1991 में भारत में आर्थिक सुधार हुए थे. कोटा-कंट्रोल का सिस्टम ख़त्म किया गया था.लाइसेंस-राज की जगह ओपन कम्पटीशन ने ले ली. डॉलर के मुकाबले रुपया गिराया गया. ताकिएक्सपोर्ट ज्यादा हो सके. भारत के मार्केट को विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया.वही, जिसे FDI कहते हैं. पर ये सारे फैसले लेना आसान नहीं था. अभी हाल-फिलहाल में FDI को लेकर कितना बवाल होगया था. 1991 में तो सरकार जाने की नौबत आ जाती. तुरंत जनता कहती कि 'लुटेरों नेदेश को विदेशियों के हाथ बेच दिया'. खैर, जो भी हो. फैसले लिए गए.पर उस दौरान कुछ रोचक वाकये भी हुए थे...1. जनता का डर इतना था कि नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह से साफ़ कह दिया था, अगर येफैसला सफल रहा तो सारा क्रेडिट 'हम लोगों' का रहेगा. अगर जनता ने बवाल किया तो मैंबोल दूंगा कि ये फैसला सिर्फ तुम्हारा था.'2.मनमोहन सिंह पहले रिज़र्व बैंक में गवर्नर रह चुके थे. इसके अलावापार्टी-पॉलिटिक्स में भी बहुत काम कर चुके थे. इसलिए नरसिम्हा राव उनको अपनी सरकारमें फाइनेंस मिनिस्टर बनाना चाहते थे. इस बारे में बात करने जब जयराम रमेश मनमोहनसिंह के घर पहुंचे, तब उनके PA ने मुंह पे बोल दिया: 'जाइये, अभी सर सो रहे हैं. औरहां, अब सर कहीं काम नहीं करेंगे. डिस्टर्ब मत करिए. सर कल ही फ्लाइट से आए हैं.बहुत थके हैं.'जयराम रमेश ने कई बार कोशिश की. पर बात नहीं हो पाई. अगले दिन रमेश ने सुबह 5 बजेफोन कर दिया. इमरजेंसी समझकर PA ने मनमोहन सिंह को फोन दे दिया. मनमोहन सिंह नेरमेश की बात सुनकर बस इतना कहा, अच्छा? फिर रमेश ने पूछा, तो मैं घर आऊं ना? तबकहा, हां. फिर जब रमेश पहुंचे तब मनमोहन सिंह फिर सो रहे थे. दो घंटे बाद उठे.3.1991 में जब नरसिम्हा राव की सरकार ने सुधार किए, तब डॉलर के मुकाबले रुपये केकीमत कम हो गई थी. इस नेक काम के वक्त फाइनेंस मिनिस्टर मनमोहन सिंह थे.पर फाइनेंस मिनिस्टर बनने से पहले मनमोहन सिंह जेनेवा में दो साल रहे थे. उस दौरानउनको डॉलर में पेमेंट होता था. अब उनको कोई नशा-पते का शौक तो है नहीं. क्लब जानानहीं है. संत आदमी. सारा डॉलर अकाउंट में ही जमा था.अब फाइनेंस मिनिस्टर बनने के बाद मनमोहन सिंह को बड़ी चिंता सताने लगी. जो डॉलरअकाउंट में था, वो तो रुपए में लगभग दोगुना हो गया था. बिना कुछ किये.एक दिन शाम को उनको इसका ख्याल आया. टेंशन में आ गए. तुरंत प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव को फोन लगाया. कहा, 'सर. देखिए, ऐसा है कि मैंने कुछ किया नहीं है. और बिनाकिए ही मेरे अकाउंट में प्रॉफिट हो गया है. डॉलर का भाव बढ़ने से मुझे 'WindfallGains' हुआ है. मैं चाहता हूं कि इस प्रॉफिट को प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करदिया जाए. मनमोहन सिंह की ईमानदारी का ये लेवल था!4. सुधार होने से पहले की बात है. देश में बड़ी दिक्कत हो गई थी. प्रधानमंत्रीनरसिम्हा राव को खाली खजाना मिला था. बड़ी चिंता में थे. ऐसे में उनके फ्रेंड उस समयके 'महान राजनीतिक तांत्रिक' चंद्रास्वामी उनके घर आये.चंद्रास्वामीचंद्रास्वामी ने राव की लकीरों को देखा और कहा, 'दोस्त, चिंता मत करो. मैंने अपनेमित्र ब्रुनेई के शाह से बात की है. उन्होंने कहा है कि जितना पैसा चाहिए, उधारदेंगे. बिना सवाल पूछे.' राव ने इस बात को एकदम सीरियसली ले लिया. तुरंत एक प्लेनतैयार किया गया. ब्रुनेई से माल मंगवाने के लिए. जब बाकी नेताओं और अफसरों को पताचला तो भागे-भागे आए. राव को समझाया.लल्लन के ख़ुफ़िया पंछियों के मुताबिक, उस वक्त कहा गया था, 'सर, ऐसे थोड़ी ना होताहै! देश-विदेश का मामला है. नाक कट जाएगी. शाह अपना मामा थोड़े है जो जेबें और बगलीभर के गिन्नियां दे देगा.'(जयराम रमेश की किताब 'To The Brink & Back' से)--------------------------------------------------------------------------------नरसिम्हा राव 28 जून, 1921 को पैदा हुए थे. 23 दिसंबर, 2004 को वो नहीं रहे.