सोनम गुप्ता को छोड़िए, कानपुर की कनुप्रिया निगम की कहानी पढ़िए
इस कहानी में कानपुर की सड़कें हैं, इश्क का चूरन है, टेम्पो है, गर्लफ्रेंड की शादी के चाट-बतासे हैं.
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फोटो - thelallantop
अंकित त्रिपाठी
'दी लल्लनटॉप' को एक और फायरब्रांड लौंडा मिला है. बकैती के तीर्थस्थल कानपुर से. कहिता है कि RSS के स्कूल से पढ़ा है, जिसके हिसाब से उम्र 24 है, लेकिन असल में 25 है. IIT से बीटेक किया है. मार्क्स धर्म को अफीम कह गए थे, अंकितवा गांजा कहता है. जब मूड भन्नाता है तो वेबसाइटों के पेज पर जाकर कमेंट दाग देता है.
रेज्यूम जीवन में सिर्फ एक बार बनाया, क्योंकि ये बनावटी काम लगता है. वनलाइनर ऐसे मारता है कि बड़के मठाधीश भी जल-भुन जाएं. इस बार उन्होंने कानपुर की एक लव स्टोरी और त्रासद अंत पर लिखा है.
कानपुर दिलफेंक लोगों का शहर है. यहां गली गली में लोग इश्क का चूरन फांकते मिल जाएंगे. कनपुरिये अपना दिल सीने में नहीं, जेब में लिए घूमते हैं. जहां मौका पाया, निकाल के पकड़ा दिया. बाकी चाहे दिल कूटा जाए, पीसा जाये या सीने से चिपका के रख लिया जाये, सब राम भरोसे. ऐसी ही कनपुरिया इश्क की आंच में पकी एक कहानी सुनाते हैं तुम लोग को.
लड़का था सुनील. सुनील श्रीवास्तव. पी रोड के पास रामबाग में ही घर था. एक नंबर का कामचोर. पिता जी सीसामऊ में गारमेंट्स की दुकान चलाते थे. पीपीएन कॉलेज में फाइनल इयर में था. एक दिन अचानक उसका दिल एक लड़की पे आ गया. लड़की का नाम था कनुप्रिया निगम. नवाबगंज में रहती थी. पिताजी सीनियर कांस्टेबल थे नवाबगंज थाने में.
सुनील का मन तो अटक ही चुका था कनुप्रिया में. कॉलेज आते-जाते उसी पे निगाहें रहती थीं. रोज की रेकी से पता चल चुका था कि वो कउन सी टैम्पो में जाती है. धीरे से खुद भी उसी टैम्पो में जाना शुरू कर दिया. एक दो बार लटक के आना पड़ा लेकिन दूसरी टैम्पो पे न बैठा. एक बार तो बात इतनी बढ़ गयी थी कि अध्धा लिए खड़ा था सड़क पे. कनुप्रिया तो सीधे पीपीएन से नवाबगंज उतरती थी लेकिन भाईसाहब उसके चक्कर में रावतपुर बेमतलब जाते थे. नवाबगंज पे उसको उतरते हुए देखते थे और फिर घूमकर पूरा सर्किल बनाते हुए पी रोड आते थे, वाया जरीबचौकी. बहुत दिनों तक ऐसे ही गोल गोल चक्कर लगाते रहे सुनील भईया. कुछ कुछ लड़की को भी पता चल चुका था. वो भी समझती थी कि छप्पन टैम्पो छोड़कर आदमी एक ही टैम्पो में घुसने के लिए अध्धा-गुम्मा मारने पे काहे उतारू हो जायेगा. नम्बर के लिए बहुत हाथ-पैर मारे सुनील ने लेकिन दाल कुछ ख़ास गली नहीं.
बहुत दिन हो चुके थे लेकिन इश्क की गाड़ी ज्यादा बढ़ ही नहीं रही थी. एक दिन खिसिया के कॉलेज में छुट्टी के बाद उसके सामने खड़ा हो गया. उसकी सहेलियां सब मुस्की मारने लगीं और इशारों में कहने लगीं कि यही है, यही है.
सुनील बोला, ‘तुम्हे पता नहीं चला अब तक?’
कनुप्रिया - ‘क्या?...कि तुम हमारा पीछा करते हो?’
कनुप्रिया समेत सब लडकियां खिलखिल करने लगीं.
सुनील, ‘ये कि आई लब यू.’
खिलखिलाने की आवाज और तेज हो गयी.
कनुप्रिया, ‘बातें तो बहुत बड़ी बड़ी कर रहे हो, नाम भी पता है हमारा?’
सुनील, ‘हां, कनपुरिया.’
‘कनपुरिया’ सुनते ही जो लड़कियां अभी तक सभ्यता से हंस रहीं थीं, बेकाबू हो गईं. हंसते हुए पछाड़े खा खा के एक दूसरे पे गिरने लगीं. सुनील भी झेंप गया लेकिन हंस भी रहा था. माहौल ही कुछ ऐसा हो गया था.
हंसते हुए ही कनुप्रिया बोली, ‘कनपुरिया नहीं कनुप्रिया.’
सुनील ने ब्लश करते हुए कहा, ‘हम भी वही कह रहे थे, लेकिन जबान लड़खड़ा गई. बहुत कठिन है तुम्हारा नाम. हमारा नाम देखो कित्ता आसान है. सु….नील. बस ‘नील’ के आगे छोटा सा सु लगा दो, हो गया सुनील.’
कनुप्रिया- ‘हमारा नाम भी तो कित्ता आसान है, ‘प्रिया' के आगे छोटा सा ‘कनु' लगा दो, हो गया कनुप्रिया.’
सुनील - ‘अगर हम तुमको खाली प्रिया कहें तो चलेगा?’
कनुप्रिया - ‘आराम से रहो, ज्यादा फ्रैंक न बनो.’
ये कहके कनुप्रिया आगे बढ़ जाती है. एक बात तो तय हो गयी थी कि कनुप्रिया के दिल में भी थोड़ा बहुत कुछ था वरना वो सुनील को वहीं झिटक न देती. पहली मुलाक़ात ‘ब्लॉकबस्टर’ न सही तो ‘हिट’ तो फिर भी रही थी. फिर क्या था, धीरे धीरे दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ी और बातें व्हाट्सएप से उठकर जेड-स्क्वायर के मैक-डी तक पहुंच गई थीं. मॉल-घुमाई, पिच्चरबाजी सब होने लगा जैसे कि एक आम मिडिल क्लास लव स्टोरी में होता है. अक्सर कनुप्रिया मुंह पे चुन्नी बांधके सुनील की डिसकवर के पीछे बैठ जाती और निकल पड़ते दोनों कानपुर की किसी प्रेमी-अनुकूल जगह के लिए. चाट-पकौड़ी भी आये दिन चलता रहा. अब घूमने जाओगे तो छूंछे ही तो लौट नहीं आओगे? इन सबके इंतज़ाम के लिए सुनील को कभी कभी बापू के गल्ले से कुछ पैसे भी मारने पड़ जाते. लेकिन प्यार में सब जायज है. कुछ महीने इन सबमे कट गये.
एक दिन कनुप्रिया सुनील से बोली, ‘आगे क्या करोगे?’
‘अब बीएससी तो ख़तम हो रही है, फिर एमएससी करेंगे.’
‘अरे बेवक़ूफ़, मेरा क्या होगा?’
सुनील घबराकर बोला, ‘क्या हुआ? कोई बीमारी वीमारी है क्या तुमको? कैंसर टाइप?’
‘भक्क, पागल ही हो एक दम.’
‘तो?’
‘अरे मतलब फ्यूचर का क्या होगा? कॉलेज ख़त्म होने वाला है. सेटल वेटल होगे कि नहीं?’
‘ग्रेजुएशन हुआ नहीं अभी और सेटल हो जाएं पहिले ही? एमएससी का प्लान बनायें तो हैं.’
‘बीएससी करके तो तुम उखाड़ नहीं पाये, एमएससी करके कउन सी तोप मार लेओगे?’
‘अरे पापा की गारमेंट्स की दुकान भी तो है न. वो कहां भागी जा रही है. सालों का फैमिली बिज़नेस है हमारा.’
‘अब इत्ते बुरे दिन आ गये कि सीसामऊ में लड़कियों के टॉप बेचोगे तुम?’
‘जींस भी मिलती है.’
‘हर समय मजाक न किया करो तुम. सीरियस मैटर चल रहा है. पापा को इम्प्रेस कैसे करोगे?’
‘अरे इत्ता काहे सोच रही हो, अपने साथ कउन सा इंटरकास्ट वाला लफड़ा है? तुम ‘निगम'. हम ‘श्रीवास्तव'. दोनों ‘लाला'. बहुत मुश्किल से सेम जात में अच्छे लड़के मिलते हैं...बता देना अपने हवालदार से.’
‘तमीज से बात करो, पापा हैं.और पापा ने तो लड़का ढूंढना शुरू भी कर दिया है. उनकी प्रायोरिटी सरकारी नौकरी वाले ही हैं.’
‘तो क्या किया जाये?...बताओ...?’
‘सब हमी बताएं...और तुम क्या लंगर खाने के लिए बैठे हो? कोई कम्पटीशन वगैरह निकालो. सरकारी नौकरी पकड़ो.’
‘कहो तो तुम्हारे लिए आईएएस बन जाऊं मेरी जान?’
कनुप्रिया की हंसी छूट गयी, ‘तुम्हाई औकात हमें पता है. ज्यादा तुर्रमखां न बनो. एसएससी टाइप निकालो कुछ.’
‘एसएससी बहुत टफ है यार, तुम तो जानती ही हो कि इंग्लिश में थोड़े डाउन हैं हम. ऊपर से ठहिरे जनरल.’
‘तुम यहां बइठ के रोते रहो केवल. बैंक-पीओ तो निकाल पाओगे या वो भी नहीं?’
‘हां, वो ट्राई कर सकते हैं.’
‘अगस्त में फॉर्म आते हैं उसके. अभी तीन-चार महीने हैं. अच्छे से मेहनत करके एग्जाम निकालो नहीं तो पीरोड पे दुकान पे बइठ के, ‘आइये बहनजी, आइये बहनजी’ ही करते रहना.’
‘बहुत जानकारी है तुम्हे. तुम भी भर रही हो क्या?’
‘नहीं. हमसे ज्यादा जरूरत तुम्हे है. और वैसे भी पजल वाले सवाल हमाये समझ में नहीं आते. हम तो बीएड करेंगे.’
कनुप्रिया के चक्कर में सुनील ने दो दिन बाद ही काकादेव जाकर बैंक-पीओ की कोचिंग जॉइन कर ली. कॉलेज भी जल्द ही ख़तम हो गया. इसीलिए मिलना-जुलना भी बहुत कम हो गया था. बस फ़ोन पे ही बात हो पाती थी. सुनील का एग्जाम नजदीक था, इसलिए फ़ोन पर भी बातें कम हो गयीं थीं. दिन गुजरें और सुनील ने बैंक-पीओ और क्लर्क दोनों के प्री और मेंस दे डाले. अब हुआ कुछ यूं कि कनुप्रिया ने सुनील का फ़ोन उठाना बंद कर दिया. कभी कभार उठा भी लेती तो अजीब से बात करती और कई बार बाद में बात करने का बहाना बनाकर थोड़ी ही देर में फ़ोन काट देती.
सुनील हैरान भी था. वो कनुप्रिया से मिलना चाहता था लेकिन मिलना तो दूर, बात करना भी मुश्किल था. इसी बीच अचानक कनुप्रिया ने सुनील को व्हाट्सएप, फेसबुक सबपे ब्लाक कर दिया. यहां तक कि फ़ोन पर भी उसका नंबर ब्लाक कर दिया. सुनील जानना चाहता था कि ऐसा क्या हो गया जो सात महीने के प्यार पर यूं बेदर्दी से लात मार दी. इसी बीच सुनील का रिजल्ट आया. पीओ तो वो नहीं बन सका लेकिन क्लर्क में सेलेक्ट हो गया. सुनील का परिवार बहुत खुश हुआ. सुनील भी खुश था लेकिन कनुप्रिया को लेकर बेचैनी भी थी. उसने कनुप्रिया की सहेलियों से पता करने की कोशिश की तो काफी जद्दोजहद के बाद पता चला कि उसकी शादी होने वाली है. अगले महीने ही. वो एक बार कनुप्रिया से मिलकर सब कुछ क्लियर करना चाहता था. उसने उसकी पक्की सहेली अंजू से गुहार लगवाई कि वो बस एक बार सुनील से मिल ले. एक आखिरी बार.
तय दिन पर दोनों मिले.
कनुप्रिया बोली, ‘बस पंद्रह मिनट का टाइम है, जो बोलना है जल्दी बोलो.’
‘शादी कर रही हो तुम?’
‘हां, पापा ने रिश्ता तय कर दिया है.’
‘तो फिर हमसे काहे कहा था कि पीओ बन जाओ?’
‘तो बन गये क्या?’
‘पीओ न सही, क्लर्क तो बन गये हैं. पीओ अगली बार बन जायेंगे. नहीं तो जेआईबी, सीआईबी तो निकाल ही लेंगे. पैसे भी ज्यादा मिलने लगेंगे और प्रमोशन भी जल्दी होगा.’
‘‘क्लर्क बन गये’ तो ऐसे बता रहे हो जैसे कलेक्टर बन गये हो.’
‘हमने तो सस्ता हनीमून पैकेज भी सर्च करना शुरू कर दिया था गूगल पे. अब बताओ लुगाई ही दूसरे के साथ भागी जा रही है.’
‘बस बकवास करवा लो तुमसे ’
‘अच्छा, पहिले इन्ही सब बातों में मजा आता था. अब बड़ी चौधराइन बन रही हो?’
‘अइसा है...ज्यादा बदतमीजी से बात न करो हमसे.’
‘सही नहीं है ये. प्यार करते हैं तुमसे’
‘आ हा हा हा...तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे बड़ा सच्चा प्यार ही करते थे हमसे.’
‘मतलब.’
‘मतलब ये कि चाट-पकौड़ी खाने और दो-चार बार पिच्चर देख लेने को प्यार कहते हो तुम? कॉलेज में टाइम पास के लिए कोई चाहिए थी तुमको तो पड़ गये थे हमाये पीछे. हमने भी थोड़ा भाव दे दिया. ज्यादा प्यार व्यार की दलीलें न दो इधर.’
कनुप्रिया की बात में सच्चाई तो थी लेकिन सुनील भला कैसे मान लेता?
थोड़ा गुस्से में बोला, ‘भुगतोगी.’
‘क्या भुगतोगी? ज्यादा न बोलो, पापा ने पुलिस वाला ढूंढा है.’
‘पुलिस वाला’ सुनकर सुनील थोड़ा घबराया, ‘मतलब हम कुछ नहीं करेंगे. भगवान लाठी मारेगा तुमको.’
‘वो तो वक़्त बताएगा लेकिन तुम एक बात कान खोल के सुन लो. आज के बाद हमसे या हमाई किसी भी सहेली से कांटेक्ट करने की कोशिश की तो फिर जानते ही हो कि पुलिस मारती दस है, गिनती एक ही है...’
ये कहके कनुप्रिया चली जाती है. सुनील को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. थोड़ा आराम से सोचने के बाद उसे अहसास हुआ कि ऐसा कुछ सीरियस प्यार तो नहीं ही था. टाइम पास ही था एक तरह से. पर यार टाइम पास ही सही, प्यार होता तो प्यार ही है. सुनील का दिल टूटा न सही, हल्का सा चिटक तो गया ही था. गुस्सा भी था थोड़ा सा.
खैर धीरे धीरे दिन बीतते गये और सब कुछ नॉर्मल सा हो गया. तभी उसे पता चला कि कनुप्रिया की शादी अगले दिन ही है. वो कनुप्रिया से बदला भी लेना चाहता था. अगले दिन शादी में गया. गया तो वो था बदला लेने के लिए बाहर जनवासे में लगे चाट-बतासे, फ्रूट सलाद वगैरह देखके खुद को रोक न सका. सारे स्नैक्स चखे और हर निवाले के साथ कनुप्रिया को कोसता रहा. फिर चाऊमीन-फ्राइड राइस से लग्गा लगा के पाव-भाजी, डोसा-चिल्ला, सब कुछ लपेटा. चार कचौरी, दो नान, तीन मिस्सी रोटी और ढेर सारे चावल दो-तीन वैराइटी की पनीर के साथ ठूंसकर वो आइसक्रीम की ओर बढ़ा. पांच-छै बार से क्या कम ली होगी? पेट लमसम भर ही चुका था लेकिन चार गुलाब-जामुन और दो प्लेट गाजर का हलवा जगह ही कितनी लेते हैं? वो भी एडजस्ट हो गये.
पेट की टंकी अच्छे से फुल करने के बाद वो ‘व्यवहार’ वाले काउंटर पे आया. कनुप्रिया से बदला लेने का जो प्लान उसने बड़ी मेहनत से बनाया था, वो एक्सीक्यूट करने का वक़्त आ गया था. तहलका मचने ही वाला था. उसकी आँखों में जैसे अंगारे थे. मौका देखकर धीरे से उसने जेब में हाथ डाला और एक लिफाफा निकाला और काउंटर पर बैठे बुड्ढे को पकड़ा दिया. गुंडई मुस्कान लिए वो शान से बाहर आ गया. उसका बदला पूरा हो चुका था.
बाद में लिफाफा खोल के देखा गया तो उसमे दस ‘दस-दस’ के नोट थे जिनपे लिखा हुआ था- “कनुप्रिया निगम बेवफा है.”
भाईजी हमें तो लगता है ‘सोनम गुप्ता' वाले केस में भी यही हुआ होगा. तुम्हारा क्या कहिना है??
लेटेस्ट अपडेट: “कनुप्रिया शादी के बाद खुश है और सुनील बैंक में नोट गिन गिन कर परेशान.”
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