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इन खुलासों ने उघाड़ दिया भोपाल सेंट्रल जेल का सच

लापरवाही के 3 सबूत. इसका ठीकरा किसके सिर फोड़ें?

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2 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 2 नवंबर 2016, 09:53 AM IST)
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भोपाल की सेंट्रल जेल. उसके गेट पर ही मोटे से अक्षरों में लिखा है ISO. जेल उसके मानकों पर खरी थी इसलिए ही उसे ISO का सर्टिफिकेट मिला. यानी आप उसकी मजबूती पर भरोसा कर सकते हैं.  

टाइट सिक्योरिटी वाली इस जेल से सिमी के आठ संदिग्ध आतंकी ताला तोड़कर भाग निकले. वो भी एक हेड कांस्टेबल का मर्डर करके. ISO वाली सेंट्रल जेल से भागना कोई पहली बार नहीं था. इससे पहले भी दो कैदी भाग चुके हैं, वो भी आठ महीने पहले. मर्डर के मामले में दोषी ठहराए गए थे और सजा काट रहे थे. वो कैदी अब कहां हैं, दोबारा पकड़े गए या नहीं, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई. उसी जेल में लकड़ी की चाभी से ताला खोलकर 8 'खूंखार' संदिग्ध आतंकी भाग निकले. अब पता चला है कि जेल की सिक्योरिटी पर रिटायर्ड जेल प्रमुख ने 2014 में ही चेतावनी दे दी थी. और कहा था कि सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है. इसके बाद भी जरूरी इंतजाम नहीं किए गए.

पढ़िए, भोपाल की सेंट्रल जेल की सुरक्षा की पोल खोलते ये तीन उदाहरण

1. जेल से भाग गए गणपत सिंह और रामलाल

6 फरवरी साल 2004. खबर आती है दो कैदी सेंट्रल जेल से फरार हो गए. इनमें से एक मंडी, ग्यारसपुर (विदिशा) का रहने वाला गणपत सिंह रावत था और दूसरा फ्रीगंज, कुरवाई (विदिशा) का रामलाल केवट. ये दोनों मर्डर के जुर्म में 6 साल से सजा काट रहे थे. उम्रकैद हुई थी. इसमें सबसे ज्यादा चौकाने वाली बात ये है कि पुलिस को पता भी नहीं चला कि दो कैदी भाग गए हैं. जब कैदियों की गिनती हुई, तब पता चला. वो बाकी कैदियों के साथ बगीचे में काम करने के लिए ले जाए गए थे. वहां से लौटने से के दौरान ही पुलिस को चकमा दे गए. तब बंदियों को ले जाने वाले प्रहरी को एसपी (जेल) ए.के. तोमर ने सस्पेंड कर दिया था.

2. सब कुछ भगवान भरोसे था सेंट्रल जेल में

साल 2014 की बात है. मध्य प्रदेश के फॉर्मर आईजी (जेल) जी.के. अग्रवाल ने मध्य प्रदेश सरकार को जेल का बेकार बिल्डिंग स्ट्रक्चर, सिक्योरिटी और स्टाफ की बदहाली के बारे में चेतावनी दी थी. बताया गया था कि यहां सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है. जेल में स्टाफ की कमी है. अग्रवाल साल 2000 में रिटायर हुए थे. letter 1 'इंडियन एक्सप्रेस' से बातचीत में जीके अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने इस बारे में उस समय के स्टेट चीफ सेक्रेटरी एंथनी डेसा को 26 जून 2014 में एक लेटर लिखा था. इसकी कॉपी उन्होंने नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत डोभाल और इंटेलिजेंस ब्यूरो को भी भेजी थी. 2013 में भोपाल की खांडवा जेल से सिमी के 6 मेंबर्स भाग गए थे. इसके कुछ महीने बाद ही उन्होंने लेटर लिखा था. लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया. letter 2 अग्रवाल ने जेल अफसरों से मीटिंग बुलाने की भी मांग की थी, जिसमें वह जेल से कैदियों के फरार होने जैसी घटनाओं से बचने के लिए कुछ सुझाव देते, लेकिन मीटिंग पर भी कोई जवाब नहीं मिला. उन्होंने लेटर में लिखा, 'इस समय सभी जेलों के सिमी सदस्यों को भोपाल सेंट्रल जेल में रखा गया है. लेकिन इस जेल की बिल्डिंग स्ट्रक्चर से लेकर, गलत सुरक्षा व्यवस्था और स्टाफ की दुर्दशा को देखते हुए यह मान लेना बिलकुल गलत होगा कि सब कुछ ठीक रह सकता है. यहां कोई बड़ा हादसा भी हो सकता है.' अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने यह लेटर उस वक्त जेल प्रशासन को भी भेजा था. लेकिन जब डीजी (जेल) संजय चौधरी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह ऐसे किसी लेटर के बारे में नहीं जानते.

3. संदिग्ध आतंकियों को जेल में काबू करना हो गया था मुश्किल

नई दुनिया की खबर है. 25 दिसंबर साल 2014.  भोपाल सेंट्रल जेल प्रशासन ने जेल हेडक्वार्टर को लेटर लिखा. जिसमें बताया गया कि उन्हें काबू करना मुश्किल हो गया है. उस वक्त जेल में सिमी के 28 मेंबर्स बंद थे. उस लेटर में सिमी के कथित आतंकियों की हरकतों की जानकारी दी गई. बताया गया कि सेंट्रल जेल में बंद फैजल और उसके साथियों के इरादों को देखते हुए उन्हें दूसरे कैदियों से अलग कर दिया गया है. इसके बावजूद फैजल अपने साथियों का मनोबल बढ़ाने के लिए भड़काऊ भाषण का इस्तेमाल कर माहौल बिगाड़ने की कोशिशें कर रहा है. कई दिनों तक कथित आतंकी खाने के बर्तन बजाकर जेल में शोरशराबा करते हैं. और जब नमाज पढ़ने के वक्त एक साथ मिलते हैं. तो आपस में बातें करने लग जाते हैं. कुछ प्लानिंग करते हैं.
रिपोर्ट पढ़ने के बाद कुछ सवाल भी पैदा होते हैं. पहला ये कि मर्डर करके फरार होने वाले दोनों कैदी कहां हैं? दूसरा सवाल, जब रिटायर्ड अफसर ने आगाह किया था तो क्यों कुछ नहीं किया गया? तीसरा सवाल, सिमी के संदिग्ध आतंकियों को लेकर ही खास तौर से आगाह किया गया था. फिर भी लापरवाही क्यों बरती गई? चौथा सवाल, संदिग्ध आतंकियों को साल 2014 में अलग-अलग रखा जा रहा था और वे सिर्फ नमाज के वक्त मिलते थे. जब वो इतने कथित खतरनाक आतंकी थे तो उन्हें एक दूसरे  के संपर्क में आने का मौका क्यों दिया गया?
सवाल उठाइए. सवाल पूछिए. सवालों के होने से सच का सबसे परिष्कृत रूप सामने आता है.  यही लोकतंत्र है. 

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