The Lallantop
Advertisement

क्या देश में बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल पा रही है?

क्या लगातार देश में शिक्षा का स्तर गिर रहा है?

Advertisement
Img The Lallantop
क्या लगातार देश में शिक्षा का स्तर गिर रहा है?
pic
सुरेश
18 नवंबर 2021 (अपडेटेड: 19 नवंबर 2021, 01:17 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
बात एक कहानी से शुरू करते हैं. आप जानते ही हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की हार हुई थी. ब्रिटेन, अमेरिका के खिलाफ लंबी लड़ाई, फिर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले के बाद जापान पूरी तरह से बर्बाद हो गया था. लाखों लोग मारे गए थे, उद्योग-धंधे, अर्थव्यवस्था चौपट. जापान की साख इतनी खराब हो गई थी कि जापानी सामान घटिया माल का रूपक बन गया था. वैसे ही जैसे आज हमारे यहां चाइनीज़ माल को घटिया माना जाता है. तब जापानी सामान के लिए ऐसा कहा जाता था. लेकिन जापान फिर से अपने पैरों पर खड़ा हुआ. तबाही से तरक्की के सफर पर दौड़ना शुरू किया. और फिर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की कतार में शामिल हुआ. जापान फिर से एक समृद्ध और खुशहाल देश बन गया. पर क्या आप जानते हैं इसमें बड़ा रोल किसका था- जापान के शिक्षकों का. जापान की सरकारों ने पूरा दारोमदोर अपने टीचर्स को दिया. टीचर्स ने मेहनत करके जापान के बच्चों को समाज और राष्ट्रनिर्माण सिखाया. देश के लिए दिन-रात मेहनत करने की सीख दी. बच्चों को स्किल्स दिए. और ये पीढ़ी जापान को फिर से खड़ा करने में लग गई. दिनरात मेहनत की. और उसका असर पूरी दुनिया ने देखा. बेहतर शिक्षा की ज़रूरत पर जापान के प्रधानमंत्री यासुहिरो नाकासोने ने कहा था कि अगर देश को विकासक्षमता और सृजनशीलता वाला समाज तैयार करना है जो सबसे जरूरी है शिक्षा में सुधार करना. और जापान के प्रधानमंत्रियों ने जुमला के बजाय असल में शिक्षा में सुधार पर ध्यान दिया. हमने जापान का ज़िक्र बस इसलिए किया कि अच्छी शिक्षा एक समाज के लिए, एक देश में कितना फर्क ला सकती है. लेकिन अच्छी शिक्षा पाने का पर्याय हमारे देश में ये बन गया है कि कितने महंगे प्राइवेट स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे हैं. जो भी सक्षम है, वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहता. और जो जितना सक्षम है वो उतने महंगे स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं. लेकिन हमें वो रिपोर्ट दिखती जिसमें बच्चे अब प्राइवेट के बजाय सरकारी स्कूल में जा रहे हैं. तो पहले रिपोर्ट की बात करेंगे और फिर इसके मायने समझेंगे. प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन नाम से एक नामी NGO है. इसका हर साल शिक्षा पर एक सर्वे होता है - Annual Status of Education Report. ASER. असर बोला जाता है. इसमें देशभर के 25 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के 17 हजार 814 गांवों में फोन पर बात करके सर्वे हुआ. 76 हजार परिवारों से बात की. करीब 7 हजार स्कूलों के टीचर्स या प्रिसिंपल्स से भी बात की गई. और इसके बाद क्या मालूम चला, वो सुनिए. सर्वे में सामने आया कि देश में प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों का प्रतिशत घटा है और सरकारी स्कूलों में दाखिले बढ़ रहे हैं. (GFX) 2018 में 64.3 फीसदी बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में हुआ था. 2020 में ये हिस्सेदारी 65.8 फीसदी थी. यानी ज्यादा फर्क नहीं आया था. लेकिन 2021 में एकदम से बढ़ गया. इस साल सितंबर तक 70.3 फीसदी बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूल में हुआ है. इसके उल्ट. निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों की तादाद घट गई है. 2020 में 28.8 फीसदी था. जबकि 2021 में घटकर 24.4 फीसदी रह गया है. अब इसकी वजह क्या रही होगी. सर्वे में लोगों ने की वजह बताईं. जैसे महामारी के कारण आई आर्थिक तंगी, लॉकडाउन के कारण पलायन, प्राइवेट स्कूलों का ऑनलाइन क्लास ना ले पाना. या सरकारी स्कूलों की मुफ्त फैसिलिटी. अगर राज्यवार देखें तो सबसे ज्यादा सरकारी की छात्रों का पलायन उत्तर प्रदेश में हुआ है. सर्वे के मुताबिक 2018 की तुलना में 13% ज्यादा छात्रों ने सरकारी स्कूलों में नामांकन कराया है. 2018 में नामांकन 43.10% था, अब यह बढ़कर 56.30% हो गया है. सर्वे में कुछ और अहम नतीजे भी सामने आए. जैसे देश में ट्यूशन का चलन बढ़ रहा है. 2020 में 32.5 फीसदी बच्चे ट्यूशन पर निर्भर थे. अब ये 39 फीसदी हो गया है. तो प्राइवेट स्कूलों में नामांकन घट रहा है, लेकिन प्राइवेट ट्यूशन का चलन बढ़ रहा है. नतीजों को भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में कैसे समझना चाहिए. हमने प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की सीईओ डॉ रुकमणी बनर्जी से बात की. उन्होंने हमें बताया सरकारी स्कूल में नामांकन बढ़ने की कई वजहे हैं एक तो है कोविड के दौरान सरकारी स्कूल ने बहुत प्रयास किए हैं कि बच्चों को अलग अलग तरीक़े से लर्निंग कराई जाए. अगर परिवार की नज़र से देखें तो एक पहलू यह भी हो सकता है कि इस दौरान परिवार को कई आर्थिक परेशानियों से भी गुज़रना पड़ा था. आज जो आंकड़े दिख रहे हैं वो सब इन्ही चीज़ों का नतीजा है. और जैसे जैसे समय आगे जाएगा हमें समझ जाएगा कि यह कोविड की वजह से है या वाक़ई किसी बड़े बदलाव की तरफ़ हम हैं. हमने अलग अलग राज्यों के टीचर्स से भी बात करके ये समझने की कोशिश की कि कोरोना के बाद उनके लिए क्या बदला है. सबसे पहले राजस्थान के टीचर की बात सुनते हैं
Embed
अब जानते हैं कि यूपी के टीचर ने क्या कहा
Embed
अब सरकारी और प्राइवेट वाला फर्क समझते हैं. कोरोना में बच्चों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने की वजह तो समझ आ रही है. लेकिन क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ने का मतलब ये समझना चाहिए कि वो बच्चे अच्छी शिक्षा से महरूम हो जाएंगे. पहले तो अच्छी शिक्षा का मतलब क्या होता है, ये समझना चाहिए. हमने शिक्षा पर काम करने वाले और एक देश,12 दुनिया किताब के लेखक शिरिष खरे से बात की. उन्होंने कहा-
Embed
हमने एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत से भी बात की. पूछा कि दिन ब दिन सरकारी स्कूलों का स्तर क्यों गिर रहा है. उन्होंने हमें बताया -
Embed
संविधान की प्रस्तावना में ही समानता की बात है. लेकिन समानता पढ़ाई के मामले में नहीं दिखती है. अमीरों को अच्छे स्कूल मिलते हैं, गरीब बच्चों के लिए वो स्कूल होते हैं.

Advertisement

Advertisement

()