The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Campus Katha: When i trimmed the grass of my college's lawn

मां कहती थी बड़ी होकर घास काटोगी, और वो सच हो गया

वो कॉलेज का समय था, जब लगा कि घास काटना ही सबसे अच्छा काम है.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
लल्लनटॉप
17 जून 2016 (अपडेटेड: 17 जून 2016, 05:59 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
पारुल

पारुल

पारुल तिवारी डीयू के टॉप कॉलेज सेंट स्टीफेंस से पढ़ाई कर रही हैं. हिस्ट्री में. धें वाली अंग्रेज़ी में लिखती-पढ़ती-बोलती हैं लेकिन हिंदी से इश्क इधर ‘दी लल्लनटॉप’ की गली में खींच लाया है. पढ़िए इनके कॉलेज का एक किस्सा.


 
"मैं काम कोई भी करूं, लेकिन अच्छी तरह करना बहुत ज़रूरी है. अगर मैं साइंटिस्ट बन जाऊं, लेकिन अच्छा साइंटिस्ट न बनूं तो क्या फ़ायदा? भले घास काटने वाला बनूं, लेकिन अच्छा, तो कोई मतलब है. मैं ये सोचता हूं." लक्ष्य फ़िल्म में जब ऋतिक रौशन के पापा संडे की सुबह- सुबह उनको 'आगे क्या करोगे' बोल के झाड़ते हैं, तो ऋतिक यही बोलते हैं. और बिलकुल सही बोलते हैं. एकदम ऐसा ही होना चाहिए.
https://www.youtube.com/watch?v=fYJEJCFQEcE
ये जो भारतीय मां-बाप हर संडे सुबह-सुबह उठ जाते हैं, हमारा चैन से सोना देख नहीं पाते हैं. उनको और कुछ ढंग का मिलता नहीं है. बरसों से चले आ रहे सवाल को दोहरा देते हैं - "आगे क्या करने का इरादा है?" बस! और आपका संडे को बकैती काटने का पूरा प्लान चौपट हो जाता है. लेकिन हम और हमारे भाई भी कम बेशरम और बेहूदे नहीं थे. हर बार सर नीचे कर के एक ही लाइन चेप देते थे - "अबसे अच्छे से पढ़ाई करेंगे." और एक बार जो किसी तरह थोड़ा बहुत सुन के निकल लिए, फिर तो वही दर कुत्तई शुरू.
जैसे-तैसे पढ़ के जब कॉलेज आए तो फिर से वही सवाल! मतलब साला एक दुविधा पार किए नहीं कि दुनिया अगली दुविधा की ओर जीभ निकाल के, आंख नचा के इशारा कर देती है. खूब चिढ़ाती है. हर चौथे दिन कोई टीचर, कोई दोस्त, मुंह उठा के पूछ देता है. वही एक सवाल. 'आगे क्या करोगी?' बचपन में जब हम छोटे थे तो कुछ खाने को मांगने पर हमारी मम्मी 'घेंवड़ा' बना कर देने की बात कहती थीं. जी में आता है इन लोगों को भी यही बोल दें कि घेंवड़ा बनाएंगे. लेकिन कुछ उल्टा-सीधा बोल के टरका देते थे.
Campus Kisse

Embed
कुछ दिन क्लास में चैन से कटे. लेकिन लोगों की भी एक आदत होती है. उनसे रहा नहीं जाता है. रह-रह के कोई पूछ ही देता था, 'सीरियसली बताओ, आगे क्या करोगी?' 'सीरियसली' सुन के हमें और हंसी आ जाती. हम अब निहायत निर्लज्ज हो चुके थे. किसी के भी सामने, यहां तक की इंटरव्यू में भी कुछ भी प्लानिंग बता देते थे. ट्रेन में पेपर सोप बेचने, गन्ने का जूस बेचने और ATM का गार्ड बनने तक हम कुछ भी बक देते थे.
Embed
डेट फ़िक्स हुई. वैसे ही जैसे किसी की शादी की फ़िक्स होती है. इतना ही नहीं, मुहूर्त भी निकाला गया. तय हुआ कि घास तभी कटेगी जब ज़्यादा से ज़्यादा दोस्त फ्री हों, और इस मंगल बेला में शरीक हो सकें. कुछ महानुभावों ने फेसबुक पर इवेंट तक बना दिया. कोई इंट्रेस्टेड दिखता था तो कोई डेफिनिटली कमिंग दिख रहा था. दोस्तों में मज़ाक चरम पर था. कॉलेज में जिसे मालूम चल सकता था, उसे मालूम चल चुका था. टीचर्स में भी कुछ न कुछ बतकही चल ही रही थी. कुछ दोस्तों को ये आईडिया बिल्कुल भी ढंग का नहीं लग रहा था. उन्होंने हमें मना किया. एक ने तो फेसबुक से ही अन-फ्रेंड कर दिया, ये कह कर कि घास काटने वाली से मुझे कोई नाता नहीं रखना. लेकिन अपने दिमाग में धुन थी तो थी. घास काटने की.
तय तारीख और समय पर हम सभी लॉन में पहुंच गए. ठीक-ठाक भीड़ जुट गई थी. उस वक़्त अगर हमें देखने के लिए टिकट लगा दिया जाता तो आज हम एक बड़े से लॉन वाले बंगले में रह रहे होते. कुछ दोस्त वीडियो बना रहे थे. कुछ फोटो ले रहे थे. घास काट के बड़ा मज़ा आया. हमसे ज़्यादा लोगों को मज़ा आया. कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन से त्रस्त लोग हैरान थे कि पहली बार कॉलेज में सिर्फ 'मन कर रहा था' के तर्क पर किसी काम की इज़ाज़त दी गई है. फिर काफी दिनों तक कॉलेज में भटकते वक़्त लोग हमें पहचानने लगे थे. पूछने लगे थे - 'तुम्ही थी न जिसने घास काटी थी उस दिन?' हालांकि ऐसा बहुत दिन नहीं चला. कुछ ही दिन बाद लोग हमें समाज में हमारी पुरानी औकात पर वापस ला दिए. कल तक पहचानने वाले लोग आज हमें सामने से आते देख नज़रें फेर लेते थे. उस समय एक बार फिर हमें ज़ालिम दुनिया का असली चेहरा दिख गया. साला सुर्खियों में रहो तभी भाव मिलता है.
Embed

Advertisement

Advertisement

()