं तो रातों को घरों में रोशनी आखिर होती कैसे थी? फिर केरोसिन ऑयल की खोज कैसे हुई? और फिर किसका दिमाग घूमा और दुनिया बदलने वाले पेट्रोल-डीजल की खोज हो गई.

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28 अगस्त 1859 को पहली बार अमेरिका में तेल का कुऑ मिला था. फाइल फोटो: इंडिया टुडे/विकिमीडिया कॉमन्स
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अभय शर्मा
19 अक्तूबर 2023 (अपडेटेड: 19 अक्तूबर 2023, 04:29 PM IST)
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एक दिन आप सुबह-सुबह सोकर उठे. देखा तो हर तरफ हड़कंप मचा था. जानने की इच्छा हुई आखिर हुआ क्या? आंखे मलते हुए मोबाइल पर तुरंत न्यूज़ पढ़ी, होश उड़ गए. खबर थी कि दुनिया में कच्चा तेल खत्म. यानी पेट्रोल-डीजल कुछ भी नहीं बचा. बूंद भर भी नहीं. सुनकर टेंशन तो होगी, घर के दरवाजे पर कार खड़ी है, बाइक खड़ी है, अब उनका क्या होगा. लेकिन कुछ देर की टेंशन थी जो दो बातें सोच कर कम हो गई. पहली- अरे ये दर्द केवल हमारा ही थोड़े है, ये तो जगत की समस्या है. दूसरा- कोई नहीं, सीएनजी और इलेक्ट्रिक कारें तो मार्केट में आ ही गई हैं. घर की लाइट और एसी-वेसी भी चल रही है. तेल रुकने से ये कुछ भी बंद नहीं हुए. लेकिन कुछ रोज महंगाई का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि कुछ समय के लिए ही सही देश की अर्थव्यवस्था के चक्के तो जाम हो ही जाएंगे. लेकिन कुल मिलाकर ऐसा कुछ नहीं होगा जिससे आपको ये लगे कि आप 170 साल पहले पहुंच गए.

170 साल पहले की बात इसलिए क्योंकि तब पेट्रोल और डीजल कुछ भी इजाद नहीं हुआ था. बल्ब भी नहीं जला था. इलेक्ट्रिक पंखा भी नहीं और एसी भी नहीं था. लेकिन, तब लोग जीते कैसे थे? क्या रात को घरों में अंधेरा ही रहता था? अगर नहीं तो रातों को घरों में रोशनी आखिर होती कैसे थी? फिर केरोसिन ऑइल यानी मिट्टी के तेल की खोज कैसे हुई? और फिर किसका दिमाग घूमा और दुनिया बदलने वाले पेट्रोल-डीजल की खोज हो गई.

मछली और चिड़िया जलाते थे

बात बिलकुल शुरू से शुरू करते हैं. कहा जाता है कि आधुनिक युग शुरू होने से हजारों साल पहले तेल और गैस का उपयोग कुछ क्षमता में किया गया था, तेल के कुएं 347 ईस्वी में चीन में खोदे गए थे. लेकिन आधुनिक इतिहास की शुरुआत जब हुई तब में तेल और गैस लोगों की जिंदगी से गायब थे. 15वीं और 16वीं शताब्दी में हाल ये था कि अंधेरा होते ही लोग घरों से बाहर नहीं निकलते थे. ये चलन आम था. अगर कभी उन्हें रात में कुछ काम करना होता था, तो इसकी व्यवस्था कई दिनों पहले से करनी पड़ती थी. वो व्यवस्था जिसे सुनकर हो सकता है अब 2023 में आप कल्पना भी न कर पाएं.

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फिश और चिड़िया जलाकर रौशनी की जाती थी

उस समय अमेरिका और यूरोप में लोग एक विशेष तरह की मछली और विशेष तरह की एक चिड़िया का शिकार करके उसे कई दिन पहले ही घर में लाकर रख लेते थे. इन्हें कई दिनों तक सुखाया जाता था, फिर इनसे रौशनी की जाती थी. अमेरिका में तब इसके लिए सैल्मन फिश का बड़ा इस्तेमाल होता था. लोग इस मछली को पकड़कर कई दिनों तक सुखाते थे, फिर किसी रात को जब जरूरत होती थी इसे एक लोहे के स्टैंड पर रखकर जलाते थे. इसी तरह स्कॉटलैंड में लोग ऑइली बर्ड के नाम से मशहूर 'पेट्रेल' नाम की चिड़िया को मारकर सुखा लेते थे और फिर रौशनी के लिए इस्तेमाल किया करते थे. इस चिड़िया के गले में गले में बत्तियाँ (मोटा धागा) डाला जाता था. ठीक वैसे ही जैसे मोमबत्ती में बत्ती डाली जाती है, बताते हैं कि ये चिड़िया कई घंटों तक रौशनी किया करती थी.

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फिर आया व्हेल का तेल

फिर इस दौर से लोग बाहर आए. एक नया जमाना आया, नया आविष्कार हुआ. साल 1700 से 1850 तक व्हेल मछली का तेल चलन में आया. लैंप जलाने के लिए इस्तेमाल हुआ. बड़ी संख्या में व्हेल का शिकार किया जाता था. इस तेल की कई कंपनियां थीं. छोटी-छोटी बॉटल्स में ये तेल बिका करता था. दुनियाभर में अमेरिका इस कारोबार में नंबर वन था. उस समय व्हेल के तेल की इंडस्ट्री अमेरिका में पांचवीं सबसे बड़ी इंडस्ट्री थी. समुद्र में व्हेल पकड़ने वाले करीब 900 जहाज घूमा करते थे, जिसमें से 700 ज्यादा केवल अमेरिका के थे.

जब केरोसीन ऑयल आया

लेकिन, इतना बड़ा पाप आखिर कब तक कोई होने देता. कुछ लोगों को व्हेल का शिकार किया जाना पसंद नहीं आता था. और वो लगे थे फ्यूल का दूसरा विकल्प ढूंढने में. 1846 में कनाडा के आविष्कारक और भूविज्ञानी अब्राहम पाइनियो गेस्नर को इस काम में कामयाबी मिली. उन्होंने लैंप जलाने के लिए नया फ्यूल इजाद कर लिया. अब्राहम ने कोयला, कोलतार और ऑयल शेल को रिफाइन करके केरोसिन आयल यानी मिट्टी का तेल बना दिया. इसे बनाना आसान था और से व्हेल ऑयल से आधे से भी कम दाम में मिलता था.

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अब्राहम पाइनियो गेस्नर | फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

इस फ्यूल की खोज होते ही व्हेल के तेल का मार्केट ढह गया. 1850 में अब्राहम गेस्नर ने केरोसिन गैस लाइट नाम की कम्पनी खोली और सड़कों पर केरोसिन तेल से जलने वाले लैम्प लगाने के कॉन्ट्रैक्ट लिए. फिर घर-घर में केरोसिन आयल से रौशनी होने लगी. ये उस समय एक बहुत बड़ा आविष्कार माना गया था, इसलिए भी क्योंकि केरोसिन इतना सस्ता था कि इसे हर कोई गरीब-आमिर सब खरीद सकते थे. ये वो समय भी था जब आम लोगों ने रात को भी घरों से निकलना शुरू किया, क्योंकि अब सडकों पर लैम्प लग गए थे.

फिर डार्टमाउथ कॉलेज का एक प्रोफेसर पेंसिल्वेनिया पहुंचा

बहरहाल, इसके बाद भी और बेहतर फ्यूल की खोज जारी रही. और फिर आया साल 1858. कहें तो दुनिया बदलने वाला साल यही था. अमेरिका के डार्टमाउथ कॉलेज के एक प्रोफेसर जॉर्ज बिसेल अमेरिका के ही पेंसिल्वेनिया राज्य के कुछ ग्रामीण इलाकों में पहुंचे. उन्हें कहीं से पता लगा था कि पेंसिल्वेनिया के कुछ दूरदराज वाले इलाकों में लोगों को अजीब सा कोई चिकना पदार्थ जमीन पर दिखा है. कई जगह इस तरल पदार्थ के छोटे-छोटे बुलबुले जमी पर देखे गए थे. प्रोफेसर बिसेल इन इलाकों में गए और इस पदार्थ के कई सैम्पल लेकर वापस अपने कॉलेज पहुंच गए. कई दिन लगे लेकिन इस पदार्थ को उन्होंने रिफाइन कर लिया. रिसर्च किया और पता लगा लिया कि इसमें लैंप जलाने की क्षमता है. यानी बिसेल को ये अंदाजा हो गया था कि पेंसिल्वेनिया के इलाकों में जमीन के नीचे एक ऐसा तरल पदार्थ है जिससे लैम्प जलाया जा सकता है.    

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प्रोफेसर जॉर्ज बिसेल (बाएं) और एडविन ड्रेक (बाएं) | फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स 

इसके बाद वो जल्द ही फिर पेंसिल्वेनिया के उन्हीं इलाकों में दोबारा पहुंचे. अब उन्हें तलाश थी एक ऐसे व्यक्ति की, जो उनके लिए तेल के कुएं का पता लगा सके यानी जो खुदाई करके जमीन के नीचे तेल ढूंढ सके. प्रोफेसर जॉर्ज बिसेल को एक ऐसा बंदा जल्द ही मिल गया. नाम था एडविन ड्रेक. एडविन ड्रेक एक कंडक्टर थे, होटल में क्लर्क की नौकरी भी कर चुके, कुल मिलाकर ड्रेक की टेक्निकल नॉलेज सिफर थी. लेकिन जब प्रोफेसर बिसेल ने उन्हें अपना प्लान बताया तो वो तेल ढूंढने के काम के लिए तुरंत तैयार हो गए.

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अंकल बिली और उनके बेटे लगे ड्रिलिंग के काम पर

एडविन ड्रेक ने पेंसिल्वेनिया के ही एक व्यक्ति को हायर किया ढाई डॉलर प्रति दिन की दिहाड़ी पर. नाम था विलियम स्मिथ प्यार से लोग इन्हे अंकल बिली कहते थे. अंकल बिली को पानी के नल लगाने के लिए जाना जाता था. जमीन में ड्रिलिंग यानी बोरिंग करते-करते उनके बाल सफेद हो चुके थे. अब काम शुरू हुआ पेंसिल्वेनिया के अलग-लग इलाकों में तेल की खोज का. कई महीनों काम हुआ, लेकिन कुछ नहीं मिला. फिर ये लोग पहुंचे यहां के टाइटसविले इलाके में. अंकल बिली ने अपने बेटों के साथ यहां मेटल का पाइप लगाकर ड्रिलिंग शुरू की.

शुरू में जमीन से कुछ तेल की बूंदे निकलीं, उम्मीद जगी. लेकिन 39 फीट की खुदाई के बाद जमीन में एक बड़ा पत्थर आ गया और ड्रिलिंग करने वाला मेटल का पाइप अटक गया. इसके बाद ड्रिलिंग बंद कर दी गई. एडविन ड्रेक स्टीम का इंजन लेकर आए जिससे फिर ड्रिलिंग की कोशिश की गई, तगड़ी चोटों के बाद जमीन के नीचे आया पत्थर टूट गया और ड्रिंलिंग फिर शुरू हो गई. यहाँ पर एक बात आपको बताना भूल गए कि उस समय जब ड्रिंलिंग चल रही थी तो हर कोई एडविन ड्रेक और अंकल बिली की मजाक बनाता था, क्योंकि ये वो समय था जब कोई सोच भी नहीं सकता था कि जमीन के नीचे पानी की जगह तेल भी हो सकता है. लोगों ने ड्रेक को पागल तक करार दे दिया था. लेकिन ड्रेक तब भी डटे हुए थे.

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अंकल बिली (बाएं) और दायीं ओर ड्रिलिंग वाली जगह की फोटो | फोटो क्रेडिट: विकिमीडिया कॉमन्स 

जब एडविन ड्रेक निराश हो गए

बहरहाल, 60 फीट तक ड्रिलिंग होने के बाद भी जब तेल जैसा कुछ नहीं निकला तो एडविन ड्रेक नाउम्मीद हो गए. उन्होंने अंकल बिली से निराश होकर कहा - 'अब आप चाहे जितनी खुदाई कर लो, लेकिन मुझे नहीं लगता अब कुछ निकलेगा, आप देख लो कि अब खुदाई करनी है या नहीं, मैं तो जा रहा हूं, मैं आपको आकर काम बंद करने के लिए आखिरी सहमति दूंगा.'

इसके बाद एडविन ड्रेक टाइटसविले से चले गए. कुछ लोगों का मानना है कि एडविन ड्रेक ड्रिलिंग का काम बंद करने के लिए प्रोफेसर जॉर्ज बिसेल की सहमति लेने वहां से गए थे. हालांकि, ड्रेक के जाने के बाद भी अंकल बिली ने ड्रिलिंग का काम जारी रखा, हालांकि काफी स्लो कर दिया. अब वो आराम ज्यादा करते ड्रिलिंग कम. ऐसा होना लाजिमी भी था क्योंकि निराश तो वो भी थे.

जब जमीन ने उगला कच्चा तेल

फिर आया 28 अगस्त 1859 का दिन. दोपहर की बात है. रविवार था अंकल बिली एक पेड़ के नीचे पड़ी चारपाई पर आराम कर रहे थे. उनका एक बेटा अकेले ड्रिंलिंग कर रहा था. करीब 69 फीट की ड्रिलिंग हो चुकी थी. फिर बेटे ने ड्रिलिंग पाइप जमीन में डाला और पाइप में फंसी मिटटी निकालने के लिए उसे ऊपर खींचा. जो ड्रिलिंग की प्रोसेज है. लेकिन इस बार मिट्टी के साथ पाइप के निचले हिस्से में एक बदबूदार तरल पदार्थ भी लगा हुआ था. एक चिकना गाढ़ा काला पदार्थ था. बेटा दौड़कर अपने पिता के पास पहुंचा, कहा पापा उठो तेल मिल गया.

अंकल बिली ने जब ये सुना, तो बेटे की ओर देखते रह गए, उनके लिए विश्वास करना मुश्किल था. बेटे ने हाथ बढ़ाया और उन्हें अपनी उंगलियों पर लगा ऑइल दिखाया. अंकल बिली देखते ही पहचान गए. ये वही था जिसका सैम्पल उन्हें एक छोटी सी शीशी में महीनों पहले प्रोफेसर जॉर्ज बिसेल ने दिया था.

अब क्या था तीनों पिता-पुत्रों में एक नया उत्साह था. तीनों डट गए ड्रिलिंग करने में. अगले दिन सोमवार को एडविन ड्रेक वापस टाइटसविले लौटे. अब वो आए थे अंकल बिली को ड्रिलिंग करने से रोकने के लिए और सामान बांधकर वापस घर जाने लिए. लेकिन बग्घी से उतरते ही दूर से एडविन ने ड्रिलिंग साइट का जो नजारा देखा, तो उन्हें लगा कुछ बवाल हो गया है. लोगों की भीड़ वहां इक्क्ठा थी. वो तेजी से ड्रिलिंग साइट की ओर बढे, करीब जाकर देखा तो बड़े-बड़े ड्रमों में, कंटेनर में, बैरल में, बर्तनों में कच्चा तेल भरा हुआ था. और अंकल बिली और उनके बेटे ड्रिलिंग करने के बजाय इस तेल की सुरक्षा में लगे हुए थे. अंकल बिली ने एडविन ड्रेक को देखते ही अपनी गोल हैट सर से उतारी और अपने सीने पर हाथ रखकर ड्रेक की ओर सिर झुकाकर मुस्कुराए. फिर पास जाकर उन्हें गले लगा लिया. अब तक ड्रेक का सवाल पूछने वाला चेहरा, इत्मिनान वाली मुद्रा में बदल चुका था. ड्रेक को आगे समझने में देर न लगी कि अंकल बिली के चेहरे पर ख़ुशी क्यों है.

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तेल खोज के बाद पिट-होल सिटी का हाल | फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

एक शहर बसा और जल्द ही लोग छोड़कर चले गए

अमेरिकी जानकार बताते हैं कि एडविन ड्रेक और अंकल बिली जिस इलाके में ड्रिलिंग कर रहे थे. वो इलाका टाइटसविले शहर से करीब 11 किमी दूर था. एक देहात का इलाका और तब वहां आसपास कुछ भी नहीं था. लेकिन तेल की खोज होने के कुछ साल बाद ही इस एरिया में पैर रखने की जगह नहीं थी. एडविन ड्रेक के तेल के कुएं के चार-छह किलोमीटर के इलाकों को बाहर से आए लोगों ने खरीद लिया था, मकान बन गए थे, बड़े स्तर पर लोग ड्रिलिंग का काम शुरू कर चुके थे. 20 डॉलर में एक बैरल तेल तब यहां बिकने लगा था. 1865 तक इसे पिट-होल सिटी का नाम दिया जा चुका था. 50 से ज्यादा होटल यहाँ बन चुके थे. पूरे अमेरिका में ये शहर oil सिटी के नाम से मशहूर हो गया था. दूर-दूर से लोग यहां आते थे. 15000 हजार लोग यहाँ अपने मकान बनाकर रहने लगे थे.

लेकिन फिर जल्द ही वो समय आया जब इस शहर को लोगों ने छोड़ना शुरू कर दिया. क्यों ये भी बताते हैं. दरअसल, जनवरी 1866 से यहां के तेल के कुओं में तेल कम होना शुरू हो गया. इस शहर से एक दिन में छह हजार बैरल तेल निकलता था, जो जनवरी 1866 में घटकर तीन हजार बैरल पर पहुंच गया. फिर अगले एक साल में घटकर 2 हजार बैरल पर डे. कुछ सालों में यहां के कुओं में तेल खत्म हो गया. और फिर लोग इस शहर को छोड़कर चले गए.

लेकिन, तब तक पूरे अमेरिका और दुनिया को ये पता चल चुका था कि जमीन सिर्फ पानी ही नहीं उगलती. इसमें से तेल भी निकलता है. इस खोज के बाद बड़े-बड़े प्लेयर कच्चे तेल की फील्ड में उतर गए. काले सोने यानी क्रूड ऑइल की बड़ी रिफाइनरियां खुलीं. पेंसिल्वेनिया के अलावा अमेरिका के अलस्का, ओहियो, और टेक्सास जैसे राज्यों में बड़े तेल के कुएं मिले और अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक मुल्क बन गया.

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