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चीतल डायरीज़: साबरकांठा में औरतों को गाली के तौर पर क्यों कहा जाता है - ‘वाडिया वाली’

गुजरात की थराद विधानसभा सीट से ग्राउंड रिपोर्ट.

बनासकांठा ज़िले में आज़ादी से पहले एक रजवाड़ा हुआ करता था, थराद. फिलहाल यह बनासकांठा ज़िले की एक विधानसभा सीट है. पाकिस्तान की सीमा से थराद की दूरी महज़ 40 किलोमीटर है. भीम सिंह वाघेला थराद के आखिरी राजा थे, जिनका राज चला करता था. थराद में उनके हवाले से एक किस्सा बड़ा मशहूर है. कहते हैं कि भीम सिंह वाघेला का प्रशासन इतना सख्त था कि अपराध का नामो-निशान नहीं हुआ करता था. एक बार उन्होंने एक बकरे के गले में सोने की घंटी बांध कर उसे खुला छोड़ दिया था. तीन महीने तक बकरा थराद में आराम से चरता रहा. किसी ने उसकी सोने की घंटी को हाथ लगाने की हिम्मत तक नहीं की.

सन 1900 में पैदा हुए भीम सिंह 1921 के साल में थराद के 7 वें ‘ठाकुर साहेब’ बने. वो राजकोट के राजकुमार कॉलेज से पढ़े हुए थे. आज़ादी के बाद थराद भारतीय संघ का हिस्सा बना. भीम सिंह के हाथ से सत्ता चली गई. रह गए प्रिवी पर्स और स्टेट की कई सौ एकड़ ज़मीन. इसी दौर में थराद से करीब 700 किलोमीटर दूर एक और किरदार अपने को गढ़ रहा था. नाम था गोवर्धनदास गिरधारी लाल मेहता. नाम काफी लम्बा था इसलिए लोग अपनी सुविधा के मुताबिक उन्हें ‘जी.जी.’ के नाम से बुलाने लगे.

राजाबाई क्लॉक टॉवर
बंबई का राजाबाई क्लॉक टॉवर, जिसपर 1930 में जीजी मेहता ने तिरंगा फहरा दिया था (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

1930 में महज़ 18 साल की उम्र में उस समय के बॉम्बे के राजाबाई क्लॉक टॉवर पर तिरंगा फहराकर जी.जी. आठ महीने के लिए जेल गए. छूटकर आए तो मज़दूरों के बीच काम करना शुरू कर दिया. पेशे से वकील थे. वकालत भी ठीक ही चल रही थी. 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय फिर से जेल में ठूंस दिए गए. 1952 में जब कांग्रेस के तमाम नेता अपनी टिकट पक्की करवा कर सत्ता के प्रतिष्ठानों में अपनी भागीदारी तय करने की जद्दोजहद में लगे हुए थे, जी.जी. अपने लिए अलग रास्ता चुन रहे थे. उन्होंने वकालत छोड़ दी और गुजरात के आदिवासी विस्तार वाले इलाके साबरकांठा चले आए. जब वो साबरकांठा आए तो उनके बगल में भूदानी झोला लटक रहा था और दिमाग में विनोबा भावे के दिए रचनात्मक कार्यों का खाका नत्थी था.

जी.जी. लम्बे समय से आदिवासी और घुमंतू जनजातियों के लिए काम कर रहे थे. पालनपुर-थराद रोड पर बसे बुढ़नपुर के पुनर्वास के लिए सारे प्रयास असफल हो रहे थे. जिस गांव में बुढ़नपुर के लोगों को बसाने की बात होती वो गांव इसका विरोध करने लगते.

विनोबा भावे (काले चश्मे में) के शुरू किए भूदान में लाखों एकड़ ज़मीन दान हुई थी
विनोबा भावे (काले चश्मे में) के शुरू किए भूदान में लाखों एकड़ ज़मीन दान हुई थी.

साबरकांठा आने के करीब 12 साल बाद, माने 1964 के साल में कहानी के दोनों किरदारों की मुलाकात हुई. जी.जी. मेहता अपने दिमाग में बुढ़नपुर को नए सिरे से बसाने के लिए एक योजना लिए भीम सिंह वाघेला के पास पहुंचे. उनके साथ में थीं विमलाबेन और जशोदाबेन. इन तीनों लोगों ने भीम सिंह को बताया कि वो बुढ़नपुर की 13 औरतों की अगुवाई में नया गांव बसाना चाहते हैं. इन 13 ‘आदी औरतों’ में सिर्फ एक औरत आज ज़िंदा है, ‘तोती दादी’. 80 के पेटे में पहुंच चुकी तोती दादी को 43 पुराना किस्सा आज भी याद है. वो बताती हैं-

“विमलाबेन ने दरबार साहेब (भीम सिंह) के सामने दामन फैलाते हुए कहा कि मैं आपकी बहन जैसी हूं. अगर कोई चीज़ मांगूं, तो आप मना तो नहीं करेंगे? भीम सिंह ने विमलाबेन से पूछा कि आपको क्या चाहिए. विमलाबेन ने उनसे हमारे लिए यह ज़मीन मांग ली, जिस पर आज वाडिया गांव बसा हुआ है. यह जमीन भीम सिंह की थी और इसे गौचर के तौर पर छोड़ा गया था.

दरबार साहेब से मिलकर वो हमारे पास आईं. उन्होंने हम 13 औरतों की एक सहकारी समिति बनाई और यह ज़मीन हमारे हवाले कर दी. जब हम बुढ़नपुर छोड़कर यहां पहुंचे तो यहां जंगल था. आने-जाने के कोई साधन नहीं. विमलाबेन ने हमसे कहा कि यहां जोतो और खाओ. शुरुआत में हम 13 लोगों के साथ 40 परिवार यहां आए. हमने मिलकर पूरी ज़मीन से जंगल साफ़ किया और इस ज़मीन को खेती लायक बनाया.”

तोती दादी उन 13 औरतों में से एक हैं जिन्होंने भीम सिंह से गांव के लिए ज़मीन मांगी थी
तोती दादी उन 13 औरतों में से एक हैं जिन्होंने भीम सिंह से गांव के लिए ज़मीन मांगी थी. (फोटोः विनय सुल्तान/दी लल्लनटॉप)

हर इलाके में कुछ ख़ास गांव एक ख़ास छवि के प्रतीक बना दिए जाते हैं. यह खतरनाक सामान्यीकरण हमारी लोक परम्परा का हिस्सा हैं. मसलन जयपुर के पास की तहसील चौमू के साथ एक खास किस्म की छवि जुड़ी हुई है. इसी तरह बनासकांठा और उससे सटे पाटन और साबरकांठा में औरतों के लिए एक शब्द गाली के तौर पर इस्तेमाल होता है, ‘वाडिया वाली’.

वाडिया निकलने से पहले हम चाय पीने के लिए तिरंगा होटल पर रुके हुए थे. यहां काम करने वाले नौजवान ने चाय के साथ एक सलाह भी परोसी. उसके हिसाब से हमें वाडिया जाते वक़्त पानी अपने साथ ले जाना चाहिए. वाडिया का पानी पीने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है. हमारी बगल की टेबल पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा हुआ था. उसने हमसे कहा कि यह गांव अपशगुन वाला है. चिमन भाई जब मुख्यमंत्री थे तब उनकी बीवी उर्मिला बेन इस गांव के दौरे पर आई हुई थीं. दौरे के दौरान ही उन्हें चिमनभाई के मरने की खबर मिली. ये समझिए कि उर्मिला बेन की चूड़ियां इसी गांव में टूटी थीं. जब अशोक भट्ट यहां से दौरा पूरा करके वापस लौटे और उन्हें लकवे का दौरा पड़ गया.

दरअसल 13 औरतों के साथ जो चालीस परिवार 1964 में 208 एकड़ की गौचर जमीन पर आकर बसे थे, वो सरानिया नाम की घुमंतू जनजाति के थे. किसी दौर में इनके पुरखे बैलगाड़ी पर अपना घर लादे गुजरात में घुस गए होंगे. इस बात की तुड़ी-मुड़ी याद का कतरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा. वाडिया के बाशिंदे भूपत बताते हैं-

“हमारे बाप-दादा चितौड़ से यहां आए थे. वहां चौहान राजा हुआ करते थे, इसलिए हम भी अपनी जात चौहान ही लिखते हैं.”

तथ्य यह है कि चितौड़ पर सिसोदिया राजपूतों का राज हुआ करता था. इस लिहाज़ से भूपत के दावे को ख़ारिज भी किया जा सकता है. लेकिन उस कपड़ों की गवाही को ख़ारिज करना मुश्किल है जो सरानिया औरतें आज भी पहनती हैं. इसके अलावा इस बस्ती में बना जैसलमेर के लोक देवता बाबा रामदेव का मंदिर सदियों पुराने विस्थापन का एक सिरा हमारे हाथ में थमा देता है.

सरानिया समुदाय के लोग एक गैर-सरकारी संगठन के कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए. फोटोः विचरता समुदाय समर्थन मंच के मित्तल पटेल से साभार)
सरानिया समुदाय के लोग एक गैर-सरकारी संगठन के कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए.
(फोटोः विचरता समुदाय समर्थन मंच के मित्तल पटेल से साभार)

भूपत की बातों से इतर जो चीज इस बिरादरी के बारे में तथ्य के तौर पर रखी जा सकती है, वो यह कि रजवाड़ों के समय से इस बिरादरी की लड़कियां वेश्यावृति का काम करती आई हैं और यह आज भी बदस्तूर जारी है. इस पूरे कारोबार में उनके पिता और भाई दलाल की भूमिका निभाते आए हैं.

सारे रिवाज यहां उलट जाते हैं

जनजातियों और ख़ास तौर पर घुमंतू जनजातियों के कायदे मुख्यधारा वाले समाज से कुछ अलग होते है. एक अनुमान के मुताबिक 1 लाख से ज़्यादा कन्या भ्रूण गर्भ में मार डाले जाते हैं. सरानियां बिरादरी में इसके उल्ट लड़की का पैदा होना जश्न का मौक़ा होता है.

यहां परिवार को चलाने की ज़िम्मेदारी लड़कियों के ऊपर ही होती है. मर्द रजवाड़ों के समय पर हथियार और खेती में काम आने वाले औज़ार बनाया करते थे. ऑटोमेटिक राइफल और ट्रैक्टर के दौर में उनके पास छोटी-मोटी छिनैती को अंजाम देने के अलावा कोई ख़ास रोज़गार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं. कहने को इन लगों के पास खेती के लिए ज़मीन भी है लेकिन वो रोज़गार का विकल्प नहीं बन सकता. परिवार के आर्थिक ढांचे में लड़की की यह भूमिका उलटे दहेज की प्रथा को जन्म देती है. शादी के दौरान लड़के वालों की तरफ से लड़की वालों को एक खास रकम दहेज के तौर पर दी जाती है.

सरानिया समुदाय में उलटे दहेज की प्रथा है. शादी के वक्त लड़के को पैसे देने पड़ते हैं (फोटोःरॉयटर्स)
सरानिया समुदाय में उलटे दहेज की प्रथा है. शादी के वक्त लड़के को पैसे देने पड़ते हैं (फोटोःरॉयटर्स)

बुढ़नपुर आए 40 परिवार अब बढ़कर 250 के करीब पहुंच गए हैं. बिरादरी आज भी अपने कायदों के हिसाब से चल रही है और खुद को बाहरी हस्तक्षेप से दूर रखे हुए है. लेकिन इनका मुस्तकबिल तय करने वाले हाथ इन बिरादरियों से नहीं आते. सीधे तौर पर देखने पर लगता है कि किसी लड़की के परिवार के सदस्य ही उनकी दलाली कर रहे हैं लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है. ये लोग कुछ उसी तरह के चक्र फंस गए जिसमें फंसकर किसान हमेशा कर्ज़े में डूबा रहता है.

इस गांव में सक्रिय पांच बड़े दलाल है जो कि सरानिया बिरादरी से नहीं आते हैं. यह लड़की के पैदा होते ही उसके घर पहुंच जाते हैं. नवजात बच्ची के एवज़ में कुछ पैसा उसके मां-बाप को दे देते हैं. यह रकम बतौर कर्ज़ दी जाती है. जब लड़की 15 साल की हो जाती है तो ये दलाल दिया हुआ कर्ज़ सूद सहित वसूलते हैं. इन दलालों के पास कई रईस ग्राहक होते हैं, जिन्हें वर्जिनिटी बेची जा सकती है. इसके बाद से वो लड़की अगले कुछ सालों के लिए बाहरी दलालों की मिल्कियत बन जाती है. कमाई का 30 से 40 टका लड़की के घरवालों को भी मिलता रहता है. पिछले कई दशकों से ऐसा ही चलता आया है और इसके बंद होने के फिलहाल कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं.

एक रिवाज़ जिसका ज़िक्र छूट गया

2012 के मार्च में वाडिया गांव भारत ही नहीं विदेशी मीडिया की भी सुर्खियों में आ गया था. वजह थी 20 सेक्स वर्कर्स की सामूहिक शादी. यह एक अच्छी हेडलाइन थी और ‘सेक्स वर्कर्स का गांव’ अच्छे विज़ुअल की हुंडी थी. इस पूरे आयोजन को सेक्स वर्कर्स के पुनर्वास के तौर पर पेश किया गया. तो क्या सरानिया समुदाय की लड़कियां पूरी ज़िंदगी ज़रायम पेशे में लगी रहती हैं? यह अधूरी जानकारी आपको गलत निष्कर्ष पर छोड़ सकती है.

2012 में सरानिया समुदाय में पहली बार कोई सामुदायिक विवाह हुआ था. इस घटना को कवर करने के लिए देश-विदेश से लोग आए थे
2012 में सरानिया समुदाय में पहली बार कोई सामुदायिक विवाह हुआ था. इस घटना को कवर करने के लिए देश-विदेश से लोग आए थे.

40 के पेटे में पहुंच चुकीं शारदाबेन 2001 में यहां एक गैर-सरकारी संगठन के प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए आई थीं. प्रोजेक्ट था वाडिया गांव की सेक्स वर्कर्स को यौन संक्रामक रोगों और HIV से बचाव के लिए जागृत करना. दो साल बाद प्रोजेक्ट पूरा हो गया लेकिन शारदाबेन यहीं टिकी रहीं. उन्होंने कई तरीके से गांव की लड़कियों को यह पेशा छोड़ने के लिए राज़ी करने की कोशिश की लेकिन कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली.

काम के दौरान वो सरानिया समाज के कई रिवाज़ों से रूबरू होती रहीं. इस दौरान उन्हें एक ऐसे रिवाज़ का पता चला जो उनके काम आ सकता था. सरानिया बिरादरी का नियम है कि लड़की की सगाई के बाद उन्हें यह काम बंद कर देना होता है. वो कहती हैं-

“सरानिया बिरादरी में मुस्लिम समाज की तरह ही रिश्तेदारी में शादियां हो जाती हैं. जब एक बार लड़की की सगाई तय हो जाती है उसके बाद उसे यह पेशा छोड़ देना होता है. सगाई के वक़्त लड़के के घरवाले लड़की के पिता को एक तय रकम देते हैं. 2012 के समय यह रकम 60,000 रुपए और एक सोने की अंगूठी हुआ करती थी.

मुझे जब इस प्रथा की जानकारी मिली तो मैंने सोचा कि यह एक तरीका है जिससे हम इन लड़कियों को देह व्यापार से निकाल सकते हैं. यहां चीज़ें अलग तरीके से काम करती हैं. जो लड़कियां शादी से पहले देह व्यापार में लगी होती हैं वो शादी के बाद लम्बे घूंघट में छुप जाती हैं.”

वाडिया. (फोटोः विनय सुल्तान/दी लल्लनटॉप)
वाडिया. (फोटोः विनय सुल्तान/दी लल्लनटॉप)

शारदाबेन के पास योजना तो थी लेकिन शादी करने लिए लड़कियों को तैयार करना आसान काम नहीं था. इसके लिए उन्होंने नया तरीका निकाला. वो महीने में एक बार वाडिया गांव की लड़कियों को बाहर घुमाने ले जातीं. यह वो मौक़ा होता जब इन लड़कियों का साबका अलग दुनिया से पड़ता. शारदाबेन बताती हैं-

“मैं मंदिरों का दर्शन करवाने के लिए लड़कियों को वाडिया से बाहर ले जाती. हमारी ट्रिप के दौरान मैं उन्हें समझाती कि वो जो कर रही हैं वो अच्छा काम नहीं है. मंदिर दिखाने के साथ-साथ मैं उन्हें कई परिवारों में भी लेकर जाती. उन्हें पूछती कि अगर तुम्हारा भी ऐसा ही परिवार हो तो कितना अच्छा हो. धीरे-धीरे करके मैंने 25 लड़कियों को शादी के लिए तैयार किया.

जैसे ही यह खबर वाडिया में सक्रिय बड़े दलालों को पड़ी उन्होंने अपनी तरफ से दबाव बनाना शुरू कर दिया. उन्होंने पांच लड़कियों को तोड़ भी लिया. आखिरकार हमारे पास 20 ऐसी लड़कियां थीं जो शादी के लिए तैयार थीं. अब सवाल यह था कि इन लड़कियों से शादी करेगा कौन. समाज द्वारा तय की गई 60 हज़ार की रकम किसी के पास थी नहीं. ऐसे में हमें लड़के की तरफ से दिए जाने वाले दहेज का प्रबंध भी करना पड़ा. आखिरकार हम इस गांव में सामूहिक विवाह करवाने में कामयाब हो गए.”

तोती दादी के साथ शारदा बेन. शारदा एक सरकारी प्रोजेक्ट के तहत सरानिया समुदाय के बीच काम करने आई थीं लेकिन कभी वापस नहीं गईं
तोती दादी के साथ शारदा बेन. शारदा एक गैर-सरकारी संस्था के प्रोजेक्ट के तहत सरानिया समुदाय के बीच काम करने आई थीं लेकिन कभी वापस नहीं गईं. (फोटोः विनय सुल्तान/दी लल्लनटॉप)

शारदाबेन आज नई चुनौती से जूझ रही हैं. वो मुफ्त शिक्षा दिलवाने के नाम पर चालीस लड़कियों को गांव से बाहर निकालने में कामयाब हो गई हैं. फिलहाल वो पालनपुर के एक प्राइवेट स्कूल में इन लड़कियों के दाखिले के लिए माथा-पच्ची कर रही हैं. वो बताती हैं-

“जब मैं यहां आई तो इस गांव तक कोई सीधी सड़क नहीं आती थी. लोग अपने खेत से जाने का रास्ता भी नहीं देते थे. गांव के लोगों को थराद जाने के लिए पास के गांव वडगांव तक पैदल जाना पड़ता था. बाज़ार में खरीदारी करने जाने पर दुकानदार इन्हें ‘रंडी’ कहकर ही बुलाते थे. ऐसी असंवेदनशीलता के चलते यह बिरादरी बाहरी लोगों पर जल्दी भरोसा नहीं करती.

आज भी गांव से बाहर इन लड़कियों को हर जगह अपनी पहचान के चलते परेशानी का सामना करना पड़ता है. यह गांव काफी बदनाम हो चुका है. लेकिन चीज़ें धीरे-धीरे बदल रही हैं. अभी हाल ही में मैंने ऐसी एक लड़की की थराद सिविल हॉस्पिटल में डिलीवरी करवाई थी जिसकी 2012 में शादी हुई थी. उसने एक बच्ची को जन्म दिया. बच्ची को देखकर उसकी मां रोने लगी. उसे डर था कि उसकी बेटी को उसकी तरह ही देह व्यापर में धकेल दिया जाएगा. अपनी बदनाम पहचान के चलते इन लड़कियों के लिए नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करना काफी चुनौतीपूर्ण काम है. ज़्यादातर लड़कियां हार मान कर उसी दुनिया में लौट जाती हैं.”

सरानिया समुदाय के लोग बीपीएल राशन कार्ड की दरख्वास्त लिए हुए. सरानिया समुदाय सरकार से काफी कटा हुआ है. ज़्यादातर योजनाएं इन तक गैर-सरकारी संगठनों के ज़रिए पहुंचती हैं
सरानिया समुदाय के लोग बीपीएल राशन कार्ड की दरख्वास्त लिए हुए. सरानिया समुदाय सरकार से काफी कटा हुआ है. ज़्यादातर योजनाएं इन तक गैर-सरकारी संगठनों के ज़रिए पहुंचती हैं (फोटोः विचरता समुदाय सहायता मंच से साभार)

 चुनाव और सरानिया

250 परिवारों वाले इस गांव में करीब 400 वोटर हैं. सूबे में जल्द ही चुनाव होने वाला है. जब मैंने भूपत से पूछा कि क्या वो वोट देते हैं, तो उन्होंने जिस अंदाज़ में सर को हिलाया उसका सामन्य मतलब हां होता है. जब मैंने उनसे पूछा कि अभी थराद का विधायक कौन है, तो उनके पास इस सवाल का सही जवाब नहीं था. तो आखिरकार ये लोग वोट कैसे देते हैं? भूपत इसका जवाब कुछ इस तरह से देते हैं-

“हमें क्या पता कौन सही है और कौन गलत. हमारे गांव के चार-पांच आगेवान हैं जो कि मिल-बैठकर यह तय करते हैं कि किसे वोट देना है. सारा गांव उसी को वोट देता है.”

208 एकड़ की इस ज़मीन पर फिलहाल इन परिवारों का मालिकाना हक़ नहीं है. यह ज़मीन 1964 में बनी ‘स्त्री सेवा सहकारी समिति’ के नाम है. तोती दादी इस समिति की ज़िन्दा बची आखिरी सदस्य हैं. उनकी चिंता यह है कि उनके जाने के बाद ज़मीन की मिल्कियत का क्या होगा. वो कहती हैं-

“ज़मीन हमारे नाम नहीं है. ये भीम सिंह बापू की ज़मीन थी जो उन्होंने हमें दी थी. आज भी इसका पट्टा सरकार के नाम है. ये ज़मीन हमारे नाम हो जाए तो हमारा कुछ भला हो सकता है. वरना सरकार हमें कभी भी गांव से बाहर निकाल सकती है.”

सरानिया समुदाय से एक बालवधु. इस समुदाय में आज भी कई बच्चियां कच्ची उम्र में ब्याह दी जाती हैं. (फोटोःरॉयटर्स)
सरानिया समुदाय से एक बालवधु. इस समुदाय में आज भी कई बच्चियां कच्ची उम्र में ब्याह दी जाती हैं. (फोटोः रॉयटर्स)

ज़मीन पर मिल्कियत नहीं होने की वजह से इन लोगों को बिजली के कनेक्शन नहीं मिल रहे हैं. सरकारी महकमे को डर है कि आने वाले समय में बिजली के बिल मिल्कियत के दस्तावेज़ के तौर पर अदालत में पेश किए जा सकते हैं. लम्बी लड़ाई के बाद 208 में से 3 एकड़ को रिहाइशी ज़मीन के तौर पर चिह्नित करवाया गया है.

लेकिन बिजली का कनेक्शन पाने का रास्ता काफी पेचीदा घुमावों से होकर गुजरता है. गांव वालों के लिए इससे आसान काम ये है कि अपने तार को थोड़ा सा घुमाकर गांव के पास से गुज़र रही बिजली की सप्लाई लाइन पर टांग दें. गांव में कुछ लोगों को कनेक्शन दे भी दिए गए हैं लेकिन खेत में ट्यूबवेल के लिए कनेक्शन नहीं मिल रहे हैं. ऐसे में 205 एकड़ पर पसरे खेत इन लोगों के लिए रोज़गार का कोई ख़ास विकल्प उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं.

इस बस्ती के लिए लोकतंत्र के क्या मायने हैं? इसका सबसे सही जवाब तोती दादी के पास है. जब हम गांव में पहुंचे तो तोती दादी के मुंह से निकला पहला शब्द था कि उन्हें संडास चाहिए. जाड़े में उन्हें खेत में संडास जाने में बहुत मुश्किल होती है. उम्र के असर के चलते घुटनों ने भी मुड़ने से इनकार कर दिया है. शारदाबेन उन्हें बताती हैं कि चुनाव के कारण आचार संहिता लगी हुई है और अभी कोई सरकारी काम नहीं हो सकता है. उनका संडास एक महीने बाद ही बन पाएगा. तोती दादी कहती हैं,

“एक महीना निकलना बहुत मुश्किल है. क्या मेरा संडास थोड़ा पहले नहीं बन सकता?”

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