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मिलिए, अफज़ल गुरु, कसाब और याकूब मेमन को फांसी देने वाले जल्लादों से

जानिए फांसी देना कितना आसान या मुश्किल होता है.

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रुचिका
20 मार्च 2020 (अपडेटेड: 20 मार्च 2020, 06:42 AM IST)
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निर्भया निर्भया के चार दोषियों- अक्षय, विनय, पवन और मुकेश को 20 मार्च 2020 को फांसी दी गई. ये 21वीं सदी का दूसरा ऐसा मामला है, जब किसी रेपिस्ट को फांसी की सज़ा दी गई. इससे पहले धनंजय चटर्जी को बलात्कार के जुर्म में 14 अगस्त, 2004 को कोलकाता की अलीपोर जेल में फांसी दी गई थी. भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के मुताबिक, 'किसी भी व्यक्ति की जिंदगी या उसकी स्वतंत्रता नहीं छीनी जानी चाहिए, ऐसा सिर्फ कानून के तहत किया जा सकता है.'

पिछले एक दशक में भारतीय न्यायपालिका ने 1300 से ज्यादा लोगों को मौत की सजा सुनाई, लेकिन इनमें से फांसी सिर्फ याकूब मेमन, अफ़ज़ल गुरु और कसाब को दी गई.


फांसी की सज़ा सुनाता तो एक जज है, लेकिन उसे अंजाम तक कोई और पहुंचाता है. कोई और होता है, जो उस रस्सी को काटता है. फांसी देते वक्त जेल अधीक्षक, एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट और 'जल्लाद' मौजूद रहते हैं. इनमें से कोई एक भी कम हुआ, तो फांसी नहीं दी जा सकती. जल्लाद ही है जो मुजरिमों को फांसी देता है. लेकिन, क्या किसी जल्लाद के लिए लोगों को फांसी देना आसान है?

फांसी को लेकर लोगों के मन में बहुत से सवाल रहते होंगे. जैसे फांसी सिर्फ सुबह ही क्यों दी जाती है? इतना बड़ा गुनाह करके जब अपराधी खुद फांसी के तख्ते पर चढ़ता है, तो उसे कैसा लगता है? फांसी किस तरह दी जाती है? जल्लाद कौन होते हैं?

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जेल मैन्युअल के तहत फांसी सूर्योदय से पहले दी जाती है, ताकि जेल के दूसरे काम इससे प्रभावित न हों. फांसी के लिए एक खास किस्म की रस्सी का प्रयोग किया जाता है. इसे मनिला कहते हैं. भारत में ये रस्सी सिर्फ एक जगह बनाई जाती है, बक्सर सेंट्रल जेल में. तय वक्त पर मुजरिम को फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया जाता है. इसी दौरान उसे उसका गुनाह, जिसके लिए उसे फांसी दी जा रही है, बताया जाता है.

तभी जल्लाद मुजरिम के हाथ पीछे से बांध देता है और दोनों पैर भी बांध दिए जाते हैं. इसी वक्त जल्लाद मुजरिम के सिर पर काला कपड़ा डालता है और अपनी प्रार्थना पढ़ता है. तयशुदा वक्त पर जैसे ही जल्लाद के हाथों लीवर खींचा जाता है, मुजरिम लटक जाता है.

मुजरिम को कितनी देर तक फांसी पर लटकाया जाता है, इसका कोई निर्धारित वक्त नहीं है. फांसी के बाद अपराधी की मौत की जांच के लिए वहां एक डॉक्टर मौजूद रहता है, जो दस मिनट बाद फंदे में ही चेकअप करता है. डॉक्टर के अपराधी को मरा घोषित करने के बाद ही लाश को फंदे से उतारा जाता है.


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पवन जल्लाद

देश में एकमात्र पुश्तैनी जल्लाद हैं- पवन जल्लाद. देश के चर्चित अपहरण कांड के दोषी रंगा-बिल्ला को फांसी पवन के दादा कल्लू जल्लाद ने ही दी थी. तब कल्लू जल्लाद को मेरठ से दिल्ली की सेंट्रल जेल बुलाया गया था. यही नहीं, इंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह को भी कल्लू ने ही फांसी का फंदा पहनाया था. पवन पांच बार अपने दादा कल्लू सिंह को फांसी देते हुए देख चुके हैं. उन पांच में से तीन बलात्कार के ही दोषी थे:


1. दिल्ली तिहाड़ जेल- 1987- इंदिरा गांधी के हत्यारे 2. डिस्ट्रिक्ट जेल आगरा- 1988- रेप का दोषी 3. इलाहाबाद- 1988- रेप का दोषी 4. जयपुर- 1988- रेप का दोषी 5. पटियाला- 1989- दो भाई, जिन्होंने अपने ही भाई-बहनों की प्रॉपर्टी को लेकर हत्या की थी

1993 मुंबई बॉम्ब ब्लास्ट के दोषियों में से एक याकूब मेमन को 30 जुलाई, 2015 को फांसी दी गई थी. महाराष्ट्र के नागपुर सेंट्रल जेल में जिस शख्स ने याकूब को फंदे पर लटकाया था, वह उसी जेल का एक कॉन्स्टेबल था. उन्हें इस बात पर गर्व है कि उन्होंने याकूब मेमन को फांसी लगाई. इसे वह अपनी ड्यूटी का ही एक हिस्सा मानते हैं.


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याकूब मेमन

26/11 हमले के आरोपी मोहम्मद अजमल आमिर क़साब को 21 नवंबर, 2012 को फांसी दी गई थी. यहां भी यरवदा सेंट्रल जेल के कॉन्स्टेबल ने उसे फांसी लगाई थी.


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कसाब

मोहम्मद अफज़ल गुरु 2001 में भारतीय संसद पर हुए आतंकी हमले का दोषी था. उसे 9 फ़रवरी, 2013 की सुबह दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी पर लटकाया गया था. ये काम भी इसी जेल के एक कॉन्स्टेबल ने किया था.


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अफज़ल गुरु

आसान तो नहीं होता किसी को भी मौत के घाट उतारना, लेकिन ये जल्लाद इस बात के लिए खुद को लकी मानते हैं. ऐसे आरोपियों को सज़ा देना, जिनकी वजह से कई मासूमों की जान गई हो. आखिरी वक्त में मुजरिमों की हालत भी बहुत खराब रहती है. कई बार ऐसा ये भी हुआ कि रो-रोकर बेहाल हुए मुजरिमों को जैसे-तैसे खड़ा करके फांसी लगाई गई.




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