बात एक कहानी से शुरू करते हैं. आप जानते ही हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध में जापान कीहार हुई थी. ब्रिटेन, अमेरिका के खिलाफ लंबी लड़ाई, फिर हिरोशिमा और नागासाकी परपरमाणु हमले के बाद जापान पूरी तरह से बर्बाद हो गया था. लाखों लोग मारे गए थे,उद्योग-धंधे, अर्थव्यवस्था चौपट. जापान की साख इतनी खराब हो गई थी कि जापानी सामानघटिया माल का रूपक बन गया था. वैसे ही जैसे आज हमारे यहां चाइनीज़ माल को घटियामाना जाता है. तब जापानी सामान के लिए ऐसा कहा जाता था. लेकिन जापान फिर से अपनेपैरों पर खड़ा हुआ. तबाही से तरक्की के सफर पर दौड़ना शुरू किया. और फिर दुनिया कीसबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की कतार में शामिल हुआ. जापान फिर से एक समृद्ध और खुशहालदेश बन गया. पर क्या आप जानते हैं इसमें बड़ा रोल किसका था- जापान के शिक्षकों का.जापान की सरकारों ने पूरा दारोमदोर अपने टीचर्स को दिया. टीचर्स ने मेहनत करकेजापान के बच्चों को समाज और राष्ट्रनिर्माण सिखाया. देश के लिए दिन-रात मेहनत करनेकी सीख दी. बच्चों को स्किल्स दिए. और ये पीढ़ी जापान को फिर से खड़ा करने में लगगई. दिनरात मेहनत की. और उसका असर पूरी दुनिया ने देखा. बेहतर शिक्षा की ज़रूरत परजापान के प्रधानमंत्री यासुहिरो नाकासोने ने कहा था कि अगर देश को विकासक्षमता औरसृजनशीलता वाला समाज तैयार करना है जो सबसे जरूरी है शिक्षा में सुधार करना. औरजापान के प्रधानमंत्रियों ने जुमला के बजाय असल में शिक्षा में सुधार पर ध्यानदिया. हमने जापान का ज़िक्र बस इसलिए किया कि अच्छी शिक्षा एक समाज के लिए, एक देशमें कितना फर्क ला सकती है. लेकिन अच्छी शिक्षा पाने का पर्याय हमारे देश में ये बनगया है कि कितने महंगे प्राइवेट स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे हैं. जो भी सक्षम है,वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहता. और जो जितना सक्षम है वोउतने महंगे स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं. लेकिन हमें वो रिपोर्ट दिखतीजिसमें बच्चे अब प्राइवेट के बजाय सरकारी स्कूल में जा रहे हैं. तो पहले रिपोर्ट कीबात करेंगे और फिर इसके मायने समझेंगे. प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन नाम से एक नामी NGOहै. इसका हर साल शिक्षा पर एक सर्वे होता है - Annual Status of Education Report.ASER. असर बोला जाता है. इसमें देशभर के 25 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशोंके 17 हजार 814 गांवों में फोन पर बात करके सर्वे हुआ. 76 हजार परिवारों से बात की.करीब 7 हजार स्कूलों के टीचर्स या प्रिसिंपल्स से भी बात की गई. और इसके बाद क्यामालूम चला, वो सुनिए. सर्वे में सामने आया कि देश में प्राइवेट स्कूल में पढ़नेवाले छात्रों का प्रतिशत घटा है और सरकारी स्कूलों में दाखिले बढ़ रहे हैं. (GFX)2018 में 64.3 फीसदी बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में हुआ था. 2020 में येहिस्सेदारी 65.8 फीसदी थी. यानी ज्यादा फर्क नहीं आया था. लेकिन 2021 में एकदम सेबढ़ गया. इस साल सितंबर तक 70.3 फीसदी बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूल में हुआ है.इसके उल्ट. निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों की तादाद घट गई है. 2020 में 28.8फीसदी था. जबकि 2021 में घटकर 24.4 फीसदी रह गया है. अब इसकी वजह क्या रही होगी.सर्वे में लोगों ने की वजह बताईं. जैसे महामारी के कारण आई आर्थिक तंगी, लॉकडाउन केकारण पलायन, प्राइवेट स्कूलों का ऑनलाइन क्लास ना ले पाना. या सरकारी स्कूलों कीमुफ्त फैसिलिटी. अगर राज्यवार देखें तो सबसे ज्यादा सरकारी की छात्रों का पलायनउत्तर प्रदेश में हुआ है. सर्वे के मुताबिक 2018 की तुलना में 13% ज्यादा छात्रोंने सरकारी स्कूलों में नामांकन कराया है. 2018 में नामांकन 43.10% था, अब यह बढ़कर56.30% हो गया है. सर्वे में कुछ और अहम नतीजे भी सामने आए. जैसे देश में ट्यूशन काचलन बढ़ रहा है. 2020 में 32.5 फीसदी बच्चे ट्यूशन पर निर्भर थे. अब ये 39 फीसदी होगया है. तो प्राइवेट स्कूलों में नामांकन घट रहा है, लेकिन प्राइवेट ट्यूशन का चलनबढ़ रहा है. नतीजों को भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में कैसे समझना चाहिए. हमनेप्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की सीईओ डॉ रुकमणी बनर्जी से बात की. उन्होंने हमें बतायासरकारी स्कूल में नामांकन बढ़ने की कई वजहे हैं एक तो है कोविड के दौरान सरकारीस्कूल ने बहुत प्रयास किए हैं कि बच्चों को अलग अलग तरीक़े से लर्निंग कराई जाए.अगर परिवार की नज़र से देखें तो एक पहलू यह भी हो सकता है कि इस दौरान परिवार को कईआर्थिक परेशानियों से भी गुज़रना पड़ा था. आज जो आंकड़े दिख रहे हैं वो सब इन्हीचीज़ों का नतीजा है. और जैसे जैसे समय आगे जाएगा हमें समझ जाएगा कि यह कोविड की वजहसे है या वाक़ई किसी बड़े बदलाव की तरफ़ हम हैं. हमने अलग अलग राज्यों के टीचर्स सेभी बात करके ये समझने की कोशिश की कि कोरोना के बाद उनके लिए क्या बदला है. सबसेपहले राजस्थान के टीचर की बात सुनते हैं कोरोना काल के बाद बच्चों के परिजनों कारुख़ सरकारी स्कूलों की तरफ़ हुआ है. कोरोना की पहली लहर में इन बच्चों की संख्याकम थी लेकिन दूसरी लहर आने के बाद इस संख्या में बढ़ोतरी हुई है. उस वक़्त बच्चोंके लिए ऑनलाइन कंटेंट चलाया जाता था. अब जानते हैं कि यूपी के टीचर ने क्या कहासरकारी स्कूल में फ़ीस नहीं लग रही है , प्राइवेट में लग रही है. यहां तो उल्टासरकार पैसा दे रही है. जिससे साफ़ है ग्रामीण यहां के सरकारी स्कूल में ज़्यादाइंटरेस्टेड हैं इसलिए यहां ज़्यादा एडमिशन करा रहे हैं. पहले जहां 150 बच्चे रहतेथे अब वहीं 250 रह रहे हैं. पहले की तुलना में सरकारी स्कूल में सुविधा भी ज़्यादामिल रही है. अब सरकारी और प्राइवेट वाला फर्क समझते हैं. कोरोना में बच्चों केसरकारी स्कूलों में पढ़ने की वजह तो समझ आ रही है. लेकिन क्या सरकारी स्कूलों मेंपढ़ने का मतलब ये समझना चाहिए कि वो बच्चे अच्छी शिक्षा से महरूम हो जाएंगे. पहलेतो अच्छी शिक्षा का मतलब क्या होता है, ये समझना चाहिए. हमने शिक्षा पर काम करनेवाले और एक देश,12 दुनिया किताब के लेखक शिरिष खरे से बात की. उन्होंने कहा- आजजिनकी नौकरी गई है उनके पास पैसों की कमी है , लेकिन एक बड़े तबके के पास तो हमेशासे पैसा ही पैसे की कमी रही है. अगर मिडिल क्लास तबका अभी अपने बच्चों को प्राइवेटस्कूल में नहीं पढ़ा रहा है तो हो सकता है यह उनकी अस्थायी समस्या हो. लेकिन ग़रीबलोगों के लिए यह समस्या स्थायी है. इसलिए इसका निदान भी स्थाई होना चाहिए. और इसकानिदान सरकारी स्कूल ही है. शिरिष खरे ये मानते हैं कि सरकारी स्कूलों में बच्चों कीसंख्या बढ़ना एक मौके की तरफ लेना चाहिए. सरकारी शिक्षा को बेहतर करने का मौका है.हमने एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत से भी बात की. पूछा कि दिन ब दिनसरकारी स्कूलों का स्तर क्यों गिर रहा है. उन्होंने हमें बताया - मैंने देखा है किपहले लोग सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता देते थे लेकिन अब यह धीरे धीरे बदल रहा है.उसके बाद जैसे जैसे प्राइवेट स्कूल आने लगे लोगों का रुख़ उनकी तरफ़ होने लगा. एकबात और हुई जिन लोगों को शिक्षा के क्षेत्र में निर्णय लेना होता है, वो भी अपनेबच्चों को प्राइवेट स्कूलों में डालने लगे. इसके साथ ही सरकार का ध्यान भी इनसरकारी स्कूलों की तरफ़ से हटने लगा. संविधान की प्रस्तावना में ही समानता की बातहै. लेकिन समानता पढ़ाई के मामले में नहीं दिखती है. अमीरों को अच्छे स्कूल मिलतेहैं, गरीब बच्चों के लिए वो स्कूल होते हैं.